Sunday, 31 January 2016

१(४७_एवमुक्तुवा अर्जुनः   संख्ये रथोपस्थ उपाविशत -----------ऐसा कहकर आसक्ति, मोह, मूढ़ता से हुए व्यथित  मन वाले अर्जुन बाणसहित धनुष का त्याग करके युद्ध भूमि में रथ के मध्य भाग में बैठ गए ! जिस उमंग  और उत्साह के साथ बहुत सी दिव्य शक्तियों से युक्त अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा था कि आप मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये !जिस से कि में देख सकूँ की इस युद्ध भूमि में दुर्बुद्धि, अधर्म परायण दुर्योधन का प्रिय कार्य करने के लिए  कौन कौन से महारथी, रथी और राजा लोग आये हैं ! जिनसे मुझे इस संग्राम में युद्ध करना है !अर्जुन ने इस कथन के साथ अपने गांडीव धनुष पर वाण भी चढ़ा लिया था !किन्तु युद्ध भूमि में खड़े हुए स्वजनों और गुरुजनों को देख कर वह मूढ़ता आसक्ति और मोह का शिकार हो  गया !और अपने स्वधर्म को त्याग कर  रथ में धनुष वाण का त्यागकर बैठ गया !स्वधर्म के ;पालन में सबसे बड़ी बाधा आसक्ति और मोह के कारण आती है !मोह ग्रस्त होने पर चित्त में मूढता प्रवेश कर जाती है !जिसके कारण धर्म परायण लोग भी  चर्चा तो नीति ,त्याग ,और सदाचार की करते है !किन्तु सदाचार और नीति की चादर ओढ़ कर बे समस्त काम अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं !चोर डाकुओं और दुराचारियों से भी देश और समाज की उतनी छति नहीं होती है !जितनी इन रंगे सियारों के सदाचार के नाम पर किये गए लालची  कामों से होती है !जो स्पष्ट अपराध करने वाले अपराधी होते हैं !उनके सम्बन्ध में जनमानस सतर्क हो जाता है !और अपराधों और अपराधियों को नियंत्रित करने के लिए कानून भी हैं !किन्तु उन मोह ग्रस्त आसक्ति युक्त लोगों को पहचान कर उन पर नियंत्रण कर पाना आमजन के लिए संभव नहीं हो पाता है !इनमे से प्रथम श्रेणी के  मोहग्रस्त बे लोग होते हैं जो प्रतिभा या सिफारिश या वैधानिक व्यबस्था से  महत्त्व पूर्ण स्थानो में प्रवेश पा जाते हैं !फिर बे लालची लोग अपने पदों का दुरपयोग कर देश और समाज  को पतन की ओर ले जाते है ! और रिश्वत को ही अपना एक मात्र कर्म बनाकर अपने महत्त्व पूर्ण पदों का दुरपयोग करते हैं !दूसरे दर्जे के लोग बे  होते हैं जो धर्म का चोला ओढ़कर त्याग और अपरिग्रह का उपदेश देते हैं !किन्तु उनका जीवन आकंठ भोग विलास में डूबा हुआ होता है !तीसरे प्रकार के मोहग्रस्त लोग बे होते हैं जो राजनीति में प्रवेश कर येन केन प्रकारेण  वैधानिक संस्थाओं पर काबिज होते हैं !~और जनता के विकास की बात कर अपनी  और अपने परिवार का विकास कर अकूत धन सम्पती का संग्रह कर लेते हैं !फिर ये तीनो प्रकार के लोभी लालची और स्वधर्म का त्याग करने वाले अपनी अधार्मिक और अनीति युक्त जीवन चर्या को पुष्ट करने के लिए सभी सद्वृत्तियों का नाश कर डालते हैं !जैसे कालाबाजारी, मिलावटी खाद्य पदार्थ बेच कर धनसम्पत्ति इकट्ठी करने वाले व्योपारी और रिश्बत खोर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी सभी निर्माण कार्यों में घपले बाजी करने वाले ठेकेदार वैधानिक संस्थाओं पर काबिज नेता  लोग और अपने अपने कर्तव्य छेत्रोंसे भ्रष्ट ये सभी लोग अनीति से उपार्जित धन से गरीवों को खाद्यान और शीत निवारण के लिए गर्म  वस्त्रों आदि का वितरण  करते हैं ,और भी बहुत से  से दिखावटी लोकहित के कार्य करते दिखाइ देते  हैं !यही लोग धार्मिक कथाओं मंदिर मस्जिद आदि के निर्माण के लिए अत्यंत भ्रष्ट साधनो से उपार्जित धन से कथा प्रवचन आदि कराते हैं !और अपने इन सभी स्वार्थ निष्ठ कार्यों से समाज को दूषित प्रदूषित करते हैं !और आमजन के लिए गरीवी निर्मित करते हैं !लालच और मोह  आसक्ति से ग्रस्त इन लोगों को अधर्म ही धर्म मालुम पड़ता है !इसीलिए भगवान श्री कृष्ण मोह मूढ़ता और आसक्ति  से चित्त को मुक्त करने के साधन गीता  में उपदेश के द्वारा बताते  हैं !कोई भी व्यक्ति स्वभाव से अपराधी और मूढ़ नहीं होता है !किन्तु जब उसका चित्त माह ग्रस्त हो जाता है तो सामान्य व्यक्तियों की तो बात छोड़िये अर्जुन कैसा महान योद्धा भी आसक्ति और मूढ़ता के कारण कर्तव्य भ्रस्टता की और कदम बढ़ा देता है !और स्वधर्म छोड़ देता है !

Friday, 29 January 2016

गांधीजी का अंतिम दिन-सदा की भांति गांधी जी साढ़े तीन बजे सुबह जगे १३ से १८ जनबरी के उपवास के बाद बे अभी भी कमजोरी महसूस कर रहे थे पौने पांच बजे उन्होंने गरम पानी शहद और नीबू का रस लिया और एक घंटे बाद १६ औंश नारंगी का रस लिया उनकी तबियत सुबह की शैर के निकलने के लिए अच्छी नहीं थी इसलिए थोड़ी देर कमरे के भीतर ही इधर उधर टहलते रहे खांसी को शांत करने के लिए वह पिसी हुई लोंग का चूर्ण तथा ताड गुड की गोलिआं लिया करते थे लोंग का चूर्ण ख़त्म हो गया था इसलिए मनु गांधी उनके साथ टहलने में शरीक होने के बजाय थोड़ा सा लौंग का चूर्ण तैयार करने के लिए बैठ गयी उसने गांधी जी से कहा अभी आकर साथ हो जाती हूँ नहीं तो रात को जरुरत पड़ने पर जरा सा भी चूर्ण नहीं रहेगा उन्होंने मनु से कहा कौन जानता है की रात पड़ने से पहले क्या होगा ?अथवा में जीवित भी रहूँगा या नहीं ?यह भी कहा अगर रात को में जीवित रह गया तो तुम आसानी से चूर्ण तैयार कर सकती हो इसके बाद उन्होंने अपने सचिव को अपना आखिरी बसीयत नामा दिया और कहा की इसे सावधानी से पढ़ लो अगर कोई बात रह गयी हो तो उसे जोड़ देना फिर उन्होंने स्नान किया 9.३० बजे सुबह का खाना खाया उसमे उबला हुआ साग बकरी का दूध ४ पके टमाटर ४ संतरे गाजर का रस अदरख और खट्टा नीबू तथा घृत कुम्हारी का काढ़ा था फिर उन्होंने नोआखाली के समाचार सुने १०.३० पर बे आराम करने खाट पर लेट गए इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया सुधीर घोष और एक अंग्रेज ने टाइम्स की एक कतरन पढ़ कर सुनाई जिसमे सरदार पटेल और नेहरू के मतभेदों से लाभ उठाकर सरदार को सम्प्रदाय बॉडी बताकर उनकी निंदा की गयी थी और नेहरू की प्रांसा का ढोंग रचा गया था गांधी जी ने कहा मै ऐसे लोगो को जानता हूँ १.३० बजे उन्होंने पेट पर मिटटी की पट्टी रखबाई पट्टी उत्तर जाने के बाद मुलाकातें फिर शुरू हुई सीलोन के डॉ डिसिल्वा उनकी पुत्री फ्रांस का पत्रकार लाइफ पत्रिका की मार्गरेट आदि ने मुलाकात की ४बजे मुलाकातें ख़त्म हुई इसके बाद गांधीजी सरदार पटेल के साथ अपने कमरे में चले गए सरदार के साथ उनकी पुत्री भी थी चर्खा कात ते हुए एक घंटे से अधिक बात चीत की गांधी जी ने सरदार से कहा पहले मेने यह विचार व्यक्त किया था की तुमको या नेहरू को मंत्रिमंडल से बाहर आने के लिए कहूँ लेकिन अब मै निश्चित तौर पर इस नतीजे पर पहुंचा हूँ की तुम दोनों का मंत्रिमंडल में रहना आवश्यक है आप दोनों की जरा सी भी फूट इस इस्थिति में विनाशकारी साबित होगी नेहरू जी प्रार्थना के बाद मुझ से मिलेंगे तब उनसे भी इस बात की चर्चा करूँगा प्रार्थना का समय निकट आ गया था और बात अभी भी चल रही थी इसलिए सरदार की पुत्री ने घडी की ओर इशारा किया गांधीजी ने कहा अब मुझे तेजी से प्रार्थना के लिए भागना होगा रास्ते में उनको सेविका ने बताया की काठियाबाद के दो कार्यकर्त्ता मिलने का समय चाहते है गांधीजी ने कहा प्रार्थना के बाद आएं अगर जीबित रहा तो उस समय उनसे मिलूंगा जब गांधीजी चबूतरे की सीढ़ीओं पर चढ़ गए जहाँ प्रार्थना होती थी उसी समय कोई आदमी दाहिनी और से भीड़ को चीरते हुए आगे आगया और प्रणाम की मुद्रा में हाथ जोड़कर गांधीजी के सामने झुकते हुए पिस्तौल से एक के बाद एक तीन गोलियां चलायीं गांधीजी जमीं पर लुढक गए उनके मुख से निकले हुए अंतिम शब्द थे राम राम
कतिपय बिन्दुओ पर आपकी शह दंगा कराने की ओर प्रेरित करती हँ ऐसा लगता है! विश्व में व्याप्ति बढ़ाने की तीव्र इच्छा रखने वाले कतिपय मुसलमीन face book पर अभद्र/असभ्य भाषा का प्रयोग कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं हम उनके सहयोगी ना बने। कमसेकम अभद्र/असभ्य भाषा के लिए आपकी ओर से सांस्कृतिक डांट आपकी श्रेष्ठता तथा बिंदु उठाने का वास्तविक उद्देश्य अवगत कराये ऐसी अपेक्षा हम सभी की स्वाभाविक इच्छा है! कुछ अधिक हो गया हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ!
BBC Hindi
SPECIAL STORY ON GODSE: क्या आप जानना चाहेंगे नाथूराम गोडसे का परिवार उनके बारे में क्या सोचता था. पढ़िए खास रिपोर्ट रेहान फज़ल की जो गोडसे के परिवार से मिलकर लौटे हैं.
http://bbc.in/1wCpoZE

Thursday, 28 January 2016

पूजा पाठ जब उस पूजा के लिए निर्मित विधि  विधान के अनुसार की जाती है  ! तब वह उत्तम फल प्रदान करने वाली होती है !भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय  १६(२३,२४)में कहा है कि जो मनुष्य पूजा पाठ के लिए नर्मित शाश्त्र विधि को त्यागकर अपनी इक्छा से मनमाना आचरण करते हैं ! वह ना तो अंतःकरण की शुद्धि को प्राप्त होते हैं ! और ना ही उन्हें सुख शांति की और ना परम गति की ही प्राप्ति होती है ! अतः प्रत्येक पूजा पाठ करने वाले स्त्री पुरुषों को पूजा पाठ के लिए निर्मित विधि विधान का पालन करना चाहिए !जिस प्रकार भौतिक वस्तुओं के निर्माण या प्राप्ति के लिए भी उनके लिए निर्मित विधानों और प्रिक्रयाओं का पालन करना पड़ता है !उसी प्रकार से पूजा पाठ के लिए निर्मित विधान का पालन करना भी अनिवार्य है !अगर कोई स्त्री या पुरुष न्यायाधीश का पद प्राप्त करना चाहता है ! तो उसे न्यायाधीश बनने के लिए निर्धारित विधान का पालन करना पड़ेगा !उस पद की प्राप्ति मानव अधिकारों की दुहाई देकर आंदोलन से प्राप्त नहीं की जा  सकती है !उसी प्रकार से शनि देव की पूजा भी निर्धारित शास्त्रीय विधान से ही की जानी चाहिए !इसको स्त्री पुरुषों के पूजा पाठ के अधिकारों से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए !शनि देव विघ्न उत्पन्न करने वाले गृह हैं !उनका पूजन विघ्न निवारण के लिए किया जाता है !उनको बुलाने के लिए नहीं किया जाता है !इसिलए शनि मंदिर  में प्रवेश करने और उनकी पूजा करने के स्पष्ट निर्देश शाश्त्रों  में है !जगद गुरु शंकराचार्य वैदिक सनातन धर्म के संरक्छक और शाश्त्र ज्ञान के प्रामाणिक जानकार होते हैं !इसीलिए इस सम्बन्ध में उनकी राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए !अगर महिलायें शाश्त्र विधि का त्याग कर शनिदेव की पूजा करना चाहती हैं !और इसको स्त्री के अधिकारों का मुद्दा बना रही हैं !तो उनको संविधान के अनुसार शनि मंदिर में प्रवेश को रोका नहीं जा सकता हैं !किन्तु उन्हें यह समझना  चाहिए कि शनि देव के मंदिर में शनि पूजा के लिए निर्मित विधान का उल्लंघन कर पूजा करने से उसका विपरीत विघ्न उत्पन्न करने वाला फल भी प्राप्त हो सकता है !

Wednesday, 27 January 2016

१(४६)यदिमाम्प्रतीकारम अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ---------------अगर ये शास्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र और उनके पक्छपाती राजा लोग युद्ध भूमि में सामना न करने वाले मुझे मर भी दें तो भी वह मेरे लिए बड़ा ही हितकारक होगा !गीता में भगवान का उपदेश समस्त प्राणियों को आसक्ति मूढ़ता और मोह निरसन के लिए ही हुआ है !युद्ध में प्रबृत्त कराने या छोड़ देना के लिए नहीं  हुआ है !युद्ध करने का निर्णय तो खुद अर्जुन का था !युद्ध अर्जुन को कर्तव्य रूप में प्राप्त हुआ था !और अब वह आसक्ति के कारण अपने कर्त्तव्य को त्याग रहा है !यह कर्तव्य ना करने की प्रवृत्ति देश समाज और व्यक्ति का पतन करने वाली होती है !इसीलिए कर्त्तव्य चाहे युद्ध करने का हो या व्योपार या राजनीति या सरकारी सेवा ,चिकित्सा या शिक्छण कार्य या न्याय कार्य  आदि करने का हो भीषण से  भीषण  परिस्थिति  में भी व्यक्ति को अपने कर्तव्य  का पालन करना चाहिए !यही बात गीता में विशेष तौर पर बतायी गयी है !मनुष्यों को  भुक्ति और  ,मुक्ति सब कर्त्तव्य पालन से ही प्राप्ति होती है !जब अर्जुन कैसे व्यक्ति भी मोह मूढ़ता और स्वजनाशक्ति से कर्तव्य से  पलायन करने लगते हैं !तब देश और समाज तथा व्यक्ति के नैतिक पतन कोरोका नहीं जा सकता है ! अर्जुन जैसे  विद्वान और अपने कर्तव्यछेत्र में निपुण और प्रशिक्छित व्यक्ति मूढ़ता ,मोह और स्वजनाशक्ति से कर्तव्य  विमुख होने की चेष्टा करते हैं !तो बे अपना सब ज्ञान विज्ञान कर्त्तव्य त्याग के समर्थन और अनुमोदन में लगादेते हैं !यह बात अर्जुन के यहाँ दिये गए तर्कों  से सिद्ध होती  है ! अर्जुन यहाँ अपने दिए गए कथन से अपने पूर्व में दिए गए कथनो  को झूठा सिद्ध कर रहा है !
!जब पांडवों को गुप्तचरों द्वारा यह समाचार प्राप्तहुआ था! कि दुर्योधन ने भीष्मपितामह से पूंछा था कि आप पांडवों की सेना को युद्ध में कितने दिनों में मार सकते हैं ! तब भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य ने कहा था कि बे पांडवों की संपूर्ण सेना का संघार एक माह में कर सकते हैं 1 कृपाचार्य ने दो महीने का और अश्वत्थामा  ने दस ही दिनों में पांडव सेना को मार देने की बात कही थी ! कर्ण ने कहा था कि वह पांडव सेना को मात्र पांच दिनों में ही समाप्त कर सकता है! तब  युधिस्ठर ने अर्जुन से पूंछा था कि में भी तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ कि तुम कितने समय में शत्रुओं की सेना का संघार कर सकते हो !अर्जुन का उत्तर था ! मै जो सत्य बात कह रहा हूँ उस पर ध्यान दीजिये ! मेँ भगवान श्री कृष्ण की सहायता से युक्त हुआ एक मात्र रथ को लेकर ही देवताओं सहित तीनों लोकों संपूर्ण चराचर प्राणियों तथा संपूर्ण कौरव सेना को भीष्म ,द्रोणाचार्य ,कर्ण कृपाचार्य आदि को  भी पलक मारते मारते ही  नष्ट कर सकता हूँ ऐसा मेरा विश्वास है ! भगवान शंकर का दिया हुआ पशुपति शस्त्र मेरे पास है ! जो प्रलयकाल के समान समस्त प्राणियों का नाश कर सकता है ! इसे ना तो भीष्म जानते हैं 1 और न इसका पता द्रोणाचार्य करण कृपाचार्य और अश्वत्थामा  आदि वीरों को ही है !वही अर्जुन यहाँ मोह मूढ़ता और स्वजनाशक्ति से ग्रस्त होकर कर्त्तव्य त्याग के समर्थन में यह बात कह रहा है !अगर में अश्त्र शस्त्र त्याग कर निहत्था अवस्था मेँ हो जाऊं  और फिर भी धृतराष्ट्र  केपुत्र मेरा बध कर दें ! तो यह भी मेरे लिए हितकर है !यह अर्जुन नहीं बोलरहा है !उसकी मूढता और स्वजनाशक्ति बोलरही है !आसक्ति महान पुरुषों को भी कितने नीचे स्टार तक गिरा सकती है !अर्जुन का यह कथन इसका उदाहरण है ! 




Tuesday, 26 January 2016

१)(४४,४५) उत्सन्न कुल धर्माणाम् मनुष्याणां जनार्दन नरके अनियतमवासो भबतीतिअनुशुश्रम========हे कृष्णा जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं ! उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरक बॉस होता है  !ऐसा हम सुनते आये हैं ! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हम लोग राज्य सुख लोभ से कुल का नाश करने का बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे ! और राज्य की प्राप्ति के लिए अपने स्वजनो को ही मारने के लिए तैयार हो गए !मोह मूढ़ता और आसक्ति तथा नीति अनीति और कर्त्तव्य पालन तथा कर्तव्य भ्रष्टता  के लिए भी सभी लोग आधार धर्म में ही खोजते हैं !यहाँ अर्जुन भी कर्त्तव्य त्याग के लिए धर्म को ही माध्यम बना रहा है !और कुल के नाश को आधार बनाकर राज्य धर्म पालन के बड़े उत्तरदायित्त्वा के निर्बहन से  पलायन कर रहा है !विनोबाजी ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए अर्जुन के इस कथन में तीन विचार दोष बताये हैं -----(१)मै मारने वाला -----आत्मविषयक अज्ञान (२)स्वजन मोह -----स्वधर्मनिष्ठा की कमी ! स्वधर्म अर्थात कर्त्तव्य पालन में स्वजन परिजन  आसक्ति या मोह  नहीं रहना चाहिए (३)सुख के लिए राज्य की प्राप्ति -----कर्मयोग के विषय में गलत कल्पना युद्ध राज्य सुख के लिए नहीं है  ! राज्य भी सुख के लिए नहीं है ! वह कर्त्तव्य पालन और प्रजा की रक्छा सुरक्च्छा और समृद्धि तथा लोक हित साधन के लिए है !
----------पांडव सदा कुल की रक्छा के लिए प्रयत्नशील रहे !शक्तिशाली होते हुए भी उन्होंने कुल  का नाश ना हो इसके लिए अपने राज्य प्राप्ति के अधिकार को त्याग कर मात्र जीविको  पार्जन के लिए पांच गाओं की मांग की थी ! जिसके उत्तर में दुर्योधन का कथन था कि वह बिना युद्ध के सुई की नौक बराबर भी भूमि नहीं देगा ! !पांडव जब १२ बरष का बनवासी जीवन अत्यंत कष्ट में कन्द मूलफल खाकर और जमीन पर सोकर बिता रहे थे !उस समय भी करण  दुर्योधन और शकुनि दुःशाशन ने मंत्रणा कर पांडवों को मारने का षड्यंत्र किया था ! दुर्योधन अपने साथ बनवासी पांडवों को मारने केलिए अाठ हजार रथ तीस हजार हाथी कई हजार पैदल और नो हजार घोड़े लेकर गया था ! किन्तु दुर्योधन आदि का द्वैतबन में जहाँ पांडव रह रहे थे ! गन्धर्वों से युद्ध हो गया गन्धर्वों ने युद्ध में करण को पराजित कर दिया था ! और करण अपनी जान बचाकर युद्ध से भाग गया था ! दुर्योधन की सारी सेना भी भाग गयी थी  धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भी भागने लगे  थे ! किन्तु दुर्योधन और दुशाशन आदि को गन्धर्वों ने  पकड़ कर कैद कर लिया था  दुर्योधन आदि की रानियों को भी कैद कर लिया ! गन्धर्व जब दुर्योधन आदि को बंदी बनाकर ले जाने लगे ! तब सभीे कौरव सैनिक पांडवों की शरण में गए ! और उनसे कहा कि हमारे राजा दुर्योधन आदि को गन्धर्व बंदी बनाकर ले जा रहे हैं ! आप उनकी रक्छा  कीजिये ! भीमसेन ने सैनिकों की दीन पुकार सुन कर कहा था कि हम लोगों को जो काम करना चाहिए था वह गन्धर्वों ने पूरा कर दिया है ! ये कौरव कुछ और ही करना चाहते थे ! इन्हे विपरीत परिणाम देखना पड़ा है ! कपट विशेषज्ञ दुर्योधन आदि का यह हमलोगों को नुकसान पहुंचाने वाला षड्यंत्र गन्धर्वों ने विफल कर दिया है 1 भीम को इस प्रकार बात करते देख युधिस्ठर ने कहा ----भइया यह कड़वीं बातें कहने का समय नहीं है  !इस समय कौरव भारी संकट में फंस गए हैं ! हमको इस समय इनकी मदद करनी चाहिए ! भाई बंधुओं में मतभेद और लड़ाई झगडे होते ही रहते हैं ! कभी कभी उनमे वैर भी बन्ध जाता है ! परन्तु इस से कुल धर्म नष्ट नहीं होता है ! अर्थात कुल की रक्छा करने का कर्तव्य फिर भी बना रहता है ! जब कोई बाहर का मनुष्य कुल पर आक्रमण करता है तब श्रेष्ठ पुरुष उस बाहरी मनुष्य केद्वारा  होने वाले तिरिष्कार को सहन नहीं करते हैं ! दूसरों के द्वारा  आक्रमण किये जाने पर हम १०५ भाई हैं ! अर्जुन , ,नकुल ,सहदेव और तुम किसी से भी पराजित नहीं किये जा सकते हो ! गन्धर्वों द्वारा बंदी बनाये गए  दुर्योधन आदि को छुड़ा लाओ  !इसी समय चित्र सेन गन्धर्व द्वारा बंदी बनाया गया दुर्योधन जोर जोर से रोने लगा और बोला पुरूबंश का यश बढ़ाने वाले समस्त धर्मात्मात्माओं में श्रेष्ठ पुरुष सिंह महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिस्ठर मेरी रक्छा करो ! यह शत्रु तुम्हारे भाईओं को बंदी बनाकर लिये जा रहे हैं ! हमारे प्राणों की रक्छा करो ! कुरुवंश के लिए बड़ा भारी अपयश प्राप्तहो रहा है ! तब पांडवों ने गन्धर्वों से युद्ध कर उनको पराजित किया ! औरदुर्योधन आदि को उनकी कैद से मुक्त कराकर उनको जीवन दान प्रदान किया था ! उनके छूटने के बाद युधिस्ठर नेदुर्योधन आदि से कहा था कि फिर कभी ऐसा  दुस्साहस ना करना ! हमलोगों के प्रति मन में शत्रुता न रखना !किन्तु दुर्योधन की दुष्ट बुद्धि ने और उसकी कपट मंडली कर्ण दुशाशन शकुनि आदि ने पांडवों के द्वारा  की  गयी कुलरक्छा का उत्तर कुल के बिनाश से दिया था ! स्वजनाशक्ति  ,मोह और मूढता के कारण ही आज भी राष्ट्र मे लोकतांत्रिक भाव का सृजन नहीं हो पारहाहै !          
१)(४४,४५) उत्सन्न कुल धर्माणाम् मनुष्याणां जनार्दन नरके अनियतमवासो भबतीतिअनुशुश्रम========हे कृष्णा जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं ! उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरक बॉस होता है  !ऐसा हम सुनते आये हैं ! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हम लोग राज्य सुख लोभ से कुल का नाश करने का बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे ! और राज्य की प्राप्ति के लिए अपने स्वजनो को ही मारने के लिए तैयार हो गए !मोह मूढ़ता और आसक्ति तथा नीति अनीति और कर्त्तव्य पालन तथा कर्तव्य भ्रष्टता  के लिए भी सभी लोग आधार धर्म में ही खोजते हैं !यहाँ अर्जुन भी कर्त्तव्य त्याग के लिए धर्म को ही माध्यम बना रहा है !और कुल के नाश को आधार बनाकर राज्य धर्म पालन के बड़े उत्तरदायित्त्वा के निर्बहन से  पलायन कर रहा है !विनोबाजी ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए अर्जुन के इस कथन में तीन विचार दोष बताये हैं -----(१)मै मारने वाला -----आत्मविषयक अज्ञान (२)स्वजन मोह -----स्वधर्मनिष्ठा की कमी ! स्वधर्म अर्थात कर्त्तव्य पालन में स्वजन परिजन  आसक्ति या मोह  नहीं रहना चाहिए (३)सुख के लिए राज्य की प्राप्ति -----कर्मयोग के विषय में गलत कल्पना युद्ध राज्य सुख के लिए नहीं है  ! राज्य भी सुख के लिए नहीं है ! वह कर्त्तव्य पालन और प्रजा की रक्छा सुरक्च्छा और समृद्धि तथा लोक हित साधन के लिए है !
----------पांडव सदा कुल की रक्छा के लिए प्रयत्नशील रहे !शक्तिशाली होते हुए भी उन्होंने कुल  का नाश ना हो इसके लिए अपने राज्य प्राप्ति के अधिकार को त्याग कर मात्र जीविको  पार्जन के लिए पांच गाओं की मांग की थी ! जिसके उत्तर में दुर्योधन का कथन था कि वह बिना युद्ध के सुई की नौक बराबर भी भूमि नहीं देगा ! !पांडव जब १२ बरष का बनवासी जीवन अत्यंत कष्ट में कन्द मूलफल खाकर और जमीन पर सोकर बिता रहे थे !उस समय भी करण  दुर्योधन और शकुनि दुःशाशन ने मंत्रणा कर पांडवों को मारने का षड्यंत्र किया था ! दुर्योधन अपने साथ बनवासी पांडवों को मारने केलिए अाठ हजार रथ तीस हजार हाथी कई हजार पैदल और नो हजार घोड़े लेकर गया था ! किन्तु दुर्योधन आदि का द्वैतबन में जहाँ पांडव रह रहे थे ! गन्धर्वों से युद्ध हो गया गन्धर्वों ने युद्ध में करण को पराजित कर दिया था ! और करण अपनी जान बचाकर युद्ध से भाग गया था ! दुर्योधन की सारी सेना भी भाग गयी थी  धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भी भागने लगे  थे ! किन्तु दुर्योधन और दुशाशन आदि को गन्धर्वों ने  पकड़ कर कैद कर लिया था  दुर्योधन आदि की रानियों को भी कैद कर लिया ! गन्धर्व जब दुर्योधन आदि को बंदी बनाकर ले जाने लगे ! तब सभीे कौरव सैनिक पांडवों की शरण में गए ! और उनसे कहा कि हमारे राजा दुर्योधन आदि को गन्धर्व बंदी बनाकर ले जा रहे हैं ! आप उनकी रक्छा  कीजिये ! भीमसेन ने सैनिकों की दीन पुकार सुन कर कहा था कि हम लोगों को जो काम करना चाहिए था वह गन्धर्वों ने पूरा कर दिया है ! ये कौरव कुछ और ही करना चाहते थे ! इन्हे विपरीत परिणाम देखना पड़ा है ! कपट विशेषज्ञ दुर्योधन आदि का यह हमलोगों को नुकसान पहुंचाने वाला षड्यंत्र गन्धर्वों ने विफल कर दिया है 1 भीम को इस प्रकार बात करते देख युधिस्ठर ने कहा ----भइया यह कड़वीं बातें कहने का समय नहीं है  !इस समय कौरव भारी संकट में फंस गए हैं ! हमको इस समय इनकी मदद करनी चाहिए ! भाई बंधुओं में मतभेद और लड़ाई झगडे होते ही रहते हैं ! कभी कभी उनमे वैर भी बन्ध जाता है ! परन्तु इस से कुल धर्म नष्ट नहीं होता है ! अर्थात कुल की रक्छा करने का कर्तव्य फिर भी बना रहता है ! जब कोई बाहर का मनुष्य कुल पर आक्रमण करता है तब श्रेष्ठ पुरुष उस बाहरी मनुष्य केद्वारा  होने वाले तिरिष्कार को सहन नहीं करते हैं ! दूसरों के द्वारा  आक्रमण किये जाने पर हम १०५ भाई हैं ! अर्जुन , ,नकुल ,सहदेव और तुम किसी से भी पराजित नहीं किये जा सकते हो ! गन्धर्वों द्वारा बंदी बनाये गए  दुर्योधन आदि को छुड़ा लाओ  !इसी समय चित्र सेन गन्धर्व द्वारा बंदी बनाया गया दुर्योधन जोर जोर से रोने लगा और बोला पुरूबंश का यश बढ़ाने वाले समस्त धर्मात्मात्माओं में श्रेष्ठ पुरुष सिंह महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिस्ठर मेरी रक्छा करो ! यह शत्रु तुम्हारे भाईओं को बंदी बनाकर लिये जा रहे हैं ! हमारे प्राणों की रक्छा करो ! कुरुवंश के लिए बड़ा भारी अपयश प्राप्तहो रहा है ! तब पांडवों ने गन्धर्वों से युद्ध कर उनको पराजित किया ! औरदुर्योधन आदि को उनकी कैद से मुक्त कराकर उनको जीवन दान प्रदान किया था ! उनके छूटने के बाद युधिस्ठर नेदुर्योधन आदि से कहा था कि फिर कभी ऐसा  दुस्साहस ना करना ! हमलोगों के प्रति मन में शत्रुता न रखना !किन्तु दुर्योधन की दुष्ट बुद्धि ने और उसकी कपट मंडली कर्ण दुशाशन शकुनि आदि ने पांडवों के द्वारा  की  गयी कुलरक्छा का उत्तर कुल के बिनाश से दिया था ! स्वजनाशक्ति  ,मोह और मूढता के कारण ही आज भी राष्ट्र मे लोकतांत्रिक भाव का सृजन नहीं हो पारहाहै !          

Sunday, 24 January 2016

१(४२,४३)संकरो नरकायेबकुलघ्नानाम कुलस्य च  ----------------वर्णसंकर कुलघातियों और कुल को नरक में ले जाने वाला ही होता है ! श्राद्ध और तर्पण ना मिलने से कुलघातियों के पितर भी पितृलोक से गिर जाते हैं  ! इन वर्णसंकर संतानो के उत्पन्न होने से कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जाति धर्म भी नष्ट हो जाते हैं !महाभारत ने युधिस्ठर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने बताया कि पूर्वकाल में प्रजापति ने यज्ञ के लिए केवल चार वर्ण और उनके पृथक पृथक कर्मों की ही रचना की थी ! किन्तु धन पाकर या धन के लोभ से अथवा वासनाओं के बशीभूत होकर विभिन्न वर्णो के स्त्री पुरुषों में विवाह और विवाहोत्तर अथवा बिना विवाह के भी सम्बन्ध स्थापित हो गए ! जिस से वर्ण व्यबस्था का उल्लंघन  और अतिक्रमण होने लगा ! परिणाम स्वरुप वर्ण संकर संतानों का जन्म होने लगा ! वर्तमान समय में सभी वर्णो के स्त्रीपुरुषों  वर्णधर्म का त्यागकर वैवाहिक और व्याहरहित यौन सम्बन्ध स्थापित करते देखे जाते हैं ! जो वर्ण संकर संताने उत्पन्न होती हैं ! उनके कर्मों से ही उनके वर्ण की पहचान होती है ! क्योँकि वर्णाश्रम व्यबस्था गुण और कर्मों पर ही आधारित थी ! वर्णसंकर पुरुष अपने पिता या माता के अथवा दोनों के ही स्वभाव का अनुसरण करता है ! वह किसी भी प्रकार से अपने प्राकृतिक स्वाभाव को छिपा नहीं सकता है ! जैसे शेर अपनी चित्र विचित्र खाल और रूप के द्वारा माता पिता के समान ही होता है !उसीप्रकार मनुष्य भी अपनी योनि का ही अनुसरण करता है ! यद्द्पि कुल और वीर्य गुप्त रहते हैं  !अर्थात कौन कुल में और किसके वीर्य से उत्पन्न हुआ है ! यह बात ऊपर से प्रगट नहीं होती है ! तो भी उसकाजन्म संकर योनि में हुआ है ! वह मनुष्य  थोड़ा बहुत अपने माता पिता के स्वभाव का प्रदर्शन करता ही है ! सन्सार के सभी प्राणी नाना प्रकार के आचार व्योहार में लगे हुए हैं ! और भांति भांति के कर्म करते हैं ! अतः आचरण के सिवा  ऐसी  कोई वास्तु नहीं है जो जन्म के रहस्य को साफ़ तौर पर प्रगट कर सके ! ब्राह्मण वर्ण का मनुष्य भी यदि उत्तम शील अर्थात आचरण हीन हो तो उसका सत्कार ना करे ! और शूद्र भी यदि धर्मज्ञ और सदाचारी हो तो उसका विशेष आदर करना चाहिए ! मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील ,आचरण और कुल के द्वारा अपना परिचय देता है ! यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मों द्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाश में ला देता  है ! वर्तमान समय में जिस बच्चे के माता पिता का पता ना चले उसका वर्ण उसके पालक पिता का ही मानना चाहिए !और  पालक पिता के सगोत्र बंधुओं  का जैसा संस्कार होता है वैसा ही उसका भी करना चाहिए तथा उसी वर्ण की कन्या के साथ उसका विवाह भी कर देना चाहिए !
                                विनोबा जी ने कुलधर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि सब धर्मों से कुलधर्म बलवान है ! कुल से विशिष्ट संस्कार प्राप्त होते हैं !विशिष्ट गुणों का विकास होता है ! मनुष्य के चित्त पर उनका  बहुत प्रभाव रहता है ! उसी में से उसका स्वधर्म निश्चित होता है ! इसीलिए कुलधर्म श्रेष्ठ है धर्म का उदय पहले चित्त में होता है ! फिर उस से भावना पैदा होती है  !जब वह प्रत्यक्छ कृति में आता है तब वह कर्तव्य होता है ! मानव मूल्यों और संस्कारों की रक्छा स्त्रियों से ही होती है ! बच्चों के प्रथम संस्कार माता से ही निर्मित होते हैं ! शास्त्रकारों ने स्त्री को उच्च स्थान दिया है 1 इसीलिए स्त्री के लिए अनेक प्रकार के बंधन माने गए हैं ! स्त्री को पुरुष की अपेक्छा अधिक श्रेष्ठ अधिक योग्य माना गया है ! इस बात को ध्यान में रख कर स्त्री पुरुष समानता के बारे में सोचना चाहिए ! स्त्री पुरुष समानता का यह अर्थ नहीं है कि पुरुष जिस प्रकार का दुराचार  आदि कर अपना पतन करते हैं ! वैसा ही स्त्रियों को भी करना चाहिए !

Saturday, 23 January 2016

जीवन योग गीता २(२२बासान्सि जीर्णानि- आत्मा अजर अविनाशी है और उसको उसके कर्मानुसार शरीर प्राप्त होते रहते है सभी प्राणिओं के शरीर नाशवान है और आत्मा जो शरीरोँ के अंदर निवास करने से जीवात्मा कहलाता है अविनाशी है ऐसा विनाशी शरीर और अविनाशी जीवात्मा का संगम यह मनुष्य शरीर है यह समझ कर शरीर की मृत्यु को अनिवार्य तथ्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए जिस प्रकार मनुष्य पुराने कपड़ों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार सभी शरीरोँ में रहने वाला जीवात्मा पुराने शरीरोँ को छोड़ कर नए शरीर धारण कर लेता है पुराने शरीरोँ को छोड़ कर नए शरीरोँ को धारण करने की इस प्रिकिरिया को ही मृत्यु का मुख कहा जाता है जीवात्मा को उसके कर्मानुसार नए शरीरोँ की प्राप्ति होती रहतीहै जीवात्मा को कर्मानुसार ८४ लाख योनिओं में भटकना पड़ता है जब तक उसे अपने निज भगवद धाम या मुक्ति प्राप्त नहीं हो जाती है शरीर कर्मानुसार बदलते रहते हैं किन्तु जीवात्मा वही रहता है अमावस्या के अन्धकार के बाद जब चन्द्रमा पुनः प्रकट होता है तो यही कहा जाता है की यह वही चन्द्रमा है इसी प्रकार दूसरे शरीर में प्रिवेश करने के बाद भी देहधारी आत्मा वही है यह समझना चाहिए जैसे चन्द्र ग्रहण में अंधकार रूप राहु चन्द्रमा की और आता और जाता दिखाई नहीं देता है उसी प्रकार जीवात्मा भी शरीर में आता और शरीर को छोड़ कर जाता हुआ दिखाई नहीं पड़ता है इस श्लोक में शरीराणि पद बहुवचन में देने का तात्पर्य है की जबतक जीवात्मा को अपने वास्तविक स्वरुप का बोध नहीं होता तब तक यह जीव ८४ लाख योनिओं में भ्रमण करता रहता है और प्रकार प्रकार के शरीर धारण करता ही है देही पद का प्रयोग सम्पूर्ण जीवों का ज्ञान कराने केलिए हुआ है यहाँ प्रश्न खड़ा होता है की पुराने कपडोँ का दृष्टान्त शरीरोँ पर कैसे लागू हो सकता है क्योँकि शरीर तो बच्चोँ और जवानोँ के भी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं सभी सरीरोँ की मृत्यु आयु समाप्त होने पर ही होती है इसलिए मृत्यु का समय होना ही शरीरोँ का जीर्ण होना है वैसे भी शरीर प्रीति छण और प्रितिदिन अवस्था परिवर्तन से जीर्ण होता रहता है युवा बस्था होने से बचपन मर जाता है और बृद्ध होने से युवाबस्था मर जाती है प्रत्येक मनुष्य में एक इक्छा शक्ति होती है और एकप्राण शक्ति होती है इक्छा शक्ति के रहते हुए प्राणशक्ति नष्ट हो जाती है तब नया जन्म होता है अगर इक्छा शक्ति ना रहे तो प्राणशक्ति नष्ट होने पर भी पुनर जन्म नहीं होता है
देश में महापुरुषों के जन्मदिवस पर छुट्टी करने की मांग करने का रिवाज बन गया है और सरकार भी इस मांग को तुरत स्वीकार कर लेती है ना मांग करने वाले इस पर विचार करते हैं और ना ही सरकार की महापुरुषों के जन्म दिन या पुण्य तिथि पर छुट्टी की मांग करना या छुट्टी देना महापुरुषों का सम्मान नहीं बल्कि जिन लोगों की काम करने में रूचि नहीं होती है ऐसे निठल्ले काम चोरों को काम ना करने का एक और अवसर प्रदान करना है महापुरुषोँ का जीवन आराम हराम है की तर्ज पर चलता है और उनके नाम पर उनको सम्मान देने के लिए लोगों को काम ना करने की स्वतंत्रता दी जाती है यह अत्यंत शर्म नाक विरोधा भास है जब की उनकी कर्म संस्कृति का ज्ञान कराने के लिए उस दिन सामान्य दिनों से अधिक काम करना चाहिए और विद्यालयोँ में विद्यार्थिओं को उनके महान जीवन के बारे में बताया जाना चाहिए विद्यालयोँ की छुट्टी होती है किन्तु विद्यार्थिओं को यह जानकारी नहीं होती है की जिस कारण से छुट्टी हुई है वह व्यक्ति कौन था और उसने देश और समाज के लिए कब और कौन से महान कार्य किये थे वैसे भी सरकारी स्कूलोँ में सामान्य दिनों में भी पढ़ाई नहीं होती है इसलिए महापुरुषोँ के जन्म या पुण्य तिथि पर छुट्टी ना देकर अतिरिक्त कर्म प्रेरणा दिवस के रूप में बनाया जाना चाहिए और विद्यालयोँ में विचार गोष्ठिओं का आयोजन कर उनके जीवन के बारे में जानकारी देनी चाहिए तथा काम चोरी और निठल्ला पन को अवकाश दिवस के रूप में देने की प्रथा बंद की जानी चाहि

Friday, 22 January 2016

बच्चों को महापुरुषों के जन्म मरण आदि का  शिक्छण और जीवन कार्यों का शिक्छण   कराया  जाना चाहिए !ताकि बे भविष्य में महापुरुषों के महान त्याग और तपस्या युक्त जीवन को अपना आधार बनाकर राष्ट्र को सम्मुन्नत बनाने में समर्थ हो सकें !  और राष्ट्र भक्ति के द्वारा विश्व मानव बनने में सफल हो सकें !और युवाओं और प्रौढ़ तथा बृद्ध पुरुषों को बे  जहाँ भी जिस कर्मछेत्र में बे प्रवृत्त हों अपने जीवन कार्यों से महापुरुषों के द्वारा किये गए लोक कल्याण और राष्ट्र भक्ति के कार्यों को बच्चों के अनुसरण करने के लिए अपने आचरणों से  प्रस्तुत करना चाहिए !भारत में उल्टा हो रहा है !बच्चों को महापुरुषों के बारे में शिक्छण नहीं दिया जाता है !आलसी,प्रमादी  और कर्तव्य भ्रष्ट  लोग महापुरुषों के जन्म दिन पर छुट्टी की मांग करते हैं !और कर्तव्य भ्रष्ट  सरकारें तुरत छुट्टी की घोसणा कर देती हैं !ये कर्तव्य भ्रष्ट  शासन में बैठे लोग और आलसी प्रमादी अधिकारी ,कर्मचारी और शिक्छक बच्चों को महापुरुषों के   जीवन कार्यों के शिक्चण से वंचित कर देते हैं ! और अधिकांशतः अपने नाम को रोशन और मीडिया में अपने नाम को प्रकाशित करने के लिए मान  सम्मान की प्राप्ति की लिए प्रयासरत  लालची लोग जो अपने जीवन कार्यों से देश और समाज को बिगाड़ने और कलंकित   करने वाले l फिर महापुरुषों के बारे में विचार गोष्ठियों का आयोजन  आदि करते हैं !ये शव्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करने वाले तथाकथित लोग घोर अवसरवादी और स्वार्थी होते हैं !बच्चों से युवा हुए भारतीय नवयुवक महापुरुषों के जिए गए जीवन का किंचित मात्र लक्छण भी इनके द्वारा आचरित जीवन में नहीं दीखते  हैं !बल्कि ये महापुरुषों के आचरण के विपरीत कर्म करते दिखाई देते हैं !अन्यथा जिस देश भारत की विरासत त्याग तपस्या और देश भक्ति की रही हो ! उस स्वतंत्र भारत में कर्त्तव्य निष्ठा काअभाव और चारों और व्याप्त भ्रष्टाचार कैसे टिका रह सकता था  ?!विशाल सेना और आतंरिक सुरक्छा तंत्र के रहते कुछ आत्तंक वादीस देश पर आत्तंकवादी हमले करने में कैसे सफल हो सकते थी ?भुखमरी गरीवी आदि कैसे टिकी रह सकती थी ?इसिलए महापुरुषों के स्मरण करने की पद्धति बदलनी चाहिए !बच्चों को महापुरुषों के महान कार्यों का शिक्छण विद्यालयों में दिया जाना चाहिए !और उनका प्रशिक्छण अध्यापकों और अभिभावकों के आचरण से होना चाहिए !

Thursday, 21 January 2016

१(४०,४१)कुल्छ्ये  प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनः ---------------कुल का नाश होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म का नाश होने पर शेष बचे हुए सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है ! हे कृष्ण अधर्म  के अधिक बढ़ जाने से कुल  की स्त्रियां सदाचरण को त्यागकर भ्रष्ट हो जाती हैं ! और स्त्रियों के चरित्र भ्रष्ट हो जाने से वर्ण शंकर संताने उत्पन्न होने लगती  हैं !कुल का नाश ना हो और युद्ध भी न हो इसका गंभीर प्रयत्न श्रीकृष्ण और पांडवों तथा ऋषियों आदि ने भी किया था !किन्तु दुर्योधन ,करण ,दुशाशन ,और  शकुनि आदि के हठ और दुराग्रह तथा धृतराष्ट्र की दुर्योधन के प्रति आसक्ति के कारण युद्ध टाला नहीं जा सका था ! विदुर जो धृतराष्ट्र के भाई थे  !उन्होंने भी धृतराष्ट्र को धर्म युक्त उपदेश देकर कहा था ! कि पांडवों के साथ युद्ध करने में जो दोष है ! उन पर दृष्टि डालिये ! एक बार युद्ध छिड़ जाने पर सभी का नाश हो जाएगा ! इसके सिबा पुत्रोंके साथ वैर और  नित्य आक्रोश पूर्ण जीवन कीर्ति का नाश और आपके शत्रुओं को आनंद की प्राप्ति इस पारिवारिक विनाश से होगी ! भीष्म द्रोण तथा पांडवों का बढ़ा हुआ क्रोध अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होगा ! आपके १०० पुत्र करण और पांच पांडव ये सब मिलकर समुद्र पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी का शाशन कर सकते हैं ! आपके पुत्र जंगल के समान है ! और पांडव उसमे रहने वाले सिंह हैं  !आप सिंघो सहित सभी जंगल को नष्ट ना कीजिए ! तथा जंगल से उन सिंघों को दूर ना भगाइए ! आपके कुल में उत्पन्न ये अग्नि  के समान तेजस्वी  पांडव छमाभाव से युक्त और दुर्गणों से शून्य है ! अपने पुत्रों सहित आप लता के समान है  !और पांडव महान ब्रक्छ के सद्दृश हैं ! ब्रक्छ का आश्रय लिए बिना लता कभी भी विकसित नहीं हो सकती है !  जो अपने कुटुम्बीजनों का सत्कार करता है ! वह सुख और समृद्धि की प्राप्ति करता है ! आप समर्थ हैं ! वीर पांडवों पर कृपा कीजिये ! और उनकी जीविका के लिए उन्हें कुछ गाओं दे दीजिये ऐसा करने से आपको संसार में यश की प्राप्ति होगी ! आपको अपने पुत्रों को नियंट्रण में रखना चाहिए ! धृतराष्ट्र ने कहा विदुर तुम जो कुछ कह रहे हो वह परिणाम में हितकर है और  यह ठीक भी है ! जिस ओर धर्म होता है विजय उसीकी होती है ! किन्तु में दुर्योधन का त्याग नहीं कर सकता हूँ ! यद्द्पि पांडवों के प्रति मेरी बुद्धि सदा प्रेम पूर्ण रहती है ! किन्तु दुर्योधन से मिलाने पर मेरी बुद्धि पलट जाती है ! प्रारब्ध को उल्लघन  करने की शक्ति किसी में नहीं है ! मै तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ ! उसके सामने  पुरुषहार्थ व्यर्थ है ! भीम नेभी भगवान श्री कृष्ण से कहा था कि आप कौरवों के बीच में ऐसी ही बातें कहें जिस से हमलोगों में शांति स्थापित हो सके ! युद्ध की बात उन्हें सुनाकर आप भय भीत ना करना ! दुर्योधन असहनशील, क्रोध में भरा रहने वाला, श्रेय ओर सद्भाव  का विरोधी और दिल में बड़े हौसले रखने वालाहै ! अतः उसके प्रति कठोर बात न कहियेगा उसे सामनीति के द्वारा ही समझाने का प्रयत्न कीजियेगा !  हम सभी पांडव नीचे पैदल चलकर अत्यंत नम्र होकर दुर्योधन का अनुसरण करते रहेंगे  !परन्तु हमारे कारण भारतवंशियों का नाश ना हो ! आप भीष्म पितामह ,आदि से शांति स्थापित करने के लिए ही कहें जिस से सब भाईयों  में सद्भाव बना रहे और दुर्योधन भी शांत हो जाय ! राजा युधिस्ठर भी  शांति चाहते हैं ! और अर्जुन भी युद्ध के इक्छुक नहीं हैं क्योंकि अर्जुन में बहुत अधिक दया भरी हुई है  !शव्द ग्यानी धृतराष्ट्र भी दुर्योधन में  आसक्ति के कारण धर्म का पालन नहीं कर रहा है !और अर्जुन भी स्वजनाशक्ति के कारण कर्त्तव्य से भ्रष्टहोकर धर्म की बात कर रहा है और अधर्म तथा कर्तव्य त्याग से समाज में कर्म संकरता का सर्जन करना चाहता है !आसक्ति के निरसन के बिना धर्म चर्चा   वन्ध्या पुत्र के समान है !धर्म की सिद्धि और   उपलब्धि कर्तव्य पालन से ही होती है !

Wednesday, 20 January 2016

१(३८,३९)यद्द्प्या ये न पश्यन्ति लोभोपहत चेतसा -------यद्द्पि लोभ के कारण जिनका विवेक विचार लुप्त हो गया है ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने से होने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते हैं ! तो भी हे कृष्ण ! कुल का नाश करने से होने वाले दोष को ठीक ठीक जान ने वाले हम लोग इस पाप से निब्रत्त होने का विचार क्यों ना करें ?पांडवों का स्वभाव पूर्ण रूप से धर्मयुक्त और लोभ मुक्त था ! बे किसी भी स्थिति में कुल का नाश नहीं चाहते थे  ! बे दुर्योधन आदि के द्ववारा किये गए अत्यंत अन्याय युक्त क्रूर विध्वंसक आचरण के बाद भी उनसे भाई चारा और सौहाद्र बनाये रखना चाहते थे !इसीलिए युधिस्ठर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा था ! जिनका अपने साथ कोई सम्बन्ध भी ना हो तथा जो सर्वथा नीच और शत्रु भाव रखने वाले हों उनका भी वध करना उचित नहीं है ! फिर जो सगे सम्बन्धी श्रेष्ठ और सुहृद हैं ऐसे लोगों का बध कैसे उचित हो सकता है ? हमारे विरोधियों में अधिकांश हमारे भाई बन्धु, सहायक और गुरुजन हैं ! उनका बध करना तो बहुत बड़ा पाप हैं ! युद्ध तो पाप ही है ! इसमें तो कुछ भी अच्छा नहीं है ! जो लोग धीर वीर ,लज्जाशील श्रेष्ठ और दयालु हैं ये ही प्रायः युद्ध में मारे जाते है !और अधम श्रेणी के मनुष्य जीवित बच जाते हैं ! शत्रुओं को मारने पर भी उनके लिए सदा मन में पश्चाताप बना रहता है !  छत्रियों का  यह युद्ध रूप कर्म पाप ही है ! हम भी छत्रिय ही हैं  !अतः हमारा यह स्वधर्म पाप होने पर भी हमें तो करना ही होगा क्योंकि उसे छोड़ कर दूसरी किसी बृत्ति को अपनाना भी निंदा की बात होगी ! हमलोग ना तो राज्य त्यागना चाहते हैं ! और ना कुल के विनाश की ही इक्छा रखते हैं ! यदि नम्रता दिखाने से दुर्योधन आदि भी शांत हो जाएँ तो वही सबसे उत्तम है ! हम युद्ध की इक्छा ना रख कर साम, दान और भेद सभी उपायों से राज्य की प्राप्ति के लिए पर्यटन कर रहे हैं ! तथापि यदि हमारी साम नीति असफल हुई तो युद्ध ही हमारा प्रधान कर्तव्य होगा ! दुर्योधन आदि का चित्त लोभग्रस्त हो गया है ! यह धृतराष्ट्र ने भी विदुर से कहा था ! दुर्योधन लोभ के अधीन हो गया है ! उसकी बुद्धि दूषित हो  गयी है उसके सहायक भी दुष्ट स्वाभाव के ही हैं ! इसीलिए जाओ और परम बुद्धिमती और दूरदर्शिनी गान्धारी देवी को यहां बुला लावो ! मै उसीके साथ इस दुर्बुद्धि को समझा बुझा कर राह पर लाने की चेस्टा करूँगा ! किन्तु दुर्योधन ने अपनी माता गान्धारी की बात को भी नहीं माना था ! वेदव्यास ने भी कहा था स्वजनो के साथ कलह अत्यंत निन्दित माना गया है ! वह अधर्म एवं अपयश बढ़ाने वाला है ! अतः तुम स्वजनो के साथ कलह में ना पड़ो ! कुटुंब अपने शरीर जैसा ही होता है !किन्तु लोभ और एश्वर्या प्राप्त के लिए लालायित दुर्योधन की बुद्धि कुल के नाश और मित्र द्रोह से होने वाले पाप की और ध्यान नहीं दे रहा था !यहाँ अर्जुन की दृष्टि दुर्योधन आदि के लोभ की तरफ तो जा रही है ! पर बे स्वयं स्वजनाशक्ति से आबद्ध होकर बोल रहे हैं ! इस तरफ उनका ध्यान नहीं जा रहा है ! इस कारण बे अपने कर्तव्य से भ्रस्ट हो रहे हैं  ! जब तक व्यक्ति की दृष्टि  दूसरों के दोषों की तरफ रहती है ! तब तक उसको अपना दोष नहीं दीखता है ! अर्जुन को भी दुर्योधन आदि के दोष दीख रहे हैं ! और अपने में अच्छाई  का अभिमान   हो रहा है इसीलिए वह  अपनी समझ की तारीफ कर रहा है !और अपना मोह रूपी दोष नहीं देख रहा है !और उलटे भगवान श्री कृष्ण को ही उपदेश दे रहा है !
गांधीजी ने कांग्रेस का संबिधान बनाया था उन पर भी उनके विरोधी अनेक मनगढ़ंत आरोप उनके जीवन काल में लगाते थे और यह सिलसिला आज भी जारी है किन्तु गांधी जी आरोपों का खंडन ना तो खुद करते थे और ना किसी को करने देते थे उनका तेज इतना प्रखर था कि उनके जीवन काल में और आज भी उनके विरोधिओं को छोड़ कर कोई भी विश्वास नहीं करता है और उनकी कीर्ती विश्वव्यापी होती जा रही है कांग्रेस पार्टी ने भी कभी आरोपों का खंडन नहीं किया और चुप चाप आरोपों को झेलती रही परिणाम यह हुआ कि देश को मजबूत आर्थिक आधार और विश्व में भारत को प्रितिष्ठा दिलाने के बाद भी बिपक्षिओं के झठे और मनगढ़ंत आरोपों का खंडन ना करने के कारण कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी अब तो झूठ बोलने वालों में चुनाबी संघर्श होना है एक और प्रितिपल बदलने वाले असत्मय जीवन जी कर सत्य का स्तुतिगान करने वाले केजरीवाल है और दूसरी और कांग्रेस पर मनगढ़ंत आरोप लगाकर केंद्र में सत्तानशीन दल भाजपा है और कांग्रेस सत्ताप्राप्ति की जंग से बाहर है यह चुनाव दो आदर्शवाद की बात करने वाले दलों आमआदमी पार्टी और बीजेपी के मध्य हो रहा है देखते किसको सफलता मिलती है ?

Tuesday, 19 January 2016

१(३६,३७) निहत्य धार्तराष्ट्रानाः का प्रीति जनार्दन-------- हे कृष्ण इन धृतराष्ट्र के पुत्रों  और साथियों तथा सम्बन्धियों को मार कर हम लोगों को क्या लाभ होगा ? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा ! आतताइयों को दण्डित करने के लिए ही कानून बनाये जाते हैं !और उनको कानून के अंतर्गत दण्डित करना यह राजा का प्रमुख कर्तव्य होता है !अर्जुन यहाँ मोह के कारण उत्पान्न मूढ़ता का कारण आतताइयों  को दण्डित करना भी पाप बता रहा है !महाभारत कल में आततायी छै प्रकार के माने जाते थे ! आग लगाने वाला ,विष देने वाला ,हाथ में अश्त्र लेकर मारने को तैयार व्यक्ति ,धन का बलपूर्वक हरण करने वाला ,जमीन छीनने वाला और स्त्री का अपहरण करने वाला ! इनको दण्डित करने से राजधर्म का निर्बहन और पुण्य की प्राप्ति होती थी ! इसीलिए अपने वान्धव इन धृतराष्ट्र के सम्बन्धियों को युद्ध में मारना में उचित नहीं मानता हूँ !क्योँकि अपने कुटुम्बियों को मार कर हम कैसे सुखी होंगे ? ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी है ! यह मोह अर्जुन में अचानक उत्पन्न हुआ है ! जिसके कारण अपने छत्रियोचित कर्तव्य की तरफ से अर्जुन का ध्यान हट गया है जहाँ मोह होता है ! वहां मनुष्य का विवेक दब जाता है ! विवेक के दबने से  मोह की प्रबलता बढ़ जाती है ! और मोह के प्रबल होने से कर्तव्यभाव लुप्त हो जाता है ! यही इस्थिति   यहाँ अर्जुन की हो गयी है ! उसका  छात्र धर्म के साथ राज धर्म का  भी ज्ञान नष्ट हो गया है ! और वह अपने पूर्व में दिये गए कथनो और आश्वासनों को भी भूल गया है ! द्रौपदी ने अर्जुन भीम आदि से और भगवान श्री कृष्ण से अपनी ह्रदय विदीर्ण कर देने वाले दुःख को बताते हुए कहा था -----मेरी जैसी स्त्री जो कुन्तीपुत्रों की पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न  जैसे  वीर की बहन होने के बाद भी क्या किसी तरह राजसभा में केश पकड़ कर घसीट कर लाई जानी चाहिए थी ? में रजस्वला थी ! मेरे कपड़ों पर खून के छींटे लगे थे ! मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र था ! और में लज्जा और भय से थर थर काँप रही थी ! उसदाशा में मुझे कौरव सभा में बाल पकड़ कर घसीटते हुए लाया गया  था ! पांडवों ,पांचालों और वृष्णि वंशी वीरों के जीतेजी धृतराष्ट्र के पुत्रों ने मुझे दासी  कहकर मुझे भोगने की इक्छा प्रगट की थी ! मै धर्मतः भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्र बधू हूँ ! तो भी उनके सामने ही अपमानित की गयी थी ! भीमसेन के बल को धिक्कार है ! अर्जुन के गांडीव धनुष को भी धिक्कार है ! जो उन नराधमों द्वारा अपमानित होती हुई देख कर भी सहन करते रहे ! यह धर्म का सनातन मार्ग है कि निर्बल पति भी अपनी पत्नी की रक्छा करते हैं ! मेरे लिए न पति हैं ना पुत्र हैं न बांधव हैं और न भाई हैं ना पिता हैं और ना ही आप मेरी रक्छा कर रहे हैं ! क्योंकि आप सब लोग नीच मनुष्यों द्वारा जो मेरा अपमान हुआ था उसकी उपेक्छा कर रहे हैं ! मानो उनके दुष्क्रत्य के लिए आपके दिल में जरा भी दुःख नहीं है ! उस समय करण  ने जो मेरी हंसी उड़ाई थी ! उसने मुझे कौरव सभा में वैश्या कहा था ! उस से उत्पान्न हुई मर्मान्तक पीढ़ा मेरे अन्तस्थल में शूल की तरह चुभ रही है ! श्री कृष्ण चार कारणों से आपको सदा मेरी रक्छा करनी चाहिए ! एक तो आप मेरे सम्बन्धी हैं ,दूसरे अग्निकुंड से उत्पन्न होने के कारण में गौरव शालिनी हूँ  तीसरे आपकी सखी हूँ और चौथे आप मेरी रक्छा करने में समर्थ हैं ! श्रीकृष्ण ने अर्जुन भीम आदि की उपस्थित में यह कहा था ! द्रौपदी तुम  जिन पर क्रुद्ध हुई हो उनकी स्त्रियां भी अपने पतियों को अर्जुन के वाणो से छिन्न भिन्न और खून से लथ पथ हो मरकर धरती पर पड़ा देख इसी प्रकार विलाप करेंगी ! मै सत्य प्रतिज्ञा पूर्वक कह रहा हूँ  कि तुम राज रानी बनोगी ! द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण के मुख से ऐसी बातें सुनकर अर्जुन की ओर देखा ! तब अर्जुन ने द्रौपदी से कहा था ! लालिमा युक्त सुन्दर नेत्रों वाली देवी तुम विलाप मत करो भगवान श्री कृष्ण  जो कुछ कह रहे हैं वह अवश्य होकर रहेगा टल नहीं सकता है ! यहाँ अर्जुन मोह और स्वजनासक्ति के कारण बदली हुई भाषा बोल रहा है !आसक्ति  का निरसन ही गीता का मख्य ध्येयहै !परिस्थिति कैसी भी हो कर्तव्य कर्म का निष्पादन तो होना ही चाहिए !कर्तव्य का जब निष्ठां पूर्वक पालन समाज में नहीं होता है !तब कर्म संकरता समाज में व्याप्तहो जाती है !और लोग कर्तव्य भ्रष्ट होकर आदर्श की बातें करने लगते हैं !महाभारत का प्रसंग मात्र परिवार का युद्ध नहीं था !यह राजधर्म और कर्त्तव्य पालन का उदाहरण था !मोह ग्रस्त व्यक्ति परिवार प्रेम आदि की चद्दर ओढ़कर राजधर्म और कर्त्तव्य निष्ठां का विनाश कर देते हैं !फिर यह कर्तव्य भ्रष्टता का जहर संपूर्ण समाज में फेल जाता है !जैस आजकल देश और समाज में फैला हुआ  है !आदर्श व्याख्यानों की चद्दर तले घनघोर कर्तव्य भ्रस्टता  क्रियाशील है !

Monday, 18 January 2016

१(३४, ३५)आचार्याः पितरः ,पुत्रास्तथैव चः पितामह========आचार्य ,पिता ,पुत्र ,और पितामह ,मामा स्वसुर  ,पौत्र ,साले ,तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं ! यदि बे मुझ पर प्रहार भी करें तो भी में इनको मारना नहीं चाहता हूँ ! और हे कृष्ण यदि मुझे पृथ्वी ,पाताल और अन्तरिक्छ का राज्य भी मिलता हो तो भी में इनको मारना नहीं चाहता हूँ ! फिर इस पृथ्वी के राज्य के लिए तो में इनको कैसे मार सकता हूँ ? अर्जुन के इस कथन से उसका कुटुम्ब प्रेम और युद्ध ना करने की बृत्ति का अहसास होता है ! बहुत से लोगों को अर्जुन के इन कथनो से  यह कहने का अवसर प्राप्त होता है कि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था भगवान श्री कृष्ण ने उसको युद्ध में लड़ने के लिए प्रेरित किया और महाविनाश करवा दिया ! बहुत से गीता के भाष्यकार यह भी कहते हैं कि वास्तव में महाभारत का युद्ध कभी हुआ ही नहीं है !उपनिषदों में वर्णन है कि शरीर में एक सनातन देवा सुर संग्राम चलता रहता है तदनुसार गीता के १६ बे अध्याय में दैवी और आसुरी सम्पत्तियों का उल्लेख किया गया है ! विनोबाजी ने कौरव का अर्थ कर्मासक्त  और मूढ राजस तामस बृत्ति किया है ! कुरु का सूक्छम अर्थ है कर्मासक्त जिनके पीछे कुरु कुरु लगा है ! बे मूढ़ और तामस कौरव ! पांडव अर्थात प्रज्ञावान ,ज्ञान दृष्टि ,सात्त्विक बृत्ति से संपन्न आसुरी विरुद्ध दैवी अथवा राजस तामस विरुद्ध सत्त्वविक बृत्ति ! इस प्रकार गीता में इस इस युद्ध का दुहरा स्वरुप है ! कौरव पांडव रूपक है यह बात गांधी जी भी मानते थे !उनके पहले भी कई भाष्यकारों ने कहा है कि मनुष्य के ह्रदय में कुरुछेत्र है ! गीता में दैवी और आसुरी शक्तियों का निरूपण किया गया है !जो प्रत्येक मनुष्य के अंदर रहती हैं !गीता पर जितने भी भाष्य  और टीकाएँ है !वे भाष्यकारों की बुद्धि और ज्ञान के अनुसार ठीक हैं !लेकिन गीता का मर्म और धर्म तथा तत्त्व बिना महाभारत  के अध्ययन चिंतन और मनन के बगैर स्पष्ट नहीं हो सकता है !व्यास देव ने एक लाख श्लोकों  में महाभारत कि मानसिक रचना  तीन साल में हिमालय की तलहटी में बैठ कर की थी जिसको गणेशजी ने लेखनी से लिपिबद्ध किया था !महभारत में ८८०० श्लोक ऐसे हैं जिनका अर्थ सिर्फ व्यासजी जानते हैं या सुखदेव जानते हैं !गीता भी महाभारत का ही हिस्सा है !जो गीता में सूत्र  रूप में हैं !उसका विस्तृत स्वरुप महाभारत में हैं !इसीलिए अर्जुन के कथन को उसके महाभारत में बर्णित भिन्न भिन्न समय में दिये गए कथनो और उसके समग्र जीवन के आधार पर ही समझाना होगा !गीता युद्ध कराने या युद्ध कला को सिखाने वाला धर्म ग्रन्थ नहीं है !गीता व्यक्ति को हर परिस्थिति  में कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन करने की शिक्छा देने वाला अमूल्य ग्रन्थ है ! युद्ध ऐसी भयानक स्थिति में भी अपने कर्तव्य कर्म का अनासक्त  भाव से निर्बहन कर व्यक्ति मोक्छ प्राप्तकर सकता हैं !मोक्छ और परमगति ,परमशान्ति ,आदि सभी प्रकार कि श्रेष्ठ गतियों की उपलब्धि मनुष्यों को अनासक्त भाव से कर्तव्य पालन से हो सकती है !यही गीता का सनातन सर्वकालिक सन्देश मनुष्य मात्र के लिए है !!गीता में धर्म का अर्थ भी कर्तव्य कर्म ही है !जब यह कर्तव्य कर्म निष्ठापूर्वक अनासक्त  भाव से किया जाता है !तब यह कर्तव्य कर्म आत्मशांति प्राप्ति का मार्ग और परमपद प्राप्ति का साधन बन जाता है !वर्तमान काल में मनुष्य जीवन के सभी कर्म छेत्र भोग  कामनाओं से पूर्णरूप से आच्छादित होकर दूषित प्रदूषित हो गए हैं और लगातार हो रहे हैं !  सभी लोग वासनाओं और इक्छाओं की तृप्ति में प्रयासरत देखे जाते हैं !बे वासनाओं के माया जाल में इतने उलझे हुए हैं कि बे अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर  कामनापूर्ति में लगे रहकर देश और समाज का ताना बाना नष्ट कर रहे हैं !माया ममता से प्रेरित महत्त्वकांछियों के समुदाय ने सामान्य मनुष्यों का जीवन अनेक प्रकार के कष्टों से परिपूर्ण कर दिया है !कोई भी संगठन या संस्थान लोकहित के कार्यों को कर्तव्य निष्ठा से संचालित करता नहीं दिखाई देता है !लोग कामना भोग के सेवन में इतने मसगूल  दिखाई देते हैं !कि उनको अच्छे बुरे का भेद ही नष्ट हो गया है !आसक्ति  और कामनाओं के भोग के कारण बे त्याग प्रेम करुणा अपरिग्रह भक्ति आदि की अच्छी बातें बिभिन्न मंचों से करते दिखाई देते हैं !किन्तु आचरण पूरी तरह कामना और भोग  प्रधान है !और बे पूरी तरह से परिवार कल्याण और अपने शरीरों को प्रितिस्ठा प्रदान कराने के प्रयत्नो में मशगूल दिखाई देते हैं !अर्जुन भी यहाँ स्वजनासक्ति  से आसक्त होकर अपने पूर्वकथनो से पलट कर त्याग की बात कर रहा है !जब उसके प्रिय  हितों पर आक्रमण होगा तो वह फिर जिन लोगों को ना मरने की बात यहाँ कह रहा है !उनको युद्ध में मारने के लिए कृत संकल्प हो जाएगा !यहाँ वह यह आसक्तिके कारण भूल गया है !कि इस कथा  के पहले उसने इनही आचार्य और पितामह के लिए क्या उदगार व्यक्त किये थे !और बाद में भी फिर उसने इन सबके साथ युद्ध किया था ! अर्थात अपने कर्तव्य कर्म का निष्पादन किया था !
वेदिकधर्म में काल को ४ युगोँ में विभाजन सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग के रूप में किया गया है तथा इन युगोँ की आयु और इन युगों में जन्म लेने वाले स्त्री पुरुषों की आयु गुण धर्म आदि भी बताये गए हैं इस समय कलयुग चल रहा है इसलिए इस युग में जन्मे मनुष्योँ के आचार विचार व्योहार आदि पर ध्यान देते हुए ही हमें साधु संतों सन्यासिओं समाज सेबिओं राजनेताओं अध्यापकों तथा सभी प्रकार के मनुष्योँ के आचरणों पर बुद्धि पूर्वक विचार कर अपनी राय निर्धारित करनी चाहिए जिस प्रकार से आज मन का निग्रह करना इन्द्रिओं का वष में करना धर्म पालन के लिए कष्ट सहना बाहर भीतर से शुद्ध रहना दूसरों के अपराधोँ को छमा करना शरीर मन आदि में सरलता रखना वेद शास्त्र आदि का ज्ञान रखना यज्ञ विधि को अनुभव में लाना और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव रखने वाले ब्राह्मण समाज में बिरले ही हैं इसी प्रकार शूरवीरता तेज धैर्य शासन करने आदि की विशेष चतुरता युद्ध में कभी पीठ न दिखाना दान करना तथा शासन करने का भाव रखने वाले छत्री भी नहीं है गाय की रक्षा और खेती करने वाले वैश्य भी नहीं है वे सिर्फ खरीदने बेचने का व्यबसाय करते हैं और सरकारी नौकरी के द्वारा वेतन प्राप्त कर तथा शासन व्यबस्था चलाने वाले सेवा भावी सूद्र भी नहीं है इस प्रकार से पूर्व में प्रचलित वर्ण व्यबस्था पूरी तरह से समाप्त हो गयी है कलियुग में यह होता ही है इसलिए इस युग में वर्ण धर्म के स्थान पर भगवान भागवत धर्म की स्थापना करते है अर्थात धार्मिक व्यक्ति की पहिचान आचरण से की जाती है वर्ण या जाति से नहीं इसलिए इस युग में जिनमे ब्राह्मणो के गुण धर्म होते है तथा जो राजनेता या समाज सेवी तन मन धन से निस्वार्थ भाव से जनसेवा करते हैं और जो इस मरणशील संसार को अपने सुख भोग का साधन न बनाकर दुखमय मानकर लोकसेवा के लिए अपना जीवन अर्पित कर निष्काम भाव से ईश्वर की उपासना करते है वही सच्चे आस्तिक और ईश्वर भक्त होते हैं और परमात्मा के धाम को प्राप्त करते हैं यही भगवान की आज्ञा
गीता ९(३४)मन बड़ा ही चंचल प्रमथन शील जिद्दी और सभी इन्द्रियोँ से अधिक बलवान होता है उसको बस में करना वैसा ही असंभव है जैसे वायु को रोकना जीवात्मा मन का आश्रय लेकर ही कान नेत्र ,त्वचा रसना और नाक इन पांचों इन्द्रिओं के द्वारा भोगों का सेवन करता है इसलिए सबसे पहले मन को विषय भोग से हटाकर परमात्मा की साधना में केन्द्रित करना पड़ता है जब तक मन सांसारिक पदार्थों के भोग में लगा हुआ है तबतक आसक्ति युक्त मन परमात्मा की भक्ति नहीं कर सकता है इसलिए मन को ईश्वर के ध्यान अर्चा उपासना पूजा से ईश्वर में लगाना पड़ता है तब मन परमात्मा की भक्ति में लगने लगता है और परमात्मा की पूजा में मन अनुरक्त हो जाता है और फिर उसका आश्रयस्थल संसार ना होकर परमात्मा हो जाता है और भक्त परमात्मा की श्रेष्ठता का अनुभव कर परमात्मा की शरण ग्रहण कर लेता है तात्पर्य यह है की संसार के संबंधों के बजाय परमात्मा को ही नमस्कार करने लगता है जब तन मन परमात्मा की महत्ता और भक्ति से युक्त हो जाता है तब परमात्मा की महिमा का अनुभव उसे जीवित अवस्था में ही जाता है और अंतकाल में वह भक्त परमात्मा के धाम को प्राप्त हो जाता है यह भक्ति की ही महिमा है की भगवान की भक्ति से वर्तमान जीवन में भगवान की महिमा का दर्शन और मृत्यु के बाद भगवान के लोक की प्राप्ति हो जाती है किन्तु संसारिक भोगों को स्थायी बनाने की कितनी भी चेस्टा की जाय वह आज तक किसी की भी पूरी नहीं हुई और ना होगी क्योँकि संसार में स्वाभाविक संयोग वियोग होता रहता है
१(३२,३३)  ना कांक्छे विजयम कृष्ण ना च राज्यम सुखानि च ----------हे कृष्ण ना तो में विजय चाहता हूँ ना राज्य चाहता हूँ तथा ना सुखों  को ही  चाहता हूँ  हे गोविन्द हम लोगों को राज्य से क्या लाभ है ? और  भोगों से भी क्या लेन्हा   है ? जिनके  लिए हमारी राज्य भोग और सुख  की इक्छा है बे ही सभी अपने प्राणो की और धन की आशा का त्याग करक युद्ध भूमि में  खड़े हैं ! भौतिक जगत में आसक्ति अनेक प्रकार से व्यक्तियों को पकड़ती है !और कर्तव्य भ्रष्ट  करती है !यहाँ अर्जुन को कर्तव्य भ्रष्ट करने के लिए सभी प्रकार के अधिकारों और राज्य सुख  भोग के प्रति उदासीनता के रूप में आई है !अर्जुन का धर्म युद्ध रूप कर्तव्य कर्म करने का था !राज्य की प्राप्ति तो युधिस्ठर को होना थी !और राज्य से प्राप्त होने वाले सुख भी  सभी  को प्राप्त होने थे ! युद्ध  को भी पांडवों ने टालने का भरसक प्रयत्न किया था !यह युद्ध दुर्योधन के अन्याय और हठ धर्मिता  के कारण हो रहा था  ! !जब व्यक्ति का चित्त आसक्ति के प्रभाव में आ जाता है !तो उसकी बुद्धि में मूढता  छा जा जाती है  !और विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है !राज्य प्राप्ति और राज्य सुख भोगने की बलवती आकांछा ने दुर्योधन की बुद्धि विवेक का अपहरण कर लिया था !इसीलिए उसने किसी की भी सलाह को नहीं माना था !यहाँ तक कि वह पांडवों को उतनी भूमि भी बिना युद्ध के देने को तैयार नहीं था !जितनी भूमि सुई की नौक पर आ सकती थी !किन्तु जब उसकी संपूर्ण सेना और कुल का नाश हो गया !तब वह भी ऐसी ही भाषा बोल रहा था जैसी भाषा अर्जुन यहाँ बोल रहे हैं !उसने युधिस्ठर से कहा था में जिनके लिए कौरवों का राज्य चाहता था बे मेरे सभी भाई मारे जा चुके हैं ! भूमंडिल के सभी छत्रिशिरोमणियों का संघार हो गया है !यहां  के सभी रत्न नष्ट हो गए हैं  !अतः विधवा स्त्री के समान श्रीहीन हुई इस पृथ्वी का उपभोग करने के लिए अब मेरे मन में तनिक भी उत्साह नहीं है ! जब द्रोण और करण शांत हो ग़ये तथा पितामह भीष्म भी मार डाले गए इसीलिए अब यह सूनी पृथ्वी तुम्हारी ही रहे ! मै सहायकों से रहित होकर राज्य शाशन की इक्छा नहीं करता हूँ ! में मृग चार्म धारण कर बन में चला जाऊंगा ! अपने पक्छ के लोगों के मारे जाने से अब इस राज्य में मेरा कोई अनुराग नहीं है !दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही राज्य सुख भोग के त्याग की बात कह रहे हैं !किन्तु दोनों ही आसक्ति के बंधन के वशी भूत  होकर त्याग की बात कर रहे हैं !दुर्योधन राज्य की प्राप्ति सुख भोग के लिए पाना चाहत था !किन्तु पा ना सका इसीलिए राज्य सुख त्याग की बात कर रहा है !और अर्जुन अपने स्वधर्म का परित्याग स्वजनाशक्ति  के कारण कर रहा है !दोनों ही की शव्दों की अभिव्यक्ति एक  जैसी है किन्तु भावों में भिन्नता है !यही आसक्ति से ग्रस्त मनुष्यों की मूढता है ! 

Saturday, 16 January 2016

१(३१)निमत्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ------------हे कृष्णा में शकुनों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनो को मार कर लाभ भी नहीं देख रहा हूँ इन दोनों बातों से अर्जुन यह कह रहे हैं कि में शकुनों पर विचार करके देखूं या स्वयं विचार करके देखूं दोनों ही प्रकार से युद्ध का आरम्भ और परिणाम हमारे लिए और संसार मात्र के लिए हितकारक नहीं दिखाई देता है  !महाभारत काल में शकुनों से ही कर्म के परिणामों की और कर्मो की पूर्व भूमिका का ज्ञान लोग करते थे !जब दुर्योधन का जन्म हुआ था तब जन्मते ही वह गधे की रकने सी आवाज में रोने लगा था उसके रोने की आवाज सुनकर दूसरे गधे भी रेंकने लगे थे गीध गीदड़ और कोाये भी कोलाहल करने लगे थे बड़े जोर की अंधी चलने लगी थी राजा धृष्ट रास्त्र भी भय से पीड़ित हो गए थे तब उन्होंने ब्राह्मणो को भीष्म और विदुर को तथा समस्त कुरुवंशियों को बुलाके कहा था हमारे कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले राजकुमार युधिस्ठर सबसे ज्येष्ठ हैं बे अपने गुणों से राज्य के पाने के अधिकारी है किन्तु उनके बाद यह मेरा पुत्र दुर्योधन ही ज्येष्ठ है क्या यह भी राजा बन सकेगा धृतराष्ट्र की यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओं में भयंकर मासाहारी जीव गर्जना करने लगे थे और गीदड़ अमंगल सूचक बोली बोलने लगे थे सब और उन भयानक अपशकुनों को देखकर विदुर ने कहा था कि आप के ज्येष्ठा पुत्र के जन्म लेने पर जिस प्रकार से  ये भयंकर अपशकुन प्रगट हो रहे हैं उनसे स्पष्ट जान पड़ता है की आपका यह पुत्र समूचे कुल का संघार करने वाला होगा ! यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नो की शांति हो जायेगी ! और यदि इसकी रक्छा की गयी तो आगे चल कर बड़ा भरी उपद्रव खड़ा होगा  !महीपते आपके निन्नयाबे पुत्र ही रहें ! यदि आप अपने कुल की शांति चाहते हैं तो इस एक पुत्र को त्याग दें ! केवल एक पुत्र के त्याग द्वारा इस सम्पूर्ण कुल का तथा समस्त जगत का कल्याण कीजिये ! नीति कहती है कि समूचे कुल के  हित के लिए  एक व्यक्ति को त्याग दें ! गाओं के हित के लिए एक कुल का त्याग कर दें  !और देश के हित के लिए एक गाओं का परित्याग कर दें ! और आत्मा के कल्याण के लिए सारे भूमण्डल को त्याग दें ! विदुर और सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणो के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र स्नेह के आसक्ति पूर्ण बंधन में बंधे धृत राष्ट्र ने दुर्योधन का त्याग नहीं किया था ! परिणाम स्वरुप महाविनाश हुआ !वेद व्यास ने भी धृत राष्ट्र से अमंगल सूचक भयानक उत्पातों और शकुनों को बताते हुए ! धृतराष्ट्र से कहा था कि तुम्हारे पुत्रों और अन्य राजाओं का मृत्युकाल आ पहुंचा है ! बे काल के अधीन होकर जब नष्ट होने लगें ! तब इसे काल का चक्क्र समझ कर मन में शोक ना करना ! यदि संग्राम भूमि में तुम इन सबकी अवस्था देखना चाहो तो तुम्हें में दिव्यनेत्र प्रदान करूँ ! फिर तुम यहाँ बैठे ही बैठे वहां होने वाले युद्ध का सारा दृश्य अपनी आँखों से देख सकोगे ! धृतराष्ट्र ने कहा ब्रह्मऋषि प्रवर में अपने कुटुम्बीजनों का वध नहीं देखना चाहत हूँ ! परन्तु आपके प्रभाव से इस युद्ध का वृतान्त अवश्य सुनना चाहत हूँ  !तब व्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी थी ! व्यासजी ने कहा  इस युद्ध में भयानक नरसंघार होगा ! क्योंकि मुझे इस समय ऐसे ही भयानक अपशकुन दिखाई दे रहे हैं ! बाज ,गीध ,कौए ,कंक और बगुले ब्रक्छों के अग्र भाग पर बैठते तथा अपने समूह एकत्रित करते हैं ! ये पक्छी अत्यंत आनंदित हो कर युद्धस्थल को बहुत निकट से जाकर देखते हैं ! इस से सूचित होता है कि ये मॉस भक्छी पशु पक्छी आदि प्राणी हाथियों ,घोड़ों आदि का मास खाएंगे ! प्रातः और सांयम् उदय और अस्त की बेला में सूर्य देओ कबन्धों से घिरे दीखते हैं ! कार्तिक की पूर्णिमा को कमल के समान नीलवर्ण के आकाश में चन्द्रमा प्रभा हीन होने का कारण दृष्टि गोचर नहीं हो पाटा है ! इसका फल यह है कि बहुत से शूरवीर नरेश तथा राजकुमार मारे जाकर पृथ्वी को आच्छादित करके रणभूमि में शयन करेंगे ! शनिश्चर नामक गृह रोहिणी को पीड़ा देता हुआ खड़ा है ! चन्द्रमा का चिन्ह मिट सा गया है  !इस से सूचित होता  है कि भविष्य में महान भय की प्राप्ति होगी !इत्यादि युद्ध सूचक अपशकुनों का वर्णन व्यास देव ने किया है !   
१(२८,२९,३०)------दृष्ट्वा इमाम  स्वजनं कृष्ण युयुत्सम  समुपस्थिम ---------हे कृष्ण युद्ध की इक्छा वाले इस कुटुंब समुदाय को अपने सामने उपस्थित देख कर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं ! तथा मुख सूख रहा है ! मेरे शरीर में भी कैंप काँपी हो रही है ! रोंगटे खड़े हो रहे हैं ! तथा हाथ से गांडीव धनुष गिरता मालुम पड़ रहा है ! और त्वचा भी जल रही है  !मेरा चित्त भ्रमित सा होता मालुम पड़ता है ! और में खड़ा रहने में भी मुश्किल महसूस कर रहा हूँ ! सभी स्वजन युद्ध के लिए उत्सुक हैं ! यह देख कर गात्र शिथिल हो गए हैं ! कान से सुनने की अपेक्छा साक्छात आँखों से देखने पर विशेष असर होता है ! विनोबा जी ने अर्जुन में स्वजनो को देख कर गात्र गलित हो गए, मुख सूख गया ,कम्प ,रोमांच ,गांडीव गिरगया, त्वचा जलने लगी ,खड़ा नहीं रह सकता मन चकराने लगा इन भावों को  अष्ट तामस भाव कहा है  !

Thursday, 14 January 2016

१(२६,२७)तत्र अपश्यत् स्थितान  पार्थ पितृनथ पितामहान-------जब भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि इस युद्ध भूमि में इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख  !कुरु शव्द में धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों के पुत्र आ जाते हैं ! क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं ! तब अर्जुन की दृष्टि दोनों सेनाओं में उपस्थित कुरुवंशियों पर गयी ! उन्होंने देखा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि पिता के भाई खड़े हैं ! जो कि अर्जुन के लिए पिता के समान थे ! भीष्म सोम दत्त आदि दादा खड़े हैं ! द्रोणाचार्य और कृपाचार्य विद्या देने वाले गुरु खड़े हैं ! पुरुजित ,कुंतिभोज ,शल्य ,शकुनि आदि मामा खड़े हैं ! भीम ,नकुल ,सहदेव ,दुर्योधन ,विकर्ण आदि दुर्योधन के  १०० भाई खड़े हैं! अभिमन्यु ,घटोत्कच ,द्रौपदी के पांचों पुत्र  जो मेरे पुत्र हैं और भतीजे हैं !और दुर्योधन का पुत्र लक्छ्मण तथा दुशाशन के पुत्र भी खड़े हैं ! जो की मेरे भतीजे लगते  हैं ! गुरु पुत्र  अश्वत्थामा आदि जो दुर्योधन के मित्र हैं ! और ऐसे ही मेरे मित्र भी खड़े हैं ! द्रुपद विराट ,शैव्य आदि ससुर और सम्बन्धी भी खड़े हुए हैं ! और युद्ध में बिना किसी स्वार्थ के दोनों पक्छों में अपने प्राणो की आहुति देने के लिए सात्यकि और कृतवर्मा आदि युद्वंशी वीर भी खड़े हुए हैं ! इनके अतिरिक्त बान्हीक आदि प्रिपितामह,,धृष्टद्युम्न शिखंडी ,सुरथ आदि साले, जयद्रथ आदि बहनोई, तथा अन्य बहुत से सगे सम्बन्धी भी दोनों सेनाओं में खड़े हुए हैं ! दोनों ही सेनाओं में सम्बन्धी ही सम्बन्धी देखकर अर्जुन के ह्रदय में कौटंबिक और स्नेहगत आसक्ति के कारण कायरता आगयी ! वह अपने दुष्ट और अधर्म विनाशक कर्तव्य से भ्रष्ट हो गया ! और ऐसी खतरनाक और विषाद ग्रस्त  स्थिति में चलागया जो धर्म और नैतिकता ,आदर और श्रद्धा का चादर ओढ़कर  कर अर्जुन को मोह ग्रस्त  और कर्तव्य भ्रष्ट करने के लिए आई थी ! जिसके कारण अप्रितम और अजेय  योद्धा और दिव्य शक्तियों से संयुक्त अर्जुन विषादग्रस्त हो गया ! उस विषाद के निवारण के लिए भगवान  को उपदेश देना पड़ा जो गीता के रूप में प्रगट होकर  समग्र मानव जाती  के लिए भी मोह मूढ़ता ,और आसक्ति तथा विषाद के निरसन का शशक्त और अमर  माध्यम बन गया      
शायद ही कोई ऐसा दिन निकलता हो जब देश में हिन्दू मुस्लिम दंगों तनाओं या झगड़ों के समाचार प्रकाशित न होते हौं मुहम्मद साहिब के जन्म दिन पर भी हिन्दू मुस्लिम झगड़ा हो गया झाँसी में मेने देखा की जलूस में बच्चे और युवा भी हाथों में तलवारें घुमाते हुए चल रहे थे जैसे मुहम्मद साहिब का जन्म दिन मनाने के बजाय कहीं युद्ध करने जा रहे हौं अभी देओबन्द में हापुड़ में और एक जगह और मुहम्मद साहिब पर आपत्ति जनक टिप्पड़ी करने पर हिन्दू मुस्लिम विवाद हो गया इन सब घटनाओं को देख कर ऐसा लगता है जैसे हिन्दू मुस्लिम एक दूसरे से लड़ने के मौके की तलाश में रहते हौं और कोई छोटी सी घटना भी उनको लड़ने का अवसर प्रदान करने के लिए काफी हो जाती है ये हिन्दू मुस्लिम विवाद क्या देश का भाग्य बनगए हैं ?इन दो धर्मों के बीच कभी स्थायी शांति स्थापित हो पायेगी ?यह तो भविष्य ही बताएगा अभी तो दंगा फसाद झगड़े तनाओ नफरत का दौर चलता दिखाई दे रहा है
महाभारत से सम्बंधित एक आख्यान है !युद्ध के बाद जब युधिस्ठर राजा हो गए !तो उन्होंने अपने मंत्री से कहा कि किसी महात्मा का पता करो जिसके चरण धोकर में उसको भोजन कराना चाहता हूँ !महाभारत युद्ध के बाद कुरुछेत्र गिद्धों और माशाहारी जानबरों  और बहुत प्रेतों ,भूतों और  पिशाचों  काकेंद्र बन गया था !साधु संत वहां खोजने पर भी नहीं मिलते थे !एक दिन जासूसों ने बताया की कुरुक्छेत्र के भीसण रक्त पात से रंजित एक गुफा में महात्मा रहते हैं !और बे सिर्फ अमावस्या को ही गुफा से कुछ समय के लिए बाहर निकलते हैं !मंत्री अमावस्या के दिन गुफा के बाहर बैठ   कर महात्मा के निकलने की प्रतीक्छा कर रहा था !दोपहर को महात्मा गुफा से बहार आये !मंत्री ने उनके चरणो में शाष्टांग दंड बात   किया !और अपना परिचय देकर निवेदन किया कि धर्म राज युधिस्ठर अपने राजमहल को आपके पावन चरणो से पवित्र करने के लिए आपको भोजन के लिए आमंत्रित किया है !यह सुनकर महात्मा विलाप करने लगा और तुरत गुफा के अंदर चलागया !जब मंत्री ने यह बात युधिस्ठर को बतायी तो युधिस्ठर बड़ा दुखी होकर सोचने लगा कि क्या उसका राजमहल और अन्न इतना दूषित और अपवित्र है !कि कोई महात्मा आना तो दूर रहा निमंत्रण की बात सुनकर ही रोने लगता है !यह बात बहुत दुखी होकर युधिस्ठर ने भगवान श्री कृष्ण को सुनाई !यह सुनकर पहले तो भगवान श्री कृष्ण मुस्कराये फिर बे भी उदास होगये !जब युधिस्ठर नेइसका रहस्य जानना चाहा तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा की में मुस्कराया इसीलिये था की इस महात्मा नेइस रक्तरंजित स्थान को भगवान की साधना के लिए इसीलिए चुना था कि यहाँ उसकी साधना में बिघ्न करने कोई नहीं आएगा ! किन्तु यहां भी तुम्हारा मंत्री उसको निमंत्रित करने पहुँच गया ! इसीलिए में मुस्कराया था कि अभीभी ऐसे साधु संत हैं !जो आराधना के लिए एकांतवास करते हैं औरउनके जीवन का ध्येय सिर्फ ईश्वर कीप्राप्ति ही होती है !किन्तु आने वाले समय में जो कलियुग होगा उसमे ऐसे संत साधु नहीं मिलेंगे इसीलिए में उदास हो गया था !साधु भोग को त्याग कर योग की और बढ़ता है !किन्तु यह कलियुग है इसमें साधु महात्मा योग के नाम से भोग की प्राप्तिकरते है !राम रहीम आदि इसी कोटि के साधु संत है जो योग नाम मात्र का करते है ! और भोग का सेवन प्रचुर मात्र में करते हैं !तुलसी दास जी ने रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में कलियुगी तपस्वियों की चर्चा करते हुए कहा है !तपसी धनवंत दरिद्र  ग्रही !कलिमहिमा तात ना जात कही !

Wednesday, 13 January 2016

१(२३,२४ ,25) योत्स्यमानेन अवेक्छे अहम या एते अत्र समागतः -----दुष्ट बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इक्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं ! उन सभी राजाओं को जो युद्ध करने को उतावले हैं ! उन सबको में देख लूँ !  निद्रा को जीतने वाले अर्जुन के इस प्रकार कहने पर भगवान श्री कृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य भाग में भीष्म और द्रोणा चार्य के सामने खड़ा करके अर्जुन से कहा कि पार्थ युद्ध की इक्छा से इकट्ठे हुए इन कुरुवंशियों को देखो ! विनोबा जी ने बताया है कि अर्जुन के मन की त्रिविध परिणिति दिखाई देती है -----(अ)उत्साह २२,२३ ) (बी)विषाद २८से ४६) (२)७  अर्जुन के चित्त की स्थिति कैसे बदलती गयी इसका चित्रण है ! अर्जुन की बात पूरी होते ही श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा कर दिया ----- श्री कृष्ण के इस तुरत निर्णय लेने का महाभारत का यह वर्णन ध्यान आकर्षित करता है ! कौन सा काम ठीक है और कौन सकाम गलत है ! इस विषय में श्री कृष्ण के मन में कभी संदेह उत्पन्न नहीं होता है ! इसीलिए बे तुरंत कार्य कर लेते थे ! किन्तु जो साधक या जिज्ञासु हैं उन्हें प्रत्येक कार्य भली प्रकार सोच विचार कर ही करना चाहिए !यहाँ अर्जुन ने दुर्योधन को दुर्बुद्धि कहा है !यह कहने के लिए अर्जुन के पास पर्याप्त कारण और प्रमाण थे !दुर्योधन हमेशा पांडवों से वैर और दुर्भाव तथा घृणा का पोषण करता था !वह पांडवों की उन्नति को कभी पचानही पाया था !पांडवों को नष्ट करने का कोई भी अवसर बो हाथ से जाने नहीं देता था ! इसके बाद भी पांडव उसके प्रति हमेशा सद्भाव और भाई चारे का   भाव बनाये रहे थे !पांडवों का व्योहार दुर्योधन के प्रति ऐसा ही था जैसा वर्तमान समय में भारत का पाकिस्तान के प्रति सद्भाव और भाई चारे का है !और दुर्योधन का व्योहार पांडवों के प्रति वैसा ही पांडवों को समाप्त करने का था जैसा पाकिस्तान का भारत के प्रति है !महभारत में दुर्योधन आदि के दुर्व्योहार  और पांडवों का उनके प्रति सद्व्योहार के अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं !जब पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था ! तो देश विदेश के राजाओं से जो बेश कीमती भेंट पांडवों को प्राप्तहुई थी ! उनको लेने का भार पांडवों ने दुर्योधन को दिया था !पांडवों के उस ऐश्वर्य को देख कर उसके शरीर की कान्ति फीकी पढ़ गयी थी ! वह सफ़ेद और दुर्बल हो गया था ! उसकी दशा बड़ी दयनीय हो गयी थी !और वह सदा चिंता में डूबा रहता था ! यह देख कर उसके पिता धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से कहा तुम बहुमूल्य वस्त्र ओढ़ते हो, पहनते हो अच्छी जाति के घोड़े तुम्हारी सवारी में रहते हैं ! बहुमूल्य शैयाएँ, मन को प्रिय लगाने वालीं युवतियाँ , सभी ऋतुओं में रहने के लिए विशाल भवन ,देवताओं के भांति सभी ऐश्वर्य तुम्हे कहने मात्र से प्राप्त हो जाते हैं ! तुमने कृपाचार्य से निरुक्त ,निगम ,छंद ,वेद के छहों अंग ,अर्थ शाश्त्र तथा आठ प्रकार के व्याकरण शाश्त्रों का अध्यन किया है  ! बलराम ,कृपा चार्य तथा द्रोणाचार्य से तुमने अश्त्र विद्या सीखी है ! सूत और मागध सदा तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं ! तुम्हारी बुद्धि की प्रखरता प्रसिद्ध है ! तुम्हें क्यों चिंता हो रही है ? तम्हारे इस शोक का कारण क्या है ? यह हमें बताओ ! दुर्योधन ने कहा युधिस्ठर की उन्नति देख कर मेरे शरीर की कान्ति फीकी पड़ गयी है ! तथा मै दीन दुर्वल हो गया हूँ ! व्यक्ति के सर्वनाश में ईर्ष्या से घातक और कोई अन्य तत्त्व नहीं है !दुर्योधन की पांडवों के प्रिति इसी ईर्ष्या ने भयानक युद्ध को जन्म दिया !जिस से सर्वनाश हुआ !ईर्ष्या मनुष्य के ज्ञान विज्ञान बुद्धि और  विवेक का नाश कर देती है !
९(२१)यज्ञ विद्या और उसका आयोजन उसके लोक कल्याण के उद्देश्य से हटकर व्यक्तिओं के स्वार्थ का पोषण करने वाला महाभारत काल में बन गयाथा राजा लोग युद्ध में विजय हासिल करने के लिए पापी अपने पापों को छुपाने के लिए दम्भ और पाखंड से युक्त यज्ञ तथा कुछ लोग अपने दुश्मनो की हत्या कराने के लिए यज्ञ कराने लगे थे ऐसा ही यज्ञ द्रुपद ने द्रोणाचार्य की हत्या कराने के लिए किया था जिस से धृष्टद्युम्न उत्पन्न हुआ था जिसने द्रोणा चार्य को समाधी में मार डाला था इस प्रकार यज्ञ भौतिक स्वार्थों की पूर्ति तथा स्वर्ग प्राप्ति कराने का साधन बन गया था और उसका मोक्ष प्रदान कराने वाला स्वरुप लुप्त हो गया था यज्ञ का विधिवत अनुष्ठान करने वाले अपने पुण्योँ से विशाल भोग युक्त स्वर्ग की प्राप्ति करते थे और जब स्वर्ग के सुख भोगने से उनके पुण्य समाप्त हो जाते थे तब पुनः स्वर्ग से पतित होकर संसार में जन्म ले लेते थे यह स्वर्ग प्राप्ति उनको होती थी जो भोगों की प्राप्ति के लिए तीनों वेदों में कहे सकाम धर्म का आश्रय लेकर विधि विधान से यज्ञ का अनुष्ठान करते थे आज कल भी बहुत से यज्ञ होते दिखाई देते हैं किन्तु उनमे विधि विधान का पालन प्रायः नहीं होता है हवन सामग्री यज्ञ के अनुकूल नहीं होती है घृत भी शुद्ध नहीं होता है मन्त्रों का उच्चारण भी अशुद्ध होता है और कभी कभी तो यज्ञ में हादशा होजाते है जिसमे यज्ञ करने वाले लोगों की मृत्यु भी हो जाती है यज्ञ का विकृत तामसी स्वरुप ही आजकल दिखाई देता है लोगों ने बहुत से कल्पित यज्ञ करना शुरू कर दिए हैं जिनकी बुद्धि शुद्ध नहीं है बे भी समाचारों में बने रहने के लिए बुद्धि शुद्धि यज्ञ करते दिखाई देते हैं यज्ञ करने वालों को ऐसे परमात्मा का अपमान कराने वाले यज्ञ से बचना चाहिए
मुसलमानो की आवादी देश में बढ़ रही है इस से हिन्दू कुछ समय बाद अल्पमत में हो जायेगा और देश मुस्लिम राष्ट्र बन जायेगा फिर हिन्दू उसी प्रकार से नेष्ट नाबूद हो जायेगा जैसा पाकिस्तान और बांग्ला देश में हुआ है यह हिंदूवादी संगठनो के लोगों का विचार है इसलिए इस विचार के जो लोग बीजेपी में चुनाव जीत कर आये है उनका यह सोच है की मुसलमानो के अनुपात में हिन्दू आबादी बढ़ने के लिए आवश्यक है की हिन्दू भी अधिक बच्चे पैदा करें मुसलमान यह मानते हैं की बच्चे अल्लाह की मर्जी से पैदा होते हैं इसलिए परिवार नियोजन गुनाह है इसलिए मुस्लिम आबादी बढ़ रही है किन्तु हिन्दू धर्म आबादी बृद्धि को धर्म संगत नहीं मानता है पृथ्वी स्वयं भगवान से जाकर प्रार्थना करती है की विशाल आबादी को धारण नहीं कर पा रही हूँ इसलिए आबादी कम करने की कृपा कीजिये इसलिए हिन्दुओं को आबादी के सम्बन्ध में मुसलमानो की नक़ल नहीं करनी चाहिए भारत धर्म निर्पेक्छ देश है इसलिय परिवार नियोजन सख्ती से लागू करना चाहिए दो बच्चों से अधिक संतान पैदा करने वालों को सभी प्रकार की सरकारी सुबिधायें बंद कर देनी चाहिए तथा कानून निर्माण कर दो बच्चों से अधिक पैदा करने वालों को सजा भी देनी चाहिए क्योँकि बच्चो की संख्या बढ़ाने वाले मुसलमान हो या हिन्दू अगर बच्चे अल्लाह की मर्जी से हो रहे हैं तो अल्लाह को पृथ्वी पानी और खाने की सामग्री भी बढ़ा देनी चाहिए अल्लाह के लिए इसमें क्या परेशानी है यदि यह नहीं होता है तो आबादी अगर इस तरह बढ़ती रही तो आदमी आदमी को खाने लगेगा इसलिए बीजेपी के नेताओं को आबादी बढ़ाने वाले व्यान देश हित में नहीं देना चाहिए
१(२० ,२१ ,२२ ) अथ व्यबस्थान दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः -------दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि के पश्चात अब युद्ध होने की तैयारी हो ही रही थी  !कि उस समय धृतराष्ट्र के पुत्रों ,राजाओं और उनके सहयोगियों को सामने व्यबस्थित रूप में खड़े देख कर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान श्री कृष्णा से यह वचन बोले ! हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को खड़ा कीजिये ताकि में युद्ध में खड़े हुए इन युद्ध की इकच्छावालों को देख लूँ कि इस युद्ध रूप उद्द्योग में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना है !अर्जुन के रथ पर जो ध्वजा फहराती थी उसको विश्वकर्मा ने तैयार किया था ! विश्वकर्मा ने यह ध्वजा   ट्वस्टा प्रजापति और इन्द्र के साथ मिलकर बनायी थी इन तीनो ने देवमाया के द्वारा इस ध्वजा  में छोटी बड़ी अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवम दिव्य  मूर्तियों का निर्माण किया था ! भीम सेन के अनुरोध से हनुमान जी उस ध्वजा  में युद्ध के समय अट्ठहास करते थे ! जिस से शत्रुओं के दिल दहल जाते थे ! और हनुमान जी  स्वयं ध्वज पर स्थापित थे ! उस ध्वजा  ने  ४ कोष अर्थात १२ किलोमीटर तक सम्पूर्ण दिशाओं तथा अगल बगल एवं ऊपर के आकाश को व्याप्त कर रखा था ! विश्वकर्मा ने उस ध्वज के निर्माण में ऐसी देव  माया रची थी कि वह ध्वज ब्रकच्छों से आवृत्त अथवा अवरुद्ध होने पर भी कहीं भी अटकती नहीं थी ! जैसेआकाश में बहुरंगा इंद्र धनुष प्रकाशित होता है ! परन्तु यह समझ में नहीं आता है कि वह क्या है ? ठीक ऐसा ही विश्वकर्मा का बनाया हुआ वह ध्वज है ! उसका रूप रंग बिरंगा है ! और वह अनेक प्रकार का दिखाई देता है ! जैसे अग्नि सहित धूम विचित्र तेजोमय आकार और रंग धारण करके सब ओर फैलकर ऊपर आकाश की और बढ़ता जाता है ! उसी प्रकार विश्वकर्मा ने उस ध्वज का निर्माण किया है ! उसके कारण रथ पर कोई भार नहीं बढ़ता है ! और ना उसकी गति में कोई रुकावट ही पैदा होती है !

Tuesday, 12 January 2016

काशी अनादिकाल से शीर्ष विद्वानो की नगरी रही है !शव्दिक ज्ञान और अनुभवजन्य ज्ञान का सही प्रमाणपत्र इसी नगरी से प्राप्त अनादिकाल से होता रहा है !शंकराचार्य और मंडन  मिश्रा का और स्वामी दयानंद और विशुद्धानन्द आदि सहित अनेक ऋषियों महर्षियों और ज्ञानियों के शाश्त्रार्थ इसी पवित्र भूमिमें हुए हैं !यहीं पर गांधीजी का १९१५ में बनारस हिन्दू  विश्वविद्यालय के प्रांगण में तत्कालीन वायसरॉय हार्डिंग्ज की उपस्थिति   में ऐतहासिक भासण हुआ था !विवेकानंद का भी यहाँ आगमन एक से अनेकबार हुआ !विवेकानंद १४ साल तक नंगे पैर एक अज्ञात सन्यासी के रूप में सम्पूर्ण भारत में भ्रमण करते रहे थे !इस भ्रमण के दौरान उनको भारत की दरिद्रता और आध्यात्मिक विपुलता का भी दर्शन हुआ !और धर्म में व्याप्त ढोँग और पाखंड का भी अनुभव हुआ था !इसी भ्रमण के दौरान उन्हें पावहारी ऋषि के भी दर्शन हुए !और इसी आध्यात्मिक शक्ति का दर्शन उन्होंने अमेरिका में विश्व धर्म सम्मलेन में सभी धर्मों के आचार्यों को कराया था !और महत्ता प्राप्त की थी !१८९३ में विवेकानंद आध्यात्मिक धारा को प्रवाहित करने के लिए अमेरिका गए थे !बे पश्चिम के विज्ञान से भारत के आध्यात्मिक ज्ञान का समन्वय स्थापित करना चाहते  थे !पश्चिम भौतिक ज्ञान के कारण प्राप्त भौतिक समृद्धि के अतिशय और अवांछनीय भोगों के कारण  अशांत था और भारत दरिद्रता  से पीड़ित था !बे चाहते थे कि पश्चिम भारत से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर शांति प्राप्त करे ! और भारत पश्चिम के विज्ञान से दरिद्रता का निवारण करे !विवेकानंद की डगर आसान नहीं थी !उनको अपने ही देश वासियों की ईर्ष्या  का शिकार होना पड़ा था !उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था की प्रत्येक भारतबासी को अपने जीवन से गुणों में दोष देखने की बृत्ति को निकाल कर फेंक देना चाहिए  और ईर्ष्या का त्याग कर देना चाहिए !और जहाँ कहींभी अच्छे कर्म हो रहे हों उनका सहयोग करना चाहिए !महान बन ने के ये तीन गुण व्यक्तियों और राष्ट्र के लिए सामान रूप से उपयोगी हैं !जिस प्रकार मातृ सुख की प्राप्ति के लिए महिलाओं को ९ महीने गर्भ धारण के कष्ट को उठाना पड़ता है !उसी प्रकार से विवेकानंद के द्वारा आचरित जीवन चर्या के लिए अपनी मन बुद्धि और चित्त को आत्मसंयम के द्ववारा नियंत्रित और परिवर्तित तथा परिवर्द्धित करना पड़ता है ! तथा अहंकार दर्प और अभिमान से मुक्त होना पड़ता है ! अमेरिका जाने के पहले उनका नाम विदिविशानन्द था ! जिसका अर्थ होता है जो अभी मार्ग में है !यह नाम राजस्थान की रियासत खेतड़ी के शाशक ने जो विवेकानंद के समर्पित भक्त थे !ने बदलबाया था !और विवेकानंद का नाम धारण किया था ! विवेकानंद का जीवन काफी कठिनाइयों के दौर से गुजरा था जिसका जिक्र उन्होंने अपने कई पत्रों में किया है !
गीता ९(१७)जगत का निर्माता परमात्मा है या यह अपने आप बनगया है आदि अनेक प्रकार के मत जगत निर्माण के सम्बन्ध में प्रचलित है गीता ईश्वर को जगत का निर्माता मानती है किन्तु ईश्वर प्राणिओं को उनके कर्मानुसार ही शरीर प्रदान करता है शरीरों की प्राप्ति में परमात्मा हस्तछेप नहीं करता है जैसे जिसके कर्म होते हैं वैशे ही पशु पक्छी स्त्रीपुरुष आदि के शरीर सभी प्राणिओं को प्राप्त होते है पूर्वकृत कर्म ही प्राणिओं की शरीर प्राप्ति का कारण है चूँकि ईश्वर ही जगत का निर्माता है इसलिए वही संपूर्ण जगत का पिता धाता (धारणकरने वाला )माता पितामह (जगत के निर्माण करने वाले प्रजापति ब्रह्मा का निर्माता भी ईश्वर है इसलिए ब्रह्मा का जनक होने के कारण जगत का पितामह भी ईश्वर ही है )गति (कर्मानुसार फलदाता )भर्ता (जगत का पालन पोषण करने वाला )स्वामी साक्छी (प्राणिओं के कर्मोँ को गबाह की तरह देखने वाला सभी मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है किन्तु कर्म फल भोग में परतंत्र है )जीवों की अंतिम गति अर्थात जब मनुष्य कर्म बंधन से मुक्त कर्म करने की कला का विकास कर लेता है तब वह जीव जो ईश्वर का ही अंश है ईश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है जो की जीव का निज धाम है आश्रय( बिना किसी भेद भाव के प्राणिओं की भलाई करने वाला) जगत की उत्पत्ति तथा संघार करनेवाला तथा सद्गति प्रदान करने वाला और अविनाशी बीज भी ईश्वर ही है समस्त जगत परमात्म का स्वरुप है यह समझ कर ईश्वर के वास्तविक भक्त संसार की सेवा में अपने आप को तथा अपने समस्त भौतिक साधनो को निष्काम भाव से सिर्फ ईश्वर प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्छ्य बना कर लगा देते हैं
१(१७,१८,१९)काश्यश्च परमेश्ववासः शिखंडी च महारथः ---------बड़ा  धनुष धारण करने वाले काशिराज और महारथी शिखंडी ,द्रष्टद्युम्न विराट ,तथा अपराजित सात्यकि ,द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने अभिमन्यु  तथा अन्य सभी राजाओं ने अपने अपने शंख बजाये ! उन शंखों की ध्वनि पृथ्वी से लेकर आकाश तक गूंज उठी जिस से धृतराष्ट्र के पुत्रों के ह्रदय विदीर्ण हो गए ! काशिराज जिस समय युद्ध भूमि में उतरकर युद्ध करते थे ! उस समय बे आठ रथियों के बराबर हो जाते थे ! शिखंडी का जन्म स्त्री के रूप में हुआ था !द्रुपद के कोई पुत्र नहीं था ! इसीलिए उनकी पत्नी ने भगवान शंका की आराधना की थी !भगवान शंकर के वरदान से उनको पुत्री की प्राप्ति हुई थी !जब द्रुपद की महारानी ने भगवान शंकर से यह निबेदन किया कि उसने आराधना पुत्र की प्राप्ति के लिए की थी !तब भगवान शंकर ने कहा था कि कालांतर में यह लड़की दैव के प्रभाव से पुरुष बन जायेगी !इसीलिए द्रुपद ने शिखण्डिनी के सभी संस्कार पुत्र की तरह किये !और यह बात छिपा राखी कि शिखण्डिनी लड़की है !शिखण्डिनी ने द्रोणाचार्य से अश्त्र शस्त्र और धनुर्वेद की शिक्छा प्राप्त की और वह युद्धकला में पारंगत  होका महारथी हो गयी !जब शिखण्डिनी युवाबस्था को प्राप्त हुई !तब उसका विवाह द्रुपद ने दशार्ण देश के राजा हिरण्यवर्मा  की पुत्री से कर दिया !जब हिरण्यवर्मा की पुत्री को विवाह के बाद यह मालूम पड़ा कि शिखण्डिनी स्त्री है !तब उसने अपने पिता के पास द्रुपद के इस धोखे के बारे   में बताया !हिरण्यवर्मा ने द्रुपद के राज्य पर आक्रमण करने का एलान कर दिया !जब शिखण्डिनी को इस बात का पता लगा !तो उसने निर्जन बन में जाकर अन्न जल त्यागकर मृत्यु को वरण करने का निर्णय किया !जिस वन में शिखण्डिनी अन्न जल त्याग कर मृत्यु को वरण करने का प्रयत्न कर रही थी !उसी बन में स्थूणाकरण नाम का यक्छ निवास करता था !स्थूणाकरण ने शिखंडनी से मृत्यु वरण करने का कारण पूंछा ! तब शिखण्डिनी ने सम्पूर्ण बर्तान्त  यक्छ को सुनाया !यह सुन कर यक्छ के ह्रदय में करुणा भाव जाग्रत हो गया !और उसने यक्छी विद्या से अपना पुरुषत्व शिखण्डिनी को दे दिया और उसका स्त्रीत्व स्वयं धारण कर लिया !और शिखण्डिनी से कहा की जब तुम्हारा काम पूर्ण हो जाए तब तुम हमारा पुरुषत्व वापिस कर देना !जब हिरण्य वर्मा ने शिखण्डिनी की परीक्छा ली तो वह पुरुष सिद्ध हो गया !इस पर हिरण्यवर्मा अपनी पुत्री को डाट डपट कर वापिस विदर्भ देश में लौट गया !इसी बीच यक्छों के अधिपति कुबेर स्थूणाकरण के भवन पर आये जब स्थूणा करण उनके स्वागत के लिए उपस्थित नहीं हुआ !तब उसने उसके उपस्थित ना होने का कारण पूँछा तो स्थूणाकरण के सेवकों  ने बताया कि इस समय स्थूणाकरण स्त्री बन गया है !इस पर कुबेर ने श्राप दे दिया कि अब स्थूणाकरण स्त्री ही बना रहेगा !इस प्रकार शिखण्डिनी शिखंडी बन गयी !राजा  द्रुपद और विराट यद्द्पि आयु में बृद्ध थे ! किन्तु बे बड़े पराक्रमी और युद्ध में अजेय तथा महारथी  थे धृष्टद्युम्न भी महारथी और पांडवों की संपूर्ण सेना का सेनापति था ! द्रौपदी के पांचों पुत्र भी महारथी थे ! मधुवंशी सूरवीर सात्यकि भी महारथी था ! वह mahaabharat युद्ध में kisi भी वीर के dwaara parajit नहीं हुआ था लम्बी भुजाओं वाला अभिमन्यु यूथपतियों का भी यूथपति था वह शत्रुनाशक वीर समरभूमि में अर्जुन और श्री कृष्ण के सामान पराक्रमी था !   

Monday, 11 January 2016

९(१३)देव अर्थात परमात्मा के जितने गुण हैं वे सभी देवी सम्पत्ति कहलाते हैं ये देवी सम्पत्ति परमात्मा की प्राप्ति कराने वाली होने से देवी सम्पत्ति कहलाती है महात्मा लोग इसी देवी प्रकृति के आश्रित हो कर भगवान को संपूर्ण प्राणियोँ का आदि और अविनाशी समझ कर भगवान का भजन करते हैं जो वास्तविक महात्मा होते हैं उनकी रूचि भोग और सम्पत्ति संग्रह में नहीं होती है उनकी वृत्ति में मन मष्तिष्क और चित्त में एक परमात्मा के सिवाय और कुछ नहीं होता है वे छण भर भी परमात्मा का वियोग सहन नहीं कर पाते हैं ऐसे महात्माओं का आशीर्वाद फल दायी होता है उनके पावन स्पर्श से भमि जल वायु और समय तक पवित्र हो कर बदल जाता है किंतु आज कल ऐसे महात्मा दुर्लभ हैं
९(१५,१६)वैदिक धर्म में साधकों को उनकी रूचि श्रद्धा विश्वास और योग्यता के अनुसार भगवान की उपासना पूजा अर्चा करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है परमात्मा एक है किन्तु उपासना की विधियां अनेक हैं इसलिए कुछ साधक भगवान को और अपनी आत्मा को एक मान कर भगवान की अभेद भाव से उपासना करते हैं दूसरे कई भक्त परमात्मा को अपने से पृथक मान कर चारों तरफ मुखवाले भगवन के विराट रूपकी अर्थात संसार को ही परमात्मा का विराट रूप मान कर संसार की सेवा को ही परमात्मा की पूजा मान कर भक्ति भाव से संसार की सेवा अनेक प्रकार से करते हैं इस प्रकार भक्त अपने आप को सेवक और भगवान को सेव्य मानकरतथा सभी पदार्थो को पूजा की सामग्री मान कर कार्य कारण रूप से स्थूल सूक्छम रूप से जो कुछ देखने सुनने समझने और मानने में आता है वह सब केवल भगवान ही है कृतु, यज्ञ, स्वधा, ओषधि, मन्त्र, घृत ,अग्नि, और हबन रूप क्रिया भी भगवान ही हैं अर्थात भक्त सेवक भगवान सेव्य और जो कुछ भी बस्तु रूप में सामग्री है वह सब पूजा के दृव्य है इस प्रकार से यह पूजा कार्य भक्त का जीवन भर चलता रहता है

Sunday, 10 January 2016

 भारत की अस्मिता और पहचान ही आध्यात्मिक है !इसीकारण से यहाँ स्वदेशी और विदेशी सभी धर्म जन्मे और विकसित हुए !जब इस्लाम और ईसाई धर्मों ने इस देश में पदार्पण किया तो इस देश ने उनका खुले मन से स्वागत किया ! भारत के बहुत से राजाओं और धनपतियों ने भी चर्च  और मस्जिद  के निर्माण में सहयोग किया !इसका मूल कारण भी यही है कि भारत में जन्मे ऋषियों ,साधुओं ,और महात्माओं ने संपूर्ण भारत में पैदल घूम घूम कर इस बात  का सन्देश जन जन तक पहुंचाया कि सभी के शरीर आकार, प्रकार, रंग, रूप, बुद्धि, वैभव समृद्धि आदि में जरूर भिन्न भिन्न हैं  किन्तु उन सभी शरीरों में एक ही आत्मा का निवास है !इसीलिए सभी के  सुख दुःख समान  हैं !सभी का यह कर्तव्य है कि सभी शरीरों को आत्मदृष्टि से देखें  और सभी को सुख सुविधा प्रदान कराएं  और किसी भी जीव की हत्या ना करें यहाँ तक कि अनावश्यक रूप से ब्रक्छों , भूमि , पहाड़ों का भी छेदन भेदन ना करें !इसीलिए भारत कभी भी अनादिकाल से साम्प्रदायिक नहीं रहा !भारत के सन्देश को यहाँ के सभी धर्मों को ग्रहण कर विश्व को यह सन्देश देना चाहिए कि भारत ने  कटटरता और सम्प्रद्यिकता का  कभी पोषण नहीं किया

Saturday, 9 January 2016

गीता ज्ञान १(१४,१५,१६)ततः श्वेते  हये युक्तेः ------भीष्म आदि के शंख बजाने के बाद सफ़ेद घोङो से युक्त महान रथ पर बैठे हुए भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन ने भी दिव्य शंख बड़े जोर से बजाये ! भगवान श्री कृष्णा ने पाञ्चजन्य नामक तथा अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया ! युधिस्ठर ने अनंत विजय और भयानक कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक शंख  तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष मणिपुष्पक नाम के शंख बजाये  !अर्जुन को अनेकानेक दिव्य शक्तियां प्राप्त थी ! जिस महान रथ पर अर्जुन और भगवान श्री कृष्णा बैठे हुए थे वह रथ वरुण ने अर्जुन को दिया था ! उसमे जुते हुए अश्वों का रंग चांदी के सामान सफ़ेद था ! बे सभी घोड़े गन्धर्व देश में उत्पन्न तथा सोने की मालाओं से विभूषित थे ! उस रथ की ध्वजा पर एक श्रेष्ठ कपि बैठा हुआ था ! उन घोड़ों की कांति सफ़ेद बादलों सी जान पड़ती थी ! बे वेग में मन और वायु की समानता करते थे ! वह रथ संपूर्ण आवश्यक वस्तुओं से युक्त था ! तथा देवताओं और दानवों के लिए भी अजेय था ! मयासुर ने अर्जुन को देवदत्त नमक शंख प्रदान किया था ! वह शंख जल के देवता वरुण देव का था ! जो बजाने पर बड़ी भारी आवाज करता था ! उस शंख की आवाज सुनके समस्त प्राणी काँप उठते थे ! विजली की गड़गड़ाहट के समान पाञ्चजन्य का गंभीर घोष सुनकर सब और फैले हुए समस्त पांडव सैनिक हर्ष से उल्लसित एवं रोमांचित हो उठे  !शंखों  की ध्वनि से मिला हुआ बेगवान् वीरों का निनाद पृथ्वी आकाश तथा समुद्रों तक फेल कर उस सबको प्रितिध्वनित करने लगा ! भगवान ने पाञ्चजन्य नामक शंख शंख रूप धारी दैत्य को मारकर उसको शंख के रूप में ग्रहण किया था अर्जुन के पास जो देवदत्त नमक शंख  था उसके  सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि वह शंख उनको  इन्द्र ने दिया था ! चित्र रथ गंधर्व ने भी अर्जुन को १०० दिव्य घोड़े दिए थे  !इन घोड़ों की यह विशेषता थी की इनमे से युद्ध में कितने ही घोड़े क्यों ना मारे जाएँ पर ये संख्या में १०० के १०० ही रहते थे ! बे  पृथ्वी स्वर्ग आदि सभी स्थानो पर जा सकते थे  !इन्ही १०० घोड़ों में से ४ सफ़ेद घोड़े अर्जुन के रथ में जुते हुए थे ! भीम को भीम कर्मा इसीलिए कहा जाता था क्योँकि वह युद्ध छेत्र में अत्यंत भयानक ढंग से युद्ध करते थे ! उन्होंने ही धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों का अकेले ही बध किया था तथा उन्होंने हिडिम्ब ,किर्मीर बकासुर ,,जटासुर ,आदि असुरोँ और जरासंध कीचक आदि बलवान वीरों को भी मारा था ! जब पांडव छिपे रूप में भिक्छा मांग कर अपना जीवन यापन कर रहे थे ! तब उनको भिक्छा में जो अन्न प्राप्त होता था ! उसमे से आधा भीम खाते थे और आधा शेष चारों भाई और कुंती खाती थी ! उनके पेट में ब्रक नामकी एक विशेष अग्नि थी जिस से बहुत अधिक अन्न पचता था ! इस कारण उनका नाम बृकोदर पड़ गया था ! ऐसे बृकोदर भीमकर्मा भीम ने बड़े आकार वाला पौण्ड्र नामक शंख बजाया ! युधिस्ठर ने अनंत विजय नामक शंख तथा नकुल और सहदेव न सुघोष मणि पुष्पक नामक शंख बजाये ! आचार्य विनोबा भावे न भगवान श्री कृष्णा के पाञ्चजन्य नमक शंख की व्याख्या करते हुए कहा है कि भगवान की आवाज पंचजनो की कल्याण की इक्छा से प्रेरित है ! और भक्त की आवाज भगवान की कृपा प्रसाद की देन है ! इसीलिए भगवान श्री कृष्णा की शंख का नाम पाञ्चजन्य और भक्त अर्जुन की शंख का नाम देवदत्त है ! इसी प्रकार से युधिस्ठर द्वारा बजाये गए अनन्तविजय नाम की शंख की व्याख्या इस रूप में भी  की जा सकती है कि युधिस्ठर धर्म राज हैं ! और जो धर्म पर आरुढ़ है  उसकी पराजय कभी  हो ही नहीं सकती है ! इसीलिएउनके शंख का नाम अनन्तविजय है ! भीम की शंख का नाम पौण्ड्र है जो आकार में सबसे अधिक विशाल है ! क्योँकि भीम की सभी कर्म भयानक हैं ! नकुल,और  सहदेव के शंख सुघोष मणि पुष्पक है ! जो अपने नाम की अनुकूल आकृति में सौम्य है ! बे नकुल की बुद्धिमत्ता और सहदेव की सुंदरता को दर्शाते हैं !
महाभारत ग्रन्थ के बारे में यह कहना कि इसको घर में रखना अशुभ है !और भगवान श्री कृष्णा चक्र हाथ में लेकर भीष्म पितामह की और जा रहे हैं !इस चित्र को घर में नहीं लगाना चाहिए !इस से झगडे का माहौल घर में बनसकता है !इसीलिए यह चित्र अशुभ है !ये जान बूझकर वैदिक संस्कृति के आध्यात्मिक और भौतिक लाभ से वंचितकरने के लिए निर्माण किया हुआ षड्यंत्र है !इस कारण से लोग इस महान आध्यात्मिक ग्रन्थ में उपदिष्ट समाज शास्त्र ,अर्थशास्त्र ,धर्म शास्त्र और मोक्छ शास्त्र के ज्ञान से वंचित हो गए हैं !व्यासदेव ने कहा है !कि जो ज्ञान विज्ञानं महाभारत में है वही अन्यत्र भी है !जो इसमें नहीं है वह कहीं भी नहीं है !भारतीय अध्यात्म का अनमोल आध्यात्मिक ग्रन्थ गीताशास्त्र भी महाभारत में हैं !विष्णु सहस्त्रनाम और भीष्मस्तव राज भी महाभारत में ही है !जिसका पाठ भक्तगण करके भोग और मोक्छ प्राप्त करते हैं !इसके अतिरिक्त महाभारत बहुविध आध्यात्मिक साधनाएं और अनेकों परमात्मा के पूजन के भी विधान है !इसे पंचम वेद कहा गया है !इसके बाद भी इस ग्रन्थ को घर में नहीं रखना चाहिए !यह कथन युक्ति और धर्म के विरुद्ध है !आप भी बहुत से महाभारत के प्रसंग पोस्ट करते रहते हैं !उनके पोस्ट करने में आपका क्या मंतव्य होता है !कहनही सकते हैं !किन्तु आपके द्वारा पोस्ट किये हुए कथानकों पर जब कुछ कमेंट किया जाता है !जो महाभारत के तो अनुकूल होता है !किन्तु आपकी समझ के प्रितिकूल होता है !उसे आप पब्लिश नहीं करते हैं !हो सकता है यह आपकी पालिसी हो !किन्तु महभारत के बारे में इस तरह से लिखना यह उचित नहीं है !

Friday, 8 January 2016

१(१२ ,13) तस्य सञ्जनयन हर्षं कुरूब्रद्धाः  पितामह -------- कौरवों में बृद्ध भीष्म पितामह ने दुर्योधन का उत्साह बढ़ाने के लिए शंख बजाया ! यद्द्पि भीष्म पितामह से भी अधिक आयु मे बड़े शांतुन के भाई बान्हीक भी युद्ध में मौजूद थे ! किन्तु बल में और ज्ञान में श्रेष्ठ होने के कारण यहाँ भीष्म को बृद्ध कहा गया है महाभारत काल में जो ब्राह्मण ज्ञान सदाचार और स्वधर्म के पालन में श्रेष्ठ होते थे बे भले ही आयु में छोटे हों उन्हें ज्येष्ठ  कहा जाता था ! छत्रिय बल की दृष्टि से और वैश्य धन की दृष्टि से ज्येष्ठ और शूद्र आयु की दृष्टि से सम्मानीय माने जाते थे  !युद्ध में तथा सभी मांगलिक कार्यों में शंख बजाये जाते थे ! इसीलिए भीष्म पितामह ने बहुत जोर से शंख बजाया जिस से दुर्योधन के ह्रदय में हर्ष उत्पन्न होगया है ! यह शंख ध्वनि सेना में विजय के लिए संकल्प के भाव को दर्शित करती थी ! भीष्म पितामह के शंख बजाने के साथ ही सभी सेनापतियों और प्रमुख सैनिकों ने शंख भेरी (नगाड़े )ढोल मृदंग और नरसिंघे एक साथ बजाये !इस से बड़ा भयंकर कोलाहल पैदा हो गया !दुर्योधन की सेना में शंख और दुंदभियों की ध्वनि सैनिकों के सिंघनाद, घोड़ों की हिनहिनाहट ,रथ के पहियों की घरघराहट, हाथियों की गर्जना तथा गरजते हुए योद्धाओं के सिंघनाद करते हुए ताल ठोँकने और जोर जोर से बोलने की तुमुल ध्वनि सब ओर व्याप्त हो गयी शंख और भेरी आदि वाददयों का सम्मिलित भयंकर शब्द जब एक दूसरे पर गर्जन तर्जन करने वाले रणवीर शूरों के सिंघनाद से मिला तब दोनों सेनाओं में महान कोलाहल एवं संघर्श की तैयारी होने लगी !
९(७)मनुष्य लोक से लेकर ब्रह्मलोक तक के संपूर्ण प्राणी आयुपूर्ण होने पर मृत्यु को प्राप्त होते है किन्तु सभी प्राणियो की आयु में अंतर होता है ब्रह्मा का एक दिन मनुष्योँ की आयु की गड़ना के अनुसार ४करोद ३२ लाख साल का होता है इतनी ही उनकी रात्रि होती है इस प्रकार जब ब्रह्मा की १०० साल की आयु पूरी हो जाती है तो सारी सृष्टि भगवान की प्रकृति में समा जाती हैं जिसे महा प्रलय कहा जाता है प्रकृति में लीन हुए इन प्राणियों के कर्म जब पक जाते है और फलदेने के लिए उन्मुख हो जाते हैं तब ईश्वर सभी प्राणिओं के परिपक्व कर्मों का फल देकर पूर्वकृत कर्मों के अनुसार उनके शरीरों की रचना करते है सभी प्राणिओं के शरीरों की रचना उनके पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के अनुसार ही होती है ईश्वर अपनी इक्छा से किसी भी शरीर का निर्माण नहीं करता है सृष्टि निर्माण की इस क्रिया महा सर्ग कहते हैं