आज प्रकृति संरक्छण दिवस है !यह दिवस बनबिभाग के अतिरिक्त कुछ भासण विशारद
लोग भी मनाते हैं !किन्तु ये दोनों ही प्रकृति संरक्छण का काम ठीक से नहीं
करते हैं !बनविभाग तो जंगल का विनाश अपने संरक्छण में कराता है !और
ब्रक्छा रोपण के लिए जो सरकारी बजट आता है ! उसका भी नाममात्र का उपयोग
ब्रक्छा रोपण के लिए किया जाता है !और जो ब्रक्छा रोपण किया भी जाता है !
उन पोधोँ की भी देख भाल नहीं की जाती है !अगर प्रतिवर्ष ब्रक्छा रोपित
किये गए सरकारी आंकड़ों को देखा जाय ! तो अबतक सरकारी आंकड़ों के
अनुसार अबतक इतने ब्रक्छ अब तक रोपित कर दिए गए हैं ! कि भारत में तिल
भर भी भूमि बिना ब्रक्छों के नहीं बचती !जितने भी फलदार और सागौन शीशम आदि
के ब्रक्छ थे उनका सर्व बिनाश बन विभाग के द्ववारा रिश्वत खोरी और
राजनेताओं के हितार्थ किया गया है !जो भासण विशारद नेता हैं ! और जिनमे
अधिकाँश चुने हुए प्रतिनिधि और मंत्री आदि भी है ! बे भी प्रकृति के विनाश
में संलग्न है !प्रकृति का विनाश अनेक रूपों और स्वरूपों में इन तथाकथित बन
रक्छको के द्वारा किया जा रहा है !पृथवी से खनिज पदार्थ और नदियों से
बालू और नदियों में शीवर लाइन और कारखानो का गन्दा पानी छोड़ कर उनको
प्रदूषित करने का काम भी ये अधिकारी और राजनेता ही कर रहे हैं ! और करवा
रहे हैं ! !इन प्रकृति विध्वंसक लोगों के प्रभाव से मुक्त और प्रकृति
संरक्छण के भाव से युक्त और प्रकृति संरक्छण जीव मात्र के असित्तत्त्व के
लिए आवश्यक समझ कर कुछ समाज सेवी व्यक्ति निश्वार्थ भाव से प्रकृति संरक्छण
में लगे हुए हैं !कुछ समाज सेवायिओं ने बृक्छ काटने के विरोध में चिपको
आंदोलन चलाया ! और इसके लिए अपने जीवन को भी दाव पर लगा दिया !कुछ लोग
ब्रक्छा रोपण के कार्य में लगे हुए हैं !कुछ व्यक्ति पृथ्वी के संरक्छण के
लिए लगातार काम कर रहे हैं ! और कुछ लोग नदियों को पुनर जीवन देने तथा
गंदगी मुक्त कार्यों में लग कर काम कर रहे हैं !जिन पर प्रकृति संरक्छण का
वैधानिक दायित्त्व है ! बे अपने कर्त्तव्य का अगर निष्ठां पूर्वक निर्वहन
करें ! और इन समाज सेवायिओं से तालमेल कर इनके कार्यों को बढ़ावा दें !तो
प्रकृति संरक्छण का कार्य तेजी से और व्यबस्थित रूप से हो सकता है !यह
शर्रीर भी एक ब्रक्छ के समान है !ज्ञान इसकी जड़ है ! बुद्धि इसका तना है !
अहंकार इसकी शाखाएं है ! इन्द्रियां इसके खोखले हैं ! और यह पृथ्वी आकाश
जल अग्नि और वायु पांच तत्त्वों से निर्मित है ! शरीरों के अनगिनित भेद ही
इसकी टहनियां हैं ! इसमें सदा ही कामनाओं और वासनाओं केसंकलप रूपी पत्ते
उगते रहते हैं ! और कर्म रूपी फूल खिलते रहते हैं ! इस शरीर से पाप पुण्य
रूपी कर्मों से इसको सुख दुःखादि इसमें सदा लगे रहने वाले फल हैं ! इसका
बीज परमात्मा है ! यह शरीर ही समस्त प्राणियों का आधार है ! जो इसके
तत्त्व को भली प्रकार जान कर ज्ञान रूपी उत्तम तलवार से इस में होने वाले
स्वार्थों और वासनाजनित संकल्पों और कार्यों को काट डालता है ! वह प्रकृति
का संरक्छण प्राणिमात्र के समस्त शरीरों के प्राणो के लिए निश्वार्थ भाव
से करता है ! क्योँकि प्रकृति के संरक्छण के अधीन ही समस्त प्राणियों का
जीवन है !प्राकृतिक संसाधनो का विनाश पृथ्वी से समस्त प्राणियों का
असितत्त्व समाप्त कर देगा !इसलिए प्रकृति के विनाश का कार्य प्राणियों से
समस्त प्राणियों केविनाश का कार्य है यह समझ कर प्रकृति विनाश का कार्य बंद
कर देता है
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