Friday, 11 December 2015

आचार्य रजनीश ने ध्यान से अदभुद शारीरिक आकर्षण प्राप्त कर लिया  था !गहरे ध्यान में उतरने के लिए जिस निर्भयता की आवश्यकताहोती है !वह उनमे थी !जब ध्यानी स्थूल जगत के संपर्क से ध्यानस्थ  होने पर बिलग होता है !तब आतंरिक जगत में प्रवेश में  अभ्यस्त ना होने के कारण साधक भयग्रस्त हो जाता है !और कभी कभी इसके गंभीर परिणाम भी शरीर पर होते हैं !रजनीश दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी थे !उन्होंने विश्व के महान दार्शनिको नीत्शे फ्रायड आदि का गंभीर अध्यन किया था !इसके अलावा ताओ कन्फूसियस आदि की ध्यान विधियों का भी उन्होंने अभ्यास किया था !और यह बे समझते थे की ध्यान के परिणाम हानि प्रद नहीं हो सकते हैं !इसीलिए उन्होंने ध्यान से शक्ति प्राप्त की थी !किन्तु ध्यान से प्राप्त शक्ति का उपयोग उन्होंने आत्मशक्ति की प्राप्ति के लिए ना कर भौतिक शक्ति प्राप्ति के लिए किया !उनमे वैराग्य का सन्यासियों की तरह का भाव नहीं था !उन्होंने ध्यान योग को भोग की चादर में लपेटकर भोग भाव से ग्रस्त नर नारियों युवाओं और युवतियोँ को आकर्षित किया !भोगी व्यक्ति कभी आत्मशांति और अध्यात्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता है !भोग भाव के केंद्र में स्त्रियों के प्रति आकरषण प्रमुख रूप से होता है !रजनीश के सानिध्य में जो ध्यान साधना चलती थी !उसमे युवा यवतियों को शारीरिक सम्बन्ध बंनाने की पूरी आजादी थी !इसिलए भारतीय युवा युवतियां बड़ी संख्या में उनके शिष्य बने !और विदेशी युवा युवतियों में सामान्य तौर पर वैध अवैध यौन सम्बन्ध वर्जित नहीं होते हैं !इसीलिए अपने स्वभाव सिद्ध आचरण में बिना परिवर्तन के उन्हें भी रजनीश की ध्यान साधना ठीक मालूम पड़ी !रजनीश के सन्यासी और सन्यासिन सभी यौन सम्बन्ध बनाते थे इन सन्यासियोँ के नमो में सबसे विकृत और अनर्थकारी बात यह थी कि सन्यासिन माँ आनंद शीला माँ योग प्रभा ,माँ ज्योतिर्मयी आदि कहलाती थी !और सन्यासी प्रज्ञान भारती स्वामी वेदांत स्वामी दिव्य चक्छु आदि नाम धारी होते थे !इन नामों की पवित्रता रजनीश ने नष्ट कर दी थी !जिस महिला को हम माँ कहकर सम्बोधित करते हैं !वह सम्बोधन करने वाले पुत्रबत व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध कैसे कर सकती है ?  !उनके आश्रम में ध्यान से प्राप्त समाधि का नाटक करते हुए !उनके सन्यासी काम भोग में मगन  होकर एक दूसरे से लिपटजाते थे !यही उनकी सम्भोग से समाधी की अवधारणा थी !माँ शीला रजनीश की लम्बे समय तक विश्वास पात्र रही !और सन्यासिनी के रूप में इन्होने भरपूर यौन सुख भी भोगा !किन्तु अमेरिका में इनको काराबास की सजा भी हुई !और रजनीश के साथ अंतरंग जीवन जीने वाली शीला आज रजनीश की घोर विरोधी है !शीला और रजनीश का संयोग योग के नाम पर भोग प्रधान था  !और भोग प्रधान सम्बन्ध जहां अन्य स्त्री पुरुषों का भी प्रवेश हो स्थायी नहीं रह सकता है !उसमे अवश्य दरार पड़ती है !और उस दरार से शत्रुता का जन्म होता है !शीला रजनीश के बारे में तो बता रही हैं !किन्तु अपने बारे में सही तथ्योँ को छिपा रही हैं !इनके कुकर्मों और रजनीश के प्रति विश्वासघात की फेहरिस्त भी बहुत लम्बी है !

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