अजन्मा का जन्म कैसे और क्यों ?-------- जब भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा की मैने अविनाशी कर्मयोग को सूर्य से कहा था वही पुरातन कर्म योग मैने तुझ से कहा है !अर्जुन ने कहा आपका जन्म अभी हुआ है !और सूर्य अनंत काल से प्रकाशित है !तब मैं यह कैसे मानलूं की अपने सृष्टि के प्रारम्भ में सूर्य को ज्ञान योग का उपदेश किया था !भगवान् श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं !मैं अपने सभी पूर्व जन्मो को जानता हूँ किन्तु तू नहीं जानता है !मेरे तेरे जन्म लेने की प्रिक्रिया में भी भेद है !तेरा जन्म पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के कारण होता है !किन्तु मेरा जन्म कर्माधीन नहीं है !मैं अजन्मा ,अविनाशी और अजर तथा अमर ,निर्गुण और निराकार होते हुए भी अपनी योग शक्ति से प्रगट होता हूँ !ना मेरा जन्म होता है और ना मरण होता है !मेरा शरीर चिन्मय और दिव्य है !मेरा जन्म और कर्म दिव्य हैं !मैं अपनी योग माया से ढका रहता हूँ इसीलिए जो मूढ़ और अज्ञानी मनुष्य मुझे अजन्मा और अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानते और मानते हैं उन सबके सामने मेरा स्वरुप योग माया से ढका रहने के कारण प्रकाशित नहीं होता है ! बुद्धि हीन मनुष्य मेरे परम अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ भाव को ना जानते हुए मन और इन्द्रियों से पर मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला मानते हैं ! मूर्ख लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूप श्रेष्ठ भाव को ना जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवमानना करते हैं ! जो संसार में मोह ,राग ,द्वेष ,काम ,क्रोध ,लालच आदि से ग्रस्त लोग हैं ऐसे अविविवेकी मनुष्यों की सब आशाएं ,व्यर्थ होती हैं उनके सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं उनका ज्ञान भी निरर्थक होता है उनके सभी कर्म लोभ अदि से दूषित होने के कारण मुझ अविनाशी परमात्मा के स्वरुप को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं ! ऐसे सभी मोह ग्रस्त लोग आसुरी ,राक्छ्सी और मोहिनी प्रकृति के आश्रय में अपना जीवन जीते हैं ! ये शव्द ग्यानी आध्यात्मिक अनुभव से शून्य व्यक्ति मुझ परमात्मा के अविनाशी स्वरुप को नहीं समझ पाते हैं !
परमात्मा का अवतार क्यों होता है !? ------ साधुओं की रक्छा के लिए ---------- साधुओं के लक्छण -------१-----
जो सब प्राणियों में द्वेष भाव से रहित और मित्र भाव बाला,तथा दयालु ,ममता रहित ,अहंकार रहित ,सुख ,दुःख की प्राप्ति में सम छमाशील निरंतर संतुष्ट ,योगी शरीर को अपने बस में रखने वाला अध्यात्म धारण का दृढनिश्चय वाला और परमात्मा को अपनी मन बुद्धि अर्पण करने वाला जो साधु है वह परमात्मा को प्रिय होता है !
२------जिस से कोई भी प्राणी छुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से छुब्ध नहीं होता तथा जो हर्ष ,ईर्ष्या ,भय और उद्वेग से रहित है !ऐसा साधु भगवान् को प्रिय है !
३----------जिसने सम्पूर्ण आवश्यकताओं का मन से त्याग कर दिया है जो बाहर भीतर से पवित्र है, जिसके जीवन का लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है! और इसके लिए वह चतुराई के साथ ईश आराधना में अपने चित्त को पिरोये रखता है ! सांसारिक भोगों के प्रति उदासीन है, व्यथा से रहित और सभी प्रकार के लौकिक कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है 1
४----------जो न कभी हर्षित होता है और न द्वेष करता है ना शोक करता है ना कामना करता है ,और जो शुभ अशुभ कर्मों से ऊँचा उठ गया है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है !
५-------जो शत्रु और मित्र में तथा मान अपमान में सम है और मौसम की अनुकूलता और प्रतिकूलता और सुख दुःख आदि में सम तथा आसक्ति रहित है और ईश्वर भक्ति में जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है ऐसा भक्त साधु भगवान् को प्रिय है !
६-------जो प्रसंशा और निंदा को समान भाव से देखता है ! और जीवन निर्वाह की वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह में संलग्न नहीं रहता है, जिसकी भौतिक सम्पति गृह आदि में असाक्ति नष्ट हो गयी है ऐसे भगवान् के भक्त साधु भगवान् की प्रिय हैं !
७------ इन उत्तम साधू लक्छणों की प्राप्ति में जो गृहस्थ संलग्न है ,भगवान् को बे विशेष रूप से प्रिय हैं !
जब ऐसे उपरोक्त साधुओं का समाज में अपमान होता है !भोगी दुष्ट लोग उनकी जीवन पद्धति पर हमला करते हैं !उनके प्राणों का हरण करते हैं !उनके आश्रमों का नाश करते हैं !जब ऐसे साधु दुखी होकर भगवान् को पुकारते हैं !तब वह निराकार अजन्मा ईश्वर इन साधुओं की रक्छा और आततायी दुष्टों के विनाश के लिए योग माया से विविध रूपों में प्रगट होता है !
पापी मनुष्य कौन होते हैं ---------अपनी बहुत बढ़ाई करने वाले ,सत्ता ,महत्ता ,धन संपत्ति की लिए लोलुप तनिक से भी अपमान को सहन ना करने वाले ,क्रोधी ,चंचल और आश्रितों की रक्छा न करने वाले अत्यंत घमंडी ,सम्भोग में ही मगन रहने वाले ,विषमता बढ़ाने वाले दान देकर पश्चाताप करने वाले अत्यंत कृपण ,धन और काम भोगों की प्रसंशा करने वाले तथा स्त्रियों का अपमान करने वाले और उनको सिर्फ काम दृष्टि से देखने वाले बलात्कारी अपने निम्न स्वार्थों के लिए सामाजिक ताना वाना छिन्न भिन्न करने वाले आदि ये सब महान पापी हैं !इनकी समाज में जब बृद्धि हो जाती है !और समाज की शासन व्यबस्था जब इन नराधमों के हाथ में चली जाती है !और इनका विनाश जब शुद्ध साधु प्रकृति के लोगों से संभव नहीं हो पाता है !तब इनके विनाश के लिए परमात्मा शरीर धारण करता है
अधर्म का नाश कर धर्म की पुनर स्थापना करते हैं ---------- पापी लोग धर्म को भी विकृत कर देते हैं !धर्म का नाम धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि यह सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने का शिक्छण प्राणिमात्र को देता है !धर्म में हिंसा और क्रूरता को कोई स्थान नहीं है !जो धर्म ऐसे धर्म का विनाश करता है ! और धर्म को जीव हिंसा से युक्त करता है !ऐसा धर्म अधर्म होता है !जब हिंसा में बृद्धि होती है !तब इन निरीह जीवों का करुण चीत्कार परमात्मा को विचिलित कर देता है !तब परमात्मा समस्त जीवों की रक्छा के लिए और साधुओं को कष्ट मुक्त करने के लिए इन धर्मध्वजी अधर्म परायण नृशंस मनुष्य के रूप में राक्च्छसों का विनाश कर सर्व समावेशी सभी जीवों के धारण पोषण करने वाले शुद्ध धर्म की स्थापना करता है !यही भगवान् के देह धारण का हेतु है !भगवान् श्री कृष्ण ने द्वापर के अंत में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए देह धारण की थी !और गीता का अमर उपदेश देकर कर्मयोग का ज्ञान समाज को दिया था !निष्काम कर्मयोग की औषधि मनुष्यों के सभी प्रकार के मानस रोगों को समाप्त करने की अचूक औसधि है !इसका सेवन सभी लोगों को करना चाहिए !
परमात्मा का अवतार क्यों होता है !? ------ साधुओं की रक्छा के लिए ---------- साधुओं के लक्छण -------१-----
जो सब प्राणियों में द्वेष भाव से रहित और मित्र भाव बाला,तथा दयालु ,ममता रहित ,अहंकार रहित ,सुख ,दुःख की प्राप्ति में सम छमाशील निरंतर संतुष्ट ,योगी शरीर को अपने बस में रखने वाला अध्यात्म धारण का दृढनिश्चय वाला और परमात्मा को अपनी मन बुद्धि अर्पण करने वाला जो साधु है वह परमात्मा को प्रिय होता है !
२------जिस से कोई भी प्राणी छुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से छुब्ध नहीं होता तथा जो हर्ष ,ईर्ष्या ,भय और उद्वेग से रहित है !ऐसा साधु भगवान् को प्रिय है !
३----------जिसने सम्पूर्ण आवश्यकताओं का मन से त्याग कर दिया है जो बाहर भीतर से पवित्र है, जिसके जीवन का लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है! और इसके लिए वह चतुराई के साथ ईश आराधना में अपने चित्त को पिरोये रखता है ! सांसारिक भोगों के प्रति उदासीन है, व्यथा से रहित और सभी प्रकार के लौकिक कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है 1
४----------जो न कभी हर्षित होता है और न द्वेष करता है ना शोक करता है ना कामना करता है ,और जो शुभ अशुभ कर्मों से ऊँचा उठ गया है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है !
५-------जो शत्रु और मित्र में तथा मान अपमान में सम है और मौसम की अनुकूलता और प्रतिकूलता और सुख दुःख आदि में सम तथा आसक्ति रहित है और ईश्वर भक्ति में जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है ऐसा भक्त साधु भगवान् को प्रिय है !
६-------जो प्रसंशा और निंदा को समान भाव से देखता है ! और जीवन निर्वाह की वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह में संलग्न नहीं रहता है, जिसकी भौतिक सम्पति गृह आदि में असाक्ति नष्ट हो गयी है ऐसे भगवान् के भक्त साधु भगवान् की प्रिय हैं !
७------ इन उत्तम साधू लक्छणों की प्राप्ति में जो गृहस्थ संलग्न है ,भगवान् को बे विशेष रूप से प्रिय हैं !
जब ऐसे उपरोक्त साधुओं का समाज में अपमान होता है !भोगी दुष्ट लोग उनकी जीवन पद्धति पर हमला करते हैं !उनके प्राणों का हरण करते हैं !उनके आश्रमों का नाश करते हैं !जब ऐसे साधु दुखी होकर भगवान् को पुकारते हैं !तब वह निराकार अजन्मा ईश्वर इन साधुओं की रक्छा और आततायी दुष्टों के विनाश के लिए योग माया से विविध रूपों में प्रगट होता है !
पापी मनुष्य कौन होते हैं ---------अपनी बहुत बढ़ाई करने वाले ,सत्ता ,महत्ता ,धन संपत्ति की लिए लोलुप तनिक से भी अपमान को सहन ना करने वाले ,क्रोधी ,चंचल और आश्रितों की रक्छा न करने वाले अत्यंत घमंडी ,सम्भोग में ही मगन रहने वाले ,विषमता बढ़ाने वाले दान देकर पश्चाताप करने वाले अत्यंत कृपण ,धन और काम भोगों की प्रसंशा करने वाले तथा स्त्रियों का अपमान करने वाले और उनको सिर्फ काम दृष्टि से देखने वाले बलात्कारी अपने निम्न स्वार्थों के लिए सामाजिक ताना वाना छिन्न भिन्न करने वाले आदि ये सब महान पापी हैं !इनकी समाज में जब बृद्धि हो जाती है !और समाज की शासन व्यबस्था जब इन नराधमों के हाथ में चली जाती है !और इनका विनाश जब शुद्ध साधु प्रकृति के लोगों से संभव नहीं हो पाता है !तब इनके विनाश के लिए परमात्मा शरीर धारण करता है
अधर्म का नाश कर धर्म की पुनर स्थापना करते हैं ---------- पापी लोग धर्म को भी विकृत कर देते हैं !धर्म का नाम धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि यह सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने का शिक्छण प्राणिमात्र को देता है !धर्म में हिंसा और क्रूरता को कोई स्थान नहीं है !जो धर्म ऐसे धर्म का विनाश करता है ! और धर्म को जीव हिंसा से युक्त करता है !ऐसा धर्म अधर्म होता है !जब हिंसा में बृद्धि होती है !तब इन निरीह जीवों का करुण चीत्कार परमात्मा को विचिलित कर देता है !तब परमात्मा समस्त जीवों की रक्छा के लिए और साधुओं को कष्ट मुक्त करने के लिए इन धर्मध्वजी अधर्म परायण नृशंस मनुष्य के रूप में राक्च्छसों का विनाश कर सर्व समावेशी सभी जीवों के धारण पोषण करने वाले शुद्ध धर्म की स्थापना करता है !यही भगवान् के देह धारण का हेतु है !भगवान् श्री कृष्ण ने द्वापर के अंत में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए देह धारण की थी !और गीता का अमर उपदेश देकर कर्मयोग का ज्ञान समाज को दिया था !निष्काम कर्मयोग की औषधि मनुष्यों के सभी प्रकार के मानस रोगों को समाप्त करने की अचूक औसधि है !इसका सेवन सभी लोगों को करना चाहिए !