६(८,९)मिटटी पत्थर सोने में समानता तथा अकारण लाभ पहुचाने वाले सुहृद तथा
मित्र शत्रु उदासीन मध्यस्थ द्वेष्य तथा बंधू गणो धर्मात्माओं और
पापों में सामान भाओ रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है मिटटी पत्थर सुवर्ण ये
वस्तुएं हैं तथा सुह्रद आदि व्यक्ति इन सब में समता का भाव उत्पन्नकरने के
लिए मन बुद्धि चित्त अहंकार की ज्ञान से शुद्धि होती है जिस से जीती हुई
इन्द्रिओं की प्राप्ति तथा समस्त विकारों से रहित जीवन चर्या तथा आचरण की
प्राप्ति होती है जिस से परमात्मा काबोध प्राप्त होता
है भगवान की खोज मूर्ति मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे आदि में धर्म के
वाह्य भिन्न प्रकारों के अलावा उसके द्वारा रचित श्रिष्टि में धार्मिक
बंधनो से से उन्मुक्त जीवन दृष्टि से भली प्रकार शुलभ होती है क्योँकि यह
साधक के स्वयं के ज्ञान विज्ञानं पर आधारित होती है धार्मिक संस्थाएं अब कल
बाह्य होती जा रही हैं किसी ज़माने में इन्होने समाज में आत्मतत्त्व का
ज्ञान जन जन तक पहुचने का कार्य किया किन्तु आज ये समाज को विभाजित करने का
काम कर रही है तथा धार्मिक कटटरता की पोषक हो गयी है आज युग की मांग समता
है विषमता और विभाजन नहीं है और युग के अनुकूल सम्भाव युक्त परमात्मा के
बोध के लिए यहा जो बताया गया है उस से जीवन में समत्त्व भाव की प्राप्ति
हो सकती है समता आंतरिक होती है किन्तु वाह्य व्योहार वस्तुओं व्यक्तिओं
के साथ उनकी स्थिति योग्यता आदि के आधार पर ही किया जाता है सोना भी
मिटटी से ही निकलता है किन्तु उसकी कीमत मिटटी के सामान नहीं मानी जा
सकती है इसी प्रकार मित्र और शत्रु यद्द्पि आत्मदृष्टि से एक है किन्तु
व्योहार दृष्टि से समान नहीं समझे जा सकते है यही बात जीवन के अन्य
व्योहारोँ के लिए भी समझनी चाहिए
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