Wednesday, 30 December 2015

७(३०)अधिभूत अर्थात समस्त भौतिक श्रिष्टि जिसका जन्म विकास और मरण होता रहता है अधिदैव अर्थात स्थूल भौतिक श्रिष्टि को धारण करने वाली आतंरिक शक्ति जो अहंकार सहित होती है तथा जो निरंतर मनुष्य को शरीर केन्द्रित बनाये रखती है और वह निरंतर अपने ही विकास में लगा रहता है औरअधियज्ञ अर्थात आत्मा जो सभी जगत में समान रूप से व्याप्त है जो मूल रूप से परमात्मा ही हैजो पुरष सबके आत्मरूप परमात्मा में ही संपूर्ण जगत को देखता है वह पुरुष अंत में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है जैसे जैसे व्यक्ति साधना से शरीर भाव से मुक्त होकर आत्म भाव अर्थात संपूर्ण जगत में एक ही आत्मा व्याप्त है को प्राप्त होताजाता है उसकी समस्त शरीर धारिओं में भेद दृष्टि समाप्त होती जाती है और उसको चींटी कुत्ते गधे महापुरुष और मंद बुद्धि में एक ही आत्मा का अनुभब होने लगता है तब उसके बाह्य व्योहार में तो यथा योग्य भेद तो रहता है अर्थात बाह्य दृष्टि से वह कुत्ते को कुत्ता और हाथी को हाथी समझता है किन्तु उसकी आंतरिक दृष्टि सभी में एक ही आत्मा का बास है इससे युक्त रहती है और आत्मा ही परमात्मा है इसका बोध उसको स्पष्ट हो जाता है इसलिए उसकी सभी में समदृष्टि हो जाती है और सभी आत्मा धारी शरीरों को उनके पूर्व जन्मों का फल समझ कर सभी प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से सभी कार्य करने लगता है अर्थात उसके सभी कर्त्तव्य आत्म दृष्टि से निष्पादित होने लगते हैं इसलिए वह अंत समय में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है

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