भारत का समाज प्राचीन काल से ही स्वाबलम्बी समाज रहा है !यहाँ यह उक्ति प्रचिलित थी !उत्तम खेती ,मध्यम बान (बिज़नस ) अधम चाकरी ( नॉकरी को अत्यंत बुरा माना जाता था ) भीख निदान ( भीख मांगना सर्वाधिक निंदनीय कर्म था ) भारत के लोग नौकरी करने के लिए मुश्किल से तैयार होते थे !इसीलिए जो सेवा ( नॉकरी ) करते थे !बे शूद्र कहलाते थे ! आज प्रधान मंत्री से लेकर जो उत्पादन न कर सिर्फ नौकरी से ही अपना उदर पोषण करते हैं !बे सब शूद्र हैं ! आचार्य विनोबा भावे ने एक सूत्र दिया है !श्रम संजात वारीणः अर्थात श्रम करके पशीना बहाकर अपनी जीविका चलाओ ! बे कहते थे !उत्पादन करो और मक्खन खाओ ! आज भारत में एक ओर भयानक बेरोजगारी और गरीबी है !और दूसरी और जो उत्तरदायित्त्व के शासकीय पदों पर आसीन है उनमे भयानक कर्तव्यहीनता हराम खोरी और रिश्बत खोरी है !चपरासी से लेकर महत्त्व पूर्ण पदों तक पर नियुक्ति रिश्वत या सिफारिश से होती है !इस महिला का स्वाबलम्बन का उदाहरण अनुकरणीय और ग्रहण करने योग्य है !वह अपने श्रम ,कुशलता और कुशाग्र बुद्धि से ठेले पर कुलचे और छोले बेचते हुए निश्चित ही एक दिन भब्य रेस्टॉरेंट की मालिक बन जायेगी !
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