Thursday, 27 October 2016

जागते सभी हैं किन्तु देखते अलग अलग तरह से हैं ------------   जागना भी अनेक प्रकार का होता है !नींद से जागना ,विश्वासघात से चोट खाकरजागना ,शिक्छण से ज्ञान प्राप्त कर जागना ,भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए जागना ,समाज व्यबस्था को बदलने के लिए जागना ,आदि जागृति के अनेक प्रकार है !कुछ ऐसे होते हैं जो जागते हुए भी सोये से रहते हैं .और कुछ ऐसे भी होते है जो निरंतर चिन्मय सत्ता (आत्मसत्ता ,या जीव जगत के कल्याण के लिए निरंतर सचेष्ट रहने वाले ) सोते हुए भी जाग्रत रहते हैं !ऐसे ही व्यक्ति महा पुरुष कहलाते हैं !जो अपने कार्यों से जीवित अवस्था में ही अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं !और म्रत्यु के बाद भी अमर रहते हैं !उनके नाम धाम का पता नहीं होता है !किन्तु चिन्मय सत्ता में विलीन होने के बाद भी बे आत्मरूप से  सामान्यजन के व्योहार में प्रवेश कर जाते हैं ! आमजन में जब स्वार्थनिष्ठा का अभाव, दया ,प्रेम ,करुणा ,अहिंसा ,सद्भाव ,सदाचार ,सहयोग ,आदि श्रेष्ठ गुणों का दर्शन हो तो समझना चाहिये, की ये महापुरुष अपनी चिन्मय सत्ता से जीवित हैं !जब आमजन   के जीवन से ये तत्त्व विलुप्त जान पड़ें तोसमझना चाहिये की दुष्ट,आत्मविघातक स्वार्थजीवी ,मरणशील संसार के सुख  भोगों में  आकंठ डूबे  राक्छ्सी ,आसुरी ,दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का प्रेत आमजन में प्रवेश कर गया है ! भारत भूमि में अनादि काल से चिन्मय सत्ता की प्राप्ति की आकांछा में निरत मनुष्यों का प्रादुर्भाव होता रहा है !उन्हें अपने शव्दों में सर्वत्यागी ,तपस्वी ,साधु संत ,सन्यासी आदि नाम देते हैं !ऐसे महापुरुषों का ही सामूहिक नाम ब्राह्मण होता था !इसीलिए वैदिक ग्रंथों में कहा गया है की ब्राह्मण का शरीर सुख भोग के लिए नहीं त्याग और तपस्या ,योग आदि के लिए होता है !लकड़ी जलकर ही प्रकाश ,और उष्णा देती है !इसीलिए ब्राह्मण सिर्फ तप ,त्याग और तपस्या से हे प्रकाशित होता है !इसीलिए  कोई  भी धर्म ब्राह्मण मुक्त नहीं होसकता है !वैदिक धर्म में जिसे ब्राह्मण कहते हैं !वही बौद्ध धर्म में भिक्छु ,इस्लाम में मुल्ला ईसाईयों  में ,पादरी .जैन ,में पंडित, आदि नामों से जाना जाता है !इसके अतिरिक्त भी जितने धर्म संयुक्त ,और धर्म ,रहित ,ज्ञान अज्ञान आदि हैं ,उनको प्रभावित और प्रशिक्छित करने वाले व्यक्ति का नाम कुछ भी हो लेकिन वह ब्राह्मण ही होता है !ब्राह्मण ज्ञान ,अज्ञान आदि सभी का पर्यायवाची शव्द है !आज भारत की प्राचीन आत्मनिष्ठ अनादि परंपरा के विघातक तत्त्व   साक्रिय दिखाई दे रहे हैं ! संसार में दो तरह की प्राणी  श्रष्टि दृष्टि गत होती है ! एक को दैवीऔर दूसरी को आसुरी शक्ति कहते हैं !दैवी गुणों से संपन्न लोगों में भय का सर्वथा अभाव ,अंतःकरण की अत्यंत शुद्धि ,ज्ञान से लोकहितकारी कर्म करने की प्रवृत्ति ,दान ,इन्द्रिय संयम स्वाध्यायाय ,कर्तव्यपालन के लिए कष्ट सहना.शरीर ,मन ,वाणी ,की सरलता ,अहिंसा ,सत्यभाषण ,क्रोध ना करना ,संसार के सुख भोगों के त्याग की प्रवृत्ति ,चुगली ना करना ,जीव जंतुओं पर दया करना ,छमा,धैर्य  मान आदि की  चाह ना होना प्रमुखता से होते हैं !जो आसुरी लोग होते हैं ,उनमे दम्भ ,घमंड ,अभिमान क्रोध और कठोरता ,अज्ञान ,सुख भोगों की लालसा और आमजन को भ्रमित कर अपने स्वार्थों के पोषण आदि की प्रबल भावना रहती है !स्वतंत्र भारत में आमजन को अपनी समझ के अनुकूल इन जाग्रत असुरों ,( अनादि लोकोपकारी संस्कृति और अध्यात्म विघातक लोगों ) के दुष्प्रयत्नो के प्रभाव से मुक्त होकर देश की सनातन पावन दैवी शक्तियों से युक्त जीवन परंपरा का अनुशीलन करना चाहिये !भारत में युगानुकूल दिव्य सनातन परंपरा से ही भारत का कल्याण और भारत से ही विश्वकल्याण हो सकेगा !जागो अज्ञान से ज्ञान को ओर!                       

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