१(३६)अर्जुन कहता है इन कौरवों के बध करने से क्या लाभ होगा यह पापी और आततायी हैं जो राजा राजधर्म का का पालन नहीं करता है वह महानपाप का भागी होता है अर्जुन नीतिनिपुण है इसके बाद भी मोहग्रस्त होकर राजधर्म का परित्याग कर रहा है आततायी अत्याचारी चाहे राजपरिवार का हो या राजपुत्र ही क्यों न हो यदि वह आततायी है तो अवश्य दंड प्राप्ति का पात्र है मोहग्रस्त व्यक्ति कर्त्तव्य च्युत होकर कितना नीचे गिर सकता है उसका यह प्रत्यक्ष उदहारण है.n
No comments:
Post a Comment