Saturday, 20 August 2016

धरम छेत्रे कुरुच्छेत्रे -----धर्म के ८मर्ग हैं ---यज्ञ दान शाश्त्रों का अध्ययन और तप इन चारों का तो कोई दम्भी पुरुष भी आचरण कर सकता है ! किन्तु इन्द्रिय निग्रह सत्य सरलता तथा कोमलता का इन चार का तो संत लोग ही अनुसरण करते हैं !जो महात्मा नहीं है ! उनमे सत्य छमा दया और निर्लोभता तो रह ही नहीं सकते हैं !धृतराष्ट्र और दुर्योधन करण शकुनि आदि सभी कौरव वेद पाठी थे ! नित्य अग्निहोत्र करते थे !किन्तु उनमे धर्म के अंग सत्य छमा दया और निर्लोभता के गुण नहीं थे !बे शब्द ग्यानी थे !उनमे धर्म का श्रेष्ठ आचरण प्रधान आचरण नहीं था !धर्म छेत्रे कुरु छेत्रे का अर्थ है की गीता केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं है प्रत्यक्छ आचरण में उतारने के लिए है ! पांडव युद्ध के पक्छ में नहीं थे ! बे चाहते थे की १२ वर्ष का बनवास और १बर्श का अज्ञात वास बिताने के बाद उनको उनका राज्य बापिस मिल जाना चाहिए था !राजा विराट की सभा में देश के तमाम राजाओं और श्री कृष्ण की उपस्थिति में यह निर्णय हुआ की विराट का राज पुरोहित हस्तिनापुर जाकर धर्म और नीतियुक्त सन्देश दुर्योधन आदि को दे ! और पांडवों को उनका राज्य देने की बात कहे धर्म राज युधिस्ठर धर्म के विरुद्ध इंद्रासन भी स्वीकार नहीं करेंगे ! राज पुरोहित ने पुष्य नक्छत्र से युक्त जय नामक महूर्त में हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया ! उन्होंने नीति और धर्म से युक्त बातों का कथन कौरव सभा में कहा ! भीष्म पितामह ने राज पुरोहित के कथन का समर्थन किया ! किन्तु करण ने विरोध किया ! धृतराष्ट्र ने राजदूत को यह कहकर बापिस कर दिया कि वह सोच विचार कर संजय को पांडवों के पास भेजेंगे ! संजय जब धृतराष्ट्र का सन्देश लेकर पांडवों के पास गया ! तब युधिस्ठर ने संजय से कहा की दुर्योधन से बार बार अनुनय बिनय करके कहना की पांडव शांति चाहते हैं ! हम सब में परस्पर प्रीति बनी रहे ! इसलिए हम पांच भाई सिर्फ पांच गाओं पाकर ही संतुष्ट हो जाएंगे ! और इसी पर युद्ध की सम्भावना समाप्त हो जायेगी ! संजय ने कौरव सभा में संधि की बात कही भीष्म पितामह ने भी दुर्योधन को संधि के लिए समझाया किन्तु दुर्योधन ने युधिस्ठर के शांति विषयक प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि पांडव मेरी सेना और मेरे प्रभाव के कारण इतने भयभीत हो गए हैं ! कि बे राजधानी या नगर लेने की बात छोड़ कर अब पांच गाओं मांगने लगे हैं ! धृतराष्ट्र वेदव्यास परशुराम गांधारी आदि ने भी दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह दी ! किन्तु दुर्योधन करण आदि ने अहंकार पूर्वक पांडवों से युद्ध करने का ही निश्चय व्यक्त किया ! पांडवों ने युद्ध न हो इसके लिए भगवान श्री कृष्णा को दूत के रूप में कौरवों के पास भेजा युधिस्ठर ने श्री कृष्ण से कहा कि युद्ध में प्रायः लज्जाशील श्रेष्ठ धीर वीर ही मारे जाते हैं ! और अधम श्रेणी के व्यक्ति जीवित बच जाते हैं ! युद्ध रूप कर्म तो पाप ही है ! युधिस्ठर ने कहा आप ही समस्त कौरवों के सुहृद तथा दोनों पक्च्छोँ के नित्य प्रिय सम्बन्धी है ! पांडवों सहित धृतराष्ट्र पुत्रों का मंगल सम्पादन करना आपका कर्तव्य है ! आप उभय पक्छ में संधि कराने की शक्ति भी रखते हैं !आप यहाँ से जा कर दुर्योधन से ऐसी बातेंकहें जो शान्ति स्थापना में सहायक हों ! भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मै वही कहूँगा जो धर्म संगत तथा हम लोगों के लिए हितकर तथा कौरवों के लिए भी मंगल कारक हो ! कार्तिक मॉस रेवती नक्छत्र में मैत्री नामक महूर्त में श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की !श्री कृष्णा ने कोरब सभा में धृतराष्ट्र से कहा इस समय दोनों पक्छों में संधि कराना आपके और मेरे अधीन है ! आप अपने पुत्रों को मर्यादा में रखिये और में पांडवों को नियंत्रण में रखूँगा ! युद्ध छिड़ने पर तो महान संघार ही दिखाई देता है इस प्रकार दोनों पक्छों का विनाश कराने में आप कौन सा धर्म देखते हैं आपके पुत्र लोभ में अत्यंत आसक्त हो गए हैं ! उन्हें काबू में लाईये ! शत्रुओं का दमन करने वाले कुन्तीपुत्र आपकी सेवा के लिए भी तैयार हैं ! और युद्ध के लिए भी तैयार हैं ! जो आपके लिए विशेष हितकर जान पड़े उसी मार्ग का अनुशरण कीजिये !किन्तु कौरवों ने श्री कृष्णा की सलाह ना मान कर उलटे उनको ही बंदी बनाने की चेस्टा की !परिणाम स्वरुप युद्ध अवश्यमभाभी हो गया था !

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