व्योहारिक ज्ञान ---- (१)दस प्रकाार के लोग धर्म को तत्त्व से नहीं जानते हैं ----- नशेसे मतवाला ,असावधान ,पागल ,थका हुआ ,क्रोधी ,भूखा ,जल्दबाज ,लोभी ,भयभीत ,और कामी !अतः विद्वान पुरुष को इनको धर्म का उपदेश नहीं करना चाहिए
(२)जो पुरुष घर छोड़कर निरथर्क बाहर निबास,पापियों से मेलजोल ,पर स्त्रीगमन ,पाखंड ,चोरी ,चुगलखोरी और मदिरापान--- इन सबका सेवन नहीं करता है !वह हमेशा सुखी रहता है !
(३)जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों को शांति प्रदान करने में तत्पर ,कोमल, सत्यबादी ,दूसरों को आदर देने वाला ,तथा पवित्र विचारवाला होता है ! वह अच्छी खान से निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रत्न की भांति सभी लोगों के मध्य अधिक प्रसिद्धि पाता है !
(४)उन्नति चाहने वाले पुरुष को वही वस्तु खानी या ग्रहण करनी चाहिए जो परिणाम में अनिष्टकर ना हो अर्थात जो खाने योग्य हो तथा खायी जा सके ! तथा खाने या ग्रहण करने पर पचा सके और पच जाने के बाद हितकारी हो !
(५)मनुष्य का शरीर रथ है ,बुद्धि सारथि है ,और इन्द्रियां घोड़े है ! ,इनको बस में करके सावधान रहने वाला चतुर एवं धीर मनुष्य काबू में किये हुए घोड़ों से रथी की भांति सुखपूर्वक अपनी जीवन यात्रा करता है !
(६) शिक्छा न पाये हुए तथा काबू में ना रहने वाले घोड़े जैसे रथ पर सबार को मार्ग में गिरा देते हैं वैसे ही इन्द्रियों को बस में ना रखने वाले पुरुष भी भोगों में फसकर उत्तम मार्ग से पतित हो जाता है !
(७) इन्द्रियों को बस में ना रखने का कारण मनुष्य बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा समझ कर बहुत बड़े दुःख को भी सुख मान लेता है! जो धर्म और अर्थ को त्यागकर इन्द्रियों के वस में हो जाता है ! वह शीघ्र ही एशबर्या .प्राण ,धन ,तथा पत्नी से भी हाँथ धो बैठता है !मन बुद्धि और इन्द्रियों को अपने बस में रखकर अपने से ही अपनी आत्मा को जानने की इक्छा करे ! क्योँकि मनुष्य आप ही अपना शत्रु और मित्र है !जिसने स्वयं ही अपने मन बुद्धि सहित शरीर को जीत लिया है !उसका शरीर ही उसका मित्र है और न जीता हुआ शरीर ही शत्रु है !
(२)जो पुरुष घर छोड़कर निरथर्क बाहर निबास,पापियों से मेलजोल ,पर स्त्रीगमन ,पाखंड ,चोरी ,चुगलखोरी और मदिरापान--- इन सबका सेवन नहीं करता है !वह हमेशा सुखी रहता है !
(३)जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों को शांति प्रदान करने में तत्पर ,कोमल, सत्यबादी ,दूसरों को आदर देने वाला ,तथा पवित्र विचारवाला होता है ! वह अच्छी खान से निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रत्न की भांति सभी लोगों के मध्य अधिक प्रसिद्धि पाता है !
(४)उन्नति चाहने वाले पुरुष को वही वस्तु खानी या ग्रहण करनी चाहिए जो परिणाम में अनिष्टकर ना हो अर्थात जो खाने योग्य हो तथा खायी जा सके ! तथा खाने या ग्रहण करने पर पचा सके और पच जाने के बाद हितकारी हो !
(५)मनुष्य का शरीर रथ है ,बुद्धि सारथि है ,और इन्द्रियां घोड़े है ! ,इनको बस में करके सावधान रहने वाला चतुर एवं धीर मनुष्य काबू में किये हुए घोड़ों से रथी की भांति सुखपूर्वक अपनी जीवन यात्रा करता है !
(६) शिक्छा न पाये हुए तथा काबू में ना रहने वाले घोड़े जैसे रथ पर सबार को मार्ग में गिरा देते हैं वैसे ही इन्द्रियों को बस में ना रखने वाले पुरुष भी भोगों में फसकर उत्तम मार्ग से पतित हो जाता है !
(७) इन्द्रियों को बस में ना रखने का कारण मनुष्य बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा समझ कर बहुत बड़े दुःख को भी सुख मान लेता है! जो धर्म और अर्थ को त्यागकर इन्द्रियों के वस में हो जाता है ! वह शीघ्र ही एशबर्या .प्राण ,धन ,तथा पत्नी से भी हाँथ धो बैठता है !मन बुद्धि और इन्द्रियों को अपने बस में रखकर अपने से ही अपनी आत्मा को जानने की इक्छा करे ! क्योँकि मनुष्य आप ही अपना शत्रु और मित्र है !जिसने स्वयं ही अपने मन बुद्धि सहित शरीर को जीत लिया है !उसका शरीर ही उसका मित्र है और न जीता हुआ शरीर ही शत्रु है !
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