Friday, 29 July 2016

आवश्यकता है उनकी जो संपूर्ण और समग्र भारत की बात करें --------- १९३१ में राउंड टेबल कांफ्रेंस में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने ११२ प्रितिनिधि कांफ्रेंस में शामिल होने के लिए नामांकित किये थे !उसमें दलितों के प्रितिनिधि  अम्बेडकर थे ,मुसलमानो के प्रितिनिधि प्रिंस आगा खां जिन्ना ,अल्लामा इकबाल और शफ़ाक़ अहमद थे ,हिंदुओं के प्रितिनिधि पंडित मदन मोहन मालवीय आदि थे ,इसके अलावा सिखों ,राजाओं ,और अंग्रेजों आदि के प्रितिनिधि भी थे !गांधीजी ने इस कांफ्रेंस में शामिल होने से  मना कर दिया था ! क्योंकि गाँधी जी जानते थे की  इस कॉन्फेरेबस से कोई हल निकलने वाला नहीं है ! जब गांधीजी कांफ्रेंस में शिरकत करने नहीं गए थे 1 तो  तत्कालीन ब्रिटिशप्रधान  मंत्री मेक्डोनाल्ड ने वाइस राय लार्ड इर्विन से कहा था कि वह कांग्रेस से कहे कि वह गांधीजी से अनुनय विनय करे ताकि  बे कांफ्रेंस में शामिल हों !क्योंकि  उनकी अनुपस्थिति में इस कांफ्रेंस का कोई अर्थ नहीं है !क्योंकि इस कांफ्रेंस में सभी वर्गों के प्रितिनिधि है !किन्तु जो समग्र और संपूर्ण भारत के प्रितिनिधि महात्मा  गाँधी हैं !यदि बे इस कांफ्रेंस में नहीं होंगे तो संपूर्ण भारत का प्रितिनिधित्त्व नहीं होगा !तब गांधीजी को  कांग्रेस ने सम्पूर्ण अधिकार देकर  लन्दन भेजा था !उस कांफ्रेंस में भारत की स्वतंत्रता के मार्ग में दलित प्रितिनिधि अम्बेडकर ने यह कहकर बाधा उपसिथित की थी कि जब तक दलितों की समस्या का समाधान नहीं हो जाता है !तब तक भारत की स्वतंत्रता के लिए संभावित संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता है और न ही भारत को आजाद किया जा सकता है !जिन्ना अदि ने भी मुसलमानों की समस्याओं के समाधान के बिना आजादी का विरोध किया था !इसी प्रकार राजाओं ,सिखों आदि ने भी आजादी की खिलाफत की थी !गांधीजी यह जानते थे इसीलिए बे कांफ्रेंस में जाने के लिए तैयार नहीं थे !जब उन्हें मजबूरन जाना ही पड़ा था !तब उन्होंने अपने भाषण में कहा था --------- कि अंग्रेजी हुकूमत हिंदुस्तान में  स्थापित होने के पूर्व भी ये सभी समस्याएं थी !आपने हमें ६००० मील से इन समस्यायों के समाधान के लिए हमें नहीं बुलायाहै !आप ने स्वतंत्रता देने के लिए आमंत्रित किया था !और हम अपना जरूरी काम काज छोड़ कर यहाँ आये हैं !आप की हुकूमत हिंदुस्तान में शैतानी हुकूमत है !आप हिंदुस्तान को इसी हालात में छोड़ कर चले जाईये !हम इन समस्यायों का समाधान स्वयं कर लेंगे !
                               आज देश में वही द्रश्य फिर उपस्थित हो गया है जो १९३१ में था !सोशल मीडिया पर मोदी भक्त मुस्लिम भक्त ,दलित भक्त , आदि दिखाई देते हैं !ये सब भारत की अब तक हुई प्रगीति को नकारते दिखाई देते हैं !इनकी भूमिका चूहों की तरह भारत को कुतर ,कुतर कर खाने की दिखाई दे रही है !ये सब ऐसा प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं कि मोदी के आने के पहले देश में बर्बादी के अलावा कुछ हुआ ही नहीं है !अब मोदी का अवतार देश के निर्माण के लिए हुआ है !और अभी बे कांग्रेसी कुशाशन का कूड़ा करकट हटा रहे हैं ! और गड्ढे   भर रहे हैं !विदेशों की यात्रा से भारत का सम्मान बढ़ रहा है ! मुसलमान भारत में मुसलमानो की उपेक्छा का नारा बुलंद कर रहे हैं !शुक्रवार की नवाज के बाद अल्लाह ताला से उनको दंगा फसाद करने की इजाजत मिल जाती है !ईद की नवाज के बाद भी बे तेजी से तोड़ फोड़ करते हैं !मुहम्मद साहब काजन्म दिन बे तलवारें फहरा कर मनाते हैं ! दलितों से छुआ छूत अब भी हो रहा है !उनके साथ अत्याचार हो रहे हैं ! इन अंधों को दलितों की समृद्धि नहीं दिखाई देती है !और ना ही मायावती की अकूत धन संपत्ति दिखाई देती है !हिंदुस्तान  की तत्कालीन प्रधान मंत्री की नाक पर पत्थर मार कर बिहार में लोहू लुहान कर दिया था !किन्तु इंदिरा जीने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी !किन्तु मायावती के खिलाफ एक व्यक्ति ने अभद्र टिप्पड़ी कर दी तो संसद से लेकर सड़क तक विवाद छिड़ गया !उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकद्दमा लिख लिया गया !और अब वह गिरफ्तार भी हो गया है !किन्तु उसव्यक्ति की  पत्नी और बेटी को पेश करने की बात कहने वाले नशीमुद्दीन की गिरफ्तारी अब तक नहीं हुई है !और ना ही उन मायावती के अंध भक्तों के विरुद्ध कार्य बाही  हुई है !जिन्होंने अत्यंत गंदी गलियां उसकी पत्नी और बेटी को दी हैं !कुछ लोग पिछड़ों और अति पिछड़ों के मामले उठाते रहते हैं !कुछ महिला उत्पीडन का ही राग अलापते रहते हैं !कुछ रिश्वत खोरी और कोमोसन लेने में व्यस्त हैं ! कुछ सवर्णो पर आरक्छण सेहोने वाले अन्याय की बातें जोर शोर से उठाते रहते हैं !कुछ को न्यायव्यबस्था से परेशानी है !कुलमिलाकर समग्र और संपूर्ण भारत को समायोजित कर भारत में आजतक हुई प्रगति और अवनति का समग्र चित्र प्रस्तुत करा समस्यायों के समाधान का चित्र प्रस्तुत करने की ओर किसी का ध्यान नहीं है !और अगर कुछ गाँधी वादियों के पास यह समाधान है भी तो बे भारत में प्रकाशित नहीं है !कुछ लोग हैं जो समग्र और संपूर्ण भारत के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं !किन्तु बे इन स्वार्थनिष्ठ व्यक्तियों के सभी छेत्रों में काबिज होने के कारण समाज की दृष्टि और समझ से दूर हो गए हैं !आज फिर से समग्र भारत की बात और उसके लिए कार्य करने वालों की महती आवश्यकता है !और इन अंधभक्तों से मुक्ति की कामना भारत को है !ये भारत का खाते हैं और भारत को भी खाते हैं !
प्रत्येक प्रकरण के तथ्य अलग अलग होते हैं !आजकल एक विचित्र अवधारणा न्यायायों के बारे में बन रहीहै ! कि न्यायालय का काम अपराध नियंत्रण का है !और जब जघन्य अपराधों में लिप्त अपराधी तुरत जमानत पा जाते हैं !या रिहा हो जाते हैं !तो अपराधों में बृद्धि होने लगती है !और अपराधी और अधिक निरंकुश हो जाते हैं !!इस प्रचार का असर न्यायाधीशों पर भी दिखाई देता है !परिणाम स्वरुप मामूली और जघन्य आरोपित व्यक्ति भी न्यायालयों से जमानत नहीं पा पाते हैं !इसिलए आज देश केजेलों में सजा प्राप्त अपराधियों से ज्यादा अंडर ट्रायल प्रिजनर्स बंद है ! न्यायलय का काम अभियोजन द्वारा अपराधिक प्रकरण पर लिखित और मौखिक सक्छ्य के आधार पर विधि विधान के अनुसार निर्णय देना है !अपराध नियंत्रण का काम पुलिस और प्रसाशन का हैं !न्यालय के सामने अभियोजन और अपराधी समान होते हैं !इसीलिए यदि अभियोजन ने अपना मामला विधि विधान के अंतर्गत प्रस्तुत नहीं किया है ! और आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्छ्या प्रस्तुत नहीं किया है !तो न्यायालय के सामने अभियुक्त को रिहा करने के अलावा कोई अन्य उपाय शेष नहीं रहता है ! यहां मगनलाल की मौत की सजा माफ़ करने का जो प्रकरण है ! उसमे जरूर कोई ऐसी कानूनी खामी रही होगी !जिसके कारण मुख्य न्यायाधीश को उसकी फांसी की सजा उम्र कैद में बदलना पड़ी !वैसे जो तथ्य यहाँ बताये गए हैं ! उसमे उस पर आरोप था ! शराब के नशे में अपनी ही पुत्रियों की हत्या करने का और बाद में उसने खुद अपनी आत्महत्या करने की कोशिश भी की !इसीलिए उसको वैसे भी फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए थी ! क्योँकि उसकाअपराध पूर्व नियोजित नहीं था !क्रोध के आवेश में उसने और शराब के नशे में यह जघन्य कृत्य कर दिया ! और पश्चाताप की अग्नि में उसने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला भी समाप्त करने की कोशिश की थी !अपनी पुत्रियों की हत्या कर वह खुद सारे जीवन पश्चाताप की आग में झुलसता रहा होगा !
जागृत जन भागीदारी के अभाव में लोकतंत्र व्यबस्थित ढंग से नहीं चलसकता है ------- लोकतंत्र की सरकारों का निर्वाचन भी बालिग मताधिकार से होता है !इसके अलावा जितनी भी संस्थाएं होती हैं ! बे सभी भी नागरिकों द्वारा निर्मित और संचालित होती हैं !यदि प्रतिनिधियों के निर्वाचन में मतदाता अपने मत का उचित प्रयोग नहीं करता है !और समाज में संस्थाएं भी अपने कर्तव्य का निर्बहन नहीं करती हैं !तो फिर लोकतंत्र का तो यही स्वरुप होगा जो भारत बर्ष में है !यही बहुत है कि यहाँ लोकतंत्र है !इस समय देश दो राहे पर खड़ा हुआ है !या तो स्वस्थ लोकतंत्र का विकास होगा या लोकतंत्र का विनाश होगा !यथा स्थिति नहीं रहेगी !सोशल मीडिया सभी प्रकार के लोगों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गया है !इसीलिए जिन लोगों को देश की संस्थाओं को लेकर कुछ कहना है !उन्हें जिम्मेदारी के साथ सभी तथ्यों को दृष्टिगत रख कर विचार व्यक्त करना चाहिए !सिर्फ समस्यायें ही नहीं उनका समाधान भी प्रस्तुत करना चाहिए !आजकल न्याय व्यबस्था पर काफी प्रहार किये जा रहे हैं !सलमान और जयललिता आदि  आरोप मुक्त हो जाते हैं !और लालू यादव आदि जमानत पर रिहा हो जाते हैं ! और जेलों में राजनैतिक बंदियों और दबंगों तथा पैसे वालों को सभी सुविधाएं प्राप्त होतीहैं !  इसमें लोग धनबल  और राजनैतिक संरक्छण को  जेलों में सुबिधा प्राप्ति के लिए और उनकी न्यायलय से  रिहाई में कारण मानते हैं !और न्याय व्यबस्था पर हमला करते हैं ! न्यायाधीश ना तो मुकद्दमा स्वतः  दर्ज कृते हैं ,न अपराध की जाँच करते हैं !बे सिर्फ उपलब्ध साक्छ्य के आधार पर फैसला करते हैं !गबाह आदिपेश करने और अभियोग पत्र दाखिल करने का काम अभियोजन करता है !यदि सलमान के प्रकरण में उसके विरुद्ध आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्छी प्रस्तुत नहीं किये गए !इसिकिए वह अपराध मुक्त हो गए इसमें न्यायलय का क्या दोष है ? जयललिता के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायलय में विचाराधीन है !अगर किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध के आरोप हैं !और उन आरोपों का प्रकरण २० साल न्यायलय में चलता है !और इसके बाद उसके आरोप सिद्ध नहीं होते हैं !और वह आरोप मुक्त हो जाता है !ऐसी स्थिति में उसके २० बर्ष जेल में रहने की भरपाई कैसे होगी ? मुकदमो का निर्णय शीघ्र होना चाहिए !और उच्चतम न्यायालय तक की जाने वाली अपीलें की सुनबाई  भी एक साल के अंदर हो जानी चाहिए ! ताकि जिस व्यक्ति को सजा या आरोप मुक्ति जो भी कानून के अनुसार होना हो अंतिम रूप से  समाप्त हो जानी चाहिए !सलमान का यह मुकद्दमा १७ साल में निर्णीत हुआ है !सजा होने के पहले ही सलमान ने कितनी मानसिक सजा भोगी और कितनी रोटियां सेंकी इसका अनुमान तो कोई लंबीअविधि  तक मुकद्दमा लड़ने वाला ही अनुभव कर सकता है ! सलमान की जवानी मुकद्दमों को भेंट हो गयी !

Thursday, 28 July 2016

बारिश का पानी व्यर्थ बह रहा है --------- बुंदेलखंड तीन साल से भयानक सूखे से प्रभावित था ! पानी आवश्यकता से काफी काम वर्षा था !किन्तु ऐसा नहीं था की बारिश बिककुल हुई ही न हो ! इस समय भी अच्छी बारिश हो रही है !नालियां चोक हैं !कुछ नालों पर लोगों ने निर्माण कर लिये हैं !इस से पानी की निकासी बंद होने से घरों में पानी भर जाता है !सारी नदियां और बाँध उफन रहे हैं !कुछ जिलों में बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है !फिर भी तालाब सूखे  पढ़े हैं ! कुओं में  पानी नहीं हैं !हैण्ड पंप भी पानी नहीं दे रहे हैं !कस्बों में टैंकरों से पानी नागरिकों द्वारा खरीदा जा रहा है ! एक ओर यह स्थिति है !दूसरी ओर बरसात का पानी व्यर्थ बह रहा है !अगर सरकार यह प्रबंध कर लेती कि बरसात के जल से सारे तालाब और पोखरे भर दिए जाते तो बुंदेलखंड में सूखे की समस्या से निजात पायी जा सकती थी !बुंदेलखंड में तालाबों और पोखरों की भरमार थी ! किन्तु  अधिकांश तालाब अब समाप्त हो गए हैं !और कुओं को मूंद दिया गया है ! ये सब जब  ठीक थे !तब इनसे  जल की स्थाई पूर्ति होती थी ! जल ही जीवन है !इस को बताने के लिए अनेक कार्यक्रम होते रहतेहैं !और नागरिकों को सलाह दी जाती है !कि जल की प्रत्येक बून्द की सुरक्छा की जाय !इन तथाकथित भाषण देने वालों से अधिक चिंता सृजन हार को है जिसने यह श्रष्टि निर्माण की है !इसीलिए उसने पर्याप्त जल की व्यबस्था की है !किन्तु उस जल को संरक्छित और सुरक्छित करने का कार्य नहीं किया गया !परिणाम स्वरुप सूखे और बाढ़ की समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं !यदि भविष्य में भी प्रकृति द्वारा जरुरत से ज्यादा बरसात के रूप में दीये गए जल का प्रबंधन नहीं किया गया !तो हमको सूखे और बाढ़ से मुक्ति मिलना संभव नहीं है !

Wednesday, 27 July 2016

गांधीजी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा था या नहीं ?यह प्रश्न उतना महत्त्व पूर्ण नहीं है !महत्त्व पूर्ण यह है कि वह उस हिन्द्दु विचार से जुड़ा हुआ था ,जो गांधीजी को हिन्दू विरोधी और मुस्लिम समर्थक मानते थे ! तत्कालीन कांग्रेस में सभी विचार के लोग थे !और सभी मिलकर ब्रिटिश हुकूमत से हिंदुस्तान को आजाद करने के लिए संघर्ष कर रहे थे !उनमें से गांधीजीकीनीतियों और सिद्धान्तों का बहुत से लोग विरोध करते थे !किन्तु गांधीजी के चमत्कारी व्यक्तित्त्व के आगे बे सब परास्त हो जाते थे !कांग्रेस में जो कट्टर हिन्दू विचार धारा के पोषक थे ! बे गाँधी जी का विरोध करने का अवसर नहीं चूकते थे !इन्ही लोगों ने गांधीजी की हत्या का प्रयत्न उनकी हत्या के ४ बार पहले भी किया था  ! जिसमे   बे असफल रहे थे !पांचवीं बार उनको हत्या करने में सफलता प्राप्त हुई थी ! गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में हिन्दू मुस्लिम एकता को महत्त्व पूर्ण स्थान प्राप्त था !बे जीवन के अंत तक हिन्दू धर्म और इस्लाम में एकता कायम करने का प्रयत्न करते रहे !किन्तु उनके इस प्रयत्न को ना हिंदुओं ने स्वीकार किया और ना मुसलमानो ने !हिन्दू उनको मुस्लिम परस्त मानते थे और मुसलमान उनको काफ़िर कहते थे !मुसलमानो के मसीहा और पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना गांधीजी को हिन्दू नेता ही मानते रहे !उन्होंने गांधीजी के इस दाबे को कभी स्वीकार नहीं किया था कि बे  भारत के सेवक हैं !और सभी धर्मों को समान रूप से आदर देते हैं !गांधीजी ने १९४४ के सितंबर माह में जिन्ना के मुम्बई स्थित माउंट प्लीजेंट रोड पर स्थित आवास पर १८ दिन तक चर्चा कर उनको मनाने की कोशिश की थी कि बे अपनी पकिस्तान की मांग को त्याग दें ! किन्तु जिन्ना ने गांधीजी की मांग को ठुकरा दिया था !इस वातचीत का भी हिन्दू बादी संगठनों ने घोर बिरोध किया था !गांधीजी की हत्या के बाद भी जिन्ना ने गांधीजी को श्रद्धांजलि हिन्दू नेता संबोधन करके ही दी थी ! गाँधी जी ने १३ जनबरी १९४८ को मुसलमानो के समर्थन में आमरण उपबास किया था !गांधीजी की हालात उपवास से अत्यंत नाजुक हो गयी थी! डॉक्टरों का कहना था कि गांधीजी की  म्रत्यु किसी भी समय हो सकती है !इसीलिए १८ जनबरी १९४८ को सभी संगठनों ने जिनमे हिंदूमहासभा आदि हिन्दुबादी संगठन  भी थे, ने गांधीजी की सारी 13 मांगें स्वीकार कर ली थी ! गांधीजी ने कहा था कि उनको धोखा मत देना !अगर बे सब दिल से मांगे स्वीकार करते हों तभी सहमति दें ,अन्यथा उन्हें मर जाने दें !देश के विभाजन के बाद गांधीजी जिन्दा लहाश रह गए थे !उनका आखरी प्रयत्न यह था कि बे देश का विभाजन तो नहीं रोकपाये थे !किन्तु अब मुसलमान और हिन्दू आपस में दंगा फसाद ना कर प्रेम से रहें !इसिलए उन्होंने मुसलमानो के पक्छ में आमरण अनशन किया था !बे चाहते थे की पहले हिंदुस्तान में शांति स्थापित करें फिर बे पकिस्तान में जाकर शांति और सद्भाव कायम करने का प्रयत्न करेंगे !और बे ८ फरबरी को करांची जाने वाले थे !किन्तु बे इसके पहले ही शहीद कर दीए गए ! गांधीजी की सहादत को राजनैतिक लाभ के लिए मुद्दा बनाया जा रहा है !किन्तु उनकी सहादत के असली उद्देश्य की और कोई भी राजनैतिक दल ध्यान नहीं दे रहा है !उनके जीवन  के ध्येय जिनके लिए उनकी सहादत हुई थी !उस हिन्दू मुस्लिम एकता की ओर किसीका ध्यान नहीं है !पकिस्तान ,बांग्लादेश में हिंदुओं पर अमानुषिक  अत्याचार हो रहे हैं !और बे वहां से पलायन कर रहे हैं !कश्मीरी पंडित अपने ही वतन में शरणार्थी है !हिंदुस्तान में आये दिन हिन्दू मुस्लिम दंगे और फसाद होते हैं ! और आज भी गांधीजी को मुसलमानो का समर्थक होने के नाम पर गांधीजी को गद्दार और देश द्रोहीकहा जाता है !और गोडसे को राष्ट्रभक्त कह कर उसके नाम के मंदिर बनाये जाने की बात की जाती है ! और कुछ बकवादी ,लोग अब गांधीजीकी हत्या के मामले को उठाकर राजनैतिक लाभ लेने की चेस्टा कर रहे हैं ! स्वार्थी अवसरवादी लोगों ने गांधीजी को जीवन भी शांति से नहीं जीने दिया और अब म्रत्यु  के बाद भी बे गांधीजी के नाम पर राजनैतिक रोटियां सेंकने की जुगत भूँजाने में लगे हुए हैं !
आज प्रकृति संरक्छण दिवस है !यह दिवस बनबिभाग के अतिरिक्त कुछ भासण विशारद लोग भी मनाते हैं !किन्तु ये दोनों ही प्रकृति संरक्छण का काम ठीक से नहीं करते हैं !बनविभाग तो जंगल का विनाश अपने संरक्छण में कराता है !और ब्रक्छा रोपण के लिए जो सरकारी बजट आता है ! उसका भी नाममात्र का उपयोग ब्रक्छा रोपण के लिए किया जाता है !और जो ब्रक्छा रोपण किया भी जाता है ! उन पोधोँ की भी देख भाल नहीं की जाती है !अगर प्रतिवर्ष ब्रक्छा रोपित किये गए सरकारी आंकड़ों को देखा जाय ! तो अबतक सरकारी आंकड़ों के अनुसार अबतक इतने ब्रक्छ अब तक रोपित कर दिए गए हैं ! कि भारत में तिल भर भी भूमि बिना ब्रक्छों के नहीं बचती !जितने भी फलदार और सागौन शीशम आदि के ब्रक्छ थे उनका सर्व बिनाश बन विभाग के द्ववारा रिश्वत खोरी और राजनेताओं के हितार्थ किया गया है !जो भासण विशारद नेता हैं ! और जिनमे अधिकाँश चुने हुए प्रतिनिधि और मंत्री आदि भी है ! बे भी प्रकृति के विनाश में संलग्न है !प्रकृति का विनाश अनेक रूपों और स्वरूपों में इन तथाकथित बन रक्छको के द्वारा किया जा रहा है !पृथवी से खनिज पदार्थ और नदियों से बालू और नदियों में शीवर लाइन और कारखानो का गन्दा पानी छोड़ कर उनको प्रदूषित करने का काम भी ये अधिकारी और राजनेता ही कर रहे हैं ! और करवा रहे हैं ! !इन प्रकृति विध्वंसक लोगों के प्रभाव से मुक्त और प्रकृति संरक्छण के भाव से युक्त और प्रकृति संरक्छण जीव मात्र के असित्तत्त्व के लिए आवश्यक समझ कर कुछ समाज सेवी व्यक्ति निश्वार्थ भाव से प्रकृति संरक्छण में लगे हुए हैं !कुछ समाज सेवायिओं ने बृक्छ काटने के विरोध में चिपको आंदोलन चलाया ! और इसके लिए अपने जीवन को भी दाव पर लगा दिया !कुछ लोग ब्रक्छा रोपण के कार्य में लगे हुए हैं !कुछ व्यक्ति पृथ्वी के संरक्छण के लिए लगातार काम कर रहे हैं ! और कुछ लोग नदियों को पुनर जीवन देने तथा गंदगी मुक्त कार्यों में लग कर काम कर रहे हैं !जिन पर प्रकृति संरक्छण का वैधानिक दायित्त्व है ! बे अपने कर्त्तव्य का अगर निष्ठां पूर्वक निर्वहन करें ! और इन समाज सेवायिओं से तालमेल कर इनके कार्यों को बढ़ावा दें !तो प्रकृति संरक्छण का कार्य तेजी से और व्यबस्थित रूप से हो सकता है !यह शर्रीर भी एक ब्रक्छ के समान है !ज्ञान इसकी जड़ है ! बुद्धि इसका तना है ! अहंकार इसकी शाखाएं है ! इन्द्रियां इसके खोखले हैं ! और यह पृथ्वी आकाश जल अग्नि और वायु पांच तत्त्वों से निर्मित है ! शरीरों के अनगिनित भेद ही इसकी टहनियां हैं ! इसमें सदा ही कामनाओं और वासनाओं केसंकलप रूपी पत्ते उगते रहते हैं ! और कर्म रूपी फूल खिलते रहते हैं ! इस शरीर से पाप पुण्य रूपी कर्मों से इसको सुख दुःखादि इसमें सदा लगे रहने वाले फल हैं ! इसका बीज परमात्मा है ! यह शरीर ही समस्त प्राणियों का आधार है ! जो इसके तत्त्व को भली प्रकार जान कर ज्ञान रूपी उत्तम तलवार से इस में होने वाले स्वार्थों और वासनाजनित संकल्पों और कार्यों को काट डालता है ! वह प्रकृति का संरक्छण प्राणिमात्र के समस्त शरीरों के प्राणो के लिए निश्वार्थ भाव से करता है ! क्योँकि प्रकृति के संरक्छण के अधीन ही समस्त प्राणियों का जीवन है !प्राकृतिक संसाधनो का विनाश पृथ्वी से समस्त प्राणियों का असितत्त्व समाप्त कर देगा !इसलिए प्रकृति के विनाश का कार्य प्राणियों से समस्त प्राणियों केविनाश का कार्य है यह समझ कर प्रकृति विनाश का कार्य बंद कर देता है

Tuesday, 26 July 2016

डॉ एपीजे कलाम यद्द्पि राजनेता नहीं थे !किन्तु उनमे जिस तरह की राजनीति भारत में होनी चाहिए इसके सभी गुण विद्यमान थे! !भरता के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बाद राष्ट्रपति भवन एक बार फिर अत्यंत साधारण जीवन जीने वाले राष्ट्रपति का आवास बना था !
यह एक बहुत आश्चर्यजनक घटना थी ! कि उनका चयन भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए किया था !अगर भारतीय राजनीति में राजनेता लोकतंत्र के मूल सिधान्तो का प्रवेश कराना चाहते हैं ! तो उनको पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम को श्रद्धांजलि के रूप में राज नेताओं को साधारण जनता , जिनके बे प्रतिनिधि है, डॉ एपीजे कलाम की तरह सादा जीवन जीना चाहिए !और कलाम साहेब की तरह सम्प्रदाय और जाति से ऊपर उठकर राष्ट्र को न्याय युक्त नेतृत्त्व प्रदान करना चाहिए !डॉ कलामके निधन से देश ने पूर्ण रूप से जनहित में समर्पित स्वार्थ भाव से रहित महान लोकनिष्ठ व्यक्ति को खो दिया है !परम पिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !

Monday, 25 July 2016

तथाकथित अम्बेडकवादियों ने हिंदुओं और हिन्दू धर्म को अपशव्दों से अलंकृत करने का स्वभाव बना लिया है ------- निहित राजनैतिक स्वार्थों के कारण अल्पबुद्धि स्वार्थनिष्ठ राजनैतिक  दलों ने राजनैतिक चश्मे से डॉ अम्बेडकर का मूल्यांकन कर उनके अश्पृश्यता के दर्द को स्वस्थ रचनात्मिक दृष्टि न देकर निकृष्ट स्वार्थपोषण का माध्यम बना लिया है !और आरक्छण से पुष्पित और पोषित दलितों ने आरक्छण को दलित विकास के नाम पर अपने निजी भौतिक समृद्धि का साधन बना कर दलितों को  आरक्छण  के लाभ से वंचित कर दिया है !और अस्प्रश्यता को हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा कलंक मानकर इसके समूल नाश को कृत संकल्पित गांधीजी को भी गालियां और ड्रामेबाज ,तथा नोटंकी बाज आदि ऐसे अपशव्दों से नबाजना शुरू कर दिया है ! डॉ अम्बेडकर ने बुद्ध धर्म अंगीकार किया था !उनको मानने  वाले कुछ दलितों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार किया ! किन्तु बे बौद्ध धर्म की अच्छाईयों को ग्रहण करने के बजाय अपने अज्ञान और मूर्खता का प्रदर्शन हिन्दू धर्म की लानत ,मलामत और गालियां देने में करते हैं ! हिन्दू कायरता की हद तक सहनशील है !इसीलिए वह कट्टरवादी मुसलमानो के आत्तंक से पीड़ित .प्रताड़ित होकर या तो अपना धर्म परिवर्तन कर लेता है !या फिर अपना घर और पैतृक निवास छोड़ कर पलायन कर जाते हैं !और ये डरपोक हिन्दू राजनैतिक स्वार्थ में संलग्न राजनैतिक सौदागरों से न्याय की आशा करते हैं !जो राजनेता तिलक ,तराजू ,और तलवार !इनको मारो जूता चार की प्रवर्तक और घोषणा करने वाले राजनैतिक दल और उसके नेता के चरण चुम्बन करने में भी परहेज नहीं करते हैं ! बल्कि गौरवान्वित अनुभव करते हैं !उन से न्याय की आशा करते हैं !ये सभी राजनैतिक दलों के बे स्वार्थ निष्ठ नेता हैं !जिन्होंने बसपा सुप्रीमो को अपनी बहन मानकर उनसे राखी भी बँधबाई ,उनके चरण स्पर्श भी किये !और राजनैतिक स्वार्थों के लिए उनकी हत्या करने के प्रयत्न भी किये ,और ये वही धर्म को कलंकित करने वाले लोग हैं .जो मुख्य  मंत्री ,मंत्री ,कलेक्टर ,कमिश्नर ,और उच्चपदों पर आसीन दलितों के चरण छूते हैं  ,उनके साथ उठने बैठने और उनका जूठा चाटने में भी गुरेज नहीं करते हैं !और गांव में रहने वाले दलतों को कुओं से पानी नहीं भरने देते हैं !मंदिरों में नहीं जाने देते हैं ,और उनके साथ पशुओं जैसा व्योहार करते हैं ! जो  दलित धर्म परिवर्तन कर लेता है,उसको सम्मान देने लगते हैं !इन्ही स्वार्थनिष्ठ हिन्दू धर्म को कलंकित करने वाले लोगों ने दलितों में एक ऐसा बकवादी ,हिन्दुधर्म की उच्च धारणाओं को ना समझने वाले लोगों का समूह उत्पन्न कर दिया है !जो हिन्दू धर्म को गालियां देने को ही अपना महत्त्व पूर्ण कार्य  समझते हैं ! और ये तथाकथित दलित नेता गाँधी जी को भी गालियां देते हैं!ये हरिजन शव्द को घोर अपमान जनक  मानते हैं और दलित शव्द को बहुत सम्मान जनक मानते हैं !ये हरिजन शव्द की बहुत घृणित और अपमानजनक उत्पत्ति मानते हैं !किन्तु इन्होंने इस बात की जानकारी करने की कोई कोशिश नहीं की ! अपने को भंगी कहने वाले भंगी निवास में रहने वाले ,और अपने जीवन को अश्प्रस्यता  समाप्त करने के संकलप को धारण करने वाले गांधीजी ने हरिजन क्यों कहा ?गांधीजी ने ११-२-१९३३ में हरिजन समाचार पत्र में ---- हरिजन क्यों ? शीर्षक से एक लेख लिखा था ! यह शव्द गुजरात के एक दलित संत ने सुझाया था ! उस समय हरिजनों के लिए अछूत शव्द का प्रयोग होता था !गांधीजी अछूत शव्द से घृणा करते थे ! गाँधी जी कहते थे जब सवर्ण हिन्दू अपने आतंरिक विश्वास से प्रेरित और वाध्य  होकर  स्वेक्छा से अश्पृश्यता को नष्ट कर देंगे तब हम सभी हरिजन कहलायेंगे !जब तक हिन्दू धर्म के इस कलंक का नाश नहीं होता है ! और     जो लोग प्रत्यक्छ और अप्रत्यक्छ रूप से अश्पृश्यता का पोषण और क्रियान्बिन कर रहे हैं !बे चाहे इस से लाभ उठाने के लिए हिन्दू धर्म को गालियां देने वाले दलितों के हितों का नाश करने वाले और उनको दी जाने वाली सुविधाओं को भोगने वाले तथाकथित स्वार्थी अम्बेडकरवादी हों या दलितों के साथ पशुओं जैसा व्योहार करने वाले क्रूर हिन्दू हों !ये सभी क्रूर जन हैं !और समाज से बहिष्कृत किये जाने लायक हैं !

Sunday, 24 July 2016

आजकल देश और समाज में कर्मशंकर लोगों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ रही है !कर्मशंकर वे व्यक्ति होते हैं जो अपने कर्त्तव्य का पालन तो करते नहीं हैं !किन्तु अन्य कर्त्तव्य छेत्रों में व्याप्त गलतियों की चर्चा और आलोचना मै मशगूल रहते हैं ! प्राचीन भारत में जिन शव्दों का प्रयोग जिस व्यक्ति के लिये किया जाता था वह कर्मछेत्र में वैसा ही होता था !शव्दों का अवमूल्यन नहीं हुआ था! !कर्मशंकरता भी समाज में नहीं थी !इसलिए शब्द यथार्थ बोध कराते थे !जैसे ५००० बर्ष पहले कुलपति उसको कहा जाता था जो विद्वान ब्राह्मण अकेला ही १००००हजार जिज्ञासु व्यक्तियों का अन्न दानादि के द्वारा भरण पोषण कर उनकी जिज्ञासा की शांति ज्ञान और शिक्छण प्रदान कर करता था !और स्वयं उच्चकोटि का ज्ञानी और संपूर्ण भौतिक कामनाओ से बिरक्त होता था !उसके द्वारा दिया गया ज्ञान उसके स्वाध्याय के साथ उसके जीवन के अनुभव से जुड़ा और निकला हुआ होता था !इसीलिए बो समाज में भी और विद्यार्थियों में भी आदर और प्रतिष्ठा का पात्र होता था !तथा समाज में सदाचारी ज्ञानियो का बाहुल्य था !किन्तु वर्तमान समय में कुलपति शव्द में कर्मशंकरता का प्रवेश होने से इस शव्द का अवमूल्यन हो गया है !कुलपति वर्तमान समय में अधिकांश में राज्य का राज्यपाल होता है !जो केंद्रीय सरकार द्वारा उसी दल का कोई अवकाश प्राप्त राजनेता होता है !या फिर सत्ता धारी दल की पसंद का कोई तिकड़मी अवकाश प्राप्त अधिकारी होता है !फिर इसी कुलपति के द्वारा विश्विद्यालयों में उप कुलपति नियुक्त किये जाते हैं !जो कभी कभी पूर्व मंत्री या अवकाश प्राप्त प्रशाशनिक अधिकारी या फिर ऐसे डिग्री धारी विश्व विद्यालयों के प्रोफेसर्स होते हैं ! जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध सत्ता धारी नेताओं से या राज्यपाल से होते हैं ! इसलिए इस कर्मशंकरता के कारण शिक्छा में सदाचार और ज्ञान लुप्त हो जाता है !नैतिकता कुलपति और उपकुलपति के शव्दों में होती है ! किन्तु आचरण में अवसरवादिता और धनकमाने की प्रवृत्ति होती है !परिणाम स्वरुप विश्विद्यालय ज्ञान के केंद्र ना होकर चांसलर और उपकुलपति प्रोफेस्सोर्स कर्मचारियों आदि के भोग के केंद्र बन गए हैं !जहाँ से राजनेताओं, फिल्म अभिनेताओं ओर अवसरवादियों को मानद उपाधियाँ दी जाती हैं ! फर्जी डिग्री भी प्राप्त हो जाती हैं !और ये सभी न तो विद्यार्थियों के आदर के पात्र होते हैं !न विद्यार्थियों को इनसे सदाचरण की प्राप्ति होती है !और इन विश्वविद्यालयों से फर्जी और असली डिग्री प्राप्त युवक जब कर्त्तव्य छेत्र में उत्तरदायित्त्व ग्रहण करते हैं !तब इनमे से अधिकाँश युवक जिस पद पर आसीन होते हैं !इनमे भी कर्त्तव्य निष्ठा नहीं होती है !नैतिकता और सदाचार सिर्फ इनकी जबान पर होता है !किन्तु इनके आचरण में बेईमानी घूसखोरी ,आलास, प्रमाद आदि का बाहुल्य होता है !समाज में इस कर्मशंकरता के कारण प्रमाणिकता का नाश हो गया है !इसको बदलने की आवश्यकता है ! बदलाव बेईमानी से लाभ प्राप्त करने वाले समाज बिगाडक लोग नहीं करेंगे !बदलाव की व्यार की शुरुआत तो वहां से शुरू होगी जो ज्ञानी के साथ साथ सदाचारी भी होंगे !जैसे प्राचीन भारत में थे !और जिनके पदनाम के साथ उनकी आचरण निष्ठा की भी अभिव्यक्ति होती थी !
जब व्यक्ति की बुद्धि राग और द्वेष से युक्त हो जाती है !तब वह व्यक्ति मोहग्रस्त होकर सही और गलत का निर्णय ठीक से नहीं करपाता है !मोहग्रस्त मनुष्य जिस से द्वेष करता है, उस व्यक्ति में उसे अच्छे गुण नहीं दिखाई देते हैं !और जिस से राग करता है उसमे उसे दुर्गुण नहीं दिखाई देते हैं! !महाभारत में मोहग्रस्त पांडवों और कौरवों तथा अन्य सहयोगियों के कारण महाभारत का युद्ध हुआ जिसमे महाविनाश हुआ !इसी मोह निरसन का ज्ञान गीता में भगवान श्री कृष्णा ने दिया है !!महाभारत काल से भी ज्यादा मोहग्रस्त आज के भारत में तथाकथित बुद्धिजीवी और धार्मिक लोग मौजूद है !जो पहले तो महाभारत को ध्यान और ज्ञान पूर्वक पड़ते ही नहीं है !और अगर जिज्ञासा बस या आलतू फालतू समय बिताने के लिए पढ़ भी लें ! तो ग्रन्थ के सही तत्त्व को हृदयंगम ना कर मनमाने अर्थ निकालते हैं !कर्ण का प्रसंग महाभारत में दिव्य शक्तियों से युक्त है !उसका जन्म और कर्म भी दिव्य है !उसको सामान्य लौकिक दृष्टि से समझ कर उसको उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा !तो जो महाभारत का मुख्य उद्देश्य जीवन से मोह आसक्ति और राग द्वेष के निरसन का है ! वह समझ में नहीं आएगा है ! महाभारत कोई उपन्यास या मात्र ऐतहासिक घटनाओं का संग्रह मात्र नहीं है !इसमें भागवती और देवशक्तियों के द्ववारा मनुष्यों के मोह निरसन के लिए लौकिक शक्तियों के माध्यम से दुष्ट शक्तियों के विनाश और सत शक्तियों के सम्बर्धन, पोषण और संरक्छण के कथानक हैं !युधिस्ठर ने जो कुंती को श्राप दिया था ! कि कोई भी औरत किसी रहस्य को दीर्घ काल तक छुपा नहीं सकेगी !वह क्रोध में भरे हुए मोह ग्रस्त युधिस्ठर के द्वारा दिया गया श्राप था ! जिसमे न्याय और विवेक का अभाव था ! इसीलिए उस श्राप में सत्यनिष्ठा का अभाव था! !और जिस श्राप और बरदान में सत्यनिष्ठा का अभाव होता है ! वह ना श्राप होता है ! और ना बरदान होता है !वह मात्र राग द्वेष मोह और आसक्ति ग्रस्त मूढ़ व्यक्ति का प्रलाप होता है ! जब तक पांडवों को यह पता नहीं था की कर्ण उनका भाई है !तब तक पांडवो के लिए बो सबसे बड़ा शत्रु था !और पांडवों को कर्ण के सारे गुण दुर्गुण दिखाई देते थे !कर्ण ने एक बार युद्ध में युधिस्ठर को बहुत अधिक घायल कर दिया था !और मूर्छित अवस्था में उनका सारथि उनको सुरक्छित युद्ध भूमि से भगा ले गया था !युधिस्ठर कर्ण का तत्काल बध चाहते थे !जब एक बार अर्जुन घायल युधिस्ठर को देखने गए !युधिस्ठर ने भ्रम बस यह समझ लिया कि कर्ण अर्जुन के द्वारा मार डाला गया है !इसीलिए उन्होंने अर्जुन की प्रसंशा करनी शुरू कर दी !किन्तु अर्जुन ने जब यह कह दिया कि अभी कर्ण जिन्दा है !तो युधिस्ठर ने अर्जुन की और उनके गांडीव धनुष की तीब्र भर्त्सना कर दी ! परिणाम स्वरुप अर्जुन ने अपने भाई युधिस्ठर का बध करने के लिए तलबार निकाल ली !भगवान कृष्णा ने अर्जुन को युधिस्ठर का बध करने से रोका था !जिस कर्ण के जीवित रहने के कारण युधिस्ठर अर्जुन की निंदा करने लगा था ! उसी कर्ण की मृत्यु पर वह कुंती को श्राप दे रहा है !ये दोनों ही स्थितियां मोह राग और द्वेष तथा आसक्ति से उत्पन्न हुई हैं ! महाभारत के सभी पात्र मोह आसक्ति और मूढ़ता से ग्रस्त है !मात्र भगवान श्री कृष्णा मोह मूढ़ता और आसक्ति से पूरी तरह से मुक्त हैं !और बो मार्ग दर्शन कर पहले तो यह प्रयत्न करते हैं कि युद्ध ही ना हो !और जब वह अपने प्रयत्न में दैव बस सफल नहीं होते हैं !तब उनका प्रयत्न यह होता है ! कि युद्ध में सत सक्तियों की विजय हो ! और दुष्ट शक्तियां पराजित हों ! मोह ग्रस्त लोगों के युद्ध प्रसंग जसे जो महा विनाश महाभारत में कहा गया है ! उसी मोह आसक्ति मूढ़ता और रागद्वेष के निरसन के लिए गीता में सूत्र रूप से उपदेश दिया गया है !ताकि संसार में तटस्थ .न्याय युक्ति बुद्धि से निष्काम कर्म से कर्त्तव्य पालन की बुद्धि विकसित हो ताकि भविष्य में मानव समूहों में मोह के कारण दूसरा महाभारत न हो !

Saturday, 23 July 2016

महाभारत में शुलभा शाण्डिली सुवर्चला जैसी महान योगिनियों का भी वर्णन आया है !और पतिब्रत धर्म का पालन करने वाली महान पतिब्रताओं के वर्णन में उनकी दिव्य शक्तियों का वर्णन भी हुआ है !! कौशिक मुनि और पतिब्रता के सम्बाद में पतिब्रता ग्रहणी के पतिब्रत धर्म के पालन से दिव्य शक्तियां प्राप्त करने का आख्यान भी है !और पत्नी के प्रति अत्यंत आदरभाव से समर्पित पतियों के चरित्र भी चित्रित हुए है !वास्तव में उस घर को घर नहीं कहते हैं ! जिसमे घरवाली न हो घरवाली का नाम ही घर है ! घरवाली के बिना घर जंगल केसमान होता है ! पुत्र पौत्र पतोहू तथा अन्य भरण पोषण के योग्य कुटुम्बी जनो से भरा होने पर भी गृहस्थ का घर उसकी पत्नी के बिना सूना ही रहता है ! पुरुष के धर्म अर्थ काम के अवसरों पर उसकी पत्नी ही उसकी मुख्य सहायिका होती है ! परदेश जाने पर भी वही उसके लिए विश्वसनीय मित्र का काम करतीहै ! संसार में जो अशहाय हैं उसे भी लोकयात्रा में सहायता देने वाली उसकी पत्नी ही है ! संसार में स्त्री के समान कोई बन्धु नहीं है ! स्त्री के समान कोई आश्रय नहीं है ! और स्त्री के समान धर्म संग्रह में सहायक भी दूसरा कोई नहीं है ! जिसके घर में साध्वी और प्रिय बचन बोलने वाली भार्या नहीं नही है ! ,उसे तो बन में चले जाना चाहिए क्योँकि उसके लिए जैसा घर है ! वैसा ही बन है !पुरुष की रति, प्रीति और संतति की प्राप्ति स्त्री के ही अधीन है ! ये भी और अन्य बहुत सी महत्त्व पूर्ण बातें भीष्म पितामह द्वारा युधिस्ठर को स्त्री के सम्बन्ध में महाभारत में बतायीगयी हैं !
अभी ध्येयम परम साम्यम -----भारत की धर्म संस्कृति में, आचरण में, हमेशा समता का निबास रहा है !इस समता का आधार आत्मा की समता रहा है !किन्तु समय के दुष्चक्र ने भारत को गुलाम बना दिया !और १०००साल से अधिक गुलामी भारत को भुगतना पड़ी !इस गुलामी के कारण भारत की संस्कृति की आचरण पद्धति विकृत हो गयी !और कर्म व्यबस्था जो आत्मा के एकता पर आधारित थी ! उसमे दोष आने के कारण बिषमता उत्पन्न हो गयी !और भारतीय समाज उंच नीच की आत्मविरोधी क्रिया कलापों में फंस गया !परिणाम स्वरुप वैदिक सनातन धर्म आचरण और गुण बिहीन जड़वय्बस्था में बदल गया !परिणाम स्वरुप हिन्दू धर्म को त्यागकर बहुत से हिन्दू नवोदित धर्मों ईसाई और इस्लाम धर्म में प्रवेश कर गए ! ओर अपने मूल सनातन धर्म के कट्टर विरोधी हो गए !जिस तरह से धर्म का छेत्र दूषित होने के कारण धर्म में बिघटन हुआ !उसी प्रकार से आर्थिक विषमता के कारण विदेशी भूमि में जन्मे सामाजिक समता लानेवाले साम्यवादी और समाजवादी अवैज्ञानिक मतों का प्रवेश भारत भूमि में हुआ !और इन मतों के मान ने वाले बहुत से लोग देश में पैदा हुए !यद्द्पि जिस भूमि में इन मतों का जन्म हुआ वहां तो ये समाप्त प्राय है !किन्तु भारत में अभी भी ये विद्यमान हैं !और इनका स्वरुप पूंजी वादी व्यबस्था से भी अधिक प्रिय इन तथाकथित साम्यवादियों और समाजवादियों में संपत्ति के प्रति समर्पण और आकर्षण के रूप में दिखाई देता हैं !ये दोनों विचार वाह्य विषमता मिटाने के नाम पर बाह्य विषमता बढाते हैं ! सनातन धर्म बाह्य विषमता को उँगलियों की विषमता के समान स्वीकार करता है !किन्तु आत्मिक समता को स्वीकार करता है !क्योँकि आत्मिक समता यथार्थ है !जो आत्मा मनुष्य में है ! वही आत्मा हाथी और चींटी में भी है !इसलिए आत्मिक दृष्टि से सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और सद्भाव तथा संरक्छण का भाव जन्मता है !यह देहगत विषमता के रहते हुए भी आत्मगत एकता के कारण परम साम्य है !ओर यही अभिध्येय वैदिक संस्कृति का रहा है j परम साम्य की प्राप्ति के लिए लिए इन्द्रियों और मन तथा चित्त की समस्त क्रियायों को लक्छ्य प्राप्ति के लिए संयमित प्रशिक्छित और संस्कारित करना पड़ता है ! परम साम्य में परम शब्द महत्त्व का है ! जहाँ परम साम्य का रूप क्रियायों को दिया जाता है! वहां आर्थिक और सामाजिक, मन का संतुलन या मानसिक साम्य है! उसकी भी प्राप्ति स्वतः होती है! आर्थिक साम्य हरेक कार्य में मदद गार होता है ! सामाजिक साम्य के आधार पर समाज में व्यबस्था रहती है ! मानशिक साम्य से मनुष्य के मन का नियंत्रण होता है ! जो कि बहुत आवश्यक है ! नहीं तो भूला भटका मनुष्य सुख की चाह में इधर उधर भटकता रहता है ! और बहुत से अवांछनीय कार्य सुख प्राप्ति के लिए करता है ! इसिलए मनोयोग की बहुत आवश्यकता है ! आर्थिक सामाजिक और मानसिक साम्य से भी श्रेष्ठ परम साम्य है ! यह वह बस्तु है जो वैज्ञानिक और नैतिक छेत्र से भी ऊँची जाती है ! यानी परम साम्य आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कराता है !यही वैदिक धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है !जिसका बिस्मरण भारतीय समाज ने कर दिया है !जिसके कारण प्रकार प्रकार के दुष्चक्र में फंस कर हर नए दिन सुधार के नाम पर बिगाड़ को जन्म दे रहा है !

Friday, 22 July 2016

किसी भी मनुष्य की क्रियात्मक, भावनात्मक और चिंतन की गतिविधियाँ एक ही रूप में हमेशा नहीं रहती हैं !बे समयानुसार बदलती रहती है !विदुर धृतराष्ट्र के सबसे छोटे भाई और मंत्री भी थे !बे अपने समय के सबसे बड़े नीतिविशारद और आध्यात्मिक पुरुष थे !उनको महाभारत में धर्म के अंश से उत्पन्न बताया गया है !भगवान श्री कृष्णा जब कौरवों पांडवों के मध्य शांति स्थापना के लिए हस्तानुपुर गए थे ! तब बे धृतराष्ट्र द्वारा सभी सुविधाओं और भोग विलास युक्त दुशाशन के महल में रहने के बजाय विदुर के यहाँ ही ठहरे थे !तथा उन्होंने दुर्योधन के यहाँ भोजन करने से मना कर दिया था ! और विदुर के यहाँ ही भोजन किया था !धृतराष्ट्र स्वयं भी बहुत बड़ा ज्ञानी और धार्मिक व्यक्ति था !किन्तु अपने पुत्र दुर्योधन में आसक्ति के कारण वह सही निर्णय नहीं ले पाता था !और उसका पुत्र में आसक्ति के कारण कर्त्तव्य अकर्तव्य का बोध नष्ट हो गया था !तथा वह अधर्म को ही धर्म मानने लगा था !विदुर ने उसको उपदेश कर धर्म के वास्तविक तत्त्व अध्यात्म को समझाने के लिए जो उपदेश दिया है !उसी उपदेश के अंगरूप में कामी, क्रोधी, प्रमादी, थके, आलसी, जल्दबाज आदि लोगों से दूर रहने की बातें कही गयी हैं !इन्तु इस नीति गत उपदेश का मुख्य उद्देशय शाब्दिक ज्ञान को अनुभव जन्य ज्ञान में बदलने का है !इसलिए इसी उपदेश में विदुर कहते है !की राजन संसार में पांच तरह के लोग जहाँ कहीं भी आप जाएंगे आपको अवश्य मिलेंगे --(१)आश्रय मांगने वाले (२)आश्रय देने वाले (३)प्रसंसा करने वाले (४)निंदा करने वाले (५)और उदासीन, तथा तटस्थ ! इसलिए विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि मनुष्यों के बाह्य आचरण को ध्यान में रख कर व्योहार तो करो किन्तु अंदर से अनासक्त भाव से राज धर्म का पालन लोकहित में निष्पक्छ और न्याय दृष्टि से करो !

Thursday, 21 July 2016

जिस तरह से जल का प्रवाह नीचे की ओर बहने  का स्वाभाविक होता है !उसको ऊपर चढाने के लिए यंत्र का उपयोग करना पड़ता है!उसी प्रकार मानवीय स्वभाव में स्वार्थ निष्ठ जिजीविषा और स्पृहा जन्मजात होती है !उसको शुद्ध और समाज हित में शिक्छित और प्रसिक्छित करने का काम त्यागी महापुरुष करते हैं !  बे अपने तप और त्याग से  समाज में परमार्थ की पवित्र धारा बहाते हैं! राजनीति सभी प्रकार की त्याग और तपस्या की धाराओं का भक्छन् कर लेती है ! राजनीति बाह्य ,नियमों और कानूनों से संचालित होती  है, जिसको स्वार्थ निष्ठ लालची ,अंधे ,और भविष्य के भीसण परिणामों से बेखबर राजनेता अपने सत्ता प्राप्ति के स्वार्थ के लिए तोड़ मरोड़ कर अपने हित में उपयोग में लाते हैं ! ऐसे ही राजनेताओं ने अपनी छुद्र राजनीति के द्वारा
सत्ता प्राप्त करने  के लिए दलित शव्द को ईजाद कर लिया है !और शूद्र शव्द को ऐसा अर्थ गुलाम भारत में सृजित हो गया जिस से   से शुद्र समाज में अश्पृश्य ,हो गया !  जबकि वैदिक धर्म में अस्पृष्यता नाम की कोई बुराई कभी रही ही नहीं है ! भारत में वर्ण व्यबस्था गुण कर्माधरित  थी ! और यह सिर्फ हिन्दुओं में ही प्रचिलित थी !जब वर्ण धर्म दोषयुक्त हो गया तो उसका स्थान जाति व्यबस्था ने लेलिया !परन्तु आज ना तो वर्ण व्यबस्था गुण आधारित है !और ना जाति व्यबस्था कर्म आधारित है !प्राचीन भारत में शूद्रों की सामाजिक स्थिति क्या थी !इसका दिग्दर्शन महाभारत के कई आख्यानों में हुआ है !पाराशर गीता में महर्षि पाराशर ने कहा है ------- वेद शास्त्रों के ज्ञान से संपन्न  ब्राह्मण शूद्र को ब्रह्मा के तुल्य कहते हैं ! परन्तु में  तो उन्हें संपूर्ण संसार के प्रधान रकछक भगवान् विष्णु  के रूप में देखता हूँ ! राजा लोग जब मंत्री मंडल का गठन करते थे !उसमें वेद विद्या के विद्वान ,निर्भीक बाहर भीतर से शुद्ध और पवित्र ४ ब्राह्मण ,शस्त्र धारी ८ छत्री धन  धान्य से संपन्न २१ वैश्य तथा पवित्र आचार विचार वाले तीन विनयशील विद्वान शूद्र तथा पुराण विद्या में पारंगत एक सूत शामिल होता था !शूद्र धर्मात्मा और धनी होते थे !और उनको तत्कालीन भारतीय समाज में बहुत सम्मान प्राप्त था !युधिस्ठर ने जब राजसूय यज्ञ किया था तब उन्होंने राजकर्म चारियों को आदेशित कर कहा था ------तुम लोग सभी राज्यों में घूमकर वहां के राजाओं को ,ब्राह्मणो ,वैश्यों तथा माननीय शूद्रों को निमंत्रित करदो और उनको ले आओ !! महाभारत में इस तरह के अनगनित आख्यान है !गांधी जी कहते थे !कि अगर कोई शास्त्र प्रमाण से यह सिद्ध करदेगा कि हिन्दू धर्म में अस्पृष्यता है तो मैं हिन्दू धर्म को त्याग दूंगा !उन्होंने चेतावनी दी थी कीअगर हिन्दू धर्म में आयातित अस्पृश्यता की यह बुराई समाप्त नहीं होती है तो हिन्दू धर्म का नाश  हो जाएगा!

Wednesday, 20 July 2016

Politicians are found making remarks against Jatibad but they are the real precursors of it. to gain politcal power they started this most damaging game of casteism.Now it has trickled down from Parliament to Gram panchayat.These politicians are still disuniting unity of the country by spreading the pioson of casteism. They have spoiled the inner unity of the country and now we have started looking for our own selfissh interests at the cost of national intersts. Creationof castes came in vogue on the basis of Karma. and the creation of jativad is Effected by politicians
जब देश गुलाम था तो पुलिस ब्रिटिश शासकों और जमींदारों आदि के लिए काम करती थी !इसलिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बिरोध के निशाने पर पुलिस रहती थी !परतंत्र भारत में अपराध भी बहुत कम होते थे !इसलिए पुलिस थानो की संख्या बहुत कम थी !तथा एक थाने में एक थाने दार और ७,८ सिपाही ही १००,१५० गाओं पर नियंत्रण कर लेते थे !पुलिस के नाम से ही लोग भयभीत हो जाते थे ! स्वतन्त्र भारत में जब तक कांग्रेसी शासन रहा ! कोंग्रेसियों ने कभी भी पुलिस का इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए नहीं किया !नाही अपराधियों को छुड़ाने का प्रयत्न किया !राजनेता भी अपराधी चरित्र के नहीं होते थे !तथा प्रधानमन्त्री तक की सुरक्षा व्यबस्था में बहुत सुरक्षा कर्मी नहीं लगते थे ! किन्तु आज की इस्थिति बिलकुल भिन्न है !आज संसद में विधान सभाओं में बहुत से ऐसे सांसद और विधायक हैं !जिन पर संगीन अपराधों के मुकदद्मे दर्ज हैं ! !तथा इन नेताओं के बहुत से समर्थक आपराधिक चरित्र के हैं !नेताओं के अवैधानिक हस्तछेप ने पुलिस को ठुल्ला बनादिया है !पुलिस को स्वतंत्रता से कर्तव्य पालन करने दिया जाय तो वह नेताओं को ठुल्ला का सही अर्थ समझा देगी !

Tuesday, 19 July 2016

आज अवतारों, जगत्-गुरुओं, विश्वोपदेशकों ( World- teachers), सद्गुरूओं, ज्ञानियों, योगिराजों और भक्तों की देश में हाट लग रही है । ये सब दुर्लभ पद मोहवश आज बहुत ही सस्ते हो रहे हैं । ऐसे कई व्यक्तियों के नाम तो यह लेखक ही जानता है, जिनकी खुल्लमखुल्ला अवतार कहकर पूजा की जाती है और वे उसको स्वीकार करते हैं । पता नहीं, ईश्वर के इतने अवतार एक ही साथ देश में कैसे हो गये ? आश्चर्य तो यह है कि एक अवतार दूसरे अवतार को मानने के लिये तैयार नहीं है । ऐसी स्थिति में ये अवतार वास्तव में क्या वस्तु हैं ? इस बात को प्रत्येक विचारशील पुरुष सोच सकते हैं । गुरु तो गाँव -गाँव और गली-गली में मिल सकते हैं, सब कुछ गुरु चरणों में अर्पण करनेमात्र से ही ईश्वर -प्राप्ति की गैरंटी देनेवाले गुरूओं की कमी नहीं है; ऐसे हजारों नहीं, लाखों गुरु होंगे; परंतु दुःख है कि इन गुरूओं की जमात से उद्धार शायद ही किसी का होता है ।
जय श्री कृष्ण
लोकतंत्र का अभिशाप है ! महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तिओं में कर्त्तव्य निष्ठा और स्वार्थ निष्ठा के कारण दूरदृष्टि का अभाव ! इसीलिए शिक्छा जैसे चरित्र निर्माण के छेत्र में भी भारी दुर्दशा देखने कोमिलती है !प्राथमिक शिक्छा से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्छा का व्यबसायी करण हो गया है !सरकार द्वारा संचालित विद्यालय शिक्छा के लिए निरुपयोगी हो गए हैं !परिणामस्वरूप अभिभावक अपने बच्चों का प्रवेश प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में कराते हैं !और प्राइवेट स्कूल के संचालक अध्यापकों का भी शोषण करते हैं !और अभिभावकों से भी मनमानी फीस बसूलते हैं !और बच्चों की भी जान जोखम में इस प्रकार वाहनो से भरकर लेजाने से हो जाती है !इसमें अभिभावक और स्कूलों के संचालक दोनों ही दोषी हैं !किन्तु सब से अधिक अपराधी तो बो हैं !जो सरकार चलाते है ! और बो शिक्छक और शिक्छा अधिकारी हैं !जो इतने स्वार्थ में अंधे हो गए हैं !कि उन्हें न बच्चों की जान की चिंता है !ना ही देश के भविष्य की चिंता है !
सांसद जनप्रितिनिधि होता है !इसलिए उसमे उसके चुनने वाले मतदाताओं का दर्शन होना चाहिए !जो आर्थिक स्तर मतदाता का है ! और जो उसका जीवन स्तर है वही स्तर जनप्रिनिधि का भी होना चाहिए !किन्तु जनता और जनप्रितिनिधि के जीवन स्तर में जमीन आसमान का अंतर है !गांधी जी ने लंदन में गोलमेज परिषद में बोलते हुए कहा था ! कि हिंदुस्तान की गरीबी को बिना आजादी के ख़त्म नहीं किया जा सकता है !जब पत्रकारों ने गांधी जी से पूंछा था ! कि आजाद भारत में गरीबी कैसे समाप्त होगी ! और लोकतंत्र का क्या स्वरुप होगा ? गांधी जी ने कहा था ! आजाद भारत का समाज स्वाबलम्बी समाज होगा !वह अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकार का मुहताज नहीं होगा !जनप्रतिनिधिओं को कोई बेतन नहीं दिया जायेगा सिर्फ यात्रा भत्ता और भोजन भत्ता दिया जाएगा !मंत्रिपद पुरुष्कार नहीं होंगे !मंत्रियों को साफ़ सुथरी झोपड़ी रहने को दी जाएंगी तथा उनका मासिकबेतन ४०० रूपए प्रति माह होगा !वाइसराय भवन जिसमे अब राष्ट्रपति रहते हैं !में जनता के लिए अस्पताल खोला जाएगा !पहली लोकसभा के सदस्यों को बेतन नहीं दिया जाता था ! जब संसद चलती थी तो भत्ता दिया जाता था !

Friday, 15 July 2016

कश्मीरियत क्या है ?---------- कुछ लोग स्वार्थ बस और कुछ लोग अर्ध ज्ञान या अज्ञान से गुमराह हो जाते हैं !फिर ये मुट्ठी भर लोग और लोगों को गुमराह करते रहते हैं !भारत इस समय इन गुमराह मुट्ठी भर लोगों के कारण सभी प्रकार की धार्मिक और सामाजिक और राजनैतिक समस्यायों से ग्रस्त हो गया है ! आजादी के तत्काल बाद से ही इन समस्यायों का बीजा रोपण होगया था !जो अब ब्रक्छ के रूप में विकसित होगयी  है !कश्मीर समस्या उन्ही ज्वलंत समस्यायों में से है !गांधीजी ने इस समस्या को रुई के ढेर पर रखी जलती दिया सलाई कहा था ! जम्मू  कश्मीर------- कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख से मिलकर बना है !कश्मीर इस्लाम के प्रवेश के पहले सम्पूर्ण सनातन धर्मी था !यह वैदिक धर्म का केंद्र था !यह वह स्थान था !जहाँ से आध्यात्मिक अमृत धारा बहती थी !आदि शंकराचार्य  से लेकर अनेकों शीर्सस्थ  संत ,महात्माओं की साधना का यह साधना और तपस्या का  पूण्य छेत्र रहा है ! कहा जाता है की जीसस कृष्ट भी यहाँ साधना के लिए आये थे .! इस भूमि में हिन्दू धर्म के अमरनाथ,वैष्ण्व देवी ,शंकराचार्य आदि के महान तीर्थ स्थल हैं !जहाँ साल भर श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है !कश्मीर घाटी मुसलिम बहुल हैं !यही सर्वाधिक अशांति और उपद्रव का केंद्र है !यहीं पर इस्लामिक उग्र बाद सक्रिय है !जम्मू और लद्दाख अपेक्छा कृत शान्त हैं  !लद्दाख में बौद्ध और जम्मू में हिन्दू अधिक हैं !अलगाव वादी   आतंक वादी घाटी की  इस्लामिक धर्म संस्कृति को ही  कश्मीरियत कहते हैं !इसी की रक्छा के लिए बे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं! तीर्थ यात्रियों पर हमले करते हैं ! कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने को मजबूर कर देते हैं !उनका घरबार लूट लेते हैं और सेकंडों मंदिर तोड़ देते हैं !और इसी कश्मीरियत की रक्छा की वह बात करते हैं !भारत में ही कुछ लोग इसी कश्मीर की आजादी की बात और समर्थन करते हैं !सुरक्छा बलों और सैनिकों की कुर्वानी के लिए उनके दिल दिमाग में कोई दर्द नहीं है ! किन्तु आतंकवादियों की मृत्यु उनको सहादत दिखाई देती है !ये आस्तीन के सांप हैं!असली कश्मीरियत १४०० साल पुरानी है !जिसके स्मृति चिन्ह आज भी पवित्र भूमि कश्मेरु (प्राचीन नाम )  जो कश्यप मुनि का साधना छेत्र रहा है !जिसको ये तथाकथित आतंकवादी नष्ट कर रहे हैं ! कश्मीरियत है !और इसकी रक्छा करना हम सबका उत्तरदायित्तव है !और इसके लिए सरकार को इसे आतंकवाद से मुक्त करना चाहिए

Wednesday, 13 July 2016

जुलाई 2015 ·
यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः !तत्र श्री विजयो भूतिः नीतिः मतिः मम !१८(७८) अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान प्रत्येक युग में अवतार लेते हैं !महाभारत में उत्तंक ऋषि को अपने अवतरण का रहस्य और उद्देश्य बताते हुए श्री कृष्णा कहते हैं! कि मै धर्म की रक्षा और स्थापना के लिए तीनो लोकों में बहुत सी योनियों में अवतार धारण करके उन उन रूपों और वेशों द्वारा तदनरूप वर्ताव करता हूँ ! अधर्म में लगे हुए सभी मनुष्यों को दंड देने वाला और अपनी मर्यादा से कभी च्युत ना होने वाला ईश्वर में ही हूँ !जब जब युग का परिवर्तन होता है ! तब तब में लोगों की भलाई के लिए भिन्न भिन्न योनियों में प्रविष्ट हो कर धर्म मर्यादा की स्थापना करता हूँ !जब में देवयोनि में अवतार लेता हूँ ! तब देवताओं की ही भांति सारे आचार विचार का पालन करता हूँ !जब में गन्धर्व योनि में प्रगट होता हूँ तब मेरे सारे आचार विचार गन्धर्वों के ही समान होते हैं !जिस योनि में मेरा अवतार होता है !उसी योनि के अनुसार मेरा आचार विचार और व्योहार होता है ! इस समय में मनुष्य योनि में अवतीर्ण हुआ हूँ! इसलिए दुर्योधन आदि कौरवों पर अपनी ईश्वरीय शक्ति का प्रयोग ना करके मेने दीनता पूर्वक ही धर्म मार्ग पर चलने वाले पांडवों और अधर्मी कौरवों में संधि स्थापना के लिए प्रार्थना की थी ! परन्तु कौरवों ने मोह और लोभ ग्रस्त होने के कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ! इसके बाद मेने कौरवों को बड़े बड़े भय दिखाए और उन्हें डराया धमकाया भी ! तथा यथार्थ रूप से युद्ध का भयानक परिणाम भी उन्हें बताया ! परन्तु बे अधर्म और काल से ग्रस्त थे ! अतः मेरी बात मानने को राजी नहीं हुए ! इसिलए छत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए !जब अधर्म और अधर्मी ,लोभी ,दुराचारी ,पापियों का विनाश हो जाता है ! और धर्म की स्थापना हो जाती है ! और लोक व्यबस्था सदाचार परायण न्याय प्रिय आत्मनिष्ठ शाशन प्रसाशन में प्रजा के साथ भेद भाव ना कर प्रजा की भलाई करने वाले लोगों के हाथो में आजाती है ! तभी समाज में श्री अर्थात लक्ष्मी शोभा संपत्ति आदि के दर्शन होते हैं !रुपया पैसा लक्ष्मी नहीं है !रुपया तो नासिक के रुपया छापने के कारखाने में छपता है !किन्तु लक्ष्मी तो कृषि, गाय की रक्षा और वाणिज्य से उत्पन्न होती है !आज समाज के सभी बर्ग नेता अभिनेता कर्मचारी व्योपारी ,तथाकथित साधु सन्यासी आदि सभी रुपया कमाने में लगे हुए हैं !और रुपयों के संग्रह के लिए घोर अनैतिक, धोखा धडी, बेईमानी, गोवध, पाखंड, छल कपट, आदि अधार्मिक कार्य करने में संलग्न है !परिणाम स्वरुप समाज में कही प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति दिखाई देती है !और कही भयानक गरीबी के दर्शन होते हैं! !संपूर्ण देश में गो पालन के अभाव के कारण पशुओं की चर्वी से बना घी और केमिकल से निर्मित दूध और सभी खाद्य पदार्थ मिलाबटी प्राप्त हो रहे हैं !देश में पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दुर्लभ हो गए हैं ! जहाँ अधर्म का विनाश और धर्म की विजय होगी !वही वास्तविक विजय कही जायेगी !आज जिस विजय का दर्शन होता है !उस विजय की प्राप्ति में लगे हुए सभी पक्ष लोभ मोह पद प्रतिष्ठा प्राप्ति की होड़ में सभी प्रकार के अनैतिक छलकपट युक्त अधार्मिक साधनो का प्रयोग करते हैं !इसीलिए व्यक्ति जीतते ,और हारते रहते हैं ! किन्तु समाज को कष्ट देने वाली व्यबस्था नष्ट नहीं होती है !जैसे नाग नाथ वैसे सांपनाथ वाली युक्ति चरितार्थ होती है !ऐश्वर्य महत्ता, प्रभाव सामर्थ्य आदि सभी स्वार्थनिष्ठ अनैतिक अधार्मिक व्यक्तियों के हाथ में चलीगयी है ! और उनके हाथ की काठ पुतली बन गयी है !अटल न्याय, धर्म नीति के दर्शन देश और समाज के संचालन करने वालों में दिखाई नहीं देते हैं !स्वार्थों का पोषण करना ही सभी छेत्रों में काम करने वाले जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की अटल ना बदलने वाली नीति होगयी है !देश में वास्तविक श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति का दर्शन जभी होगा जब श्री कृष्ण ऐसे नीति निर्माता और अर्जुन जैसे न्याय, नीति , सदाचार ,आत्मनिष्ठ, स्वार्थ रहित ,धर्मपरायण लोग सत्ता व्यबस्था संभाल कर तदनुसार सदाचरण करेंगे !

Tuesday, 12 July 2016

भगवान श्रीकृष्ण और जामबंत का युद्ध हरवंश पुराण में बताया गया है !जो महाभारत का ही एक भाग है !महाभारत में भगवान परशुराम की भी कथा कई प्रसंगो में आई है उनका और भीष्म पितामह का २३ दिन तक युद्ध हुआ है !बे कौरव सभा में दुर्योधन को पांडवों से युद्ध न करने के लिए भी समझाते हैं !जब युधिस्ठर ने राजसूय यज्ञ किया था !तो सहदेव ने भीम के पुत्र घटोत्कच को श्री लंका में भेजा था !जहाँ उसने लंका के राजा बिभीषण से भेंट की थी !और बिभीषण ने युधिस्ठर को बहुत से हीरा मोती बस्त्र और बहुमूल्य उपहार भेंट स्वरुप भेजे थे ! भगवान राम के द्वारा निर्मित पुल को भी घटोत्कच ने देख कर कहा था कि यह वही पुल है! जो भगवान राम ने समुद्र पर करने के लिए बनबाया था ! अगस्त ऋषि के भी कई प्रसंग महभारत में हैं ! अगस्त का लोपामुद्रा के साथ विवाह होता है ! जिस से उनको एक पुत्र कि प्राप्तिहोती है ! जिस से उनके पितरों का पितृलोक से पतन रुकता है ! राम रावण युद्ध त्रेता के अंत के समय हुआ था !जैसे ही राम रावण युद्ध समाप्त हुआ द्वापर आ गया था !इसी प्रकार महाभारत का युद्ध भी द्वापर के अंत में हुआ था !जैसे ही भगवान श्री कृष्णा का स्वलोक गमन हुआ कलियुग आगया था ! इस तरह रामायण काल के जामबंत मयासुर हनुमान आदि के अलावा ये पात्र भी रामायणकाल में थे और महाभारत काल में भी थे
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ७(१९) !सभी धर्मों के मुख्य विषय भगवान हैं !किन्ही धर्मों में ईश्वर को श्रष्टि का निर्माता पालन पोषण कर्ता आदि के रूप में स्वीकार किया गया है !कुछ धर्म ईश्वर को तो मानते है किन्तु उसे श्रष्टि का कर्ता भोक्ता आदि नहीं मानते हैं !परमात्मा के असितत्त्व को आस्ति और नास्ति के विविध रूपों में सभी धर्म स्वीकार करते हैं !ईश्वर के स्वरुप आदि का वर्णन विवेचन अनेक प्रकार से साधु, सन्यासी, महात्मा ,प्रवचन कर्ता, कथावाचक आदि करते रहते हैं !सामान्य जन भी पाप पुण्य , लाभ हानि, जन्म मरण के देने वाले के रूप में ईश्वर को मानते हैं !किन्तु उस ईश्वर का वास सब में हैं !इस बोध को प्राप्त कर तदनुसार ईश्वर समपित जीवन जीने वाले महात्मा मुश्किल से प्राप्त होते हैं ! भगवान समस्त प्राणियों के निवास स्थान हैं ! तथा वे सब भूतो में वास करते हैं ! इसलिए बे बासु कहलाते हैं ! तथा बे ही देवताओं की उत्पत्ति के स्थान होने के कारण और समस्त देवता उनमे वास करते हैं ! इसलिए उन्हें देव कहा जाता है ! अतएव भगवान का नाम बासुदेव है !बासुदेवः सर्वं यह गीता का सर्वोत्कृष्ट उपदेश है ! क्योँकि यही वास्तविकता भी है ! संपूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में अपरा और परा ---इन दोनों प्रकृतियों का संयोग ही कारण है ! पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पांच महाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकार की परमात्मा की अपरा प्रकृति है ! और इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीव रूप बनी हुई भगवान की परा प्रकृति है ! इन्ही दो शक्तियों से भगवान जगत के प्रभव और प्रलय हैं ! अर्थात संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाले और जगत रूप में उत्पन्न होने वाले हैं !और भगवान ही जगत का नाश करने वाले, और बे ही जगत रूप में नाश होने वाले हैं ! क्योँकि जगत के उपादान कारण भी भगवान है ! और निमित्त कारण भी वही है ! इसलिए इस जगत का कोई दूसरा कारण तथा कार्य नहीं है ! जैसे सूत की मणिया और सूत के धागा के रूप भिन्न भिन्न होते हैं ! किन्तु उनमे सूत के सिवाय और कुछ नहीं होता है इसी प्रकार मणि रूप अपरा (जड़ )प्रकृति और धागा रूप परा (जीव )प्रकृति दोनों में एक भगवान ही परिपूर्ण है ! अर्थात एक भगवान के सिवा अन्य कुछ नहीं है ! बास्तविक दृष्टि से देखें तो ना धागा है ! और ना मणिया है केवल सूत ही है ! इसी तरह न परा है न अपरा है सिर्फ एक परमात्मा ही है !इस ज्ञान को धारण करने के लिए संसार की सत्ता महत्ता को त्याग कर सिर्फ एक परमात्मा की ही सत्ता महत्ता को समझ कर तदनुसार आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियों शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि के लिए ही समस्त जीवन के कर्म करने पड़ते हैं ! ममता का सर्वथा नाश होना ही अन्तः करण की शुद्धि है ! इस प्रकार कर्म करते करते जब ममता का संपूर्ण नाश हो जाता है ! तब अन्तः करण पवित्र हो जाता है ! और साधक की दृष्टि में संसार सर्वम् के स्थान पर बासुदेव सर्वम की स्थापना होजाती है !यह साधक भक्त ,कर्मयोगी ,ज्ञानयोगी आदि की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है !भगवन कहते हैं इस मंजिल तक पहुंचे महात्मा अत्यंत दुर्लभ हैं !भगवान सुलभ है ! किन्तु भगवान को प्राप्त करने के लिए तदनुसार अपनी जीवनचर्या का निर्माण कर जीवन जीने वाले बिरले हैं

Monday, 11 July 2016

ब्रक्छा रोपण-------- समाचार है की ११ जुलाई को संपूर्ण प्रदेश में मुख्य्मंत्री की अगुवाई में ५ करोड़ ब्रक्छों का आरोपण किया गया !देश और प्रदेश की सरकारें पर्यावरण के प्रति बहुत अधिक जागरूक दिखाईं दे रही हैं !बहुत से गैरसरकारी और सामाजिक संगठन भी पर्याबरण सुधार के लिए कार्य कर रहे हैं !सभी लोग यह महसूस करते हैं कि प्राणिमात्र  के पृथवी पर असितत्तव के लिए जल जंगल और जमीन की रक्छा और सुरक्छा की बहुत आवश्यकता है ! उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश बिगत तीन सालों से भयानक सूखे से पीड़ित रहें  है ! फसलें नहीं हुई !सरकारों ने बहुत से राहत कार्य भी चलाये !किसानों ने आत्महत्याएं भी की !बहुत से सामजिक संगठनो ने ब्रक्छों और जल के संरक्छण  के लिए उपयोगी सुझाव अपने भाषणों से दिए  और जमीन के होने वाले उत्खनन पर भी बंदिश लगाने की बात की !जल संरक्छण का कार्य सिंचाई विभाग करता है! प्रदेश में समय .समय पर सूखा पड़ता  रहता है !और भारी बरसात भी होती है !जब भारी  बरसात होती है !तो बरसात के जल का भंडारण नहीं किया जाता है !परिणाम स्वरुप बरसात से बाढ़ भी आती है !और पानी भी व्यर्थ में बाह जाता है !यदि जल का सही प्रवंधन किया जाय तो जल का अभाव तो प्रकृति ही समाप्त कर देगी !लोगों को जल की बून्द ,बून्द बचाओ इसके लिए भाषण नहीं देने पड़ेंगे !जल संरक्छण के लिए बड़ी योजनाएं बनती है !धन की व्यबस्था भी की जाती है !किन्तु जलसंरक्छन् नहीं हो पाता है !इसके लिए आवण्टित फण्ड कहाँ जाता है ? इसी प्रकार पृथ्वी से मिट्टी और पहाड़ों से गिट्टी तथा नदियों से बालू अदि के संरक्छण के लिए भी विभाग है !इसके बाद भी अवैध उत्खनन ,बालू ,गिट्टी आदि की निकासी भारी मात्र में होती रहती है 1बन विभाग ब्रक्छों की रक्छा और सुरक्छा तथा ब्रक्छा रोपण का कार्य करता है !इसके बाद भी ब्रक्छों की अवैध कटाई से जंगल ब्रक्छ विहीन हो गए हैं !प्रत्येक बर्ष ब्रकछा  रोपण होता है !ब्रक्छों के पौधों का संरक्छण किया गया होता !तो संपूर्ण प्रदेश ब्रक्छों से आच्छादित हो गया होता !देश आजाद है !चपरासी से लेकर अधिकारियों तक सभी भारतीय काम करते हैं !मंत्री ,प्रधान मंत्री ,मुख्य मंत्री आदि सभी भारतीय हैं! सभी प्रकार के सामजिक संगठन भी भारतीय ही संचालित करते हैं !सभी पर्यावरण के दूषित होने से होने वाले घातक परिणामों से चिंतित है ! फिर भी इसमें साधनों के बाद भी सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है ? यह भारत भूमि हजारों नदियों और तालाबों और पोखरों के बाद भी सूखा और बाढ़ से ग्रस्त क्यों होती है ? हिमालय और विंध्याचल जैसे और अनगिनित पहाड़ों के होते हुए भी इसके अवैध कटान क्यों जारी हैं ? भूमि से अवैध उत्खनन  और नदियों से  अवैध बालू निकासी कैसे हो रही है  ?ब्रक्छों से लदी यह भारत भूमि ब्रक्छ विहीन क्यों होती जा रही है !? ये विचारणीय गम्भीर प्रश्न है !और इनका समाधान सिर्फ हम सबके  पास है

Sunday, 10 July 2016

विश्व जनसंख्या दिवस -------- १०० मुर्ख पुत्रों से एक गुणवान पुत्र अच्छा होता है !क्योंकि आकाश में चमकने वाले हजारों तारागण अंधकार को नहीं मिटा पाते हैं किन्तु एक चन्द्रमा अन्धकार का नाश कर देता है !अगस्त ऋषि का लोपामुद्रा से विवाह हुआ था !लोपामुद्रा ने ऋषि से प्रार्थना की  कि वह एक ऐसा गुणवान पुत्र चाहती है !जो योगयता में ,विद्वता में शक्ति और सामर्थ्य में लाखों बच्चों से श्रेष्ठ हो !भारत पुरातन काल से लोकव्यबस्था और भौतिक सुखों के लिए और आध्यात्मिक आनंद के लिए संख्या के स्थान पर योग्य संतानों को उत्पन्न करता रहा है!सृष्टि में सूअर ,और शीघ्र मरने वाले तथा व्यबस्था को कष्ट पहुँचाने वाले जीव जंतुओं और झाड़ियों ,झंकार का जन्म ही अधिक संख्या में होता है !इसीलिए ऐसे जीव जंतुओं और खर पतवार को नष्ट करने का उपाय करना पड़ता है ! कुछ जीव जंतु तो प्रकृति के विधान के अनुसार अल्प आयु होने के कारण स्वतः नष्ट  हो जाते हैं !किन्तु खर ,पतवार को नष्ट करना पड़ता है !पृथवी जल ,अग्नि और वायु और आकाश की उत्पत्ति   प्राणी जीवन के पूर्व ही  हो जाती है !इनमें और जगत के प्राणियों में एक दूसरे से सहयोग करने की आवश्यकता श्रष्टि के संवर्धन ,संरक्छण के लिए  आवशयक होती है !पृथवी में जीवों को धारण और पोषण करने की सामर्थ्य और शक्ति बनी रहे!इसीलिए सभी को न तो उस पर जनसँख्या का भार बढ़ना चाहिए !और ना ही प्राकृतिक संसाधनों /मिटटी ,पहाड़ ,जल ,जंगल को नष्ट और दूषित करना चाहिए !इस प्रकार इनका संरक्छण हम करेंगे और फिर हमारा पालन ,पोषण ये प्राकृतिक संसाधन करेंगे !अगर हम ऐसा नहीं करते है !और इन संसाधनीं का विनाश करते रहेंगे !और जनसँख्या में बृद्धि होती रहेगी !तो एक दिन कुदरत ही हमारा विनाश कर देगी !सभ्यता में पतन के लक्छण तो दृष्टि गोचर होने लगे हैं !भूकम्प ,सुनामी ,बर्षा  का न होना ,मनुष्यों में बैर भाव होना ,अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति हेतु लोकव्यबस्था को नाश करना , और लोगों में धार्मिक  उन्माद पैदा कर उनको आपस में लड़ाना और जनसँख्या बढ़ाना  ,संवेदन हीनता ,अदि देश में दिखाई  दे रहे  है !मनुष्यों के कष्ट और परेशानियां ,निरंतर बढती जा रही हैं !स्वार्थों के घनघोर काले  बादलों ने मनुष्यों को पशु बन दिया है !इसके बाद भी अगर हम सुधरते नहीं है !तो अगला कदम हमारे सर्व विनाश का होगा !और जैसे मोहन ,जोदड़ो ,हड़प्पा अदि पृथवी में समां गए हैं !उसी प्रकार हम भी जमीं दोज हो जायेंगे !
कर्मयोगो विशिष्य्ते !५(२)---कर्मयोग और सन्यास दोनों ही आत्मशांति आत्मकल्याण और मोक्ष प्रदान कराने वाले हैं !परन्तु सन्यास की अपेक्छा कर्मयोग श्रेष्ठ माना गया है ! गृहस्थ आश्रम और सन्यास दोनों का विधान शाश्त्रों में है ! तथापि सन्यास आश्रम में प्राप्त होने वाली स्थिति तो गृहस्थ जीवन में भी हो सकती ! परन्तु गृहस्थ के श्रष्टि परम्परा के लिए आवश्यक संयम प्रधान काम भोग और नए नए भौतिक अविष्कारों आदि का अवसर सन्यास आश्रम में संभव नहीं है ! अतः संपूर्ण धर्मों की सिद्धि का स्थान गृहस्थ आश्रम ही है ! जैसे गृहत्यागी सन्यासी घर के प्रति अनासक्त होता है !उसी प्रकार यदि गृहस्थ भी गृहस्थ जीवन में ममता आसक्ति त्याग कर परिवार में रहता है !और सदाचार और संयम का पालन करता हुआ अपनी प्रिय पत्नी बच्चों और सम्बन्धियों के साथ निवास करता है ! तो उसे वही परमगति प्राप्त होती है ! जो सन्यासी को प्राप्त होती है ! लोक दृस्टि से कर्मयोग अधिक उपयोगी सिद्ध होता है !जो विद्याएँ कर्म का सम्पादन कराती हैं उन्ही का फल दृष्टिगोचर होता है !दूसरी विद्याओं का नहीं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म के परिणाम ही प्रत्यक्छ दिखाई देते हैं ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पी कर ही शांत होता है उसे जानकार नहीं ! अतः गृहस्थ आश्रम में रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है ! ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सन्यासी भी संसार में भक्छ्या भोक्छ्या पदार्थों का भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता है ! अतएव सन्यासी के लिए भी भूख की निबृत्ति के लिए भोजन का विधान है !पुण्यात्मा स्त्री पुरुष पुण्य कार्यों से स्वर्ग और पाप पूर्ण कार्यों से ही अधोगति और नरक आदि की प्राप्ति करते है ! देवता भी कर्म से ही स्वर्ग लोक में प्रकाशित होते हैं ! वायु कर्म को ही अपना कर संपूर्ण जगत में विचरण करता है ! सूर्य देव भी कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित और अस्त होते हुए दिखाई देते हैं ! नदियां भी कर्म परायण हो सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करती हुई प्रवाहित होती हैं ! कर्म योग के बिना संन्यास के लिए आवश्यक चित्त शुद्धि की प्राप्ति होना कठिन है ! किन्तु कर्म योगी आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियां शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि करके शीघ्र ही आत्मानंद और परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है ! सांख्य योग में तो कर्मयोग की आवश्यकता है ! किन्तु कर्मयोग में सांख्य योग की आवश्यकता नहीं है ! प्राप्त परिस्थति का सदुपयोग कर अन्तः करण की समस्त वृत्तियों प्रवृत्तियों को आत्मनिष्ठ बनाना ही कर्मयोग है ! युद्ध जैसी घोर परिस्थिति में भी कर्मयोग का पालन किया जा सकता है ! तीव्र वैराग्य और तीक्छण बुद्धि के द्वारा सन्यासी अहंकार और ममता को नष्ट करता है ! तथा कर्मयोगी निश्वार्थ भाव से लोक मर्यादा की कर्म परम्परा को सुरक्छित रखने के लिए लोकहित के कर्म करता है ! जिस कर्म में व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख प्राप्ति की इक्छा नहीं है ! वह क्रिया मात्र है कर्म नहीं है ! जैसे यंत्र में कर्तत्त्व नहीं होता है ! ऐसे ही कर्मयोगी में भी क्रिया मात्र रहती है कर्तात्त्व नहीं रहता ! संन्यास या ज्ञान योग में तो संसार के मिथ्यात्त्व का बोध होता है ! तथा सन्यासी आत्मनिष्ठ होकर कर्म से उदासीन हो जाता है !तथा कर्मों का त्याग कर देता है ! इसलिए सन्यासी आत्म लाभ प्राप्त कर अपने लिए उपयोगी होता है ! किन्तु कर्म योगी संसार मात्र के लिए उपयोगी होता है ! जो संसार के लिए उपयोगी होता है ! वह अपने लिए भी उपयोगी होता है ! इसलिए संन्यास और कर्मयोग दोनों साधन कल्याणकारक होने पर भी कर्म योग श्रेष्ठ है !

Saturday, 9 July 2016

इंग्लैंड में प्रितिनिधि मंडल ---------साउथ अफ्रीका में खुनी कानून का विरोध करने के लिए ट्रांसवाल की सरकार के सामने प्रार्थना पात्र पेश करने आदि के जितने कदम उठाने जरूरी थे बे सब उठा लिए गए थे  !किन्तु ट्रांसवाल की धारा सभा ने स्त्रियों को रखने वाली धारा को निकालकर बाकी बिल ज्यों का त्यों पास कर दिया !प्रितिनिधि मंडल में कौन कौन जाय इसका निर्णय करने में कमिटी ने बहुत समय ले लिया !अंत में यह निश्चित हुआ कि एक सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल जाय और इसके लिए गांधीजी का नाम सर्वसम्मत निश्चित हो गया !साउथ अफ्रीका में हिन्दू मुसलमान का प्रश्न नहीं था !फिर भी यह नहीं कहा जा सकता था कि हिन्दू मुसलिम में कोई मतभेद थे ही नहीं ! इन मतभेदों ने कभी जहरीला साम्प्रदायिक रूप ग्रहण नहीं किया था !गांधी जी ने यह सलाह दी कि प्रतिनधि मंडल में उनके साथ एक मुसलमान सज्जन भी जाना चाहिए !इस प्रकार हाजी वजीर अली और गांधी जी दो लोग लंदन गए थे !लन्दन पहुंचते ही प्रतिनिधि मंडल अपने काम में जुट गया !उस समय लार्ड एल्गिन उपनिवेश मंत्री थे और लार्ड मार्ले भारत मंत्री थे !गांधी जी भारत के पितामह दादा भाई नौरोजी से भी मिले फिर उनके मार्फ़त भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी से भी मिले !!हमारा प्रितिनिधि मंडल एल्गिन से मिला उन्होंने प्रितनिधि मंडल की सारी बातें ध्यान से सुनी अपनी सहानुभूति प्रगट की और अपनी कठिनाई भी बतायी  !परन्तु साथ ही यथा शक्ति हमारे लिए सबकुछ करने का वचन भी दिया ! हम लोग लार्ड मार्ले से भी मिले !उन्होंने भी हमारी परेशानी के प्रति सहानभूति प्रगट की !इंग्लैंड तथा पश्चिमी देशों में एक ऐसी असभ्य प्रथा है कि वहां अच्छे कामों का शुभारम्भ भोज के साथ किया जाता है !भोज के समाप्त होने के बाद शराब की बोतलें खुलती हैं !और यजमान तथा तथा अतिथियों की स्वास्थ्य कामना के लिए शराब पी जाती है !और बीच में भाषण भी दिए जाते हैं !गांधीजी इस सबको नापसंद करते थे !इस प्रथा के अनुसार प्रितिनिधि मणडल ने भी एक दिन दोपहर के भोजन का निमंत्रण अपने मुख्य समर्थकों और सहायक मित्रों को  दिया !इस भोज का उद्देश्य समर्थकों और सहायकों का आभार व्यक्त करना ,उनसे विदा लेना और स्थाई समिति की स्थापना करना था !इस भोज में भी प्रथा के अनुसार भोजन के बाद भाषण हुए ,और स्थायी समिति की स्थापना भी हुई !किन्तु प्रतिनिधि मंडल ने  ना शराब पी और ना मांस खाया !इस कार्यक्रम से आंदोलन को अधिक प्रसिद्धि मिली !लगभग ६ सप्ताह का समय इंग्लैंड में बिता कर प्रितिनिधि  मंडल साउथ अफ्रीका लौट आया !

Friday, 8 July 2016

महाभारत वैदिक धर्म का ग्रन्थ रत्न है !इसमें मोक्ष शाश्त्र ,राजनीति ,अर्थ और काम तथा धर्म के सभी सामान्य और गूढ़ प्रकरण भरे हुए हैं !वेद व्यास ने कहा है किजो ई ग्रन्थ में है वही अन्यत्र भी है ! और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है !कर्ण की मृत्यु के अनेक कारण थे !कर्ण से इन्द्र ने उसके कवच कुण्डल ब्राह्मण का वेश धारण कर दान में ले लिए थे !भगवान सूर्य ने उसको स्वप्न में इन्द्र को कवच कुण्डल न देने के लिए कहा था !क्योँकि उनके रहते उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी !किन्तु कर्ण ने सूर्य की सलाह न मानते हुए इन्द्र को अपने कवच कुण्डल दे दिए थे !इन्द्र से उसने कवच कुण्डल के बदले वैजन्ती शक्ति प्राप्त की थी ! जिसको वह अपने प्रमुख प्रतिद्वन्दी अर्जुन को मारने के लिए सुरक्छित रखे था !किन्तु उस शक्ति का प्रयोग भी उसे अपनी प्राणरक्षा के लिए घटोत्कच को मारने के लिए करना पड़ा था ! भगवान परशुराम ने भी उसे शाप दिया था कि जीवन संकट के समय वह परशराम जी द्वारा दिए गए अश्त्र सश्त्र संचालन के ज्ञान को भूल जाएगा !ब्राह्मण की भी श्राप थी कि युद्ध भूमि में उसका पहिया पृथ्वी निगल लेगी !और तभी असहाय दसा में उसकी मृत्यु हो जायेगी !किन्तु इन सब कारणों से बड़ा कारण यह था कि वह दुराचारी अन्यायी दुर्योधन का साथ दे रहा था ! और अधर्म का समर्थन और क्रियात्मक शक्ति से सहयोग कर रहा था !उसको पांडवों के पक्छ में जिनका वह बड़ा भाई था करने का प्रयत्न कुंती ने भी किया ! श्री कृष्ण ने भी किया !और सर सैया पर पढ़े हुए भीष्म ने भी किया !किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं मानी !अगर कर्ण दुर्योधन के अन्याय अत्याचार में शामिल होकर दुर्योधन का साथ नहीं देता तो !महाभारत का यदुध नहीं होता और १८ अक्छोहनि सेना महाविनाश से बच जाती !क्योँकि दुर्योधन को कर्ण के बल और शक्ति से युद्ध जीतने का पूरा भरोसा था !अन्याय अत्याचार कभी भी अधिक समय तक कायम नहीं रहता !और अन्याय अत्याचार का साथ और सहयोग देने वाले कितने भी शक्तिशाली हों बे एक दिन काल के कराल गाल में समा ही जाते हैं !कर्ण की मृत्यु का एक यह भी कारण था
जन्म ,कर्म , च ,मे ,दिव्यम ! ४(९)गीता में भगवान श्री कृष्णा को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है !परमशक्ति के ईश्वर के रूप में अवतार का रहस्य जो धर्म को सिर्फ तर्क और अपनी सिमित बुद्धि से जानना समझना चाहते है ! उन पर प्रगट नहीं होता है !इस रहस्य को जान ने के लिए भक्ति की आवश्यकता होती है !क्योंकि अवतार के कर्म और जन्म दिव्या होते हैं !अर्थात परमशक्ति का अवतरण और कर्म मनुष्यों की तरह लोभ लालच मोह और सुख भोग आदि की प्राप्ति के लिए नहीं होते है ! !भगवान श्री कृष्णा ने युधिस्ठर के प्रश्न करने पर अवतार के रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया ! कि मेरे परम गोपनीय आत्म तत्त्व को सुनो और समझ कर धारण करो !में इस समय धर्म की स्थापना और दुष्टों का विनाश करने के लिए अपनी माया से मानव शरीर में अवतरित हुआ हूँ ! जो लोग मुझे केवल मनुष्य शरीर में ही समझ कर मेरी अवहेलना करते हैं बे मुर्ख हैं ! और संसार में ८४ लाख योनियों में भटकते रहते हैं ! लाखों योनियों में भटकने के बाद भी मनुष्य योनि मिलना कठिन होता है !जो ज्ञान दृष्टि से मुझे संपूर्ण प्राणियों में स्थित देखते हैं ! बे सदा मुझमे मन लगाए रहने वाले मेरे भक्त हैं ! ऐसे भक्तों को में परम धाम में अपने पास बुला लेता हूँ ! मेरे भक्तों का नाश नहीं होता है ! बे निष्पाप होते हैं ! मनुष्यों में उन्ही का जन्म सफल है ! जो मेरे भक्त हैं ! हजारों जन्मो तक तपस्या करने के बाद जब मनुष्यों का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है ! तब उसमे भक्ति का उदय होता है ! मेरा जो गोपनीय कूटस्थ, अचल ,अविनाशी ,पर स्वरुप है ,उसका मेरे भक्तों को जैसा अनुभव होता है ! वैसा तर्क करने वालों को नहीं होता है ! जो मेरा अपर स्वरुप है ! वह अवतार लेने पर दृष्टिगोचर होता है ! संसार के समस्त भक्त सब प्रकार के पदार्थों से उस स्वरुप की पूजा अर्चा करते हैं ! जो मनुष्य मुझे जगत की उत्पत्ति स्थिति ओरसंघार का कारण समझ कर मेरी शरण लेता है ! उसके ऊपर कृपा करके में उसे संसार बंधन से मुक्त कर अपने पास बुला लेता हूँ ! मैं अव्यक्त परमेश्वर ही ब्रह्मा से लेकर छोटे से कीड़े तक में विद्यमान हूँ !मेरे हजारों मस्तक हजारों मुख हजारों नेत्र हजारों भुजाएं हजारों पेट हजारों जांघे और हजारों पैर हैं ! में पृथ्वी को सब और से धारण करके नाभि से दस अंगुल ऊँचे सबके ह्रदय में बिराजमान हूँ ! सम्पूर्ण प्राणियों में आत्म रूप से स्थित हूँ ! इसीलिए सर्व व्यापी कहलाता हूँ ! में अचिन्त्य, अनंत, अजर, अमर, अजन्मा ,अनादि, अवध्य, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वंद, निर्मम, निष्कल, निर्विकार, और मोक्ष का आदि कारण हूँ ! मेने ही अपने तेज से चार प्रकार के प्राणी समुदाय को स्नेह्पाश से बांधकर अपनी माया शक्ति से धारण कर रखा है ! भगवान ने कहा बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ! में तुम्हे यह दिव्य ज्ञान दे रहा हूँ ! कि भूत और भविष्य जो कुछ है वह सब में ही हूँ !जैसे भौतिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपनी बुद्धि को तदनुसार शिक्छित प्रशिक्छित करना पड़ता हैं ! !चाहे जलेबी बनाने का काम हो ! या कमीज बनाने का काम हो ! या परमाणु बम बनाने का काम हो !ये सभी और इसी प्रकार के सभी अन्य भौतिक कर्म बे ही व्यक्ति संपन्न कर सकते है ! जिन्होंने उन कर्मो को करने की शिक्छा प्राप्त की है ! उसी प्रकार परमसत्ता का अवतरण होता है ! और परमात्मा श्रीकृष्ण मनुष्य शरीर में परमशक्ति के अवतार हैं ! इस ज्ञान को धारण करने के लिए अपने मन बुद्धि चित्त अहंकार को संसार के लोभ मोह छल कपट पाखण्ड आदि से मुक्त कर शुद्ध पवित्र करना पड़ता है !फिर भक्ति के संस्कार को स्थापित करने के लिए उस परमशक्ति की पूजा आराधना उपासना शास्त्र विधि से करनी पड़ती है ! तब ईश्वर के जन्म कर्म की दिव्यता का अनुभव होता है !और मनुष्य इसीजीवन में परमानंद की प्राप्ति कर अंत में परमात्मा की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर परम गति या परम धाम को प्राप्त कर लेता है

Thursday, 7 July 2016

In bhhagvadgeeta Bhagaban Krishan gave preaching to Arujuna only when he surrendered before jagadguru Krishna and said Sishyte aham shadhi mam Twam Prapannam, that is I am thy pupil preach me Isuurrender my self to thy fee And Shri Krishna throuhg Arjuna gave the knowledge Of Karmayoga, Gyanyoga and Bhaktiyoga to the entire world, Any one whether he is na European, African, or Asian, hindu or Muslim as itis not a Religious preaching, it is a Spiritual message.It does not prescrive any particular form of Worship it lays stress on Gyanyukta Bhakti pradhan Karma yoga.t
जन्म , कर्म , च मे ,दिव्यम ,एवं यः बेत्ति तत्त्वतः ! त्यक्त्वा देहम पुनर्जन्म नेति मामेति सो अर्जुन !४(९) भगवान का जन्म इसीलिए दिव्या होता है क्योंकि उनका जन्म साधारण मनुष्यों की तरह नहीं होता है !सामान्य मनुष्य भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जन्म लेने वाला मानते हैं ! और बो उनको ईश्वर के अवतार के रूप में ना मानकर महान योगी या महान पुरुष के रूप में मानते हैं !उनका कहना है कि ईश्वर का न जन्म होता है और न मृत्यु होती है !ईश्वर अजन्मा और अविनाशी है !किन्तु यहाँ भगवान स्वयं बता रहे हैं की अविविवेकी मूढ़ मनुष्य परमात्मा के संपूर्ण ब्रह्माण्ड के महान ईश्वर रूप परम भाव को ना जान ने के कारण मनुष्य देह धरी परमात्मा को मनुष्य केरूप में ही मानते हैं तथा मनुष्य रूप में प्रगट परमात्मा का अनदर करते हैं यद्द्पि परमात्मा अजन्मा है अविनाशी है और संपूर्ण ब्रह्माण्ड का महान ईश्वर है फिर भी वह संसार में दुष्ट मोहग्रस्त भोग और अनैतिक साधनो से संग्रह में लिप्त मनुष्यों को जो अपनी भोग लिप्सा और अवांछनीय कामनाओं की तृप्ति के लिए प्राणिमात्र को कष्ट देते हैं साधु सज्जन पुरुषों का जीवन दूभर कर देते हैं और बो किसी भी प्रकार से अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते है और प्राणिमात्र का जीवन नारकीय बना देते हैं तब ऐसे दुष्ट पापाचारी शक्ति संपन्न निशाचरों से जिनका नाश करना मानवीय शक्ति से संभव नहीं हो पाटा है तब समाज को मुक्त को मुक्त कराने के लिए और समाज को सुव्यबस्थित बनाने के लिए और प्राणियों को सह असितात्त्व अहिंसक सदाचार युक्त करुणा प्रधान जीवन जीने की कला का विकास करने के लिए भगवान अपनी प्रकृति को बस में करके प्रगट होते हैं !
में हिन्दू हूँ ,मुसलमान भी हूँ ,ईसाई भी हूँ ,बौद्ध --यहूदी --पारसी भेी हूँ ---संत विनोबा----- यह सामर्थ्य ,विचार और तदनुसार आचरण और जीवन जीने की कला और संस्कृति सिर्फ हिन्दू धर्म में ही है !फिर भी लोग हिन्दू धर्म और हिन्दुओं को गलिया देते हैं !हिन्दुओं ने कभी दूसरे धर्मों से धर्मांतरण नहीं कराया !और न ही हिन्दू साधु संतों और विचार शील हिन्दुओं ने कभी किसी दूसरे धर्म की अवमानना या निंदा की !हिन्दू धर्म से ही धर्मान्तरित होकर लोग ईसाई ,मुस्लमान और बौद्ध हुए !इसके बाद भी जो धर्मान्तरित होकर ईसाई हो गए बे ईसा की  सीख को नहीं मानते हैं  कि अपने दुश्मन से भी प्यार करो !जो  मुसलिम हो गए हैं !बे पैगम्बर मुहम्मद की सादगी ,सहनशीलता और भाई चारे पर ध्यान नहीं देते हैं !जो बौद्ध हो गए हैं बे बुद्ध की करुणा,प्रेम और त्याग को नहीं मानते हैं !ये तीनो हिन्दुओं से धर्मान्तरित हिन्दुओं को ही गलिया देते रहते हैं !और हिन्दुओं के धर्म से  परिवर्तित  कराने का षड्यंत्र अनेक प्रकारों से करते रहते हैं !इन लोगों ने हिन्दू धर्म को नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है !इन्ही के साथ कुछ हिन्दू भी शामिल हो जाते हैं !
            संत विनोबा ने हिन्दू धर्म की सर्व धर्म सम्भाव की इस प्राचीन परंपरा को अपने जीवन में उतारकर दीघर्काल तक अध्यन ,मनन ,चिंतन ,और प्रयोग कर संसार के भिन्न भिन्न धर्म ग्रंथों का सार निकाल कर प्रस्तुत किया !बे कहते थे कि मेरे जीवन के सभी काम दिलों को जोड़ने के एक मात्र उद्देश्य से प्रेरित हैं ! विनोबा जी कृत विविध धर्मग्रंथों और सन्त साहित्य के सार ग्रंथों में कुरान सार अपना विशेष महत्त्व रखता है !सामान्यतः कुरआन का सार यह कल्पना भी मुसलमानो के लिए सहज में स्वीकार नहीं हो सकती है !फिर भी मुसलमानों ने इस को प्रेम से स्वीकार किया था !मदीना और कराची  की किताबी दुनिया ने लिखा था ---- विनोबा जी की यह कृति जिसने रूहल कुरान का वेश परमात्मा की इक्छा से धारण किया है ,ना केवल इस्लाम की  अपितु दुनिया के इतिहास में एक स्मरणीय कृति कहलाएगी !इंशा अल्लाह -------- किताबी दुनिया ----२५ अगस्त १९६२ ! हिन्दुस्तान की भूमि पर विविध भाषायें एवं विविध धार्मिक विश्वास रखने वाले मनुष्यों के प्रचण्ड समुदाय को विनोबा जी ने कुरान की भेंट देकर जो कार्य पूर्ण किया है ,बे उसके लिए धन्य बाद के पात्र हैं !----करांची दिसम्बर १९६२!  मौलाना मसूदी ने कहा था -----२५ मौलवी १० साल बैठ करऔर दसों लाख खर्च करके भी जो काम नहीं कर पाते ऐसा यह कार्य हुआ है !कुरआन सार का अब तक मूल अरबी अरबी नागरी(हिंदी अनुबाद सहित ),उर्दू ,मराठी ,अंग्रेजी ,बंगाली ,गुजराती अदि विविध भाषाओँ में प्रकाशन हो चुका है ! विनोबा जी के कुरान के अध्यन का जब गांधीजी को पता चला तो बे प्रसन्न हुए और कहा कि ----- हम में से किसी को तो भी यह करना चाहिए था !विनोबा कर रहा है यह आनंद का विषय है !विनोबा जी ने अलफातिहा का मराठी में अनुबाद किया था जो सर्व धर्म प्रार्थना का अंग बन गया है !
मजहब  भिन्न भिन्न रूहानियत एक है -----अल्लाह को ना भूलना ,अल्लाह पर प्यार करना ,झूठ ना बोलना ,सच बोलना ----यह रूहानियत है ! रूहानियत सभी धर्मों में एक सी है !मजहब गलत हो सकते हैं ! .अलग ,अलग भी हो सकते हैं और अच्छे  और बुरे भीहो सकते हैं ! लेकिन रूहानियत गलत और बुरी नहीं हो सकती है  ! मजहब का मतलब है इंसान को रूहानियत की तरफ ले जाना ! लेकिन कुछ लोग रास्ता नहीं जानते हैं इसीलिए बे भटक जाते हैं !मजहब क्या करता है ?इंसान को अँधा समझ कर उसका हाथ पकड़ कर इधर चलो या उधर चलो ऐसे रास्ता बताता है ! यह गुरु है ,यह मुल्ला है इसके पीछे चलो ------- यह सब मजहब सिखाता है !रूहानियत एक दम रोशनी देती है !वह कहती है देखो तुम्हारे और अल्लाह के बीच में और कोई भी नहीं  है !मजहब कहता है ,अल्लाह के पास पहुंचना है तो बीच में कोई एजेंट चाहिए! !फिर चाहे वह पुरानी किताब हो या पुरानी मूर्ति  ! मंदिर में जाना हो  या मस्जिद में गुरु की बात सुनो या किताब की मजहब में किताब ,मंदिर मस्जिद यह सब आता है  !तो अल्लाह और इंसान के बीच पर्दा पड़ जाता है ! रूहानियत कहती है कि तेरा अल्लाह के साथ सीधा ताल्लुक है ,बीच में कोई एजेंट नहीं है  !मजहब और रूहानियत में यही प्रमुख भेद  हैं!

Wednesday, 6 July 2016

Narottam Swami Real DharmSambhv (Feeling or sense of Reverence and Respect for all Religions happens or takes place in purified hearts.Not in the speeches of verbose) Vinoba ji had attained and experienced it by penance and practice.His life work was to establish Unity of hearts.once he had said that God had sent him to work for the unity of hearts.Hence he wrote several Granths of Different religions to end Baad(dispute and division) Ruhal koran along with other books concerning Unity of all Religions is a shining example. He had studied language of Koran and spent 20 years to grasp the real meaning of Koran.When Ruhal Koran( Essence of Koran ) was published it was strongly criticized and condemed by Moulavis and Mullas of Pakistan.They had termed the publication of Ruhal Koran as an act of a Kafir.But when it was studied by Islamic Hafij and scholars they praised and commended it and said 20 Hafij could not do it as has been done by Vinoba jee

बहुत से स्त्री पुरुष भाग्य या परिश्थिति बस गलत रस्ते पर चले जाते हैं !किन्तु उनका अच्छाई का मूल स्वभाव उन गंदे कामों भी अच्छा बना रहता है !इसी प्रकार कुछ स्त्री पुरुष भाग्य या परिस्थिति के कारण जीवन में उच्च सम्मान पद पा जाते हैं ! किन्तु उनका मूल दुष्टता का स्वभाव का बदलता नहीं है !यहाँ जिन सेक्स वर्कर्स का उदाहरण दिया गया है ! जिन्होंने इस गंदे निकृष्ट धंधे में रहते हुए भी अपनी पुत्रियों को डॉक्टर इंजीनियर बना दिया ! यह इस बात का प्रमाण है ! कि उनका तन गन्दा हुआ ! किन्तु उनका मन हमेशा साफ़ स्वक्छ और सदाचार से युक्त रहा !हमारे धर्मग्रंथों में इस तरह के अनेकों उदहारण है ! जहाँ वैश्यायों ने वह परमगति प्राप्त की जोविवाहित महलाओं को भी प्राप्त नहीं हुई !रामचरित मानस की चौपाई इस तथ्य को प्रमाणित करती है !पायी ना केहि गति पतित पावन राम भज सुन शठ मना !गणिका अजामिल व्याध गीध अजादि खेल तारे घना !सोना नाली में गिरने के बाद भी सोना ही रहता है !और धूल स्वर्ण मुकुट पर चढ़ने के बाद भी धूल ही रहती है !व्यक्ति के चरित्र का आकलन उसके बाह्य कर्मों के साथ उसके आंतरिक भावों के साथ भी करना चाहिए !बल्कि आंतरिक भाव कर्म के स्थूल कर्म के स्वरुप की अपेक्छा अधिक महत्त्व पूर्ण होते हैं !
महाभारत का युद्ध द्वापर के संध्याकाळ में हुआ था ! अर्थात द्वापर का अंत होने वाला था और कलियुग का प्रारम्भ होने वाला था !भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के साथ ही कलियुग आगया था ! महाभारत काल आज जे युग से अधिक शक्ति संपन्न था !किन्तु वह शक्ति भौतिक पदार्थों के उपयोग और प्रयोग से निर्मित नहीं थी !वह शक्ति आत्मसाधना की शक्ति से प्राप्त थी !युधिस्ठर जब अपने भाईओं के साथ बनवास में थे तो उनके गुरु धौम्य ने सूर्य उपासना से उन्हें ताम्बे की बटलोई प्रदान करायी थी !जिसका पका हुआ भोजन तब तक ख़त्म नहीं होता था ! जब तक अंतिम भोजन करने वाले के रूप में द्रौपदी भोजन नहीं कर लेती थी !इसी प्रकार जब युधिस्ठर काम्यक बन में निवास कर रहे थे !तब उनको लोमश ऋषि का दर्शन हुआ था !और लोमश ऋषि ने उनको अनुस्मृति विद्या प्रदान की थी उस अनुस्मृति विद्या के प्रभाव से बे भूत भविष्य की सभी घटनाओं को प्रत्यक्छ देख लेते थे ! जब धृत राष्ट्र ने युधिस्ठर से युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या पुंछी तो युधिस्ठर ने धृतराष्ट्र को संपूर्ण मृत सैनिको की संख्या और गायब हुए सैनिकों की संख्या भी बता दी थी ! धृतराष्ट्र के प्रश्न के उत्तत में उन्होंने यह भी बता दिया था ! कि मृत्यु के बाद किस सैनिक को कौन सी गति प्राप्त हुई थी !यह आत्मशक्ति से प्राप्त अनुस्मृति विद्या का प्रताप था !महाभारत ग्रन्थ इस तरह की आत्मसाधना से प्राप्त शक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है !यह सिर्फ महाभारत युद्ध का वर्णन करने वाला मात्र कथानक ही नहीं है !इसमें अत्यंत गूढ आध्यात्मिक रहस्यों का भी वर्णन हुआ है !और इस ग्रन्थ में ८८०० ऐसे गूढ श्लोक हैं जिनका अर्थ सिर्फ व्यासदेव या सुखदेव ही जानते है !आत्मशक्ति के लिए जिस सत्त्व संशुद्धि की आवश्यकता है उसका ज्ञान कराने वाला गीता शाश्त्र भी महाभारत में ही है !

Tuesday, 5 July 2016

बर्तमान काल में सम्भ्रान्त शव्द अब धनबान या पद प्रतिष्ठा का सूचक नहीं रह गया है !क्योँकि अब तो नेता मंत्री बड़े बड़े अधिकारी भी घोटालों, रिश्वत और कमीशन, हत्या, बलात्कार आय से अधिक संपत्ति के मामलों में जेल जा रहे हैं ! और सजा भी खा रहे हैं !अब पद पैसा या प्रतिष्ठा सम्भ्रान्त होने के लिए पर्याप्त नहीं है !जो लड़के लड़कियां ऊँचे होटलों में सेक्स रैकेट या नशाखोरी या रेव पार्टियों में पकडे जाते हैं !बे इन्ही तथाकथित सम्भ्रान्त लोगों की संताने होते हैं !आज सही मायने में संभ्रांत वह व्यक्ति है !जो अपने कर्त्तव्य कर्मों का निर्बहन बिना किसी लोभ लालच के कर रहा है ! !बाकी के संभ्रांत कहलाने वाले लोग सिर्फ गलत अर्थों में सम्भ्रान्त है !बे वास्तव में उद्भ्रान्त है सम्भ्रान्त नहीं हैं !
सत्या ग्रह का जन्म ------11सितम्बर १९०६ में एशियाटिक बिल (खूनी कानून )के विरोध में ट्रांसवाल में यहूदियों की नाटकशाला में सभा हुई ! उसमें गांधीजी ने प्रस्ताव पेश किया -----इस बिल के विरोध में सारे उपाय किये जाने के बाद भी यदि यह धारासभा में पास ही हो जाय तो हिन्दुस्तानी उसमें हार ना माने !हार ना मानने के फलस्वरूप जो दुःख भोगने पड़ें उन सबको बहादुरी से सहन करें !इस प्रस्ताव के समर्थन में सभी ने तीखे और जोशीले भाषण दिए !गांधी जी ने कहा कि आज तक हम लोगों ने जो प्रस्ताव जिस रीति से पास किये हैं !उन प्रस्तावों में और इस प्रस्ताव में बहुत बड़ा भेद है! क्योंकि इसके संपूर्ण अमल पर साउथ अफ्रीका में हमारी हस्ती का आधार है !हम सब एक ही ईश्वर में विश्वाश करते हैं !भले ही उसके नाम अनेक हों किन्तु उसका स्वरुप एक ही है !उस ईश्वर को साकछी रख कर हम प्रतिज्ञा करें या कसम खायें तो यह मामूली बात नहीं है !ऐसी कसम खाकर यदि हम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे ना रहें तो हम कौम के और संसार तथा ईश्वर के अपराधी बनेंगे !इस बिल का विरोध करने में हमें बहुत कष्ट भी उठाने पड़ सकते हैं ! संभव है कि हमें जेल जाना पड़े और अपमान सहने पड़ें! जेल में हमें भूख ठण्ड और धुप का कष्ट भी झेलना पड़ सकता है !कड़ी मेहनत भी करने पड़ सकती हैं !जेल में हमें जेलर की मार भी खानी पड़ सकती हैं !हम पर जुर्माना भी हो सकता है और हमारी संपत्ति भी जब्त हो सकती है !भूखों मरते और जेल के कष्ट भोगते हुए कुछ लोग बीमार भी पड़ सकते हैं और मर भी सकते हैं !इसीलिए ऐसा मानकर ही हम कसम खायें !गांधी जी ने कहा अगर मुझ से कोई पूंछे की इस लड़ाई का अंत क्या होगा ?और कब होगा ?तो में कह सकता हूँ ,की यदि सारी कॉम प्रतिज्ञा का पालन करे तो लड़ाई का फैसला तुरत हो जायेगा !यदि हम में से बहुत लोग कष्टों से डरकर फिसल जायें  और प्रतिज्ञा भंग कर दें तो यह लड़ाई लम्बी चलेगी !फिर भी में निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि जबतक मुट्ठी  भर लोग भी अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहेंगे तब तक हमारी इस लड़ाई का एक ही अंत आएगा कि हम इस लड़ाई में निश्चित विजय प्राप्त करेंगे !अब मै अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बता देना चाहता हूँ !मान लीजिये ऐसी स्थिति आजायेकि  सारे लोग अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दें और मै अकेला ही रह जाऊँ तब भी मेरा विश्वास है कि में अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं करूँगा !हम मेसे कोई यह नहीं जानता था  कि इस निश्चय को या आंदोलन को क्या नाम दिया जाय  ?!उस समय मेने इस आंदोलन को पेसिव रेसिस्टेंस नाम दिया था !इसिलए जो कोई इस संग्राम के लिए उत्तम शव्द खोज निकाले इसके लिए मेने इंडियन ओपिनियन में एक छोटे से इनाम की घोषणा की थी !श्री मगन लाल गांधी ने सदाग्रह नाम भेजा!यह नाम मुझे पसंद आया परन्तु जिस तत्त्व का समावेश में इस सुझाएँ हुए नाम में समावेश करना चाहता था वह इसमें नहीं आया था !इसलिए मेने इसमें द के स्थान पर त और या जोड़ दिया और इसका नाम सत्याग्रह बना दिया  !सत्य के भीतर शांति का समावेश मानकर और किसी भी वस्तु का आग्रह करने से उसमें बल उत्पन्न होता है ! इसीलिए आग्रह में  बल का समावेश करके मेने भारतीयों के इस आंदोलन को सत्याग्रह ------ अर्थात सत्य और शांति से उत्पन्न होने वाला बल ---- का नाम दिया !इस प्रकार जो तत्त्व सत्याग्रह के नाम से पहचाने जाने लगा उसका जन्म हुआ !

Sunday, 3 July 2016

कल्याण  पत्रिका अपने जन्म से ही वैदिक धर्म और अध्यात्म का शुद्ध और श्रेष्ठ तथा तत्त्व निष्ठ  स्वरुप प्रस्तुत करती रही है !और आज भी ढोंगी  सन्यासी ,योगी और संत तथा  भोगी ,स्वादू और साधुओं  की भीड़ में उज्जवल संत परंपरा का अनुसरण कर रही है !महान वैरागी प्राचीन और आधुनिक  संतों के उत्कृष्ट आख्यान कल्याण में प्रकाशित होते हैं !और बे अत्यन्त अल्प मूल्य में संसार के सभी धर्म प्रिय लोगों को प्राप्त कराये जाते हैं !  धर्म का चोला पहन कर भोग विलास करने का दण्ड भगवान् द्वारा कर्म फल भोग से विभिन्न योनियों में जन्म लेने से होता है !जो भगवान के साथ धोखा धड़ी करते हैं !बे वैदिक धर्म के विधान के अनुसार अधोगति कोप्राप्त कर कीड़े ,मकोड़े की योनि प्राप्त करते हैं !और रौरव नर्क में गिरते हैं !ऐसी ही एक घटना कल्याण में प्रकाशित हुई थी !एक मेढक एक छोटे कुए में रहता था !उसके शरीर का आकार बढ़ जाने के कारण वह कुएं में फस गया !जिस से पानी लेने वालों को कुए से पानी प्राप्त होना बंद हो गया !एक व्यक्ति प्रतिदिन मेढक की पीठ को बाल्टी से मार् कर घायल कर देता था मेढक नई इसव्यक्ति की दुष्ट ता से पीड़ित हो कर भगवान् का स्मरण किया !मेढक की आर्त पुकार सुनकर भगवान प्रगट हुए !उन्होंने मेढक से पूंछा की बताओ तुमको चोट पहुँचाने वाले व्यक्ति कोक्या दण्ड दिया जाय ? मेढक ने कहा प्रभु आप इसको किसी बढे प्रतिष्ठित धार्मिक श्रद्धा के केंद्र मठ का महंत बना दें !भगवान् ने कहा तुम तो  इस दुष्ट व्यक्ति को वरदान दे रहो !यह व्यक्ति महंत बनेगा तो यह लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा !लाखों लोग इसके चरणों का स्पर्श करेंगे !इसके अनुयायी ,और शिष्य ,नेता ,अभिनेता ,धन्ना सेठ और सुन्दर युवतियां होंगी !मेढक ने कहा प्रभु में भी पिछले जन्म में ऐसा ही सम्मान और श्रद्धा प्राप्त महंत था !मेने योग और तपस्या ,इंद्रिय संयम आदि के स्थान पर गृहस्थों से ज्यादा भोग किया और संत ,महंत के आध्यात्मिक आदर्शों का पालन नहीं किया !उनको दूषित किया !परिणाम स्वरुप मुझे मेढक का जन्म मिला !और अभी ना जाने कितनी अधम कूकर सूकर की योनियों से  गुजरना पड़ेगा !इसीलिए इस व्यक्ति में बरदान नहीं देरहा हूँ !इसको अनन्त जन्मों तक इस दुष्टता के लिए दण्ड दे रहाहूँ !इन भोगी और ढोंगी संतों .महंतों को दण्ड ईश्वरीय विधान के अनुसार अवश्य प्राप्त होगा ! वैदिक धर्म ग्रंथों में कहा गया है !ढोंगी संत ,महंतों का जन्म कूकर ,सूकर की योनियों में होता है !
दो पक्छों के मध्य वाद विवाद में समचित्त रहना तटस्थस्ता कहलाती है! काम जय वासनाछीन होने से सधता है !स्वामी विवेकानंद का नाम विदिविशाननद था ! जिसका अर्थ होता है जो अभी मार्ग में है ! और मंजिल पर नहीं पहुंचा है !विवेकानंद नाम उनको खेत्री के राजा ने दिया था ! जो उनका परमभक्त था ! काम वासना को जीतने के लिए उसका प्रतिरोधी भाव विकसित करना पड़ता है !और उसको शत्रु के सद्र्स्य समझना पड़ता है !अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया था ! कि मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती पकडे हुए की तरह किस से प्रेरित होकर पाप कर्म करता है ३(३६) !भगवान श्री कृष्णा ने कहा था काम ही पाप का कारण है ! इसकी कभी तृप्ति नहीं होती है ! यही महापापी है ! इसको ही तू अपना दुश्मन समझ ३(३७) ! यह काम इन्द्रियों मन बुद्धि में रहता है ! और यह काम इन्ही के द्वारा विवेक बुद्धि को ढक कर मोहित कर विवेक बुद्धि अर्थात अच्छी बुरे के भेद को समझने की शक्ति का नाश कर देता है ३(४०) इसीलिए सन्यासियों, संतो को इन्द्रियों को बस में करके इस ज्ञान और विज्ञानं के नाश करने वाले महान पापी काम को ज्ञान पूर्वक की गयी साधना और सावधानी से मारना पड़ता है !सभी श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वालों को इस साधना से गुजरना पड़ता है !स्वामी विवेकानंद को भी इस कामजय की साधना से गुजरना पड़ा था
यज्ञार्थ कर्मणो अन्यत्र लोकोअयम् कर्मबन्धनः ! तदर्थम कर्म कौन्तेय मुक्त संगह समाचर !३(९)यज्ञ को भ्रम वश कुछ लोगों ने सिर्फ घी , हवन सामग्री आदि को प्रज्वलित अग्नि में मन्त्रों के द्वारा आहुति देने तक ही सीमित कर दिया है !और यज्ञ को मात्र भौतिक मनोवांछित बस्तुओं की प्राप्ति का स्वार्थ युक्त साधन बना दिया है !महाभारत में व्यासदेव ने कहा है कि शराब आसव मछली तथा तिल चावल की खिचड़ी इन सब वस्तुओं को धूर्तों ने यज्ञ में प्रचलित किया है! वेदों में इनका विधान नहीं है !जो यज्ञ कर्ता यज्ञ के वास्तविक अर्थ को जानते हैं बे यज्ञों में परम शक्ति का ही विधि विधान से आवाहन करते हैं !शुद्ध आचार विचार वाले महान सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध वासना से फल खीर आदि ही प्रसाद रूप में परमात्मा को अर्पित करते हैं !आजकल भी यज्ञ का विकृत स्वरुप देखने में आता है !इन तथाकथित यज्ञों के माध्यम से स्वार्थनिष्ठ यज्ञ करने वाले अनेक प्रकार से परमशक्ति का अनादर करते देखे जाते हैं !इसीलिए यज्ञ के अनुष्ठान में विपरीत फल भी देखने को मिलते हैं !कई यज्ञों में विधि विधान का यथोचित पालन न करने से श्रद्धालुओं की मौत भी हो जाती है !यज्ञ करने वालों ने यज्ञ को मजाक बना दिया है ! और यज्ञ का लोकहितकारी स्वरुप नष्ट कर दिया है ! यहाँ योग का वास्तविक अर्थ और मर्म बताया गया है !यज्ञ से अत्यंत उदात्त लोकहित कारी बृत्ति का उदय होता है ! और स्वार्थ निष्ठा नष्ट होती है !यज्ञ का वास्तविक अर्थ कर्तव्य कर्मों का अनासक्त भाव से निर्बहन करना है !कर्तव्य कर्मों के करने से लोकव्यबस्था सुचार रूप से चलती है !किन्तु कर्तव्य कर्म जब निष्काम भाव से फलेक्छा के त्याग के साथ किये जाते हैं ! तब कर्त्तव्य पालन करने वाले व्यक्ति को अद्भुत आंतरिक आत्मशांति की प्राप्ति होती है ! और उसकी कार्य छमता में भी आश्चर्यजनक विकास होता है !और उसको जन्म मरण से मुक्ति का उपाय भी सुलभता से प्राप्त हो जाता है !संसार में कुछ भी स्थिर स्थायी नहीं है ! सब कुछ विनाश की और जा रहा है !जिस शरीर से कर्तव्य कर्मों का निर्वहन किया जा रहा है वह भी हर दिन मृत्यु की और जा रहा है !यह बात उसके चित्त में स्थान लेने लगती है !इसीलिए निष्कर्ष रूप में यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि --(१)संसार में शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है !(२)मुझे कुछ भी नहीं चाहिए !(३)मुझे सिर्फ अपने ही शरीर के पोषण के लिए कुछ भी नहीं करना है !मेरे प्रत्येक कर्म का अधिष्ठान संपूर्ण प्राणियों का हित और कल्याण है !यज्ञ (कर्त्तव्य पालन )के लिए किये जाने वाले कर्मो से अन्यत्र (अपने स्वार्थ के लिए किये जाने वाले )कर्मों में लगा हुआ मनुष्य समुदाय कर्मो से आसक्ति मोह स्वार्थ आदि बंधनो से बंधकर अपनी आत्मशांति को नष्ट करता है ! लोकव्यबस्था को बिगाड़ता है !और समाज के लिया महान हानिकर सिद्ध होता है !इसिलए कहा गया है कि मनुष्य समुदाय को आसक्ति रहित होका यज्ञ अर्थात कर्तव्य पालन करना चाहिए !जिस से भोग और योग दोनों की प्राप्ति होतीहै
Narottam Swami Meraj Hussain All of us have not read or understand what is enshrined in Koran. But every one of us are looking with naked eyes this ghastly murders of Non musalims.You aor anybody can not pacify and satisfy the feelings of the members of bereaved families who have lost the lives of their kins and most dear ones because they could not recite Ayaten of Koran This discrimination and differentiation in musalims and nonmusalims which became the cause of murders can not be explained without placing responsibility on these terrorists who are Musalim by name ,fame and birth

Saturday, 2 July 2016

भले ही इस्लाम शांति ,सद्भाव और भाई चारे की शिक्छा देता हो !किन्तु व्योहार में यह अत्यन्त क्रूर ,हिंसक और बेगुनाहों की निर्मम हत्या करने वाल सिद्ध हो रहा है ! यह रमजान का महीना चल रहा है !इसे इस्लाम में बहुत पवित्र और अल्लाह की इनायतेँ प्रदान करने वाला बताया गया है !किन्तु इस महीने में भी बांग्लादेश में निर्दोष लोगों की हत्या इसीलिए की जा रही है क्योंकि बे मुसलमान नहीं है !बंगला देश मुसलिम  देश है ! इसीलिए वहां आए दिन हिन्दुओं की हत्याओं के समाचार आते रहते हैं !किन्तु जो मुसलिम आबादी वाले देश नहीं हैं !वहां भी जहाँ मुसलिम संख्या में अधिक हैं !इस प्रकार की नृशंश हत्याओं के समाचार प्रकाशित होते रहते हैं !आखिर यह क़त्ल करने का जज्बा इन इस्लामिक आतंक वादियों को कहाँ से और कैसे प्राप्त होता है ?बेअपनी  जान की बाजी लगाकर भी इन हत्यायों को कर देते हैं !ये इस्लामिक हत्यारे मानव  बम बनकर खुद को भी उड़ा  देते हैं !निर्दोष लोगों की हत्या करते समय ये कुरान की आयतें और अल्ला हु अकबर के नारे लगाते   है !, इस्लाम को सारे जहां का  धर्म घोसित और इस्लाम की सत्ता स्थापित करने के लिए ये हत्याएं की जा रहीं है

Friday, 1 July 2016

सॉउथ अफ्रीका में गांधी जी का जुलाई १९०५ से अक्टूबर १९०६ तक का जीवन बिरतांत    ---- यह समय गांधी जी के व्यक्तिगत जीवन और सॉउथ अफ्रीका के भारतीय समाज में महत्त्व पूर्ण परिवर्तन का था !गांधी जी अभी भी जोहानिस बर्ग में  वकालत कर रहे थे फिर भी उनके द्वारा स्थापित फिनिक्स आश्रम सहयोगियों के लिए घर बन गया था ! जोहानिस बर्ग में उनका पारिवारिक जीवन अब स्थिर हो गया था ! भोजन के बाद रात को बे तथा अन्य सदस्य धार्मिक अध्यन और दार्शनिक चर्चा करते थे ! उनकी वकालत सत्य निष्ठां पर आधारित थी और अच्छी चल रही थी ! जीवन में सादगी के साथ संयम और शारीरिक श्रम पर जोर बढ़ गया था ! घर से दफ्तर तक का ९ किलोमीटर का फासला बे आते जाते पैदल ही तय करते थे !उनके आहार सम्बन्धी प्रयोग भी चल रहे थे ! बड़े भाई लकछमी दास को उन्होंने २७ मई १९०६ को पत्र में लिखा था कि जो कुछ भी मेरा है वह अब मेरा नहीं है ! वह सब लोक सेवा में लगाया जा रहा है ! मुझे किसी भी प्रकार के दुनिया के सुख भोग की बिलकुल इक्छा नहीं है !सार्वजानिक कार्यकर्ता के जीवन में ब्रह्मचर्य की आवश्यकता पर उनका विश्वास अधिकाधिक बढ़ता जा रहा था !गांधी जी ने लिखा ---- मेरे मन में विचार उदित हुआ कि यदि में समाज सेवा में संलग्न होना चाहता हूँ तो मुझे धन और संतान की इक्छा छोड़ देनी चाहिए (आत्मकथा भाग ३ अध्याय ७) ! उन्होंने जीवन के ३७ बें वर्ष में आजन्म ब्रह्म चर्य का ब्रत ले लियाथा !अंततः उन्हें ११ सितम्बर १९०६ को सार्वजानिक सभा में ब्रह्मचर्य ब्रत की शक्ति का साकछात कार हुआ जब उन्होंने खूनी कानून के सामने ना झुकने के कारण मिलने वाले  दण्ड को अहिंसक ढंग से झेलने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया !उसी दिन उस सिद्धांत का जन्म हुआ जो बाद में सत्याग्रह कहलाया ! गांधी जी ने बार बार ब्रिटिश भारतीय संघ केमाध्यम से ट्रांसवाल के भारतीय समाज की समस्याओं को लेकर जोरदार ढंग से अपने पत्र इंडियन ओपीनियन के द्वारा प्रस्तुत की !साउथ अफ्रीका में जो भारतीयों को अपमानित करने वाले मसले थे उन को लगातार गांधी जी उठाते रहे !गांधी जी भारतीयों के साथ बरती जाने वाली रंग भेद की नीति  के विरुद्ध आंदोलन चलाने के अतिरिक्त उनका रचनात्मक मार्ग दर्शन भी करते थे ! भारत की घटनाओं से भी बे घनिष्ठ संपर्क बनाये रहे !उन्होंने बंग भंग आंदोलन के तीब्र होने पर संयुक्त विरोध और अंग्रेजी माल के बहिस्कार का आवाहन किया !स्वदेशी आंदोलन की प्रगति पर प्रसन्नता व्यक्त की और साम्प्रदायिक एकता पर जोर दिया !उन्होंने वन्दे मातरम् को भारत का राष्ट्र गीत और देश को एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने के लिए हिन्दुस्तानी को राष्ट्र भाषा स्वीकार करने की सलाह दी !
स एवायं मया ते अद्द्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोअसि में सखा चेति रहस्यम हि एतत उत्तमम् !४(३) भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्मयोग की अनादि परम्परा बता रहे हैं ! जो विद्यायें कर्म का सम्पादन करती हैं ! उन्ही के फल दिखाई देते हैं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म का फल हीं प्रत्यक्छ देखने में आता है ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पीकर हीं शांत होता है ! उसे जानकार नहीं ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो कर्म से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सूर्य देव आलस्य त्याग कर कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं ! इसीलिए जीवन के सभी छेत्रों में मनुष्यों के लिए कर्म करने की प्रधानता है ! यदि कोई व्यक्ति सन्यासी हो गया है तो उसे भी अपने जीवन में भोग वासनाएं और कामनाओं को नष्ट करने के लिए साधनाएं करनी पड़ती हैं ! और ये साधनाएं ही उसका जीवन का प्रधान कर्म बन जाती हैं ! यदि सन्यासी वासनाओं और कामनाओं का नाश नहीं करता है ! और सिर्फ सन्यासी का वेश धारण कर लेता है तो वह बस्तवीक सन्यासी नहीं है ! उसी प्रकार कर्म की आवश्यकता आत्मज्ञानी को भी है ! कर्मके बिना कोई भी व्यक्ति एक छन भी नहीं रह सकता है ! और ना हीं उस व्यक्ति का जीवन चल सकता है ! इसीलिए किसी भी स्थिति में कर्मका त्याग संभव नहीं है ! हाँ कर्म को मोक्ष के लिए भी !और संसार में रहने के लिए भी ! और संसार को व्यबस्थित रूप से चलाने के लिए भी कर्म को तदनुसार आचरणमे सतत उतारने की आवश्यकता है ! और कर्म को सतत आचरण में उतारने की विधि गीता बताती है ! कि सभी कर्म अनासक्त भाव से राग द्वेष से मुक्त होकर सुख दुःख से ऊपर उठकर हानि लाभ की चिंता न कर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन की दृष्टि से किये जाते हैं ! वही कर्म समाज को व्यबस्थित करते हैं ! और मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं ! और कर्म बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष प्रद हो जाते हैं ! इसी अनादि कर्म परंपरा का उपदेश गीता में दिया गया है
आज मेरे जीवन के ७६ साल पुरे हो गए !यद्द्पि मेरा जन्म दिन १६ जुलाई को पड़ताहै !किन्तु स्कूल में दाखिले के समय १ तारीख लिखा दी गयी !इसीलिए यही मेरा जन्म दिन हो गया है !विज्ञानं ने फेस बुक की रचना कर मित्रता का ऐसा स्वरुप निर्मित कर दिया है !कि  हम एक दूसरे को ना जानते हुए भी मित्र हो गए हैं !में अपने फेस बुक मित्रों के साथ कुछ अपने बारे में जानकारी साझा करना चाहता हूँ !मै एक अत्यन्त साधारण व्यक्ति हूँ !अब में उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ मेरी  संसार  से मान सम्मान ,पद ,प्रतिष्ठा आदि की सारी आशाएं और  चाहतें समाप्त हो गयी है ! इस समय में मेरे तीन पेजेज गांधी  द चेरिजमा,गीता ह्यूमन स्पिरिट और गीता दी ह्यूमन स्पिरिट ब्लॉग हैं !इन पर में अपने विचार पोस्ट करता रहता हूँ!जो विचार में इंग्लिश में पोस्ट करता हूँ बे भारत के बाहर अमेरिका ,लंदन   जर्मनी ,फ्रांस अदि देशों में भी पसंद किये जाते हैं 1पकिस्तान बांग्लादेश अदि देशों से भी प्रतिक्रियें आती हैं !में किसी भी राजनैतिक दल क सदस्य नहीं हूँ !सामयिक विषयों पर मेरे विचार मीडिया में प्रसारित समाचारों के आधार पर होते हैं !इसीलिए प्रकाशित समाचारों के आधार पर बे गलत या सही हो सकते हैं !मेरे दिल दिमाग में सिर्फ सत्य और अहिंसा के प्रति आग्रह है !१९७५ तक में राजनीति में सक्रिय था !छात्र जीवन से ही में जयप्रकाश नारायण और लोहिया से प्रभावित था !इसीलिए जब जयप्रकाश नरायन ने आंदोलन प्रारम्भ किया तो में उस समय शहर कांग्रेस में महा मंत्री था उस से मेने त्याग पत्र दे दिया और आंदोलन में सम्मिलित हो गया !जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के समर्थन में जो जन संघर्ष समिति बनी थी उसका में जिलाध्यक्छ था !इसिलए २५ जून १९७५ में जब  आपातकाल घोसित हुआ ! तब में भी गिरफ्तार हुआ और 
 लम्बे समय जेल में रहा !जेलमें ही मेने गांधीजी और गीता ,महाभारत का गम्भीर अध्यन किया ! फरबरी १९७७ में जनता पार्टी की सरकार ने मेरे विरुद्ध मुकदद्मा वापिस लेकर मुझे दोष मुक्त कर दिया !मेरे जीवन में अब तक यही एक राजद्रोह का झूठा मुकदमा दर्ज हुआ !और इस,में मुझे बहुत लबे समय तक जेल में रहना पड़ा था !समाजवादी सरकार ने उन सभी लोगों को लोक तंत्र सेनानी घोसित किया है जो आपात काल में लोकतंत्र बहाली  के लिए जेल में बंद रहे थे!   !जिले में लोकतंत्र सेनानियों की जो समिति है उसका में अध्यक्छ हूँ !इस समय में गांधी विचार की संस्थाओं सेजुड़ा हुआ हूँ ! तथा महाभारत और गीता मेरे प्रेरणा श्रोत और मार्ग दर्शक हैं !में सभी फेस बुक मित्रों का हार्दिक आभार प्रगट करता हूँ जिन्होंने मुझे जन्म दिन की बधाई देकर मेरा उत्साह वर्धन किया है !
इमं विवस्ते योगम प्रोक्तवान् अहम अव्ययम् ,विवस्वान मनुबे प्राह ,मनुः इकछाब बे ब्रबीत ४(१) आजकल जिस योग का प्रचार बहुत जोर शोर से किया जा रहा है! वह वास्तव में पूर्ण योग नहीं है !आसन प्राणायाम आदि बहिरंग योग है ! इनके करने से रोगों की निवृत्ति होती है ,शरीर स्वस्थ होता है !किन्तु चित्त की शुद्धि और भोग बृत्ति का नाश नहीं होता है !जब तक व्यक्ति की जीवनचर्या और आचरण में अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का प्रवेश नहीं होता है ! तब तक उसकी जीवन यात्रा पूर्ण योग की और प्रस्थान नहीं करती है !जब तक मनुष्य के अंतःकरण में भोगों की कामना और भौतिक पदार्थों की सत्ता महत्ता है! और अपने कर्मों से अपने यश कीर्ति मान आदि प्राप्त करने की इक्छा आकांछा है तब तक वह कामना जनित संकल्पों का त्याग नहीं कर सकता है ! और कामना जनित संकल्पो का त्याग किये बिना वह ज्ञान योगी, ध्यानयोगी, हठयोगी ,कर्मयोगी ,भक्ति योगी ,आदि कोई सा भी योगी नहीं हो सकता है ! वह वास्तव में योगी के भेष में भोगी ही होता है !इसलिए वर्तमान समय में योग भी भौतिक भोगों की प्राप्ति का बहुत बड़ा साधन बन गया है !लोगों ने योग की दुकाने खोल ली है !और १०, ५ योगासन प्राणायाम कराकर अकूत धन संपत्ति प्रतिष्ठा आदि प्राप्त कर रहे हैं !इन तथाकथित योग के व्योपरियों में सत्य अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का नाम निशान भी नहीं दिखाई देता है !ये तथाकथित योगी बड़ी बड़ी कारों में घूमते हैं !बहुत विलासता युक्त जीवन जीते हैं !इनके अधिकाँश चेले चपाटे अनियमित कामजनित भोगविलास युक्त जीवन जीने के कारणरुग्ण और अनैतिक उपायों से धन संग्रह के कारण व्यथित चित्त होते हैं ! ये ही इनके चेले इनको अनीति से उपार्जित धन आदि देते हैं ! यहाँ भगवान श्री कृष्ण जिस अविनाशी योग का उपदेश कर रहे हैं !वह निष्काम कर्मयोग है !निष्काम कर्म योग का साक्छात उदहारण सूर्य है !जिसके उदय होते ही अन्धकार का नाश हो जाता है !और प्राणिमात्र में जीवन का संचार होजाता है !किन्तु सूर्यसब कुछ देता है किन्तु अपनी सेवाओं के बदले कुछ भी नहीं लेता है !निर्लिप्त भाव से बिना किसी भेद भाव के सभी को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करता है !सर्वप्रथम निश्वार्थ सेवा का ज्ञान परमात्मा से सूर्य को प्राप्त हुआ !फिर सूर्य से मनु को प्राप्त हुआ !और मनु से इकछाबाकु आदि राजऋषिओं को प्राप्त हुआ !!इस प्रकार यह निश्वार्थ निष्काम कर्मयोग की परम्परा प्रारम्भ हुई ! जैसे धूल का एक कण भी पृथ्वी का ही अंश होता है !उसीप्रकार श्रष्टि का प्रत्येक प्राणी इस विशाल ब्रह्माण्ड का ही एक अंग है !इसी भाव से जो लोग अपना जीवन यापन करते हैं !और प्राणिमात्र की सेवा में अपनी संपूर्ण सामर्थ्य और साधन सामग्री तथा शरीर को लगा देते हैं बे ही सच्चे योगी होते हैं !उनकि दृष्टि मेँ सब मेँ बे और सब उनमे होते हैं !इसीलिए उनके जीवन में भोग को भोगने की अवांछित कामना का नाश हो जाता है अनैतिक भौतिक पदार्थों केसंग्रह की इक्छा का भी अभाव हो जाता है !उनकी मन बुद्धि चित्त की संपूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्र की सेवा में अर्पित हो जाती हैं !यह अविनाशी योग है जिसकी सिद्धि निष्काम कर्म से होती है !इसी को निष्काम कर्मयोग कहते हैं !और सूर्य इसका ज्वलंत उदाहरण है !