Wednesday, 9 December 2015

में १९६१ में महाकौशल महाविद्यालय में एम ये प्रथम बर्ष का छात्र था !उक्त विद्यालय में आचार्य रजनीश दर्शन शाश्त्र के प्राध्यापक थे !महाकौशल महाविद्यालय पूर्व में राबर्टसन कॉलेज कहलाता था !आचार्य रजनीश सफ़ेद धोती कुर्ता पहने और पैरों में चप्पले पहने हुए लेडीज साइकिल से आते थे !उनका व्यक्तित्त्व अत्यंत आकर्षक था ! जो सहज ही लोगों का ध्यान अपने आप खींच लेता था !उनका भासण अत्यंत प्रभाव शाली होता था !उनकी वाणी में विलक्छण आकर्षण  था !मेने उनका भासण तरन तारण  जयंती पर जबलपुर में फुहारा पर सुना था !इसके अलावा भी एकाध बार उनको विचार गोष्ठी में भी शाहीद स्मारक में उनको सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था !रजनीश जी अपने उन्मुक्त विचारों और उन्मुक्त जीवन चर्या के कारण जबलपुर में भी विवादित थे !बाद में त्यागपत्र देकर बे भगवान रजनीश बने और अंत में ओशो के नाम से विख्यात हुए !उनकी मृत्यु भी बहुत संदिग्ध स्थितिमे हुई !उनके समर्थक यह कहते हैं !अमेरिका में उनको जहर दिया गया था ! जिस से उनकी धीरे धीरे मृत्युहो गयी !उन्होंने कोई भी पुस्तक नहीं लिखी !जो प्रवचन उन्होंने दिये थे उन्ही प्रवचनों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करदिया गया है !उन्होंने अपनी व्याख्याओं में धर्म की जो व्याख्या प्रस्तुत की उसमे संयम इन्द्रिय निग्रह ब्रह्मचर्य आदि को पूरी तरह से नकार दिया था !और उन्होंने सन्यासी का एक विचित्र स्वरूपप्रस्तुत किया !उनकी सभी सन्यासिने माँ के नाम से सम्बोधित होती थी और जो लोग उनको माँ कहकर बुलाते थे ! उनमे से उनकी इक्छा से किसी के साथ  उनके यौन सम्बन्ध भी स्थापित होते थे !जिस संन्यास की सिद्धि तपस्या और ब्रह्मचर्य से होती थी !उसकी सिद्धि आचार्य  रजनीश ने  भोग और  काम की तृप्ति से जोड़ दी थी !उनका संन्यास योग प्रधान नहीं भोग प्रधान था !उनकी ध्यान की विधियोँ में किसी भी प्रकार के प्राचीन काल के इन्द्रिय संयमकी मर्यादा और आवश्यकता  नहीं थी !इसीलिए उनकी यह ध्यान पद्धति जिसमें संयम की आवश्यकता नहीं थी !पश्चिमी देशों के युवाओं युवतियोँ  और भारत के धनी युवकों को बहुत पसंद आई !और बे ही उनके शिष्य हुए ! और उन्ही से आचार्य रजनीश   को रोल्स रॉयस कारों की उपलब्धि हुई !मेरी अपनी समझ यह है !कि आचार्य रजनीश ने गहरी ध्यान समाधि से प्राप्त ऊर्जा का प्रयोग आत्मलाभ के साथ भौतिक समृद्धिके लिए भी   किया ! !देश में जितने भी उच्च कोटि  के साधु संत और महात्मा सन्यासी आदि  हुए हैं !बे आत्मशक्ति का प्रयोग सिर्फ  परमत्मशक्तिके लिए ही करते रहे हैं  !बुद्ध महावीर आदि के जीवन इस तथ्य के प्रत्यक्छ प्रमाण है !आचार्य रजनीश के पूर्व ऐसे किसी आध्यात्मिक संत का जीवन वृतांत  मालूम नहीं पड़ता है ! जिसने योग से भोग प्राप्त किया  हो !योग के लिए ऐश्वर्य राज्य धनसम्पत्ति भोग छोड़ने के सहस्त्रों उदाहरण हैं !

No comments:

Post a Comment