१(४७_एवमुक्तुवा अर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत -----------ऐसा कहकर आसक्ति, मोह, मूढ़ता से हुए व्यथित मन वाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्ध भूमि में रथ के मध्य भाग में बैठ गए ! जिस उमंग और उत्साह के साथ बहुत सी दिव्य शक्तियों से युक्त अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा था कि आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये !जिस से कि में देख सकूँ की इस युद्ध भूमि में दुर्बुद्धि, अधर्म परायण दुर्योधन का प्रिय कार्य करने के लिए कौन कौन से महारथी, रथी और राजा लोग आये हैं ! जिनसे मुझे इस संग्राम में युद्ध करना है !अर्जुन ने इस कथन के साथ अपने गांडीव धनुष पर वाण भी चढ़ा लिया था !किन्तु युद्ध भूमि में खड़े हुए स्वजनों और गुरुजनों को देख कर वह मूढ़ता आसक्ति और मोह का शिकार हो गया !और अपने स्वधर्म को त्याग कर रथ में धनुष वाण का त्यागकर बैठ गया !स्वधर्म के ;पालन में सबसे बड़ी बाधा आसक्ति और मोह के कारण आती है !मोह ग्रस्त होने पर चित्त में मूढता प्रवेश कर जाती है !जिसके कारण धर्म परायण लोग भी चर्चा तो नीति ,त्याग ,और सदाचार की करते है !किन्तु सदाचार और नीति की चादर ओढ़ कर बे समस्त काम अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं !चोर डाकुओं और दुराचारियों से भी देश और समाज की उतनी छति नहीं होती है !जितनी इन रंगे सियारों के सदाचार के नाम पर किये गए लालची कामों से होती है !जो स्पष्ट अपराध करने वाले अपराधी होते हैं !उनके सम्बन्ध में जनमानस सतर्क हो जाता है !और अपराधों और अपराधियों को नियंत्रित करने के लिए कानून भी हैं !किन्तु उन मोह ग्रस्त आसक्ति युक्त लोगों को पहचान कर उन पर नियंत्रण कर पाना आमजन के लिए संभव नहीं हो पाता है !इनमे से प्रथम श्रेणी के मोहग्रस्त बे लोग होते हैं जो प्रतिभा या सिफारिश या वैधानिक व्यबस्था से महत्त्व पूर्ण स्थानो में प्रवेश पा जाते हैं !फिर बे लालची लोग अपने पदों का दुरपयोग कर देश और समाज को पतन की ओर ले जाते है ! और रिश्वत को ही अपना एक मात्र कर्म बनाकर अपने महत्त्व पूर्ण पदों का दुरपयोग करते हैं !दूसरे दर्जे के लोग बे होते हैं जो धर्म का चोला ओढ़कर त्याग और अपरिग्रह का उपदेश देते हैं !किन्तु उनका जीवन आकंठ भोग विलास में डूबा हुआ होता है !तीसरे प्रकार के मोहग्रस्त लोग बे होते हैं जो राजनीति में प्रवेश कर येन केन प्रकारेण वैधानिक संस्थाओं पर काबिज होते हैं !~और जनता के विकास की बात कर अपनी और अपने परिवार का विकास कर अकूत धन सम्पती का संग्रह कर लेते हैं !फिर ये तीनो प्रकार के लोभी लालची और स्वधर्म का त्याग करने वाले अपनी अधार्मिक और अनीति युक्त जीवन चर्या को पुष्ट करने के लिए सभी सद्वृत्तियों का नाश कर डालते हैं !जैसे कालाबाजारी, मिलावटी खाद्य पदार्थ बेच कर धनसम्पत्ति इकट्ठी करने वाले व्योपारी और रिश्बत खोर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी सभी निर्माण कार्यों में घपले बाजी करने वाले ठेकेदार वैधानिक संस्थाओं पर काबिज नेता लोग और अपने अपने कर्तव्य छेत्रोंसे भ्रष्ट ये सभी लोग अनीति से उपार्जित धन से गरीवों को खाद्यान और शीत निवारण के लिए गर्म वस्त्रों आदि का वितरण करते हैं ,और भी बहुत से से दिखावटी लोकहित के कार्य करते दिखाइ देते हैं !यही लोग धार्मिक कथाओं मंदिर मस्जिद आदि के निर्माण के लिए अत्यंत भ्रष्ट साधनो से उपार्जित धन से कथा प्रवचन आदि कराते हैं !और अपने इन सभी स्वार्थ निष्ठ कार्यों से समाज को दूषित प्रदूषित करते हैं !और आमजन के लिए गरीवी निर्मित करते हैं !लालच और मोह आसक्ति से ग्रस्त इन लोगों को अधर्म ही धर्म मालुम पड़ता है !इसीलिए भगवान श्री कृष्ण मोह मूढ़ता और आसक्ति से चित्त को मुक्त करने के साधन गीता में उपदेश के द्वारा बताते हैं !कोई भी व्यक्ति स्वभाव से अपराधी और मूढ़ नहीं होता है !किन्तु जब उसका चित्त माह ग्रस्त हो जाता है तो सामान्य व्यक्तियों की तो बात छोड़िये अर्जुन कैसा महान योद्धा भी आसक्ति और मूढ़ता के कारण कर्तव्य भ्रस्टता की और कदम बढ़ा देता है !और स्वधर्म छोड़ देता है !
कतिपय
बिन्दुओ पर आपकी शह दंगा कराने की ओर प्रेरित करती हँ ऐसा लगता है! विश्व
में व्याप्ति बढ़ाने की तीव्र इच्छा रखने वाले कतिपय मुसलमीन face book पर
अभद्र/असभ्य भाषा का प्रयोग कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं हम उनके सहयोगी
ना बने। कमसेकम अभद्र/असभ्य भाषा के लिए आपकी ओर से सांस्कृतिक डांट आपकी
श्रेष्ठता तथा बिंदु उठाने का वास्तविक उद्देश्य अवगत कराये ऐसी अपेक्षा हम
सभी की स्वाभाविक इच्छा है! कुछ अधिक हो गया हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ!


