परमात्मा
अजर अविनाशी अजन्मा है यह सिद्धांत अन्य धर्मों की तरह वैदिक धर्म को भी
मान्य है क्योँकि यही सत्य है किन्तु शरीरों में तथा समस्त पदार्थों में
परमात्मा का बास है इसका अनुभव साधना से आता है जो जीव हत्या करते है तथा
जगत के छण भंगुर स्वभाव को आँखोँ से देखते हुए भी तथा अनुभव करते हुए भी
कामनाओं की तृप्ति के लिए संसार की व्यबस्थाओं को बिगड़ कर नारकीय जीवन की
स्थापना कर देते हैं और सभी व्यबस्थाओं साधनो पर आधिपत्य स्थापित कर लेते
है और सन्सार का वास्तविक स्वरुप समझ कर जीने वाले
साधु पुरुषों का नाश करना शुरू कर देते हैं और इस नारकीय स्थिति को समाप्त
करने के मानवीय प्रयास कम पड़ते है तब इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वह
परमशक्ति युगानुसार भिन्न रूपों स्वरूपों में जन्म नहीं अवतार ग्रहण करती
है अवतार और जन्म में फर्क है जन्म हमारे पूर्व कर्मों के कारण होता है
किन्तु अवतार व्यबस्था के सुधार के लिए होता है भोग परायण दुष्ट लोग
परमात्मा के अवतार तत्त्व का रहस्य न समझ कर उनको मानव शरीर धारी समझ कर
उनकी अविज्ञा करते हैं बुद्धिं हीन पुरुष परमात्मा के उत्तम अविनाशी परम
भाव को ना जानते हुए मन इन्द्रिओं से परे सच्चिदानंद परमात्मा को भी मनुष्य
भाव को ही प्राप्त हुआ मानते है दुष्ट मनुष्योँ में भोग भाव इतना प्रबल
होता है की भोगों की प्राप्ति कराने वाले भगवान का बे अपने हित पोषण के लिए
निर्माण कर लेते हैं और विनाश को प्राप्त होते हैं किन्तु अवतार दुष्टों
की क्रियाओं के अनुसार कभी वैचारिक सुधार करता है और कभी जैसे कुछ वस्तुएं
जब उपयोगी नहीं रहती हैं तो उनको बदलना होता है इसी प्रकार उनके शरीरों के
विनाश का उपाय करना पड़ता है अवतार अपने कार्योँ से नवीन धार्मिक जीवन
दृष्टि भी प्रदान करता है इस प्रकार अवतार कार्य दुष्टों का विनाश और धर्म
की स्थापना करता है
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