जागते सभी हैं किन्तु देखते अलग अलग तरह से हैं ------------ जागना भी अनेक प्रकार का होता है !नींद से जागना ,विश्वासघात से चोट खाकरजागना ,शिक्छण से ज्ञान प्राप्त कर जागना ,भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए जागना ,समाज व्यबस्था को बदलने के लिए जागना ,आदि जागृति के अनेक प्रकार है !कुछ ऐसे होते हैं जो जागते हुए भी सोये से रहते हैं .और कुछ ऐसे भी होते है जो निरंतर चिन्मय सत्ता (आत्मसत्ता ,या जीव जगत के कल्याण के लिए निरंतर सचेष्ट रहने वाले ) सोते हुए भी जाग्रत रहते हैं !ऐसे ही व्यक्ति महा पुरुष कहलाते हैं !जो अपने कार्यों से जीवित अवस्था में ही अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं !और म्रत्यु के बाद भी अमर रहते हैं !उनके नाम धाम का पता नहीं होता है !किन्तु चिन्मय सत्ता में विलीन होने के बाद भी बे आत्मरूप से सामान्यजन के व्योहार में प्रवेश कर जाते हैं ! आमजन में जब स्वार्थनिष्ठा का अभाव, दया ,प्रेम ,करुणा ,अहिंसा ,सद्भाव ,सदाचार ,सहयोग ,आदि श्रेष्ठ गुणों का दर्शन हो तो समझना चाहिये, की ये महापुरुष अपनी चिन्मय सत्ता से जीवित हैं !जब आमजन के जीवन से ये तत्त्व विलुप्त जान पड़ें तोसमझना चाहिये की दुष्ट,आत्मविघातक स्वार्थजीवी ,मरणशील संसार के सुख भोगों में आकंठ डूबे राक्छ्सी ,आसुरी ,दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का प्रेत आमजन में प्रवेश कर गया है ! भारत भूमि में अनादि काल से चिन्मय सत्ता की प्राप्ति की आकांछा में निरत मनुष्यों का प्रादुर्भाव होता रहा है !उन्हें अपने शव्दों में सर्वत्यागी ,तपस्वी ,साधु संत ,सन्यासी आदि नाम देते हैं !ऐसे महापुरुषों का ही सामूहिक नाम ब्राह्मण होता था !इसीलिए वैदिक ग्रंथों में कहा गया है की ब्राह्मण का शरीर सुख भोग के लिए नहीं त्याग और तपस्या ,योग आदि के लिए होता है !लकड़ी जलकर ही प्रकाश ,और उष्णा देती है !इसीलिए ब्राह्मण सिर्फ तप ,त्याग और तपस्या से हे प्रकाशित होता है !इसीलिए कोई भी धर्म ब्राह्मण मुक्त नहीं होसकता है !वैदिक धर्म में जिसे ब्राह्मण कहते हैं !वही बौद्ध धर्म में भिक्छु ,इस्लाम में मुल्ला ईसाईयों में ,पादरी .जैन ,में पंडित, आदि नामों से जाना जाता है !इसके अतिरिक्त भी जितने धर्म संयुक्त ,और धर्म ,रहित ,ज्ञान अज्ञान आदि हैं ,उनको प्रभावित और प्रशिक्छित करने वाले व्यक्ति का नाम कुछ भी हो लेकिन वह ब्राह्मण ही होता है !ब्राह्मण ज्ञान ,अज्ञान आदि सभी का पर्यायवाची शव्द है !आज भारत की प्राचीन आत्मनिष्ठ अनादि परंपरा के विघातक तत्त्व साक्रिय दिखाई दे रहे हैं ! संसार में दो तरह की प्राणी श्रष्टि दृष्टि गत होती है ! एक को दैवीऔर दूसरी को आसुरी शक्ति कहते हैं !दैवी गुणों से संपन्न लोगों में भय का सर्वथा अभाव ,अंतःकरण की अत्यंत शुद्धि ,ज्ञान से लोकहितकारी कर्म करने की प्रवृत्ति ,दान ,इन्द्रिय संयम स्वाध्यायाय ,कर्तव्यपालन के लिए कष्ट सहना.शरीर ,मन ,वाणी ,की सरलता ,अहिंसा ,सत्यभाषण ,क्रोध ना करना ,संसार के सुख भोगों के त्याग की प्रवृत्ति ,चुगली ना करना ,जीव जंतुओं पर दया करना ,छमा,धैर्य मान आदि की चाह ना होना प्रमुखता से होते हैं !जो आसुरी लोग होते हैं ,उनमे दम्भ ,घमंड ,अभिमान क्रोध और कठोरता ,अज्ञान ,सुख भोगों की लालसा और आमजन को भ्रमित कर अपने स्वार्थों के पोषण आदि की प्रबल भावना रहती है !स्वतंत्र भारत में आमजन को अपनी समझ के अनुकूल इन जाग्रत असुरों ,( अनादि लोकोपकारी संस्कृति और अध्यात्म विघातक लोगों ) के दुष्प्रयत्नो के प्रभाव से मुक्त होकर देश की सनातन पावन दैवी शक्तियों से युक्त जीवन परंपरा का अनुशीलन करना चाहिये !भारत में युगानुकूल दिव्य सनातन परंपरा से ही भारत का कल्याण और भारत से ही विश्वकल्याण हो सकेगा !जागो अज्ञान से ज्ञान को ओर!
Thursday, 27 October 2016
Wednesday, 26 October 2016
सेवा कार्य या मालाजप ---- गांधीजी ----हरिजनसेवक१७--२--१९४६
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
Monday, 24 October 2016
नीति रक्छा का उपाय -------- गांधीजी ----- हिंदी नवजीवन २५-५-१९२४
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
Sunday, 23 October 2016
गांधीजी और रामनाम --------गांधीजी को बचपन में भूत प्रेतों से डर लगता था !इसीलिए बचपन में इस डर से निवृत्ति के लिए उन्होंने राम का जप शुरू कर दिया था !इस मन्त्र को देने वाली उनकी धाय रम्भा थी !फिर यह राम नाम उनके जीवन का शक्ति शाली और सर्वश्रेष्ठ आधार बन गया था !एक सत्याग्रही या ऐसे व्यक्ति के नाते जो दिन रात के २४ घंटे सत्य या ईश्वर में अटल श्रद्धा रखता था, .गांधीजी ने यह समझ लिया था कि ईश्वर ही हर कठिनाई में फिर वह चाहे ,शरीररिक हो या मानसिक हो या आध्यात्मिक हो उन्हें हमेशा सांत्वना और सामर्थ्य तथा आश्रय देता है !इस सम्बन्ध में उनकी सर्व प्रथम परीक्छा ब्रह्मचर्य के पालन में हुई थी !गाँधी जी कहते थे कि अपवित्र विचारों को रोकने में राम नाम ने उनकी सबसे ज्यादा सहायता की थी !रामनाम ने ही उनको उपबास करने की शक्ति प्रदान की !रामनाम ने ही उन्हें सारे आत्म संघर्षों में विजय दिलाई थी, जो उन्हें राजनीतिक ,सामाजिक आर्थिक और धार्मिक छेत्रों में लड़नी पडी थी !अपने आपको ईश्वर के आश्रय में छोड़ने से उन्हें यह अनुभव भी प्राप्त हुआ कि राम नाम शारीरिक व्याधियों का भी इलाज है ! सत्य की खोज करने और मनुष्यों के रोगों की निबृत्ति की उत्कट इक्छा के कारण गांधीजी ने शुद्ध हवा ,मालिश ,कई तरह के स्नानों ,उपवासों ,योग्य आहारों ,मिटटी की पट्टी और ऐसे ही दूसरे साधनों के द्वारा रोग मिटाने के सादे और सस्ते तरीके खोज निकाले थे !मनुष्य सिर्फ शरीर ही नहीं है ,बल्कि और कुछ भी है !इसीलिए गाँधी जी का यह पक्का विश्वास था कि मनुष्य के रोगों का कारण सिर्फ शारीरिक ही नहीं है !शरीर के साथ रोगी के मन और आत्मा का भी इलाज आवश्यक है !गांधीजी ने अनुभव किया इस ध्येय को प्राप्त करने के लिए राम नाम में श्रद्धा और विश्वास रखने जैसी उपयोगी और कोई औषधि नहीं है !गांधीजी का विश्वास था कि जब व्यक्ति अपने आपको पूरी तरह ईश्वर के हांथों में सौंप देता है, और भोजन ,व्यक्तिगत सफाई और आमतौर पर अपने आपको काम क्रोध आदि ,विकारों को जीतने के बारे में और समस्त प्राणियों के साथ अपने संबंधों के बारे में ईश्वर के नियमों का पालन करता है ! तो वह रोग से मुक्त रहता है !यह स्थिति प्राप्त करने के लिए बे स्वयं भी प्रयत्न शील रहते थे! १९४४ में जेल से छूटने के बाद उन्होंने पुणे के पास उरलीकांचन में उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किया था !जहाँ खुद उनके द्वारा आचरण में उतारे हुए प्राकृतिक इलाज के साथ रोगियों को राम नाम की महत्ता भी बताई जाती थी !यह प्राकृतिक चिकित्सा आज भी वहां हो रही है !गांधीजी की राम नाम में आस्था और श्रद्धा इतनी दृढ थी !कि म्रत्यु के समय उनके मुख से अंतिम शव्द हे राम ही निकले थे !राजघाट पर उनकी समाधी पर हे राम ही अंकित है !राम भक्त अहिंसक ,सत्यनिष्ठ ,प्राणिमात्र की सेवा में निष्काम भाव से समर्पित गाँधी जी की हत्या भी एक पागल तथाकथित नकली बुजदिल राष्ट्र भक्त हिन्दू ने की थी ! आज भी ऐसे तमाम हिन्दू धर्म के नकली ,फर्जी और , हिन्दू धर्म के कलंक राक्छ्सी ,आसुरी वृत्ति के रावण और कंस के अवतार हिन्दू गाँधी जी को नकली फर्जी झठे
मनगढंत किस्से कहानिया गढ़ कर गाँधी जी को बदनाम करने के प्रयत्न में संलग्न है !इन लोकतंत्र विघातक तत्त्वों से हिंदुओं को सतर्क और सावधान रहना चाहिए ! ये राम भक्त नहीं काम भक्त हैं !
मनगढंत किस्से कहानिया गढ़ कर गाँधी जी को बदनाम करने के प्रयत्न में संलग्न है !इन लोकतंत्र विघातक तत्त्वों से हिंदुओं को सतर्क और सावधान रहना चाहिए ! ये राम भक्त नहीं काम भक्त हैं !
Saturday, 22 October 2016
कांग्रेस ने उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को मुख्य मंत्री बनाने के लिए विधायकों को मजबूर कर दिया था !उत्तराखंड के जमीनी नेता और विधायकों की पसंद वर्तमान मुख्य मंत्री हरीश रावत ही थे !बहुगुणा का भावनात्मक सम्बन्ध और जन्म सम्बन्ध भी कभी उत्तराखंड से नहीं रहा था !उनकी सिर्फ एक ही योग्यता थी कि वह उत्तराखंड में जन्मे हेमबती नंदन बहुगुणा के पुत्र थे !इस प्रकार की गलतियों के कारण ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा है ! कांग्रेस की दूसरी सबसे बड़ी गलती यह है !कि उसका संगठनात्मक ढांचा चुना हुआ नहीं है !उसके पदाधिकारी मनोनीत किये जाते हैं !परिणाम स्वरुप केंद्रीय नेताओं की पसंद से तिकडमी लोग संगठन के पदाधिकारी नामजद हो जाते हैं !अब कांग्रेस को इन गलतियों को सुधार कर संगठन को मजबूत करना चाहिए !और लोकतंत्र विघातक दलबदलुओं को कम से कम ५ साल तक संगठन में कोई पद नहीं देना चाहिए !ना ही उनको लोकसभा या विधान सभाओं का पार्टी टिकट देना चाहिए ! वास्तविक विचारनिष्ठ कार्यकर्ताओं को ही चुनाव के द्वारा संगठन की जिमेदारी देना चाहिए !और उन्ही की सिफारिश पर पार्टी को टिकट देना चाहिए !
Wednesday, 19 October 2016
भारत की पवित्र भूमि की विरासत ऋषियों ,महर्षियों ,अवतारों ,त्यागियों और तापसियों की रही है !इस भूमि पर इन महापुरुषों ने जो किया वह स्वयं प्रकाशित हुआ था !अनादि काल से आचरित यह श्रेष्ठ जीवन पद्धति समय ( काल ) के उलटफेर से क्रमशः पतित होकर नष्ट प्रायः हो गयी ! गुलामी के १००० साल ने इन श्रेष्ठ संस्कृति को बहुत अधिक नुकसान पहुँचाया !इसको गुलामी से मुक्ति के लिए ऋषियों ,महर्षियों की तपः साधना और साधु संतो की त्याग तपस्या ने अद्र्श्य ईश्वरी शक्ति का आवाहन कर स्थूल दृष्टि से आजादी के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने प्रयत्न किया और देश को स्वतंत्र कराया ! किन्तु स्वतंत्र भारत में १००० सालों की परतंत्रता के कारण भारतीय अभी भी दिमागी गुलामी से आजाद नहीं हो पाये हैं ! इसीलिए इस विशाल देश भारत की विरासत अभी भी निकृष्ट स्वार्थ और भौतिक सुखों की चाह के गहन अन्धकार से आच्छादित है !हमारे सद्वाक्यों का खोखलापन हमारे अनुशासन रहित ,निम्न स्वार्थों से युक्त और कुत्तों की तरह भोग और ऐश्वर्य के पदार्थों की प्राप्ति के प्रयत्नों में प्रतिदिन प्रकाशित होते रहते हैं !हमारे जीवन की पतवार अत्यंत पशुबत निकृष्ट सोच ने पकड़ रखी है ! अब कौन किसको सत्य का मार्ग दिखाये! आदर्श वाक्य सिर्फ कहने के लिए और पशुओं से भी निकृष्ट आचरण करने के लिए है !यही हम देख रहे हैं !और जाने अनजाने ,वश और परवश होकर इसी मार्ग पर हम तेजी से चल भी रहे हैं !
Friday, 7 October 2016
१(४२) वर्णशंकर कुलघातिओं को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है लुप्त हुई पिण्डोदक क्रिया से पितरों का पितृलोक से पतन हो जाता है और बे अधोगति को प्राप्त होते हैं श्राद्ध लोप होने का अर्थ है पितरों के द्वारा आचरित सदाचरणो की विष्मृति श्राद्ध का आजकल एक नया रूपहो गया है समाज शुधारक श्राद्ध में ब्रह्मभोज को अनुचित मानते है वह कहते हैं यह कुरीति है इसका त्याग करना चाहिए तीन प्रकार के शरीर होते हैं स्थूल सुक्छम और कारण स्थूल शरीर का दाह होता है और सुखछम तथा कारण शरीर के लिए श्राद्ध किया जाता है जिसमे ब्राह्मणो को भोजन दान आदि मृतक शरीरसे निकली आत्मा की शांति के लिए किया जाता है यह क्रिया अनादि कल से चली आरही है श्री राम ने अपने पिता का श्री कृष्ण ने भांजे अभिमन्यु का तथा yuddhister और धृराष्ट्रा ने अपने पुत्रों पौत्रों तथा बीरगति प्राप्त समस्त राजाओं का श्राद्ध किया था
Wednesday, 5 October 2016
१(३६)अर्जुन कहता है इन कौरवों के बध करने से क्या लाभ होगा यह पापी और आततायी हैं जो राजा राजधर्म का का पालन नहीं करता है वह महानपाप का भागी होता है अर्जुन नीतिनिपुण है इसके बाद भी मोहग्रस्त होकर राजधर्म का परित्याग कर रहा है आततायी अत्याचारी चाहे राजपरिवार का हो या राजपुत्र ही क्यों न हो यदि वह आततायी है तो अवश्य दंड प्राप्ति का पात्र है मोहग्रस्त व्यक्ति कर्त्तव्य च्युत होकर कितना नीचे गिर सकता है उसका यह प्रत्यक्ष उदहारण है.n
Monday, 3 October 2016
क्या सच है और क्या झूठ है ? कौन सा राजनेता देश भक्त है या पद भक्त है ? किस व्यक्ति के मन बुद्धि ,वचन में भारत राष्ट्र के प्रति वास्तविक सेवा भावना है !या सिर्फ अपनी स्वार्थों की पूर्ति का ही ध्येय है ? इन सभी बातों का सही पता लगा पाना सम्भव नहीं है !यह समस्या आज की ही नहीं है !ज्यों ज्यों व्यक्तियों की चाहत सांसारिक पदार्थों के प्रति आसक्ति में बृद्धि होती है ! वैसे ही इस प्रकार के झूठ ,छल ,कपट ,पाखंड ,बकबाद और अपने निहित तुच्छ स्वार्थों की तुष्टि के लिए सामजिक समरसता और लोक कल्याण का ताना बाना विगाड़ने वाले लोगों का बाहुल्य जीवन के समस्त छेत्रों में होने लगता है !मक्खी ,,मच्छर गंदगी में ही पैदा होते हैं ! उनके विनाश का प्रथम उपाय तो यह है !कि गन्दगी ही न होने दी जाय और दूसरा उपाय यह है कि पैदा हो जाने के बाद सफाई से और इनको नष्ट करने वाली दबाओं के प्रयोग से इनको नष्ट कर दिया जाय ! लोकतंत्र में इन स्वएतनिष्ठ व्यक्तियों को समाप्त करने के दोनों उपाय जनता के पास हैं !किन्तु जनता से ही निकले हुए लोग जनता के तुच्छ स्वार्थों का उपयोग अपने बड़े स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते हैं !इसीलिए आज जो कुछ भी देश में झूठ और छल ,कपट ,और निकृष्ट स्वार्थ का प्रदर्शन हो रहा है !और उनको सफलता भी प्राप्त हो रही है !वह सब जनता के सहयोग से ही हो रहा है ! अभी भी कुछ देश भक्त इस स्वार्थनिष्ठ लोगों के गंदे खेल के विरुद्ध प्रयत्नशील हैं !किन्तु उनके प्रयत्न उसी प्रकार सफल नहीं हो पा रहे हैं !जैसे आंधी में आँख खोल कर चलना मुश्किल होता है ! फिर भी बे विपरीत परिस्थितयों में भी समाज के व्यापक हित के लिए कार्यरत हैं !ये कौन लोग हैं ? ऐसे लोग जीवन के सभी छेत्रों ,में ,सभी ,धर्मों ,में और सभी जातियों और वर्गों में है ,!जो अपने लोकहितकारी स्वभाव के कारण सक्रिय हैं ! किन्तु रावण की अन्याय कारी व्यबस्था में में बे विभीषण जैसे अकेले हैं ! जब तक रावण ने लात मारकर विभीषण को लंका से बाहर नहीं किया था !तब तक लंका में विभीषण भी रह रहा था और रावण की अन्यायी व्यबस्था भी चल रही थी लेकिन जिस दिन विभीषण लंका से लात खाकर श्री राम की शरण में चला गया था !उसी दिन से लंका की राक्छ्सी व्यबस्था का अंत शरू हो गया था ! अभी ये स्वार्थनिष्ठ लोग समाजनिष्ठ लोगों को किसी ना किसी प्रकार से साथ लिए हुए हैं और उनका सहयोग प्राप्त कर रहे हैं !यही उनकी चाल है और उनकी सफलता का सूत्र है !इसीलिए विनोबा जी से जब सत्ता में बैठे राजनेता या विपक्छ में कार्य रत नेता मिलने और उनका आशीर्वाद लेने जाते थे तो बे कहते थे !राजनीती त्यागो और बुद्ध ,महावीर और राम की तरह लोकहित के लिए निकल पडो ! राजनीति अब काल वाह्य हो गयी है !अब लोकनीति का समय है ! धर्मगुरुओं से बे कहते थे !अब धर्म जोड़ता नहीं बल्कि तोड़ता है !इसीलिए अध्यत्मनिष्ठ बनो !और धार्मिक और मजहवी संकीर्णताओं को त्याग दो ! इसीलिए जब तक राजनीति को देशभक्तों का सहयोग और समर्थन प्राप्त होता रहेगा !तब तक स्वार्थनिष्ठ ,सत्ता परस्त नेताओं से देशमुक्त नहीं हो पायेगा !और जब तक जनता इन धार्मिक और मजहबी साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से मुक्त नहीं होगी !तब तक ना कश्मीर में शांति स्थापित होगी और ना हिंदुस्तान पाकिस्तान विवाद शांत होगा !दोनों देशो की जनता इस झूठ के मकड़ जाल में फंस कर इन मगरमच्छों की हिंसक दान्तों में फॅस कर काल कवलित होती रहेगी !
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