गीता ज्ञान ====धर्मछेत्रे कुरुछेत्रे १(१) जब भगवान श्री कृष्ण के कौरवों और पांडवों के मध्य शांति स्थापना के सभी प्रयत्न विफल हो गए और दुर्योधन ने यह स्पष्ट कह दिया कि वह बिना युद्ध के पांडवों को उतनी भी भूमि नहीं देगा जितनी सुई की नौक पर आ सकती है !
1 तब श्री कृष्ण ने करण से कहा कि तुम आचार्य द्रोण ,भीष्म और कृपाचार्य कहना कि यह सुखद माघ शीर्ष का महीना चल रहा है ! आज से सातवें दिन अमावस्या होगी उसके देवता इन्द्र होंगे उसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय !युद्ध के लिए कुरुछेत्र की पवित्र भूमि का चयन किया गया था !क्योँकि इस पवित्र भूमि में जो मनुष्य युद्ध में मारे जाएंगे बे स्वर्गलोक की प्राप्तिकरेंगे !सभी कौरव लोभ और मोह से ग्रस्त हो गए थे !लोभ और मोह से ग्रस्त मूढ़ पुरुष धर्म और नीति की बात तो करते हैं ! किन्तु उनका आचरण घोर स्वार्थ निष्ठा के कारण अत्यंत पाप पूर्ण और निकृष्ट होता है !सभी कौरव शव्द ज्ञानी और वेद शाश्त्रों आदि के ज्ञाता थे और धार्मिक रूचि भी उनमे थी ! किन्तु स्वार्थ के कारण उनकी बुद्धि पलट गयी थी !इसीलिए बे अधर्म को हो धर्म मान रहे थे !कौरवों का पिता धृत राष्ट्र अँधा था और पुत्र मोह से ग्रस्त होने के कारण वह भी धर्म के नाम से अधर्म का ही सेवन कर रहा था ! वही इस महाभारत युद्ध की जड़ था ! व्यास जी ने शांति के सभी प्रयत्न विफल हो जाने के बाद धृतराष्ट्र से कहा कि राजन तुम्हारे पुत्रों तथा अन्य राजाओं का मृत्युकाल आ पहुंचा है ! बे जब मृत्यु के अधीन होकर नष्ट होने लगें तब इसे काल का चक्कर समझ कर मन में शोक ना करना ! यदि संग्राम भूमि में इन सबकी अवस्था तुम देखना चाहो तो में तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान कर सकता हूँ ! तुम यहीं बैठे बैठे वहां होने वाले युद्ध का सारा दृश्य अपने आँख सेदेख सकोगे ! किन्तु धृत राष्ट्र ने सिर्फ युद्ध समाचार जान ने की इक्छा प्रकट की और कुटुम्बीजनों का बध देखने के लिए दिव्या दृष्टि प्राप्त करने से अस्वीकार कर दिया ! तब व्यासजी ने धृतराष्ट्र के मंत्री संजय को दिव्य दृस्टि प्रदान की जिस से वह सर्वज्ञ बन गया ! दिव्य दृष्टि से संजय को कोई भी बात प्रकट हो अप्रकट दिन में हो या रात्रि में अथवा वह मन में ही क्यों ना हो संजय को सब जानने में आजाती थी ! संजय दस दिन युद्ध भूमि में रहा जब उसने युद्ध भूमि से लौटकर भीष्म पितामह के युद्ध भूमि में आहत होकर गिर जाने का समाचार धृतराष्ट्र को सुनाया तब धृत राष्ट्र ने संजय से कहा kee कौरवों और पांडवों की सेनाओं का वह युद्ध जिस समय ,जिस क्रम से और जिस रूप में हुआ था वह सब उन्हें बताये ! तब संजय ने दिव्य दृष्टि से युद्ध का बृतान्त का वर्णन प्रारम्भ किया !
------ गांधी जी की यह कल्पना थी कि कौरव पांडव रूपक हैं ! उनके पहले भी कई भाष्यकारों ने कहा है कि मनुष्य के हृदय में कुरुछेत्र है ! कौरव और पांडव मनुष्य के ह्रदय में ही हैं ! आचार्य विनोबा ने गीताई में लिखा है कि कौरव का अर्थ है कर्माशक्त और मूढ़ राजस तामस बृत्ति पांडव अर्थात प्रज्ञाबान ,ज्ञान दृष्टि ,सात्त्विक बृत्ति आसुरी विरुद्ध देवी ,अथवा राजस तामस विरुद्ध सात्त्विक इस प्रकार गीता में इस युद्ध का दुहरा स्वरुप है !
1 तब श्री कृष्ण ने करण से कहा कि तुम आचार्य द्रोण ,भीष्म और कृपाचार्य कहना कि यह सुखद माघ शीर्ष का महीना चल रहा है ! आज से सातवें दिन अमावस्या होगी उसके देवता इन्द्र होंगे उसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय !युद्ध के लिए कुरुछेत्र की पवित्र भूमि का चयन किया गया था !क्योँकि इस पवित्र भूमि में जो मनुष्य युद्ध में मारे जाएंगे बे स्वर्गलोक की प्राप्तिकरेंगे !सभी कौरव लोभ और मोह से ग्रस्त हो गए थे !लोभ और मोह से ग्रस्त मूढ़ पुरुष धर्म और नीति की बात तो करते हैं ! किन्तु उनका आचरण घोर स्वार्थ निष्ठा के कारण अत्यंत पाप पूर्ण और निकृष्ट होता है !सभी कौरव शव्द ज्ञानी और वेद शाश्त्रों आदि के ज्ञाता थे और धार्मिक रूचि भी उनमे थी ! किन्तु स्वार्थ के कारण उनकी बुद्धि पलट गयी थी !इसीलिए बे अधर्म को हो धर्म मान रहे थे !कौरवों का पिता धृत राष्ट्र अँधा था और पुत्र मोह से ग्रस्त होने के कारण वह भी धर्म के नाम से अधर्म का ही सेवन कर रहा था ! वही इस महाभारत युद्ध की जड़ था ! व्यास जी ने शांति के सभी प्रयत्न विफल हो जाने के बाद धृतराष्ट्र से कहा कि राजन तुम्हारे पुत्रों तथा अन्य राजाओं का मृत्युकाल आ पहुंचा है ! बे जब मृत्यु के अधीन होकर नष्ट होने लगें तब इसे काल का चक्कर समझ कर मन में शोक ना करना ! यदि संग्राम भूमि में इन सबकी अवस्था तुम देखना चाहो तो में तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान कर सकता हूँ ! तुम यहीं बैठे बैठे वहां होने वाले युद्ध का सारा दृश्य अपने आँख सेदेख सकोगे ! किन्तु धृत राष्ट्र ने सिर्फ युद्ध समाचार जान ने की इक्छा प्रकट की और कुटुम्बीजनों का बध देखने के लिए दिव्या दृष्टि प्राप्त करने से अस्वीकार कर दिया ! तब व्यासजी ने धृतराष्ट्र के मंत्री संजय को दिव्य दृस्टि प्रदान की जिस से वह सर्वज्ञ बन गया ! दिव्य दृष्टि से संजय को कोई भी बात प्रकट हो अप्रकट दिन में हो या रात्रि में अथवा वह मन में ही क्यों ना हो संजय को सब जानने में आजाती थी ! संजय दस दिन युद्ध भूमि में रहा जब उसने युद्ध भूमि से लौटकर भीष्म पितामह के युद्ध भूमि में आहत होकर गिर जाने का समाचार धृतराष्ट्र को सुनाया तब धृत राष्ट्र ने संजय से कहा kee कौरवों और पांडवों की सेनाओं का वह युद्ध जिस समय ,जिस क्रम से और जिस रूप में हुआ था वह सब उन्हें बताये ! तब संजय ने दिव्य दृष्टि से युद्ध का बृतान्त का वर्णन प्रारम्भ किया !
------ गांधी जी की यह कल्पना थी कि कौरव पांडव रूपक हैं ! उनके पहले भी कई भाष्यकारों ने कहा है कि मनुष्य के हृदय में कुरुछेत्र है ! कौरव और पांडव मनुष्य के ह्रदय में ही हैं ! आचार्य विनोबा ने गीताई में लिखा है कि कौरव का अर्थ है कर्माशक्त और मूढ़ राजस तामस बृत्ति पांडव अर्थात प्रज्ञाबान ,ज्ञान दृष्टि ,सात्त्विक बृत्ति आसुरी विरुद्ध देवी ,अथवा राजस तामस विरुद्ध सात्त्विक इस प्रकार गीता में इस युद्ध का दुहरा स्वरुप है !
