Tuesday, 31 May 2016

लोकतंत्र का स्वास्थ्य तथा सफलता निर्भीक और तटस्थ विचारों की अभिव्यक्ति से सिद्ध होती है !जिस लोकतंत्र में किसी एक विचार के विवेक शून्य अंधभक्तों का बाहुल्य हो जाता है !बे लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु होते हैं !लोकतंत्र में सत्ता का प्रवाह जनसाधारण के अभिमुख होना चाहिए और जनसाधारण से प्रतिनिधित्त्व प्राप्त सामान्य व्यक्तियों का रहन सहन जनसाधारण के अनुरुप और आचरण शुद्ध और ईमानदारी तथा लोकहित को समर्पित  होना चाहिए !उनकी नीतियां देश और काल के अनुरुप होनी चाहिए !भारत से अधिक प्राचीन कोई और देश पृथवी पर नहीं है !इस देश की प्राचीन संस्कृति सत्य ,अहिंसा ,अपरिग्रह अस्तेय और ब्रह्मचर्य प्रधान रही है !ये संस्कृति के मूल तत्त्व हैं !संस्कृति बदलती रहती है किन्तु ये ये मुलतत्तव नहीे बदलते हैं !यास्क ने सनातन की ब्याख्या करते हुए कहा है सनातनो नित्य नूतनह (सनातन सदैव नवीन है वह कभी  पुरातन नहीं होता है ) इस देश में सभी विचारों और धर्मों का प्रवेश और पोषण हुआ है !वह सिर्फ इसीलिए सम्भव हो सका है क्योंकि यह हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म की विशेषता और विरासत है !इसीलिए इसकी रक्छा और सुरक्छा तथा इसके आदर्शों और मूल तत्तवों को जीवित रखने का उत्तर दायितव सभ धर्मों पर है !अगर वैदिक धर्म का आधार ही नष्ट हो गया तो नातो सर्वधर्म समभाव रहेगा और नाही पवित्र भूमि भारत में उत्पान्न ऋषियों ,महाऋषियों ,अवतारों की परंपरा ही कायम रहेगी !और ना ही महर्षि अरविंदो ,रमण गांधी ,विनोबा दयानन्द ,अदि का जन्म होगा !इन महापुरुषों की अनादि श्रृंखला का अभी तक नाश नहीं हुआ क्योंकि इनके जाने से भारत माता की गोाद सूनी हुई कोख सूनी नहीं हुई !           
शाश्त्र विधियों का निर्माण अनुभव के आधार पर होता है !और समय और परिश्थित के अनुसार इन विधियों में शोध और नए नए अनुभवों के आधार पर बदलाव भी होता रहता है !किन्तु मूल लोकहित की बात कायम रहती है !भोजन भवन निर्माण आदि के सम्बन्ध में बहुत सी लोक कल्याणकारी व्यबस्थाएं भारतीय धर्म ग्रंथों में विद्यमान है !भवन निर्माण में वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण करने से बहुत सी विपदाओं का निराकरण हो जाता है !किन्तु आज जो विशाल भवनो या भवनो का निर्माण हो रहा है !उसमे अधिकाँश में वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन नहीं हो रहा है !तथा लोग बने हुए मकानो को खरीदने के लिए विवस हैं !अब भवन निर्माण के पूर्व विधि विधान से भूमि का पूजन भी नहीं होता है !इसीलिए वास्तुशास्त्र के नियमों के विरुद्ध निर्मित भवनो से होने वाली विपदाओं से निबृत्ति के अन्य बहुत से उपाय शाश्त्रों में बताये गए हैं !उनके पालन से भी संकटों से मुक्ति हो जाती है !भोजन के मामले में तो स्वस्थ्य वर्धक सारे नियमों का परित्याग हो गया है !परिणाम स्वरुप संपूर्ण समाज गंभीर और साधारण रोगों से ग्रस्त हो गया है !वैदिक धर्म में भोजन पकाने भोजन के पदार्थों को शुद्ध करने भोजन करने के समय के आसान भोजन के समय मन बुद्धि चित्त आदि की स्थति आदि का बहुत मूलयवान विधान प्रस्तुत किया गया है !किन्तु इन विधानों का पालन बहुत कम लोग करते देखे जाते हैं !मनुष्य के जीवन में बहुत सी हिन्शात्मक स्वार्थ प्रधान समाज में बिघटन कारी प्रवृत्तिओं का जन्म अशुद्ध भोजन के कारण ही हुआ है !भोजन से ही प्राणियों के विचार और व्योहार का निर्माण होता है !उत्तम मध्यम और अधम भोजन के पदार्थ किस प्रकार के होते हैं !और उनके खाने से मनुष्य के शरीर और अन्तः करण का उत्तम और अधम निर्माण किस प्रकार से होता है ! इसका विवरण श्री मद भगवद गीता में १७(८,९,और १०) में किया गया है !यहाँ इस लेख में भी भोजन करने के अत्यंत उपयोगी नियम बताये गए हैं !

Monday, 30 May 2016

सावरकर बन्धु ------ ब्रिटिश सरकार ने १९१९ में एक अधिनयम के द्वारा उन  राजनैतिक अपराधियों को जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के साथ सहयोग करने की शर्त स्वीकार कर ली थी उनके विरुद्ध राज्य द्रोह के मुकदद्मे वापिस लेने और उन्हें जेल से रिहा करने का आदेश वाइस राय को दिया था ! सावरकर बंधुओं ने अपने राजनैतक विचार स्पष्ट करते हुए कहा था कि अब उनके मन में किसी प्रकार का क्रांतिकारी इरादा नहीं है !




















1और अगर उन्हें मुक्त कर दिया गया तो बे सुधार कानून केअधीन काम करना पसंद करेंगे क्योंकि उनका ख्याल है की अधिनियम में निर्दिष्ट सुधारों से देश की जनता को लाभ होगा दोनों ने स्पष्ट शव्दों में बता दिया था कि बे अब ब्रिटिश सम्बन्धों से भारत को मुक्त नहीं कराना चाहते हैं ! बे यह महसूस करते हैं कि भारत की किस्मत ब्रिटेन के साथ रहकर ही सबसे अच्छी तरह गढ़ी जासकती है ! किन्तु ब्रिटिश सरकार ने उनके इस लिखित वक्तव्य के बाद भी उनको रिहा नहीं किया था  !तब सावरकर के सबसे बड़े भाई ने गांधी जी से अपने दोनों भाईयों की रहाई के लिए प्रार्थना  की थी !और भी लोगों ने गांधी जी से इस प्रकरण को ब्रिटिश सरकार के सामने रखने के लिए कहा था  !गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार से कहा था कि सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जनकल्याण के लिए होना चाहिए !अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो तो उसके ये दो निष्ठाबान पुत्र सदा के लिए हांथ से चले जाएंगे ! दोनों भाईयों का शरीर जेल की यातनाओं से जर्जर हो चुके है ! एक सावरकर भाई को मैं अच्छी तरह जानता हूँ मुझे लन्दन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था ! (विनायक दामोदर सावरकर से गांधीजी की मुलाक़ात १९०९ में लन्दन में विजयादशमीके उपलकछय में आयोजित एक भोज में हुई थी ) बे बहादुर हैं ,चतुर हैं देशभक्त हैं !बे क्रन्तिकारी हैं और इसे छिपाते नहीं हैं !मौजूदा ब्रिटिश  शाशन प्रणाली की बुराईका सबसे भीसण रूप उन्होंने बहुत पहले देख लिया था ! मुझ से भी काफी पहले समझ लिया था ! बे आज भारत को,अपने देश को दिलोजान से प्यार करने के अपराध में काले पानी की सजा भोग रहे हैं ! अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो बे किसी ऊँचे शासकीय  पद को सुशोभित कर रहे होते ! मुझे उनके और उनके भाई के प्रति बड़ा दुःख है ! गणेश सावरकर तो १४ साल २ मास की सजा भोग चुके हैं अतः कानूनन उन्हें रिहाई का अधिकार प्राप्त है ! भारतीय दण्ड सहित का खण्ड ५५ इस प्रकार है -----ऐसे हर मामले में जिसमें आजीवन काले पानी की सजा दी जाती है भारत सरकार अथवा उस स्थान की सरकार जिसकी सीमा में उक्त दण्ड दिया गया हो दोनों में से हर तरह के अभियुक्त की सहमति के बिना उसकी सजा घटाकर १४ साल की जा सकती है ! इस धारा  के अंतर्गत दोनों भाईओं को दो मास पूर्व ही रिहा होजाना चाहिए था ! चूँकि दोनों भाई अण्डमान से हटा दिए गए हैं ! इसीलिए जिस खण्ड को मेने उद्धृत किया है वह उनके पक्छ में लागू किया जाना चाहिए ! गांधी जी के प्रयत्न और हस्तछेप से दोनों भाई १९३७ में रह कर दिए गए थे !विनायक दामोदर सावरकर गांधी बध में मुल्जिम थे किन्तु अपराध सिद्ध ना होने के कारण छोड़ दिए गए थे !    

Sunday, 29 May 2016

ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री की शपथ ईश्वर अल्लाह के नाम से लेकर इस्लाम के प्रति सर्वधर्म समभाव का प्रदर्शन किया !और इसके साथ ही मुसलमानो के प्रति अपने प्रेम  को प्रदर्शित कर अपने राजनैतिक स्वार्थ की भी सिद्धि  की !इस प्रकार की शपथ इसके पूर्व किसी भी मुख्या मंत्री य मंत्री ने नहीं ली थी !गांधी जी ने भी अपनी नित्य की प्रार्थना ईश्वर अल्लाह तेरे नाम  के साथ करते थे !गांधीजी का परम  उद्देश्य हिन्दू मुसलिम एकता का था !यद्द्पि उनके मार्ग में अनेक बाधाएं आई किन्तु उन्होंने एकता का अपना प्रयत्न ना समाप्त किया और ना इसको शिथिल होने दिया !नोआखली जो विभाजन के पहले बंगाल का हिस्सा था और अब बांग्ला देश में हैं !वहां हिन्दू मुसलिम दंगा फुट पड़ा था जिसमें हिन्दुओं का सामूहिक कत्ले आम हुआ था !दंगा को रोकने के लिए गांधीजी ने ११६ मील की पैदल यात्रा १०४ डिग्री बुखार में नंगे पैर की थी जिस से उनके पैरों में छाले पड़   गए थे !उस समय बंगाल में मुसलिम लीग की सरकार थी जिसके मुख्य्मंत्री शहीद सुहरावर्दी थे !उन्होंने स्वयं हिन्दुओं के कत्ले आम में हिस्सा लेकर अहम भूमिका निभायी थी !गांधी जी को वहां कट्टरपंथी मुसमान ईश्वर अल्लाह ,राम रहीम और कृष्णा करीम वाली प्रार्थना नहीं करने देते थे !ये कट्टरपंथी मुस्लिम गांधी जी को जान से मारने की धमकी भी देते थे !किन्तु गांधी जी ने इस सबकी परवाह ना करके वहां शांति स्थापित कर दी थी !बाद में बे कोलकत्ता   में हैदरी मेन्सन   में सुहरावर्दी के साथ रहे थे और हिन्दू मुसलिम एकता के प्रयास में संलगन रहते हुए बे १५ अगस्त १९४७ को भी कलकत्ता में ही थे !गांधी जी को शहीद भी इसिलए होना पड़ा क्योंकिबे हिन्दू मुसलिम एकता को राष्ट्र के लिए अनिवार्य और आवश्यक मानते थे !किन्तु बे अपने इस प्रयत्न   में सफल नहीं हो सके थे !और पूरी शक्ति लगाने  के बाद भी देश का विभाजन नहीं रोक पाये थे !विभाजन के पहले बे कहते थे की बे १२५ साल जीवित रहना चाहते हैं !किन्तु विभाजन के बाद वह एक ही बात कहते थे की बे अब जीवित नहीं रहना चाहते हैं !जिस हिन्दुमुसलिम एकता के प्रयत्न के कारण गांधी जी को शहीद होना पड़ा था !और जिसके कारन आज भी बहुत से द्रगभ्रमित हिन्दू उनको गद्दार और राष्ट्र द्रोही  कहते हैं और उनके हत्यारे गोडसे को देश भक्त कहते हैं ! इसके लिए कट्टरपंथी मुसलमान बहुत हद तक जिम्मेदार हैं !अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश और कश्मीर में हिन्दुओं पर अत्याचार ना हुए होते और भारत में भी कट्टरपंथी मुसलमान नेता ,मुल्ला मौलवी कट्टरपंथ का स्वमर्थन अपने निम्न स्वार्थों की पूर्ति के लिए नहीं करते तो आज गांधी जी को कट्टरपंथी हिन्दू गद्दार नहीं कहते और ना ही मनगढंत झूठे आरोप लगाते !कट्टरपंथी मुल्लों  ,मौलवियों और मुसलिम नेताओं को हिन्दू धर्म की उदारता और गांधी जी की सहादत को ध्यान में रख कर हिन्दू मुसलिम एकता के लिए काम कर गांधी जी के स्वप्न को साकार करना चाहिए  !और हिन्दू मुसलीममे भेद उतपन्न  करनेवालों के मंसूबों को ध्वस्त करना चाहिए !यह काम मुसलमानो को करना है !क्योंकि ममता बनर्जी ऐसे लोग तो आजभी एकता के लिए काम कर रहे है !

Friday, 27 May 2016

पराह्न बजे ·
गांधी जी के बारे में जो भ्रम राजनीति के कारण उन लोगों ने फैलाया जो ,देश की स्वतंत्रता नहीं चाहते थे !और जो न देश को उसका पुरातन परिवर्तित गौरव स्वरुप ही प्राप्त होने देना चाहते थे i और ना ही जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा लिया था !और जिन्हे स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हुई इसकी भी सही जानकारी नहीं है !बे इस तरह के गैर जिम्मेदारी के असत्य मनगढ़ंत आरोप गांधी जी पर लगाते हैं !उनकी उपेक्छा करना ही ठीक है !उनके लिए तो सिर्फ यही कहना ठीक है की सूर्य की ओर मुंह कर के थूका गया थूंक सूर्य पर नहीं थूकने वाले के ही सर पर गिरता है !जिस संकुचित कटटरपंथी विचार के ये गांधी जी का भ्रामक प्रचार करने वाले लोग पोषक है और प्रचारक है !तथा जिन पुश्तकों या लोगों से इन्हे यह घातक ज्ञान प्राप्त हुआ है !यदि उन विचारों को प्रश्रय देने वाली राजनैतिक सत्ता आज देश में है !तो इन आँख के अंधों और लकवाग्रस्त दिमाग वालों को जल्दी से जल्दी सरकार के सहयोग से गांधी जी का चित्र नोटों पर से हटवा देना चाहिए !और देश के सभी स्थानो से गांधी जी की प्रतिमाएं भी हटवा देनी चाहिए और गांधी जी का संपूर्ण साहित्य भी आग की भेंट करवा देना चाहिए !इस से गांधी जी की आत्मा को शांति मिलेगी ! क्योँकि गांधी जी स्वयं नहीं चाहते थे कि उनका चित्र किसी जगह छपे !उन्होंने कहा था की अच्छा यह होगा की जो कुछ मैने कहा है और लिखा है वह मेरी मृत्यु के बाद मेरी ल्हास के साथ ही जला दिया जाय !क्योंकि कायम वह नहीं रहेगा जो मैने कहा है !कायम वह रहेगा जो मैने किया है !मृत्यु के बाद भी मेरे अहिंसा और सत्य पोषक जीवन चर्या युगों युगों तक मार्ग दर्शक बन कर प्रेरणा देती रहेगी !मैने कोई नया सिद्धांत उत्पन्न नहीं किया है !मेने सत्य अहिंसा संयम सेवा के उन्ही भावों को आत्मशात करने का प्रयत्न किया है !जिनको भारत के ऋषिओं मनीषियों ने अपने जीवन में जिया था !गांधी जी किसी भी रूप स्वरुप में अपनी स्मृति के पोषक नहीं थे !किन्तु उनके चाहने वालों ने उनकी मूर्तियां खड़ी करदी ! उनके नाम के आश्रम बना दिए ! उनके जन्म दिन पर छुट्टी घोषित कर दी !और आज भी विश्व का अधिकाँश देशों में उनकी स्मृति में मूर्तियां खड़ी की जारही है उनके नाम के डाक टिकट जारी किये जा रहे हैं !और संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके जन्म दिवस को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है !दूसरी और ये भ्रम फ़ैलाने वाले लोग हैं !जिन्हे गांधी जी का नाम शूल के सामान चुभता है !और ये अपने मनगढंत आरोपों के कारण खुद तो जान बूझ कर अन्धकार के गहरे खड्ड में पड़े हुए हैं !यह इसप्रकार के कुत्सित असत्य प्रचार से दूसरे लोगों के चित्त को भी दूषित करते हैं !इसीलिए इनको यह स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ है ! कि यह गांधी जी की विदाई कर महान देशभक्त नाथू राम गोडसे की प्रतिमाएं स्थापित कर दे !और जो भो इनकी नजर में देश को आजाद कराने वाले हैं उनकी प्रतिमाएं सम्पूर्ण छेत्रों में स्थापित करा दे !फिर इन्हे पता लगेगा की देश इन्हे किस रूप में शीघ्र ही याद करेगा !

Thursday, 26 May 2016

मोदीजी को केंद्र की सत्ता के आज दो साल पूरे हुए हैं !केंद्र सरकार ने इन दो सालों में जो कार्य किये हैं !उनका विस्तृत विवरण समाचार पत्रों में पकाशित हुआ है !केजरीवाल ने कहा है कि इन विज्ञापनों पर सरकार ने १००० करोड़ का व्यय किया है !केजरीवाल भी जब अपनी सरकार की उपलब्धियों का विवरण विज्ञापनों से करते हैं !तो उन पर भी भाजपा और कांग्रेस सरकारी धन के दुरपयोग का आरोप लगाती हैं !सरकारी पैसे  से विज्ञापन देने का रिबाज  पड़ गया है !मोदी सरकार का नारा है देश बदल रहाहै !विकास हो रहा है !सरकारी कार्यों का लेखा जोखा जनता के सामने रखना यह अच्छी बात है !किन्तु इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें सरकारी धन का दुरुयोग ना हो !मोदी जी की सरकार की अर्थनीति ,विदेश नीति आदि के सम्बन्ध में आमजनता अपनी कोई राय प्रगट नहीं कर सकती है !जनता की प्रसन्नता तो इस बात में है !कि  उसे भ्रष्टाचार से मुक्ति प्राप्त हो !उसकी सामर्थ्य के अनुसार उसको शिक्छा स्वास्थ्य आदि की सुविधाएं प्राप्त हों और उचित भाव में दैनिक उपयोग की वस्तुएं प्राप्त हों !प्रेस में और चैनल में एक और मोदी जी की सरकार की सफलता का गुण गान किया जारहा हैं !वहीं दूसरी और उनके कट्टर राजनैतिक विरोधी उनकी सभी छेत्रों में विफलता  का राग भी बड़ी जोर से अलाप रहे हैं !यह कह पाना बड़ा मुशिकिल है !कि सही  बात क्या है ? राजनैतिक विरोध इतना तीब्र है !कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगा रही है !तो विरोधी राजनैतिक दल  संघ मुक्त भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं !यह तो आने वाल समय ही बताएगा कि जनता किसको मुक्ति प्रदान कराती है ! 

मोदीजी को केंद्र की सत्ता के आज दो साल पूरे हुए हैं !केंद्र सरकार ने इन दो सालों में जो कार्य किये हैं !उनका विस्तृत विवरण समाचार पत्रों में पकाशित हुआ है !केजरीवाल ने कहा है कि इन विज्ञापनों पर सरकार ने १००० करोड़ का व्यय किया है !केजरीवाल भी जब अपनी सरकार की उपलब्धियों का विवरण विज्ञापनों से करते हैं !तो उन पर भी भाजपा और कांग्रेस सरकारी धन के दुरपयोग का आरोप लगाती हैं !सरकारी पैसे  से विज्ञापन देने का रिबाज  पड़ गया है !मोदी सरकार का नारा है देश बदल रहाहै !विकास हो रहा है !सरकारी कार्यों का लेखा जोखा जनता के सामने रखना यह अच्छी बात है !किन्तु इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसमें सरकारी धन का दुरुयोग ना हो !मोदी जी की सरकार की अर्थनीति ,विदेश नीति आदि के सम्बन्ध में आमजनता अपनी कोई राय प्रगट नहीं कर सकती है !जनता की प्रसन्नता तो इस बात में है !कि  उसे भ्रष्टाचार से मुक्ति प्राप्त हो !उसकी सामर्थ्य के अनुसार उसको शिक्छा स्वास्थ्य आदि की सुविधाएं प्राप्त हों और उचित भाव में दैनिक उपयोग की वस्तुएं प्राप्त हों !प्रेस में और चैनल में एक और मोदी जी की सरकार की सफलता का गुण गान किया जारहा हैं !वहीं दूसरी और उनके कट्टर राजनैतिक विरोधी उनकी सभी छेत्रों में विफलता  का राग भी बड़ी जोर से अलाप रहे हैं !यह कह पाना बड़ा मुशिकिल है !कि सही  बात क्या है ? राजनैतिक विरोध इतना तीब्र है !कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगा रही है !तो विरोधी राजनैतिक दल  संघ मुक्त भारत का नारा बुलंद कर रहे हैं !यह तो आने वाल समय ही बताएगा कि जनता किसको मुक्ति प्रदान कराती है ! 

Monday, 23 May 2016

सूर्य की उपासना से ही युधिस्ठर ने अक्छय पात्र की प्राप्ति की थी !भगवान सूर्य ने युधिस्ठर की उपासना से प्रसन्न होकर उन्हें ताम्बे की बटलोई दी थी !उस बटलोई में फल मूल भोजन करने के योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकार की भोजन सामग्री तैयार होती थी ! वह पात्र के प्रभाव से बढ़ जाती थी ! और अक्छय हो जाती थी !उस से कितने भी मनुष्य भोजन करें वह समाप्त नहीं होती थी !सबको भोजन कराने के बाद शेष अन्न द्रौपदी स्वयं खाती थी !उसके भोजन करने के बाद उस पात्र का अन्न समाप्त हो जाता था !जब पांडव बनबास में थे ! तब ऋषि धौम्य ने यह उपासना युधिस्ठर को बताई थी !युधिस्ठिर ने गंगा जी के जल में स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारों द्वारा सूर्य भगवान की पूजा की ! और उनके सम्मुख मुह करके खड़े हो गए ! गंगा जल का आचमन करके पवित्र हो उन्होंने अष्टोत्तर शतक नामक स्त्रोत्र का जाप किया ! जो मनुष्य सूर्योदय के समय भली भांति एकाग्र चित्त हो सूर्य के इन नामो का पाठ करता है ! वह स्त्री पुत्र धन रत्न पूर्वजन्म की स्मृति धैर्य तथा उत्तम बुद्धि को प्राप्त कर लेता है ! वह शोक रूपी दाबानाल से युक्त दुस्तर संसार सागर से मुक्त हो मनचाही बस्तुओं को प्राप्त कर लेता है ! जो सप्तमी अथवा षष्ठी को भक्ति भाव से सूर्य की पूजा करता है ! उस मनुष्य पर लक्ष्मी जी की अपार कृपा रहती है !सूर्य उपासना का यह संपूर्ण विधान महाभारत में है !
धर्म नहीं श्रेष्ठता है समस्या !इस विषय को अन्य पहलू से भी समझा जा सकता है !उत्क्रांति बाद का सिद्धांत भारत के बाहर पैदा हुआ है !जिसके अनुसार मनुष्य का बर्तमान सभ्यता तक आने का इतिहास जंगली मानव से शुरू होकर यहाँ तक पहुँचता है ! !वैदिक संस्कृति इसके विपरीत मानती है !आज जिस जीवन शैली को श्रेष्ठ माना जाता है !वैदिक संस्कृति के अनुसार आज की जीवन शैली आदि संस्कृति के विल्कुल विपरीत और पतन शील है !आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को जीवन मूल्यों से बिहीन कर दिया है !आज का मनुष्य अत्यंत निकृष्ट और स्वारथी तथा सम्बेदन हीन हो गया है !और अपना विनाश करने की ओर स्वयं प्रवृत्त हुआ है !जबकि पूर्व बर्ती मनुष्य ऐसा नहीं था !तथा बर्तमान युग से अधिक विकसित सुसंकृत और ज्ञान विज्ञान से युक्त था !वैदिक संस्कृति ने श्रष्टि के काल को चार युगों सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग में विभाजित किया है !और हर युग का काल और उस युग में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों के स्वभाव को भी बताया है !सतयुग के मनुष्य की आयु हजारों बर्ष की होती थी !किसी भी मनुष्य को रोग आदि की व्याधि नहीं होती थी !सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ प्रकृति से सहज ही में प्राप्त होते थे !मनुष्यों के पास तीव्रगामी विमान थे !जो बिना ईंधन के चलते थे !लोग झूठ छल कपट आदि से जीविका नहीं चलाते थे !न कोई राजा था न जाति था !यह श्रेष्ठ युग वैदिक संस्कृति के अनुसार माना जाता है !इसके बाद त्रेता द्वापर में मानव मूल्यों का क्रमिक ह्राश होता चला जाता है !और बर्तमान काल जिसे कलयुग कहते हैं ! यह सबसे निकृष्ट काल कहलाता है !इसका काल ऋषियों ने ४३२००० साल बताया है !और अभी इसको आये मात्र ५२५० साल हुए है !इस युग में व्यक्ति के भोग की पूर्ति प्रकृति के शोषण से होती है ! !हवाई जहाज जलयान मोटर वाहन आदि सभी भौतिक ईंधन से चलते हैं !इसीलिए इनके लिए पृथ्वी को खोद खोद कर खोखला कर दिया जाता है !इस विकास की अंधी दौड़ में सबकुछ उल्टा हो जाता है !और गलत को सही और सही को गलत समझने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है !अधर्म को ही धर्म समझते हैं !ओर लोग काल्पनिक व्याख्यायें श्रिष्टि के सम्बन्ध में करने लगते हैं !श्रष्टि के विकास और विनाश का वास्तविक ज्ञान महाभारत वेद आदि ग्रंथों में है !उसको पढ़ समझ कर यथार्थ ज्ञान से युक्त होकर ही ऐसे गंभीर विषय की चर्चा में प्रवेश करना चाहिए !

Sunday, 22 May 2016

इस आख्यान में अध्यात्म प्राप्ति की महत्त्व पूर्ण दृष्टि प्राप्त करने की साधना का शिक्छण प्राप्त होता है ! नचिकेता के पिता विश्वजीत नामक यज्ञ तो कर रहे थे !किन्तु विश्वजीत यज्ञ के लिए जो निष्काम भाव से यज्ञ करने का आतंरिक भाव है ! उसको वह अपने अन्तः करण में पूरी तरह से उत्पन्न नहीं कर सके थे !विश्वजीत यज्ञ में जैसा की श्री मद भगवद गीता १७(११)में कहा गया है! कि यज्ञ करना ही कर्तव्य है ----इस तरह मन को संतुष्ट करके फलेक्छा रहित मनुष्य द्वारा जो शाश्त्र विधि से यज्ञ किया जाता है ! वह श्रेष्ठ यज्ञ होता है अर्थात उस यज्ञ से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है !इस विश्व जीत यज्ञ में शाश्त्र बिधि का तो पालन हो रहा था !किन्तु सर्वस्व त्याग के भाव का अभाव था !यज्ञ में जिन गायों का दान किया जा रहा था बे वृद्ध थी और दूध भी नहीं देती थी !नचिकेता ने अपने पिता का इस महत्त्व पूर्ण भूल के लिए ध्यान दिलाया !और कहा की इस यज्ञ में सभी प्रिय वस्तुओं का दान करना पड़ता है !इसलिए आप मुझे किसे दान में देंगे !नचिकेता के पिता को क्रोध आगया और उन्होंने कह दिया तुझे में यम को देता हूँ !यमराज ने भी नचिकेता को अनेक प्रलोभन भौतिक सुख प्राप्ति के लिए बरदान मांगने के लिए दिए !किन्तु आत्मज्ञान का बरदान प्राप्त करने के लिए वह संकल्पित रहा !और अंत में मजबूर होकर यमराज को उसे आत्मज्ञान देना पड़ा !आत्मज्ञान अर्थात अध्यात्म ज्ञान प्राप्ति के लिए साधक भक्त को मनसा बाचा कर्मणा कामनाओं से मुक्त होना पड़ता है !और आत्म संतुष्टि को ही अपनी साधना का ध्येय बनाना पड़ता है ! तभी उसे आत्मज्ञान प्राप्त कराने वाली प्रज्ञा की प्राप्ति होती है !और तभी वह स्थितप्रज्ञ अर्थात आत्मनिष्ठ कह लाता है ! !भगवान श्री कृष्णा ने आत्म ज्ञान निष्ठां की प्राप्ति के लिए २(५५)में कहा है! कि जिस समय मन में आई संपूर्ण कामनाओं का त्याग हो जाता है ! और आत्म संतुष्टि ही एक मात्र ध्येय बन जाता है !उसी समय साधक भक्त को अध्यात्म निष्ठ बुद्धि की प्राप्ति होती है !

Saturday, 21 May 2016

धम्मपद   ब्राह्मण बग्गो गाथा ३८३------- हे ब्राह्मण ! तृष्णा के श्रोत्र को छिन्न कर दे ,पराक्रम कर कामनाओं को दूर करदे !हे ब्राह्मण !संस्कारों के छय को जानकर तू असंस्कृत निर्वाण का जानकार हो जा !ब्राह्मणों के लिए यही उपदेश महाभारत में भी दिया गया है !बिना तृष्णाछय और इंद्रियविजय के निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती है !निर्वाण सहज में बिना तृष्णाछय और इंद्रियविजय के नहीं होता है संसार में जो कुछ इस लोक के भोगों का सुख है और जो स्वर्ग का महान सुख है ,बे दोनों तृष्णा छय से होने वाले सुख की सोलहबीं कला के बराबर भी नहीं हैं ! यह बात व्यासदेव ने महाभारत में कही है 1 तिब्बत  के बौद्ध धर्मग्रंथों में यहाँ तक कहा गया है कि यह महाभारत का श्लोक बुद्धात्तव  प्राप्त होने पर बुद्धके मुंह   से निकला था ! कामना ही तृष्णा ,शोक और परिश्रम इन सबका उत्पत्ति स्थान है ! जब तक ब्राह्मण इन से प्रेरित होकर इधर उधर भटकता रहेगा तब तक ब्राह्मणत्तव की प्राप्ति नहीे हो सकती है 1 ब्राह्मण यह समझ कर कामनाओं का त्याग कर दे कि काम तत्त्व ज्ञान से रहित है ! काम को संतोष देना कठिन है ! जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि में घी की आहुति देने से अग्नि और तीब्र हो जाती है उसी प्रकार कामनाओं के भोग से कामनाएं और तीब्र हो जाती हैं 1 अग्नि के समान कामनाओं का पेट भरना असम्भव है ! निर्वाण के साधक को काम क्रोध ,लोभ ,तृष्णा और कृपणता का त्याग करना पड़ता है !इनके त्याग के बिना मोकछ प्राप्ति के लिए वैराग्य ,सुख ,शांति ,तृप्ति सत्य ,सम ,दम ,छमा और समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव ये सभी सद्गुण प्राप्त नहीं होते हैं 1मोक्छ या निर्वाण प्राप्ति के ये सभी साधन जिन ब्राह्मणो ने इंडियनिग्रह ,तृष्णा छय और कामनाओं के विनाश से प्राप्त कर लिए हैं बुद्ध उनको ब्राह्मण मानते हैं !बुद्ध धर्म पर तृष्णा और लोभ तथा काम वासनाओं से ग्रस्त मूढ़ गपोडीएऔर  राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति में संलग्न बुद्ध और बौद्ध  धर्म की चर्चा करने वाले बुद्ध की दृष्टि से ब्राह्मणों को नहीं पहचान सकते हैं !        

Friday, 20 May 2016

बुद्ध पूर्णिमा ----- भगवान बुद्ध और भगवद गीता ------- जितना नुक्सान धर्मिकपाखण्डियों ने धर्म का किया है !उतना नुकसान तो धर्म और ईश्वर को नकारने वाले नास्तिकों ने भी नहीं किया है !ये पाखंडियों का ही करिश्मा है की एक धर्म को दूसरे धर्म से लड़ा देते हैं !ऐसे पाखंडी जब तक जनसमाज के धर्मनिर्देशक और श्रद्धा के पात्र रहेंगे तब तक धर्म अपनी अहिंसक ,लोक कल्याणकारी और आत्मदर्शन का अनुभव कराने वाली शक्ति से वंचित रहेगा !बुद्ध को ऐसे हेी धर्मध्वजी लोगों ने सनातन धर्म के विरुद्ध खड़ा कर दिया है !जिन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया है उन्होंने बौद्ध धर्म के चरित्र निर्माण के अंतरंग साधनों की साधना करने के स्थान पर उसको ब्राह्मणो और हिन्दू धर्म  पर हमले का माध्यम बन लिया है !बुद्ध की कोई भी सीख वैदिक धर्म के विरुद्ध नहीं है !उन्होंने रुग्ण वैदिक धर्म की चिकित्सा कर उसे उत्तम स्वास्थ्य प्रदान किया है !यही कार्य भगवान् श्री कृष्णा ने भी बुद्ध के जन्म से ढाई हजार साल पहले किया था !बुद्ध ने यज्ञ के विकृत रूप  पर प्रहार किया यही कार्य  भगवान् श्री कृष्णा ने भी किया था !बुद्ध ने ब्राह्मण को गुण प्रधान माना है जाति और जन्म से नहीं यही बात श्री कृष्ण ने भी गीता में कही है ! बुद्ध की एक भी सीख हिन्दू धर्म के मूलतत्तवों के विरोध में नहीं है !बुद्ध की मृत्यु हिन्दू के रूप में हुई थी और उनके अंतिम संस्कार भी सभी हिन्दू धर्म के अनुसार ही हुए थे !बुद्ध धर्म उनके निर्वाण के बाद शुरू हुआ और वह भी कालांतर में हीनयान और महायान शाखाओं में विभक्त होगया !बौद्ध धर्म का सर्वाधिक स्वीकृत धर्म ग्रन्थ धममपद  है ! उसके भिक्खु बग्गो की गाथा २१ में बुद्ध कहते हैं ---मनुष्य अपना स्वामी आप है ,अपना शरण स्वयं आप है ,इसीलिए जैसे व्योपारी अपने भद्र घोड़े को अपने संयम में रखते हैं वैसे ही भिक्छु को अपने आप को नियंत्रित रखना चाहिए !यह शरीर अपना है जीभ अपनी है मन अपना है इसका नियंत्रक कोई दूसरा कैसे हो सकता है ?राग ,द्वेष ,मोह आदि क्लेश भी अपने ही हैं संस्कार अपने हैं और कर्म भी अपने हैं उन्हें कौन दूसरा भोगेगा ?उसे कौन दूसरा नष्ट कर सकता है ?जो ग्रहण करना चाहिए था उसे अज्ञान बस ग्रहण नहीं किया और जिसे ग्रहण नहीं करना चाहिए था उसे ग्रहण किया इसी कारण हम सब दुःख भोगते हैं !दुःख का कारण अज्ञान ,तृष्णा अदि क्लेश हैं !और सुख के कारण दया ,करुणा,मुदिता ,अहिंसा और अनासक्ति आदि हैं !यही बात भगवान् श्री कृष्ण गीता में ६(५,६) में कहते हैं ------अपने द्वारा अपना उद्धार करे ,अपना पतन ना करे ,क्योंकि आप ही अपना मित्र और आप ही अपन शत्रु है !जिसने अपने आपसे  अपने --- आपको जीत लिया है ! उसके लिए आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने आप को नहीं जीता है ,ऐसे अनात्मा का आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है !आप ही अपना मित्र बनकर मनुष्य अपना जितना भला कर सकता है उतना दूसरा कोई नहीं कर सकता है ! इसी प्रकार आप ही अपना शत्रु बनकर मनुष्य अपना जितना नुकशान कर सकता है उतना दूसरा कोई शत्रु नहीं कर सकता है !   ,  

Thursday, 19 May 2016

आसाम में भाजपा की जीत --------चुनावों में हार जीत तो होती ही रहती है !सरकारें बनती  बिगड़ती रहतीं हैं !किन्तु आसाम में कांग्रेस की पराजय और भाजपा की जीत कुछ बुनियादी मुद्दों की ओर संकेत करती है !आसाम और पूर्वोत्तर राज्यों के बुनियादी मसलों पर कांग्रेस ने कोई ध्यान नहीं दिया !आसाम में बांग्लादेशी मुसलमानो की घुसपैठ को कांग्रेस आँख बंद कर देखती रही !परिणाम यह हुआ की आज बांग्लादेशी मुसलमान आसाम के कई जिलों में बहुमत में हो गया है !और कहीं कहीं तो बांग्लादेशी मुद्रा भी चल रही है !आसामी इसका विरोध हमेशा से करते रहे हैं !आसाम गणपरिसद का उदय भी इसी समस्या के कारण हुआ था !इसके अलावा और भी जातीय समस्यायों से  आसाम और सभी पूर्वी राज्य ग्रस्त हैं !देश के विभाजन के समय जिन्ना ने आसाम को पाकिस्तान में सम्मिलित कराने का प्रयत्न किया था !किन्तु जब वह सफल  नहीं हुए थे ! तब उन्होंने कहा था की आसाम अपने आप हिन्दुस्तान में ही  पाकिस्तान बन जायेगा !बांग्लादेश में मुसलमानो की आबादी तेजी से बढ़ रही है !बांग्लादेश के पास अधिक जमीन इस आबादी के लिए बसाने की नहीं है !इसीलिए बांग्लादेश के कट्टरपंथी मुल्ल्ला हिन्दू आबादी को वहां से खदेड़ रहे हैं !और बांग्लादेशी मुसलमान आसाम ,पश्चिमी बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में अवैधानिक ढंग से प्रवेश कर रहे हैं !उनमे से बहुतों को यहाँ की नागरिकता प्राप्त हो गयी है !और कुछ तो सांसद और विधायक भी बन गए हैं !और कुछ बांग्लादेशी बहुत सम्पन्नउद्द्योगपति भी हो गए हैं !जबकि [पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत में आये हिन्दू अभी भी शरणार्थी  बने हुए हैं !कांग्रेसी सरकाने कभी इस और ध्यान नहीं दिया !आचार्य विनोबा भावे ने सुझाव  दिया था की आसाम में जमीन की विक्री पर रोक लगा दी जाय !यदि ऐसा हुआ होता तो बांग्लादेशी मुसलमान भू संपत्ति नहीं खरीद पाते !जो लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आलोचना तथ्यों के आधार पर नहीं करते हैं !उनको यह जानकारी होनी चाहिए की संघ पीड़ित हिन्दुओं की आवाज  बनता जा रहा है !संघ के स्वयंसेवक पूर्वोत्तर राज्यों में और आसाम में कार्य कर रहे हैं !कांग्रेस सरकार की हिन्दुओं की उपेक्छा और संघ का रचनात्मक कार्य का परिणाम भाजपा की कांग्रेस के गढ़ में विजय के रूप में  आया है !पश्चिमी बंगाल में एक दिन यही स्थिति हो सकती है !संघ के स्वयं सेवक वहां भी कार्य रत है !संघ का नेट वर्क सारे देश और देश के बाहर भी कार्यरत है !संघ हिन्दुओं की पसंद और उनकी आवाज बनता जा रहा है !  
आम मुसलमान या आम हिन्दू तो आपस में सद्भाव से रहना चाहते हैं !ना हिन्दुओं के पास इतना समय है की बे साम्प्रदायिक झगड़ों में उलझे और ना मुसलमानो को भी अपने परिवार का पेट पालने से समय है की बे सम्प्रदायिक झगड़ों में उलझे !लेकिन जहाँ हिन्दू मुसलिम का सबाल खड़ा हो जाता हैं वहां साम्प्रदायिक बिभाजन शुरू हो जाता है !और यह दंगो में परिवर्तित हो जाता है !हिन्दू और मुसलमान दोनों की इस स्थिति का दोनों धर्मों के लोग लाभ उठाते हैं !सबसे बड़ा प्रसन यह है कि यह किसी के बह्काबे या भड़काने पर दंगाई क्यों हो जाते है ?जबकि दंगो में आमतौर पर बो लोग प्रभावित होते हैं !जो आम हिन्दू मुसलमान होते हैं !और बो भी प्रभावित होते हैं जिनका इन दंगों से कोई दूर तक का वास्ता सरोकार नहीं होता है !इसीलिए ऐसे युवाओं को जो हिन्दू मुसलिम के नाम पर दंगा फसाद से बचना चाहते हैं !इन बिहार के चंपारण के हिन्दू मंदिर के निर्माण में दिए गए सहयोग से प्रेरणा लेकर हिन्दू मुसलिम के मध्य स्थायी शांति सद्भाव स्थापित करना चाहिए !
आज जो इस्लामिक संगठन या बोको हरम या अन्य आतंकवादी मुसलिम संगठन है !वे भी इस्लाम के नाम पर अत्यंत पशुवत क्रूर कर्म कर रहे हैं !जब ये लोग कहर वरपा करते हैं तो अल्लाह का नाम लेते हैं और कुरान की आयतों का उच्चारण करते हैं !संसार के बहुत से लोगोंने ना तो कुरान पढ़ी है और ना बो मुहम्मद साहब के जीवन के बारे में जानते हैं !उनके सामने तो जो इस्लाम का स्वरुप जो मुसलिम देशों में और मुसलिम देशों के बाहर मुसलमानो द्वारा की जा रही हैं हिंशक घटनाओ में दिख रहा है !बे तो इसीको इसलाम समझ रहे हैं !यह बात तो आपने भी स्वविकार की है कि इसलाम में तलवार उठाने की आजादी विशेष परिश्थितियों में है !बे परिश्थितियां मुसलमान अपने तरीके से समझ कर तलवार उठाते है ! और लोगों के सर कलम करते हैं !ये जितने भी क्रूर हिंसक संगठन इसलाम के नाम पर कहर बरपा कर रहे हैं !बे कुरान में तलवार उठाने की आजादी का ही दुरपयोग कर रहे हैं !इसिलिय आज युग की जरूरत और मांग यह है !की विश्व केसभी धर्म अपनी धार्मिक किताबों से हिंसा करने के सभी प्रावधानों को समाप्त करदे और ऐसे धर्म को एकमत से स्वीकार करें कि धर्म के नाम पर किसी भी प्रकार की हिंसा स्वीकृत नहीं होगी !हिंसा मुक्त धर्म से ही धर्म के नाम पर इस्लामिक संगठन आदि ऐसे हिंसक धार्मिक संगठनो से मुक्ति मिलेगी !जो धर्म के नाम पर बच्चियों तक से बलात्कार कर रहे हैं और लोगों के सर काट रहे हैं
हिमालय की पवित्र तलहटी में पर्वतीय गुफा के भीतर धर्मात्मा व्यास जी ने ध्यान योग में स्थित हो उन्होंने महाभारत इतिहास के स्वरुप का विचार करके ज्ञान दृष्टि द्वारा आदि से अंत तक सब कुछ प्रत्यक्छ की भांति देखा! ! और महाभारत ग्रन्थ की रचना की !इसके बाद व्यास जी यह विचार करने लगे की अब शिष्यों को इस ग्रन्थ का अध्ययन कैसे कराऊँ ! तथा जनता में इसका प्रचार कैसे हो !उसी समय गुफा में ब्रह्मा जी प्रगट हुए !उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि मेँ इस ग्रन्थ का प्रचार पृथ्वी में करना चाहता हूँ !किन्तु मेने इस ग्रन्थ की जो रचना अपने मन में की है !उसको लिख सके ऐसा कोई व्यक्ति मुझे दिखाई नहीं देता है !ब्रह्मा जी ने कहा तुम गणेश का आवाहन करो बे इस ग्रन्थ का लेखन कार्य करेंगे !तदोपरांत व्यासजी ने गणेश जी का आवाहन किया !गणेश जी ने कहा में इस ग्रन्थ का लेखक उसी सूरत में बन सकता हूँ !जबकि लेखन कार्य बिना रुके चलता रहे !व्यास जी ने कहा की आप भी बिना अर्थ ज्ञान के कुछ भी न लिखना !जब तक गणेश जी श्लोक के अर्थ पर विचार करते थे तब तक व्यास जी दूसरे श्लोकों की रचना कर लेते थे !महाभारत में ऐसे ८८०० गूढ़ श्लोक हैं जिनका अर्थ या तो व्यास जी जानते है या सुखदेव !महाभारत की रचना तीन साल में पूर्ण हुई थी !आधुनिक काल में कुछ धार्मिक सुधारकों ने महाभारत की बहुत सी घटनाओ को काल्पनिक और बाद में जोड़ी गयी बताकर महाभारत का अपनी मन मर्जी का संशोधित महाभारत भी लिख दिया है !किन्तु इन धार्मिक सुधारकों ने अपनी मूढ़ता और अज्ञान के कारण महाभारत के स्वरुप को बिगड़ने का काम किया है !क्योँकि जिन घटनाओ को ये लोग काल्पनिक कहते हैं !बे सभी घटनाएं विज्ञान सिद्ध कर रहा है !गीता प्रेस गोरखपुर ने ही वैदिक संस्कृति का सही और वास्तविक स्वरुप प्रस्तुत कर अत्यंत अल्प मूल में इस महान ग्रन्थ को इसके मूल स्वरुप में प्रकाशित तथा प्रस्तुत किया है !गीता प्रेस ने वैदिक संस्कृति की अनुपम सेवा कर वैदिक संस्कृति के प्रमुख धर्मग्रंथो को इन तथाकथित अल्पज्ञ धार्मिक सुधारको की दृष्टि से रक्षा की है !
लोकतंत्र में चुनाव सामान्य प्रक्रिया है !जहाँ विकसित लोकतंत्र हैं वहां चुनाव नीतियों पर लड़े जाते हैं !इसीलिए जो दल चुनाव में विजयी होता है !वह अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को निष्ठां पूर्वक क्रियांबित करता है !पश्चिमी देशों में राजनेताओं को भ्रष्टाचार के द्वारा धन संपत्ति संचय करने के अवसर आम तौर पर प्राप्त नहीं होते हैं !भारत विशाल लोकतंत्र है !इसकी इससमय की सबसे अहम समस्या महगाई को नियंत्रित और भ्रष्टाचार समाप्त करने की है !अगर केंद्र और राज्य सरकारें भ्रष्टाचार समाप्त करने में सफल हो जाएँ तो देश की जनता की ५०% समस्याएं सुलझ जाएँ !महगाई रोकने का शशक्त उपाय है !उत्पादन में बृद्धि !और दाम बांधो योजना का प्रारम्भ !सरकार वेतन बृद्धि की मांग पर कर्मचारियों का बेतन कागजी नोटों से बढ़ा देती है !नोट तो नासिक में छपते हैं !किन्तु जीवन में उपयोग आने वाली सभी वस्तुएं तो श्रम और जमीन तथा हवा ,पानी और प्रकाश तथा अग्नि के सहयोग से ही उत्पन्न होती हैं !रूपया से कभी भी महगाई बृद्धि को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है और ना ही भ्रष्टाचार को रोक जा सकता है ! जितना अधिक रुपया लोगों को दिया जाता है !उनकी भूख रुपया प्राप्त करने की बढ़ती ही जाती है !यह सब सभी लोग अपनी आँखों से देख रहे हैं ! नैतिकता ,प्रेम ,मुहब्बत ,संवेदन शीलता ,श्रमनिष्ठा ,प्रमाणिकता , देशभक्ति आदि सभी सद्गुणों का विनाश रूपया ने कर दिया है !आज के समय का सबसे  विनाशकारी ,विघटनकारी और सभी की शांति ,चैन और सुख छीनने वाल यह रूपया ही है !यह इस युग का रावण कंस ,असुर और राकछस  तथा शैतान है !

Wednesday, 18 May 2016

समस्यायों का समाधान समयानुकूल  साधनों और प्रयत्नों से ही होता है ---------- अगर हम समाज में समता स्थापित करना चाहते हैं !तो इसके लिए सिर्फ समता के लिए समर्पित महापुरुषों का स्मरण ,उनकी मूर्तियां लगाने आदि से समता  प्राप्त नहीं कर सकते हैं !महापुरुषों के संघर्ष में त्याग और बलिदान की प्रमुख  भूमिका होती है !उनके जीवन में अवकाश या भौतिक भोग सामग्री की प्राप्ति के प्रयत्नों  का कोई स्थान नहीं होता है !उनका जीवन वायु और नदी के सामान लोकहित के लिए गतिमान होता है !जो लोग उनके इस कार्य से लाभान्वित होकर वैभव ,एशबर्य और सम्मान तथा सत्ता प्राप्त करते हैं !बे इन महापुरुषों की विषमता मुक्ति मुहिम को समाप्त कर स्वयं के उत्तरोत्तर विकास के लिए नियोजित करते हैं !ऐसे ही लोग इन महापुरुषों की मूर्तियां ,उनकी पुण्यतीतिथि और जन्मतिथि पर राष्ट्रीय अवकाश उनके पुण्यस्मरण के लिए विचार गोष्ठियों आदि का आयोजन करते रहते हैं !ये इतने धूर्त और चालाक तथा स्वार्थी होते हैं !कि इन आयोजनों के द्वारा  भी बे अपनी स्वार्थ सिद्धि ही करते हैं !भारतीय समाज महापुरुषों की कर्तव्यनिष्ठा ,त्याग और बलिदान की भावना अपने आचरण में उतारने वाले  लोगों के सतत निष्काम कर्त्तव्य निष्ठां से ही विषमता और अन्याय से मुक्त होगा ! 
सड़कों के नाम बदलने ,महापुरुषों की मूर्तियां खड़ी करने उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि आदि पर अवकाश घोषित  करने के बजाय अगर युग और समय के अनुकूल उनके जीवन संघ्रषों का उपयोग बर्तमान समस्यायों के समाधान के लिए किया जाय तो वह अधिक उपयोगी होगा !बर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या है महगाई बृद्धि इसके निदानके लिए आबादी पर नियंत्रण और अधिक उत्पादन पर कार्य किया जाना चाहिए !रिश्वतखोरी दलाली  को समाप्त करना चाहिए !राजनेताओं की अंधभक्ति और विरोधी नेताओं पर मनगढंत झूठे आरोपों की मनोबृत्ति पर भी अंकुश लगाना चाहिए !रचनत्मक और स्वस्थ  लोकतंत्र की स्थापना के लिए कार्य होना चाहिए !सत्ता प्राप्ति की लालसा में झूठे वायदे और सत्ता में बने रहने के लिए देश को जाति पंथ और धर्म के नाम पर बांटना बंद होना चाहिए !राजनेताओं  को आदर्श जीवन का आदर्श प्रस्तुत कर जनता के सामने प्रमाणिकता प्रस्तुत करना चाहिए  सत्ता में बने रहने के लिए देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर उसको नष्ट नहीं करना चाहिए !अवैधानिक धन और सम्पत्ति संग्रह की बृत्ति का त्याग कर देना चाहिए !गिट्टी ,मिटटी ,बालू ,जल ,जंगल ,जमीन के दोहन पर नियंत्रण करना  चाहिए ! 

Tuesday, 17 May 2016

चापलूसी और भक्ति में भेद करना आजकल नेता लोग भूल गए हैं !नेता की स्थापना और प्रतिस्थापना तथा उद्भव और विकास चापलूसी से ही होता है !चापलूस चमचे का काम करता है !चमचा नातो सब्जी काटता है और ना बनाता है वह सिर्फ बनी हुई सब्जी को पतीली से बाहर लाने भर का काम करता है !पतीली और चमचे का साथ जभी तक रहता है जब तक पतीली में सब्जी रहती है !सब्जी ख़त्म और चमचा बाहर !इस प्रकार नेता का नेता के साथ और जनता का साथ जभी तक रहता है जबतक नेता के पास नेता को देने के लिए ताकत होती है ! और जनता जब तक नेता को चुनकर विधानसभा या अन्य संस्थाओं में भेजती रहती है !जनता का नेता को समर्थन खत्म और नेता गायब !भाजपा हिन्दू धर्म की बात करती है !किन्तु उसके ये नेता हिन्दू धर्म का मर्म नहीं समझते हैं !इसीलिए भगवान शंकर को भी चापलूसों का वशवर्ती समझ कर अनुचित टिप्पड़ी करते हैं !और इनको द्वापर से लेकर कलयुग तक का सारा इतिहास चापलूसों और चापलूसी का दिखाई देता है !भक्ति के बश भगवान होते हैं !भक्ति के मानदंडों को जीवन में अपनाकर जो अपनी बुद्धि मन चित्त और समस्त अंतर बाह्य क्रियाओं का प्रवाह सांसारिक सम्बन्धों से हटकर परम शक्ति की ओर कर देता है !उसे भगवती शक्ति की प्राप्ति हो जाती है !भक्ति के इन मानदंडो को कभी कभी ऐसे लोग भी अपना लेते हैं जो प्रारम्भ में तो भक्त होते हैं ! किन्तु शक्ति प्राप्त कर भस्मासुर बन जाते हैं !और फिर भस्मासुर के रूप में ही उसी भगवती शक्ति से खुद ही भस्म हो जाते हैं !किन्तु चापलूस तो जिसकी चापलूसी करता है और जिसके साथ रहता है उसीको चापलूसी से भस्म कर देता है !और फिर चापलूसी के लिए अन्य ठिकाना तलाश लेता है !
महाराणा प्रताप पृथ्वीराज चौहान शिवाजी आदि महान भारतीय योद्धाओं का सही मूल्याङ्कन नहीं किया गया !और आजाद भारत में भी इन देशभक्त बीरों की गौरव गाथा छात्रों तक नहीं पहुंचाई गयी !देश आजाद तो हुआ किन्तु गुलाम भारत में जिस तरह भारत पर हमला करने वाले मुगलों तुर्को और अंग्रेजो का गुण गान किया जाता था !वही गुण गान आज़ाद भारत में भी जारी रहा !उस इतिहास को भले ही हम देश में हुए विशाल धर्म परिवर्तन और परिवर्तित धर्माबिलाबिओं की मुग़लों और अंग्रेजी शाशकों के प्रति श्रद्धा आस्था और विश्वास के कारण उसको बदल न सकें !किन्तु भारत में जन्मे और मातृभूमि के लिए शहीद हुए जिनमे भारत की आत्मा का दर्शन होता है ऐसे इन बीर सपूतों को हम सही और आदरयुक्त स्थान तो इतिहास में दे ही सकते हैं ! जिस से उनको अब तक वंचित रखा गया है !और देश की गौरव शाली परम्परा से युवाओं को भी वंचित रखा गया है !
यहाँ जो कहा गया है वह एकदम सही है !किन्तु इस बिभीषका का सबसे बड़ा खतरा भारत में दिखाई देता है !आज भारत भारत नहीं है यह चूँ चूँ का मुरब्बा बन गया है ! भारत में जो प्रकृति के संरक्छण के उपाय अत्यंत प्राचीन काल में ही खोज निकाले थे !उन पर हम लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं !भारत ने जनसँख्या नियंत्रण का सूत्र दिया था !हजार मुर्ख पुत्रों से एक योग पुत्र उसी प्रकार से उत्तम है ! जैसे हजारों तारागणों से एक चन्द्रमा उत्तम होता है !हजारों तारा गण प्रकाश पैदा नहीं कर पाते हैं ! किन्तु एक चन्द्रमा सारे अन्धकार को समाप्त कर देता है !श्रष्टि में भारत ने सभी जीव जंतुओं को बराबर का हिस्सेदार माना था !इसीलिए जीव जंतुओं को अभय दान था !चिड़ियोँ का कलरव और मुर्गे की बांग से हमारी सुबह होती थी !गाय के दूध से हमारे शरीरों का पोषण होता था !उसका गोबर मूत्र भी औसिद्धि के गुणों से युक्त था !किन्तु आज मुर्गा बकरा तीतर बटेर हिरन गाय आदि मांसाहारियों के उदर में चले गए हैं ! भारत में नदियों और ब्रक्छों में भी जीवन खोज निकाला था !इसीलिए जंगल पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित थे नदियां भी शुद्ध निर्मल जल से भरी रहती थी !भारत बासी जंगलों नदियों पशु पक्छियोँ जीव जंतुओं के प्रति आदर का भाव रखते थे !भारत सोने की चिड़िया कहलाता था !धन धन्य से परिपूर्ण था !दूध दही की नदियां बहती थी !इस संस्कृति का परित्याग हमने कर दिया है !अब देश में पशुओं पक्छोयों के खून की नदियां बहती है !सीमेंट और लोहा ईंट गिट्टी मिटटी के जंगल दिखाई देते हैं !सम्बेदन हीन मनुष्य दीखते हैं !हम अपने सर्वनाश का इतिहास खुद लिख रहे हैं!अगर हम बदलने को तैयार हो तो ऋषि प्रणीत आत्मनिष्ठ संस्कृति हमारे पास है ! जिसको अपनाकर हम खुद विनाशकारी बिभीषका से बच सकते हैं और विश्व को भी बचा सकते हैं !
When sole aim is to gain political power . only selfishness and ,greed for power prevails.Where the selfishness has gripped the mind and heart, reasoning utterly fails to play its role.Only selfishness and greed become the sole guiding force.Hence in politics rules of selfless devotion do not apply. In our.democracy some admirers are haunted by certain political ideology hence they ignore sound political democratic principles of neutral criticism. And some are political power seekers hence they ignore inherent qualities of their political opponents. Both type of these persons hinder growth of democracy.Democracy is not a platform for vomiting filth and rubbish/.it is a platform for free exchange of views and thoughts to nourish and sustain the democratic political system.

Sunday, 15 May 2016

जो युवा प्रेरक वाक्योँ का उद्धरण पोस्ट करते हैं !उन्हें यह समझना चाहिए की बे किसी की जीवनचर्या के अनुभव से निकले हुए होते हैं !या किसी के जीवन में आदर्श प्राप्ति के लक्छ्य होते हैं और उनका जीवन उसी लक्छ्य की प्राप्ति के लिए समर्पित होता है !और बे प्रेरक वाक्य जभी लिखे जाते हैं जब बे अपने आचरण से सिद्ध हो जाते हैं !इसीलिए इस समय प्रेरक कर्म करने की आवश्यकता है !प्रेरक वाक्य लिखने की नहीं !समाज जिन समस्यायों से पीड़ित है उन समस्यायों को खुली आँखों से देख कर फिर उनको सुलझाने के लिए ईमानदारी और साहस से प्रयत्न करने की आवश्यकता है !एक स्वतंत्रता संग्राम गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए लड़ा गया था !और अब दूसरा संग्राम देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए लड़ा जाने की आवश्यकता है !भ्रष्टाचार का कैंसर पूरे सामजिक और राष्ट्रिय जीवन को प्राणांतक कष्ट दे रहा है !इस कष्ट के निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने अपने कर्तव्य छेत्र में ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठां का प्रवेश कराना पड़ेगा !किसी को भी दूसरे पर दोषा रोपण करने के बजाय अपने कर्तव्य कर्म पर ही विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है !देश में संविधान है !और उसके तहत कानून का शाशन है !इसीलिए किसी को गाली देने के बजाय कानून का सहारा लेना चाहिए !प्रेरक वाक्यों के उद्धरण पोस्ट करने के बजाय वर्तमान में कर्तव्य निष्ठ व्यक्तियों के आचरणों को पोस्ट करना चाहिए !और भ्र्ष्टाचारियों की भ्रष्टाचार से उपार्जित संपत्ति को भी बताना चाहिए !तथा कर्तव्य निर्बहन में कर्तव्य निष्ठ लोगों को क्या कठिनाइयां आती हैं !इन पर भी प्रकाश डालना चाहिए !इस समय के यही प्रेरक वाक्य हैं !

Saturday, 14 May 2016

शवद्ज्ञानियों की भरमार और कपटाचार में है दम्भ ,पाखण्ड ,झूठ अदि की जड़ और महती भूमिका -------
१---पढ़ने वाले ,पढ़ाने वाले तथा शास्त्रों पर प्रवचन देने वाले , उपदेशक , राजपुरुष आदि अधिकाँश व्यसनी और मुर्ख ही हैं पंडित तो वही है जो अपने कर्तव्य कर्म का पालन करता है -----युधिस्ठर
२---विद्वान पुरुष शिकार करने ,जुआ खेलने ,स्त्रीयों के संसर्ग में रहने और मदिरा पीने के प्रसंगों की बड़ी निंदा करते हैं परन्तु इन पाप कर्मों में अनेक शास्त्रों के श्रवण और अध्ययन से संपन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ---महाभारत
३ ---- बृद्धावस्था और मृत्यु के बस में पड़े हुए मनुष्य को औषधि ,मन्त्र ,होम ,और जप भी नहीं बचा सकते हैं
४---जैसे महासागर में एक काठ एक ओर से और दूसरा दूसरी ओर से आकर थोड़ी देर के लिए मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं ,इसी प्रकार संसार में प्राणियों के संयोग वियोग होते रहते हैं !
५---हमनें संसार में अनेक बार जन्म लेकर सहस्त्रों माता पिता और सेकंडों स्त्री पुत्रों के सुख का अनुभव किया है परन्तु बे सब अब किसके हैं ? अथवा हम उनमे से किसके हैं ?
विश्व के सभी धर्मों को अपने धर्म ग्रंथों से उन उपदेशों को निकाल देना चाहिए जो किसी भी रूप में हिंसा का समर्थन करते हों ! या हिंसा करने के लिए प्रेरित करते हों !कोई भी धर्मग्रन्थ आगामी समय की बदली हुई परिश्थिति में अपने समय की विधियों और नियमो के आधार पर सही और सटीक निर्णय नहीं दे सकता है !और न ही कोई धर्म ग्रन्थ कर्म छेत्र की गतिविधियों को संचालित करने का अंतिम मार्ग दर्शक धर्म ग्रन्थ हो सकता है !और कोई धार्मिक समूह यदि ऐसा मानता है कि जो कुछ उसके धर्म ग्रन्थ में लिखा है ! वही अंतिम सत्य है! तो उसका सामंजस्य युग की परिस्थिति के अनुकूल अन्य धर्म के मानने वालों के साथ नहीं हो सकता है !और यदि उसका धर्म धर्म के नाम पर हिंसा की इजाजत देता है तो वह अपने धर्म से अन्य धर्म के मानने वालों का क़त्ल आदि कर सकता है ! धर्म के नाम पर हिंसा का बीभत्स खेल इस समय इस्लाम धर्म में दिखाई दे रहा है !धर्म के नाम पर अत्यंत खू खार धार्मिक संगठन आजकल मुसलमानो के इस्लामिक और गैर इस्लामिक मुल्को में क्रियाशील दिखाई दे रहे हैं !समाचार पत्रों की सुर्खियां इस्लामिक संगठन बोकोहराम आदि की क्रूर और अमानवीय क्रियायों से भरी रहती हैं !बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी इन घटनाओ का जोर दिखाई देता है !पाकिस्तान में सुन्नी संगठन सिया अहमदिया बोहरा मुसलमानो पर आक्रमण कर उनकी नृशंष हत्याएं करते रहते हैं !यह घटना भी जिसमे ४५ सिया मुसलमान मौत के घाट उतार दिए गए हैं धार्मिक संकीर्णता का परिणाम है !विश्व शांति और प्राणिमात्र की सुरक्षा के लिए हिंसा रहित धर्म की आवश्यकता है !आज के युग की यही मांग है !अहिंसा सिर्फ श्रेष्ठ धर्म ही नहीं निकट का और तुरत आचरण में उतारने का भी धर्म है

Thursday, 12 May 2016

सिंघस्थ उज्जैन में विचार महाकुंभ -----  मध्यप्रदेश की भाजपा  सरकार के संरक्छण में विचार महाकुंभ का आयोजन हुआ !जिसमें संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ,श्रीलंका  से पधारे बौद्ध भिक्छु ,श्री  अवधेशानंद गिरी और अखिल  भारतीय गायत्री परिवार के प्रमुख श्री प्रणव पंड्या आदिने अपने महत्त्व पूर्ण विचार प्रस्तुत किये !सभी उपदेशकों ने भारतीय धर्म  और ,अध्यात्म की महत्ता को प्रतिपादित किया और आगामी समय में भारत केसुनहले भविष्य की भविष्यवाणी भी की !विचार कुम्भ में उपदेश देने वाले ये चारों महापुरुष विशाल धार्मिक संगठनों के संचालक हैं !व्योपारी लोग साल के अंत में अपने व्यापार का लेखा जोखा कर साल भर के व्यापार के लाभ हानि की बैलेंस शीट तैयार करते हैं !और अगले साल के लिए लाभ की दृष्टि से व्यापार करने की योजना बनाते हैं !धार्मिक संगठनों के संचालकों को भी अपनी बैलेंस शीट जनता के सामने प्रस्तुत करना चाहिए कि उन्होंने अपने जन्म से लेकर आजतक अपने संगठनों से सम्बद्ध लोगों में धर्म के मूल तत्त्व  सत्य ,अहिंसा ,ब्रह्मचर्य ,अस्तेय और अपरिग्रह का कितना विकास किया ! तथा इस से समाज में कितना रचनात्मक बदलाव आया !ताकि लोग यह जान सकें और समझ सकें कि आने वाले समय में भारत का भविष्य इन लोगों के कारण उज्जवल होगा !अभीे तो जो देखने में आरहा है ! कि धार्मिक लोग ईश्वर की शक्ति ,स्मरण ,पूजन ,कथा वार्ता ,सत्संग ,साधना अदि का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहे हैं !बहुत से व्योपारी ,ठेकेदार ,राजनेता ,पूंजीपति .अधिकात्री कर्मचारी प्रॉपर्टी डीलर अदि भव्य धार्मिक आयोजन करते और करवाते हैं !किन्तु कर्तव्य छेत्र में छल ,कपट ,बेईमानी ,धूर्तता  आदि का जीवन अपने निकृष्ट स्वार्थों कि पूर्ति के लिए करते हैं और कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं ! !इसीलिए देश में कर्मसन्कर्ता चारों और व्याप्त है !प्रमाणिकता का घोर अभाव है !ईश्वर की शक्तिकागलत उपयोग हो रहा  हैं !निश्चित रूप से भारत की आध्यात्मिक विरासत में भारत के सुन्हले  भविष्य की शक्ति विदयमान है !किन्तु उसका सृजन सिर्फ विचार कुम्भ से नहीं हो सकता है !विचार श्रेष्ठ हैं किन्तु उनका क्रियाँबन नहीं हो रहा है !उनके क्रियाँबन के लिए आवश्यक आचरण का पूर्ण अभाव है!  आध्यात्मिक विरासत को संजोने के लिए कथनी से अधिक करनी पर जोर देना होगा !कथनी मीठी खांड सी करनी विष की लोय !कथनी तज करनी करे विष से अमृत होय !

Wednesday, 11 May 2016

जिस तरह से पृथ्वी को खोखला किया जारहा है !भूमि को ब्रक्छ बिहीन किया जा रहा है १नदियोन को प्रदूषित और बालू से रिक्त किया जा रहा है !अधर्म को ही धर्म समझा जा रहा है !जब यह धारा देश में बेग से प्रवाहित होने लगाती है !तब प्रकृति का प्रलयंकारी विनाशक रूप प्रगट होने लगता है !इस समय मनुष्य अत्यंत अबांछनीय कामनाओ के बस होकर उनका गुलाम हो गया है !इसीलिए यह भोग का दुष्चक्र अभी रुकेगा नहीं और ना ही प्राकृतिक विपदाएँ रुकेंगी !इन भोगियोँ के कारण आम आदमी भी विपदाओं का शिकार होगा !किन्तु जो इस अत्यंत विकट परिश्थिति में अपने कर्तव्योँ का निष्ठापूर्वक पालन कर भगवान का स्मरण करते हुए अपना जीवन जिएंगे बे इस संकट में भी जीवित और सुरक्छित रहेंगे !मनुष्य निर्मित सभी साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे !व्यापक विनाश की और हम अपने कुकर्मों के कारण तीब्र गति से बढ़ रहे हैं !काल की कराल गति को सद्बुद्धि ही रोक सकती है !जिसका मुह भोग बुद्धि के कारण बंद हो गया है
मित्र के साथ द्रोह को गीता में महान पाप बताया गया है ! कुल के नाश को दोष कहा है !अर्थात मित्र का स्थान कुल (परिवार और खून के सगेसंबंधों) से भी अधिक महत्त्व का बताया गया है !सच्चे मित्र दुर्लभ होते हैं !सच्चे मित्रों के लक्छण समय और परिश्थित के अनुसार स्थूल दृष्टि से एक से नहीं रहते हैं !बहुत से कपटी मित्र भी स्वार्थ बश आचार्य चाणक्य द्वारा बताये गए लक्छणो का स्वार्थ दृष्टि से पालन कर सकते हैं !ओर संकट के समय या स्वार्थ पूर्ति के बाद मित्र का साथ छोड़ सकते हैं !मित्रता के मान दंड सामर्थ समय और परिस्थित के अनुसार बदलते भी हैं और नहीं भी बदलते है !इसमें मित्र नामक व्यक्ति की नीति और धर्म में गहरी आस्था काम करती है! !महाभारत के कर्ण और दुर्योधन की मित्रता इसी प्रकार की थी !दुर्योधन की मित्रता की दृष्टि घोर स्वार्थ प्रधान थी ! किन्तु कर्ण की मित्र दृष्टि धर्म और नैतिकता से जुडी हुई थी !द्रुपद और द्रोणाचार्य की मित्रता द्रुपद की दृष्टि में सामर्थ्य में समानता पर आधारित थी जबकि द्रोणाचार्य की मित्रता धर्म और नीति युक्त थी !इसीलिए द्रुपद द्वारा अपमानित होने के बाद भी द्रोणाचार्य ने उस पर शक्ति का प्रयोग नहीं किया ! और अर्जुन द्वारा पराजित द्रुपद जब उनके सामने लाया गया तो उन्होंने उसे मित्रता का निर्बाह करते हुए आधा राज्य लेकर जीवित छोड़ दिया था !किन्तु द्रुपद ने यज्ञ से द्रोणाचार्य का बध करने वाला पुत्र उत्पन्न किया था !ऐसा भी इतिहास में उल्लेख मिलता है कि शक्ति पाकर चन्द्रगुप्त भी आचार्य की अबज्ञा करने लगा था !इसीलिए सच्ची मित्रता का पता सिर्फ संकट काल में ही चलता है !किन्तु संकट किसी के भी जीवन में कभी कभी अचानक ही आता है !इसीलिए इस युग में आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा मित्र है
वैद्य ,डाक्टर भी रोगी ,बलवान भी दुर्वल और शक्तिशाली भी असमर्थ हो जाते हैं यह समय का उलटफेर बड़ा अद्भुत है !
२-----जो दरिद्र हैं और संतान की इक्छा नहीं रखते हैं उनके तो बहुत से पुत्र पुत्रियां हो जाते हैं ! और जो धनवान हैं उनमे से किसी को एक भी पुत्र प्राप्त नहीं होता है ! ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है !
३----- रोग ,अग्नि ,जल ,अस्त्र ,शस्त्र ,भूख प्यास ,विपत्ति विष ,ज्वर ,और ऊँचे स्थान आदि से गिरना ये सब प्राणियों की मृत्यु के निमित्त हैं ! जन्म के समय जिसके लिए प्रारव्ध बस जो निमित्त नियत कर दिया गया है वही उसकी मृत्यु का कारण होता है  !कोई भी इन निमत्तों का उल्लंघन करते नहीं देखा गया है ! कोई कोई पुरुष तपस्या आदि प्रवल पुरुषार्थ के दूवारा जो प्रारब्ध को नष्ट कर देता हैं बे मृत्यु के निमित्तों का उल्लंघन करने में सफल हो जाते हैं ! किन्तु ऐसे लोग बहुत कम होते हैं !
४-----इस जगत में धनवान मनुष्य भी जवानी में ही नष्ट होता दिखाई देता है ! और क्लेश में पड़ा हुआ दरिद्र भी सौ सालों तक जीवित रहकर अत्यन्त बृद्धावस्था में मरता देखा  जाता है ! जिनके पास कुछ नहीं है ऐसे दरिद्र भी लम्बी आयु तक   जीवित  देखे जाते हैं और धनवान कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य कीट पतंगों के समान नष्ट होते रहते हैं ! 

Tuesday, 10 May 2016

१----- बहुत से मनुष्य पेट पालने के लिए मूड मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहन लेते हैं और गृहत्याग देते हैं ! बे विविध प्रकार के भोगों की प्राप्ति के लिए भटकते रहते हैं और संन्यास की पवित्र परपरा का नाश कर अधमगति को प्राप्त होते हैं !
२----बहुत से मुर्ख मनुष्य कृषि ,गोरकछा वाणिज्य जीविका के साधन  तथा अपने घर परिवार का परित्याग कर चल देते हैं और त्रिदण्ड एवं भगवा वस्त्र धारण कर लेते हैं !
३----यदि ह्रदय के राग द्वेष अदि दूर ना हुए हों तो गेरुआ वस्त्र धारण करना स्वार्थ साधन का प्रयत्न ही समझना चाहिए धर्म का ढोँग रखने वाले मुथ मुंडों के लिए यह  जीविका चलाने का एक धंधा मात्र है !
4-----जिसने बाहर से सन्यास आश्रम ग्रहण कर लिया है वह वास्तव में सन्यासी नहीं है ! सन्यासी वास्तव में वह है ,जिसने भीतर से राग द्वेष से मुक्ति पा ली है ! राग द्वेष के रहते हुए मनुष्य संसार बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है ! जिसने राग द्वेष का त्याग कर दिया है वह सुख पूर्वक संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है ! जिसके भीतर राग द्वेष नहीं है वह कर्मयोगी कर्मों का त्याग ना करते हुए और सम्पूर्ण लोकहित के निष्काम कर्म करते हुए भी सदा सन्यासी ही है ! उसे आत्मकल्याण के लिए बाहर से संन्यास ग्रहण करने की किंचित  मात्र भी आवश्यकता नहीं है  ! ज्ञान योगी सिर्फ अपने लिए उपयोगी होता है परन्तु कर्मयोगी संपूर्ण समाज के लिए उपयोगी होता है ! भगवान् श्री कृष्ण ने ५(३) में कहा है जो मनुष्य ना किसी से द्वेष करता है और ना किसी की आकांछा करता है वह कर्मयोगी सदा सन्यासी ही है ! क्योंकि द्वन्दों से रहित मनुष्य सुख पूर्वक संसार के समस्त वन्धनों से मुक्त हो जाता है !
महाराणा प्रताप महानतम थे ------- जब राजस्थान के राजे महाराजे अकबर की जी हुजूरी  में लगे हुए थे !और अपनी बहन बेटियों का विवाह अकबर और मुग़ल सरदारों से करके अपने को गौरवान्वित अनुभब कर रहे थे !और मुग़ल सल्तनत को मजबूत कर रहे थे !तब देशभक्त  नरशार्दूल छत्री शिरोमणि  राणाप्रताप ,छत्रियों की आन बान और शान के लिए राज्य सुख और राज्य वैभव का आकर्षण  त्यागकर अकबर और उसकी सत्ता को चुनौती युद्ध के मैदान में दे रहे थे !राणा प्रताप ने घास की रोटियां खाना तो स्वीकार किया किन्तु अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की !इस महानतम योद्धा और देश भक्त राणाप्रताप के साथ इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया !सूर्य बादलों में छिप तो सकता है !किन्तु उसका प्रकाश और तेज नष्ट नहीं हो सकता है !अब बादल छट रहे हैं और राणाप्रताप रूपी सूर्य प्रकाशित हो रहा है

Monday, 9 May 2016

 संसार की समस्त परिस्थितियां आने जाने वाली ,मिलने और बिछुड़ने वाली हैं ! मनुष्य चाहता है कि सुख दाई परिस्थिति बनी रहे और दुःख दाई परिस्थिति कभी ना आये परन्तु सुख दाई परिस्थिति जाती ही है और दुःख दाई परिस्थिति आती ही है ---- यह प्राकृतिक नियम है ! इसीलिए प्राणियों के निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है ! बचपन में युवाबस्था में प्रौढ़ा वस्था में अथवा बृद्धा वस्था में कभी ना कभी ये क्लेश अनिवार्य रूप से प्राप्त होते ही हैं ! जैसे शव्द ,स्पर्श ,रूप ,रस  ,और गंध स्वाभवतः आते जाते रहते हैं ! उसी प्रकार मनुष्य सुखों  और दुखों को  प्रारब्ध  के अनुसार पाते रहते हैं !    

Sunday, 8 May 2016

बुढ़ापा और मृत्यु ये दोनों भेड़ियों के समान हैं जो बलवान ,दुर्बल छोटे ,बड़े सभी प्राणियों को खा जाते हैं कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मृत्यु को लांघ नहीं सकता भले ही वह संपूर्ण प्रथवी पर विजय पा चूका हो

Saturday, 7 May 2016

पश्चिम की संस्कृति और भारत की संस्कृति और जीवन पद्धति तथा जीवन दृष्टि में बहुत अंतर है !पश्चिमी देशों में मदर डे ,फादर डे आदि मनाये जाते हैं ! क्योंकि उन देशों में शादियां स्थाई नहीं होतीहैं !और कुछ स्थायी भी होती हैं !किन्तु ऐसी एक भी शादी नहीं होती है जिसमें कहा जाता हो कि हमारा जन्मों जन्मों का साथ है !और अगले जन्म में भी रहेगा !इसिलए कभी कभी ऐसा होता है कि संतान की माँ एक होती है किन्तु पिता बदल जाते हैं !इसीलिए जिन बच्चों का पिता के साथ रहने से माँ से विछोह हो जाता है !बे मदर डे मनाकर माँ के प्रेम और उपकारों का श्रद्धा से स्मरण करते हैं !इसी प्रकार  फादर डे में भी होता है !भारत में शादियां प्राचीन काल में शायद  ही टूटती रही हों !इसीलिए इस देश में ये फादर ,मदर डे मनाने की परम्परा नही रही है !यहाँ माता के प्रति  श्रद्धा और प्रेम स्वभाव सिद्ध रहा है !और माँ को ही केंद्र विन्दु में रख कर यहाँ भारतमाता ,गौमाता प्रथ्वीमाता ,गुरुमाता ,देवी माता अदि श्रद्धास्पद माँ सूचक शव्दों का व्यापक प्रयोग हुआ है !इस समय भारतीय धर्म संस्कृति का अवमूल्यन अज्ञान ,अहंकार और स्वार्थ के कारण हिन्दुओं के दव्वरा हो रहा है !इसीलिए बहुत गलत परम्पराओं का जन्म हो रहा है !अगर इस गलत परम्परा के कारण भी माँ के उपकारों का लोग स्मरण करें और माँ के साथ आदर ,सम्मान का व्योहार करें तो यह भी ठीक है !अगर हमारी श्रद्धा सिर्फ शब्दों तक ही सीमित है तो यह शाब्दिक श्रद्धा  तो वैसी ही है जैसे ड्राईंग रूम में सजे हुए कागज़ के सुगंध रहित कागज़ के फूल ! 

Friday, 6 May 2016

आज समाज जिस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है !उसमे कई दृश्य भव्यता के और कई दृश्य अत्यंत दीनता के दिखाई देते हैं !आजादी के पहले का भारत आज नजर नहीं आता है !आज राजनीति में पुराने राजमहाराजाओं या धनपतिओं का वर्चस्व नहीं है !आज राजनीति से लेक्रर प्रशासन तक उन लोगों का बहुमत है जो कभी दलित या पिछड़े कहलाते थे !दलितों और पिछड़ों में जो राजनीति या प्रसाशन में महत्ता पा गए हैं उनकी जीवन शैली और भव्यता प्राचीन राजाओं और धनपतियों से भी कहीं अधिक ऐश्वर्य युक्त दिखाई देती है !जो दलित जातियां या व्यक्ति राजनीति या प्रशासन में नहीं है उनके जीवन स्तर में जरूर बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है ! फिर भी पहले से बेहतर है !आज इस बात की बहुत बड़ी आवश्यकता है कि जिन लोगों के पास जिम्मेदारी के पद हैं या जिनके पास बहुत अधिक संपत्ति इकट्ठी हो गयी है !बे अपने पैसे का उपयोग इस प्रकार से करें जिसका अनुकरण करके आम आदमी भी सुधर जाए !आज कल नेता और अधिकारी शादियों और मांगलिक समारोहों में बे हिसाब पैसा खर्च करते हैं ! हजारोँ लाखों लोगों को सुस्वाद व्यंजन परोशे जाते हैं लाखोँ रूपए सजाबट पर खर्च कर दिए जाते हैं !इस प्रकार के शादी समारोहों का अनुकरण अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी कर रहे हैं !सजाबट पर खर्च अधिक हो रहा है और भोजन की गुणबत्ता का लगातार ह्राष हो रहा है !अगर राजनेता अधिकारी धनपति शादी समारोहों में सजाबट आदि में खर्चे को समाप्त करदें तो आम आदमी के शादी समारोह भी सादगी पूर्ण और दिन में होने लगेंगे जिस से विजली व्य्वश्था में भी सुधार होगा और भोजन भी स्वास्थ्य वर्धक प्राप्त होगा !

Thursday, 5 May 2016

सिंघस्थ में प्राकृतिक आपदा से श्रद्धालुओं की मौत और साधु संतों के पंडालों का उखड़ना ------धर्म का नाम ही धर्म इसीलिए पड़ा है क्योंकि वह प्रजा को धारण करता है !धर्म से भुक्ति और मुक्ति दोनों की प्राप्ति होती है !जिस प्रकार कार्यों की सिद्धि  के लिए विधि होती है !उसी प्रकार से धार्मिक कार्य भी जभी सफल होते हैं जब उनका क्रियांबन  विधि विधान के अनुसार किया जाता है !जब धार्मिक कार्यों में विधि विधान की उपेक्छा या अवज्ञा की जाती है !तो इस प्रकार के प्राकृतिक तांडव उत्पन्न हो जाते हैं !सिंघस्थ का यह प्रकृति का तांडव ऐसा ही प्रतीत होता है ! 
विद्यार्थियोँ के लिए तो आदर्श वाक्य प्रेरक होते हैं !किन्तु कर्म करने वालों को तो आदर्श बाक्य जीवन में उतारना चाहिए !ताकि आदर्श वाक्य और आदर्श कर्म का समन्वय युवा पीढ़ी को आदर्श कर्मकरने की प्रेरणा प्रदान करेगा !और इसी से आदर्श समाज का निर्माण होता है !नहीं तो आदर्श वाक्य मात्र शब्दों की कसरत बनकर रह जाते हैं !और समाज अत्यंत छल और कपट युक्त झूठा आचरण करने लगता है !प्रमाणिकता और सत्यनिष्ठा का नाश हो जाता है !भारतीय समाज में इस प्रकार के दुहरे जीवन के मान दंड आज सर्वत्र दिखाई देते हैं ! किन्तु स्वार्थोँ का घटा टॉप अन्धकार इतना गहरा है ! कि लोग अपने छोटे से स्वार्थ पूर्ति के लिए समाज और विधान और सभी कुछ जिसे आदर्श कहा जाता है समाप्त करते रहेंगे !समय का उलट फेर बड़ा विचित्र होता है !आज छल कपट युक्त जीवन ही मनोवांछित फल प्रदान कराने में सहायक होता है !किन्तु जो अच्छे शुद्ध जीवन की आवश्यकता देश और समाज के लिए तथा आने बाली पीढ़ी के लिए ज़रूरी समझते हैं !बे सतत अपने नाम को मिटाने और समाज के बनाने में लगे रहते हैं और लगे हुए हैं !

Monday, 2 May 2016

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस ------------ मानव समूहों की व्यबस्था  करने की खोज में मनुष्य लोकतान्त्रिक  व्यबस्था तक पहुंचा है !इस खोज में प्रेस यानी समाचार पत्रों का विशेष योग दान रहा है !इसको ऐसे भी समझा जा सकता है की मानव समूहों की लिए उत्तम सामजिक व्यबस्था निर्मित करने की लिए ही समाचारपत्रों का जन्म हुआ था ! मानव समूह अब इस लोकतांत्रिक व्यबस्था से भी संतुष्ट दिखाई नहीं देता है !लोकतंत्र भी अब लड़खड़ाता हुआ चल रहा है !लोकतांत्रिक व्यबस्था के आधारभूत तत्त्व लोकतंत्र व्यबस्था में संलगन राजनेताओं ,राज्य अधिकारियों ,कर्मचारियों और लोकतांत्रिक  तथा  विभिन्न समाजिक ,संगठनों के तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के साधन बन गए हैं !मानवीय अधिकारों का संरकछक  और कर्तव्यों को दिशा देने वाला और लोकतंत्र को पुष्ट करने वाला  मीडिया भी अब बेसा नहीं रहा जैसा वह अपने जन्म काल में था ! स्वतंत्रता की अलख जगाने वाला प्रेस अब स्वतंत्रता की पुकार के साथ अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति में संलग्न देखा जाता है ! प्रेस की स्वतंत्रता ,प्रेस के पास ही संरक्छित एवं सुरक्छित है !जिस प्रेस का जन्म ही मानव अधिकारों की सुरक्छा और दिशा बोध के लिए हुआ था !उसको स्वतंत्रता कौन दे सकता है ?शक्कर की मिठास तो शक्कर में ही स्वाभाविक रूप से विदयमान रहती है !इसी प्रकार से प्रेस की स्वतंत्रता तो स्वाभाविक रूप से प्रेस में ही अन्तरनिहित है !    
संसार में पशु पक्छी और मनुष्य साथसाथ रहते हैं ! कुछ बातें इन में समान होती हैं ! लेकिन कुछ बातें मानव के जीवन में विशेष होती हैं ! उन्ही बातों में एक विशेष बात है मानव की धर्म भावना ! मनुष्य को हमेशा अंदर से एक आवाज आती रहती है कि उसका व्योहार ठीक हो रहा है या नहीं ? किसी ने खूब संपत्ति इकट्ठी की ! और पैसे के कारण जीवन में उसे जनता में आदर और प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो गयी ! उसका जीवन भी भोग ऐश्वर्य से पूर्ण हो गया ! फिर भी उसके चित्त में अशांति रहती है ! तो फिर मनुष्य के चित्त का समाधान किस से होता है ?यह सोचने खोजने का विषय हो जाता है ?इस से यह मालूम होता है ! जैसे मनुष्य में भोग ऐश्वर्य की बृत्ति है वैसे ही दूसरी बृत्तियां भी मौजूद हैं ! केवल भोग ही नहीं धर्म वासना और धर्म प्रेरणा भी मनुष्य में बड़ी बलबान होती है !किन्तु अधिकांश मनुष्य आज कल धर्म प्रेरणा से प्रभावित तो हो रहे हैं ! किन्तु प्रधानता भोग और ऐश्वर्य को दे रहे हैं ! किन्तु प्राचीन काल में धर्म का प्रयोग हमेशा ही भोग और यैश्वर्य की वासनाओ को अंकुश में रखने के लिए होता रहा है ! आज भी मनुष्योँ को धर्म का उपयोग भोग ऐश्वर्य प्राप्ति की वासनाओ पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए ! यदि व्योहार के छेत्र में धर्म के लिए गुंजायश ही न हो तो फिर धर्म रहेगा कहाँ ?यदि मठ मंदिर गुरुद्वारों मस्जिदों चर्चों आदि में ! धार्मिक प्रवचन करने वालों में, साधुओं मौलवी पादरियौ आदि में ,उसी प्रकार राजनीति में व्यापार आदि में धर्म का व्योहार नहीं होगा ,उसको अछूत समझा जाएगा तब वह धर्म नहीं अधर्म होगा ! जब धर्म जीवन के सभी छेत्रों में प्रवेश कर व्योहार को शुद्ध करने का काम करे ! और व्योहार के सभी नाकों पर उसका वर्चस्व हो ! तभी धर्म का कुछ सार्थक अर्थ होगा ! धर्म और व्योहार की जोड़ी किसी भी परिश्थिति में टूटनी नहीं चाहिए ! दोनों का मेल होना चाहिए ! बल्कि मेल करा देना चाहिए ! धर्म का व्योहार से मेल करना धर्म और व्योहार दोनों की दृष्टि से अपरिहार्य है ! किन्तु इस मेल का अर्थ व्योहार की तरह धर्म को पतित करने का नहीं बल्कि व्योहार को पवित्र और पावन करने के लिए होना चाहिए !

Sunday, 1 May 2016

मजदूरी बढ़ी है ! तो है मजदूर मगन कल से हो जाएगा बाजार में महंगा राशन -------- उच्च शिक्छा प्राप्त मेहनतकश मजदूर की तरह जीवन जीने वाले लोहियाजी ने दाम बांधो का नारा दिया था !मजदूरी बढ़ाने का नहीं ! गांधी जी और विनोबा जी ने भी जीवन भर अथक श्रम किया और मजदूरों जैसा जीवन जीया था !एक समय विनोबा जी का प्रतिदिन  का खर्च मात्र कुछ पैसे ही था !और जीवन के अंत में भी उनका खाने का खर्चा तीन रुपया प्रतिदिन था !उन्होंने अपनी जवानी के दिन मजदूरी करते हुए ही बिताए थे !उन्होंने ३२ साल तक मजदूरी की थी !उन्होंने उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया था !बो कहते थे लक्छमी आटा ,दाल ,चावल ,घी दूध ,मक्खन सब्जी ,कपास अदि है !कागज का रुपया लक्छ्मी नहीं है !कागज़ का रुपया तो नासिक में सरकारी प्रेस में छपता  है !उसको मन मर्जी के मुताबिक़ छापा जा सकता हैं !किन्तु लक्छमी  तो मानव श्रम और भूमि से पैदा होती है !रुपया लफंगा है !उसका आंतरिक मूल्य शुन्य है !उसको तो समुद्र में डुबो देना चाहिए !लक्छमी की बृद्धि तो उत्पादन से ही होगी !देश में उलटी विकास की गंगा बहाई जा रही है !उत्पादन करने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है !और मजदूरी बढ़ाने की मांग करने वाले गपोडिये कामचोर ,भासण कुशल लोग रुपयों में मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं जुलूस निकाल कर नारे बाजी कर रहे हैं ! इन राज्य कर्मचारी और मजदूर समर्थक नेताओं के यदि व्यक्तिगत जीवन पर दृष्टि डाली जाय तो मालुम पड़ेगा की ये बोलोग हैं जिन्होंने अपने कर्तव्यों का कभीे  भी पालन नहीं किया !सिर्फ बहसबाजी करते रहे और मुफ्त  की तनख्वाह  लेते रहे !सारे जीवन कामचोरी का उदाहरण प्रस्तुत कर मजदूरों का शोषण करते रहे !चाहे  मजदूर हो या  आम आदमी हो इनकी आर्थिक समस्याओं का समाधान तो श्रम और भूमि से उत्पन्न पदार्थों से ही होगा !रुपयों में  मजदूरी बढ़ाने से नहीं हो पाएगा !विकास को सही दिशा में लाने के लिये तत्काल रुपयों की महत्ता को समाप्त कर उत्पादक श्रम को महत्ता प्रदान करने कासिलसिला शुरू होना चाहिए !सभी प्रकार की सेवाओं का मूल्यांकन परिणाम के आधार पर होना चाहिए !प्रमाद ,आलस्य अदि की विदाई सार्वजानिक जीवन से कर देनी चाहिए !सभी श्रमों का मूल्य समान होना चाहिए !खेत में काम करने वाले कृषक और उद्द्योग चलाने वाले उद्दोगपति ,राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री आदि को भी सिर्फ जरूरत के अनुसार ही सुविधाएँ ,बेतन आदि दिया जाना चाहिए !जनता के धन को सौगात की तरह बांटने वाले राजनेताओं और भासण कुशल मजदूर नेताओं  के पास मजदूरों की समस्याओं का समाधान ना कभी था और ना आज भी है !लोगों कोअपनी खुली आँखों से ,दिल .और दिमाग  से बाजारों में उपलब्ध रुपया कमाने की होड़ में लगे व्यापारियों द्वारा नकली खाद्य  पदार्थों की विक्री .पदार्थों के अभाव,और निरन्तर बढ़ती हुई महगाई पर ध्यान देना चाहिए !मजदूरी रुपयों में बढ़ाने के स्थान पर दाम बांधने पर जोर देना चाहिए !भारत का सनातन आर्थिक विषमता  से मुक्ति का श्रम और भूमि से उपार्जित लक्छमी बृद्धि का  यह सन्देश क्रियांबित करना चाहिए !इस सन्देश के लिए किसी दिन विशेष की आवश्यकता नहींहै !यह सतत धारण किये रहने की प्रक्रिया है ! 
धर्म एक व्यापक शव्द है! जिस नीति विचार पर हमारा जीवन चलता है ,उसे हम धर्म कहत है !धर्म के चार चरण होते हैं ---श्रद्धा ,सत्य ,प्रेम और त्याग इनमे से श्रद्धा तो भरपूर दिखाई देती है! बाकी धर्म के तीन तत्त्व करीब करीब समाप्त हो गए हैं! अब धर्म सिर्फ श्रद्धा के एक पैर पर लड़खड़ाता हुआ चल रहा है! इसलिए बहुत धार्मिक आयोजनो ,मठ महंतो आश्रमों प्रवचनों के बाद भी धर्म कार्य में प्रगति नहीं दिखाई देती है!
केवल श्रद्धा के आधार पर धर्म खड़ा तो हो जाता है! पर उस से चलना दौड़ना नहीं बन सकता है! इसलिए धर्म के जो दूसरे चरण हैं उनको जाग्रत करना होगा ! धर्म का दूसरा चरण सत्य है! उसके बिना समाज का टिकना संभव नहीं है! आज कल लोग असत्य को ही सत्य मानते हैं! संपत्ति वैभव शक्ति को ही सत्य मान लिया है और व्यक्ति ने स्वयं को उसका मालिक मान लिया है !
जब्कि इस सबका मालिक व्यक्ति हो ही नहीं सकता है! सत्य यही है की इस सबका मालिक ईश्वर ही है! हमें इस सत्य की स्थापना करनी चाहिए! तीसरा चरण प्रेम है ! इसे दया भी कहते हैं! हम मौके मौके पर दया करते भी है ! किन्तु इसे नित्य धर्म नहीं बनाते हैं! घर में प्रेम है! व्योहार में गए की प्रेम ख़त्म एक दूसरे को ठगना शुरू कर देते हैं ! हर व्योहार के साथ पैसे को जोड़ दिया है! विद्वान लोग भी जितनी योग्यता रखते हैं उस से ज्यादा ही लूट खसोट करते हैं ! प्रेम का अर्थ है कि जितना प्रेम हम परिवार से करते हैं उतना ही प्रेम हम देश और समाज से करें ! सब पर प्रेम करना हमारा धर्म है ! चौथा चरण है ! त्याग बिना त्याग के समाज आगे नहीं बढ़ सकता है ! त्याग से ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है !त्यक्तेन भुंजीथाः ईशा वाष्य उपनिषद् के इन दो शब्दों में कहा गया है कि त्याग करो तो भोग की प्राप्ति होगी ! किसान एक दाना बोता है भगवान हजार दाने देते हैं ! जब तक मानव समाज में धर्म के इन चार चरणो का आबिर्भाव नहीं होगा तब तक सत्य अहिंसा आदि श्रद्धाएं रहेंगी किन्तु धर्म नहीं बनेगी !