गीतज्ञान १(३) पश्यैताम पाण्डु पुत्राणाम् मह्त्तीम चमूम ------ दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है ! कि पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये !इस सेना के सेनापति आपके बुद्धिमान शिष्य धृष्टद्युम्न हैं ! और उन्होंने ही इस सेना के व्यूह का निर्माण किया है ! दुर्योधन यहाँ द्रोणाचार्य को इस तथ्य से अवगत करा रहा है !कि धृष्टद्युम्न का जन्म आपके बध के लिए हुआ है !और उसीको आपके प्रिया पांडवों ने अपनी सेना का सेनापति बनाया है !द्रोणाचार्य गुरु धर्म का पालन निष्ठापूर्वक करते थे !उन्हें यह पता था कि धृष्टद्युम्न का जन्म उनके घोर विरोधी बालसखा द्रुपद ने उनके बध के लिए यज्ञ कुण्ड से कराया है !फिर भी उन्होंने धृष्टद्युम्न को अश्त्र शस्त्र की श्रेष्ठ शिक्छा अन्य शिष्यों के तरह ही दी थी !धर्म की पूर्णता सदाचरण से होती है !जो धर्म सिर्फ शव्दों तक ही सीमित रहता है ! और सदाचरण से व्यक्त नहीं होता है !वह अधर्म होता है !दुर्योधन की धार्मिकता सिर्फ शव्दों तक ही सीमित थी !वह वेद पाठी था !नित्य संध्या वंदन करता था !होम ,हवन और यज्ञ आदि भी करता था !किन्तु सदाचार का आचरण नहीं करता था !इसीलिए वह अधर्म का पूरा पंडित बन गया था !उसके आचरण से क्रूरता ,दम्भ और पाखण्ड ही प्रगट होता था !यहाँ भी वह द्रोणाचार्य से झूठ बोल रहा है !दुर्योधन की सेना ११अक्छोहनि थी और पांडवों की सेना मात्र ७ अक्छोहनी थी !पांडवों की सेना के व्यूह का निर्माण प्रथम दिन के युद्ध के लिए अर्जुन ने किया था !फिर भी वह झूठ बोलकर द्रोणाचार्य को पांडवों के विरुद्ध भड़काने के लिए पांडवों की सेना बड़ी बता रहा है और व्यूह का निर्माता धृष्टद्युम्न को बता रहा है !
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