Thursday, 31 December 2015

गीता ज्ञान ====धर्मछेत्रे कुरुछेत्रे १(१) जब भगवान श्री कृष्ण के कौरवों और पांडवों के मध्य शांति स्थापना के सभी प्रयत्न विफल हो गए और दुर्योधन ने यह स्पष्ट कह दिया कि वह  बिना युद्ध के  पांडवों को उतनी भी भूमि नहीं देगा जितनी सुई की नौक पर आ सकती है ! 







1 तब श्री कृष्ण ने करण   से कहा कि तुम आचार्य द्रोण ,भीष्म और कृपाचार्य कहना कि यह  सुखद माघ शीर्ष  का महीना चल रहा है ! आज से सातवें दिन अमावस्या होगी उसके देवता इन्द्र होंगे उसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय !युद्ध के लिए कुरुछेत्र की पवित्र भूमि का चयन किया गया था !क्योँकि इस पवित्र भूमि में जो मनुष्य युद्ध में मारे जाएंगे बे स्वर्गलोक की प्राप्तिकरेंगे !सभी कौरव लोभ और मोह से ग्रस्त हो गए थे !लोभ और मोह से ग्रस्त मूढ़ पुरुष धर्म और नीति की बात तो करते हैं ! किन्तु उनका आचरण घोर स्वार्थ निष्ठा के कारण अत्यंत पाप पूर्ण और निकृष्ट होता है !सभी कौरव  शव्द ज्ञानी और वेद शाश्त्रों आदि के ज्ञाता थे और धार्मिक रूचि भी उनमे थी ! किन्तु स्वार्थ के कारण उनकी बुद्धि पलट गयी थी !इसीलिए बे अधर्म को हो धर्म मान रहे थे !कौरवों का पिता धृत राष्ट्र अँधा था और पुत्र मोह से ग्रस्त होने के कारण वह भी धर्म के नाम से अधर्म का ही सेवन कर रहा था ! वही इस महाभारत युद्ध की जड़ था ! व्यास जी ने शांति के सभी प्रयत्न विफल हो जाने के बाद धृतराष्ट्र से कहा कि  राजन तुम्हारे पुत्रों तथा अन्य राजाओं का मृत्युकाल आ पहुंचा है ! बे जब  मृत्यु के अधीन होकर नष्ट होने लगें तब इसे काल का चक्कर समझ कर मन में शोक ना करना ! यदि संग्राम भूमि में इन सबकी अवस्था तुम देखना चाहो तो में तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान कर सकता हूँ !  तुम यहीं बैठे बैठे वहां होने वाले युद्ध का सारा दृश्य अपने आँख सेदेख सकोगे  ! किन्तु धृत राष्ट्र ने सिर्फ युद्ध समाचार जान ने की इक्छा प्रकट की और कुटुम्बीजनों का बध देखने के लिए दिव्या दृष्टि प्राप्त करने से अस्वीकार  कर दिया ! तब व्यासजी ने धृतराष्ट्र के मंत्री संजय को दिव्य दृस्टि प्रदान की जिस से वह सर्वज्ञ बन गया ! दिव्य दृष्टि से संजय को कोई भी बात प्रकट हो अप्रकट दिन में हो या रात्रि में अथवा वह मन में ही क्यों ना हो संजय को सब जानने में आजाती थी ! संजय दस दिन युद्ध भूमि में रहा जब उसने युद्ध भूमि से लौटकर भीष्म पितामह के युद्ध भूमि में  आहत होकर गिर जाने का समाचार धृतराष्ट्र को सुनाया तब धृत राष्ट्र ने संजय से कहा kee कौरवों और पांडवों की सेनाओं का वह युद्ध जिस समय ,जिस क्रम से और जिस रूप में हुआ था वह सब उन्हें बताये ! तब संजय ने दिव्य दृष्टि  से युद्ध का बृतान्त का वर्णन प्रारम्भ किया !
------ गांधी जी की यह कल्पना थी कि कौरव पांडव रूपक हैं  ! उनके पहले भी कई भाष्यकारों ने कहा है कि मनुष्य के हृदय में कुरुछेत्र है ! कौरव और पांडव मनुष्य के ह्रदय में ही हैं ! आचार्य विनोबा ने गीताई में लिखा है कि कौरव का अर्थ है कर्माशक्त और मूढ़ राजस तामस बृत्ति पांडव अर्थात प्रज्ञाबान ,ज्ञान दृष्टि ,सात्त्विक बृत्ति आसुरी विरुद्ध देवी ,अथवा राजस तामस विरुद्ध सात्त्विक इस प्रकार गीता में इस युद्ध का दुहरा स्वरुप है !

Wednesday, 30 December 2015

७(३०)अधिभूत अर्थात समस्त भौतिक श्रिष्टि जिसका जन्म विकास और मरण होता रहता है अधिदैव अर्थात स्थूल भौतिक श्रिष्टि को धारण करने वाली आतंरिक शक्ति जो अहंकार सहित होती है तथा जो निरंतर मनुष्य को शरीर केन्द्रित बनाये रखती है और वह निरंतर अपने ही विकास में लगा रहता है औरअधियज्ञ अर्थात आत्मा जो सभी जगत में समान रूप से व्याप्त है जो मूल रूप से परमात्मा ही हैजो पुरष सबके आत्मरूप परमात्मा में ही संपूर्ण जगत को देखता है वह पुरुष अंत में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है जैसे जैसे व्यक्ति साधना से शरीर भाव से मुक्त होकर आत्म भाव अर्थात संपूर्ण जगत में एक ही आत्मा व्याप्त है को प्राप्त होताजाता है उसकी समस्त शरीर धारिओं में भेद दृष्टि समाप्त होती जाती है और उसको चींटी कुत्ते गधे महापुरुष और मंद बुद्धि में एक ही आत्मा का अनुभब होने लगता है तब उसके बाह्य व्योहार में तो यथा योग्य भेद तो रहता है अर्थात बाह्य दृष्टि से वह कुत्ते को कुत्ता और हाथी को हाथी समझता है किन्तु उसकी आंतरिक दृष्टि सभी में एक ही आत्मा का बास है इससे युक्त रहती है और आत्मा ही परमात्मा है इसका बोध उसको स्पष्ट हो जाता है इसलिए उसकी सभी में समदृष्टि हो जाती है और सभी आत्मा धारी शरीरों को उनके पूर्व जन्मों का फल समझ कर सभी प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से सभी कार्य करने लगता है अर्थात उसके सभी कर्त्तव्य आत्म दृष्टि से निष्पादित होने लगते हैं इसलिए वह अंत समय में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है
७(३०)अधिभूत अर्थात समस्त भौतिक श्रिष्टि जिसका जन्म विकास और मरण होता रहता है अधिदैव अर्थात स्थूल भौतिक श्रिष्टि को धारण करने वाली आतंरिक शक्ति जो अहंकार सहित होती है तथा जो निरंतर मनुष्य को शरीर केन्द्रित बनाये रखती है और वह निरंतर अपने ही विकास में लगा रहता है औरअधियज्ञ अर्थात आत्मा जो सभी जगत में समान रूप से व्याप्त है जो मूल रूप से परमात्मा ही हैजो पुरष सबके आत्मरूप परमात्मा में ही संपूर्ण जगत को देखता है वह पुरुष अंत में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है जैसे जैसे व्यक्ति साधना से शरीर भाव से मुक्त होकर आत्म भाव अर्थात संपूर्ण जगत में एक ही आत्मा व्याप्त है को प्राप्त होताजाता है उसकी समस्त शरीर धारिओं में भेद दृष्टि समाप्त होती जाती है और उसको चींटी कुत्ते गधे महापुरुष और मंद बुद्धि में एक ही आत्मा का अनुभब होने लगता है तब उसके बाह्य व्योहार में तो यथा योग्य भेद तो रहता है अर्थात बाह्य दृष्टि से वह कुत्ते को कुत्ता और हाथी को हाथी समझता है किन्तु उसकी आंतरिक दृष्टि सभी में एक ही आत्मा का बास है इससे युक्त रहती है और आत्मा ही परमात्मा है इसका बोध उसको स्पष्ट हो जाता है इसलिए उसकी सभी में समदृष्टि हो जाती है और सभी आत्मा धारी शरीरों को उनके पूर्व जन्मों का फल समझ कर सभी प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से सभी कार्य करने लगता है अर्थात उसके सभी कर्त्तव्य आत्म दृष्टि से निष्पादित होने लगते हैं इसलिए वह अंत समय में परमात्मा को ही प्राप्त हो जाता है
जब पांडव बनवास में रह रहे थे !तब युधिस्ठर ने मार्कण्डेय ऋषि से अपना दुःख व्यक्त करते हुए पूंछा था कि क्या हमलोगों से अधिक भाग्यहीन कोई व्यक्ति इस संसार में है ?हमलोग सत्यनिष्ठ और धर्मपर्याण जीवन जीते हुए घोर कष्ट प्रद बनवासी जीवन जी रहे हैं !और पापियों में प्रधान दुर्योधन भोग और ऐश्वर्य युक्त जीवन जी रहा है !शाश्त्रों में ऐसा वर्णन आता है कि मार्कण्डेय ऋषि की आयु लाखों वर्ष की है !उन्होंने युधिस्ठर से कहा कि कभी कभी अनीति से भी व्यक्ति धनसम्पत्ति और शक्ति ,वैभव ,कीर्ति ,पद प्रितिस्था प्राप्त करता है भोग भोगता है !किन्तु उसका जड़मूल से विनाश हो जाता है !उसके द्वारा किये गए पापों का फल उसके नाती पोते तक भोगते हैं !इसीलिए तुम शोाक मत करो दुःख तो भगवान राम और और अनेकों श्रेष्ठ पुरुषों को भोगना पड़ा था !तुम शीघ्र ही हस्तिनापुर का राज्य प्राप्त कर सारी पृथ्वी के सम्राट बनोगे और दुर्योधन मय अपने भाईओं और सहयोगी राजाओं के सहित विनाश को प्राप्त हो जाएगा !और यह हुआ भी !स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में राजतंत्र और जमींदारी का विनाश हुआ !और जो परम्परा से पीढ़ियों से धनवान पुरुष थे उनमे से भी अधिकांश लुप्त हो गए हैं !उनके स्थान पर नए राजे महाराजे और धन्नासेठ उत्पन हो गए हैं !जिनकी जीवनशैली और रहन सहन और ठाठ बाट राजाओं ,महाराजाओं को भी भोग ऐश्वर्य में पराजित कर रहा है !अडानी ,अम्बानी आदि ऐसे ही उद्योग समूह हैं !जिनमे से कुछ देश की सेवा भी कर रहे हैं !और कुछ सत्ता के सहयोग और संरक्छण से ऐश्वर्य के आकाश में विचरण कर रहे हैं !उनकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगनी हबा की गति से बृद्धि को प्राप्त हो रही है !दूसरी और देश में भयानक गरीवी है !और किसान आत्महत्या कर रहे हैं !अगर ये वर्तमान के लोकतंत्र में जन्मे राजे महाराजे अपनी ही संपत्ति और पारिवारिक समृद्धि में ही संलग्न और समर्पित रहते हैं !और पूर्व वर्ती राजाओं ,महाराजाओं और जमींदारों के विनाश को दृष्टिगत नहीं रखते है !अपने निकृष्ट और निहित स्वार्थों की पूर्ति में ही संलग्न रहते  हैं !तो फिर यह उसी इतिहास को दुहरा रहेहैं !
बाबा रामदेव सन्यासी का वेश धारण कर के व्योपार कर रहे हैं !और बहुतसी आयुर्वेदिक औषधियों  और गृह उपयोग में आने वाली वस्तुओं का उत्पादन भी कर रहे हैं !उनका लक्छ्य अपने व्योपार को ५००० ,६००० करोड़ तक पहुंचाने का है !सन्यास वेश धारी होने और योग गुरु के स्वरुप में विख्यात होने के कारण उनके उत्पादों की प्रमाणिकता आम जनता में है !अब जो समाचार उनके उत्पादों की प्रमाणिकता के विरुद्ध आरहे हैं !और उनके बहुत से उत्पाद घटिया और अशुद्ध सिद्ध हो रहे हैं ! तथा स्थापित मानदंडो की पूर्ति नहीं कर रहे हैं !परिणाम स्वरुप उत्पादों की बिक्री में कमी आसक्ती है !उत्पादों की बिक्री में कमी आने से तो व्योपारिक घाटा हो सकता है !वह बहुत चिंता का विषय नहीं है !क्योँकि व्योपार में नफा नुक्सान तो होता ही रहता है !किन्तु बाबा रामदेव के सन्यासी वेश के कारण जो तपोनिष्ठ गृहत्यागी श्रेष्ठ निस्पृही सन्यासियों के प्रति भी संदेह आमजन में होगा !वह छति कभी पूरी नहीं की जा सकेगी !इसीलिए बाबा रामदेव को या तो भगवा वस्त्र त्याग कर शुद्ध व्योपारी बन जाना चाहिए !या फिर सन्यास का अनासक्त तपोनिष्ठ स्वरुप कायम रखते हुए अपने उत्पादों की श्रेष्ठ गुणबत्ता कायम रखना चाहिए !तथा एक भी अप्रमाणिक तथ्य प्रस्तुत नहीं करना चाहिए !जो लिखा या कहा जय वह सत्य और प्रामाणिक होना चाहिए !

Long awaited right decision.Kashmiri Pandits had suffered unbearable cruelity and agony at the hands of Kashmiri fundamentalist separatists.They had to flee from their homeland and were leading and living lives of refugees in their own country.No government bothered togive them justice.They became the prey of separatists and suffered injustice at the hands of their governments.Governments had turned deaf ears to their agony.Now prliament has passed resolution for their safe return to their homeLand.Kashmiri Pundits must also garner courage to counter the attacks of coward fundamentalists and must not flee and tumble down against the tyranny of separatist fundamentalists

Tuesday, 29 December 2015

अगर सेंसर बोर्ड ने हिन्दू वादी संघठनो की तथा धर्माचार्यों की मांग फिल्म से विवादास्पद दृश्यों को निकालने की बात मान ली होती तो कई दिनों से चला आरहा यह आंदोलन उग्र हो कर तोड़ फोड़ में तब्दील नहीं होता अभी भी मांगे स्वीकार करने से स्थिति और बदतर होने से रोकी जा सकती है धर्म के मामले में लोगों की आश्था जुडी होती है इसलिए जब विरोध शरू हो जाता है तो बहुत से लोग धर्म के लिए बिना कुछ सोचे समझे विरोध में शामिल हो जाते हैं धर्म में अधर्म और अंधश्रद्धा कोई नयी बात नहीं है सभी धर्मों में यह है किन्तु धर्म का कोई विकल्प नहीं है न ही धर्म को समाप्त किया जा सकता है और धर्म के विरोध की इज़ाज़त उन लोगों को तो विल्कुल ही नहीं दी जा सकती है जो खुद बिगड़े हुए है और धर्म में पाखंड अन्धविश्वास दिखा बताकर स्वार्थ की रोटीआं सेंकते है और रुपया कमाते है इसलिए यह ठीक होगा की फिल्म से हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाले सीन निकाल दिए जाय नहीं तो विरोध और भी उग्र हो सकता है
७(२९)सभी शरीर धारिओं के लिए बृद्धावस्था और मरण ये दो अत्यंत दुःख दाई होते हैं मृत्यु और बृद्धावस्था दोनों ज्ञान प्राप्ति और जन्म मरण से मुक्ति दिलाने वाले हो सकते हैं इस तथ्य का उद्घाटन करते हुएश्री कृष्ण कहते हैं जो परमात्मा के शरणागत होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं बे लोग उस ब्रह्म को संपूर्ण अध्यात्म को तथा संपूर्ण कर्म को जान जाते हैं लोग जन्म लेने के बाद जैसे जैसे विकसित आयु को प्राप्त होते जाते है बृद्धावस्था तक अपने निज आत्मा को जानने का प्रयत्न नहीं करते हैं और न यह समझने की चेस्टा करते हैं की बृद्धावस्था शरीर के विकास क्रम में एक निश्चित अपरिवर्तनीय अवस्था है इस से कोई कितना भी प्रयत्न करे बच नहीं सकता है इसी प्रकार शरीर की मृत्यु भी स्वाभाविक है किन्तु शरीर को धारण करने वाली आत्मा की न मृत्यु है और न उसमे परिवर्तन होता है वह अविनाशी और सभी प्रकार के परिवर्तनों से मुक्त है संसार समाज को जानने के लिए कर्मेन्द्रिओं और ज्ञानेन्द्रिओं की आवश्यकता होती है क्योँकि शरीर और संसार का स्वभाव एक सा है जिसप्रकार शरीर में परिवर्तन होते हैं उसी प्रकार से संसार में भी निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं आत्मा और परमात्मा एक स्वभाव के हैं न परमात्मा की मृत्यु होती है और न उनमे परिवर्तन होता है इसी प्रकार न आत्मा की मृत्यु होती है और न परिवर्तन होता है इसलिए आत्मा सरीर में रहते हुए भी सरीर से पृथक है इसके लिए उसको परमात्मा का आश्रय लेना पड़ता है तभी वह ब्रह्म एक निगुण निराकार संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एकशक्ति है इसका अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करता है और वह इस बोध को भी प्राप्त हो जाता है की मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं तथा संपूर्ण कर्मो के रहस्य को समझ लेता है की सभी कर्मों का प्रारम्भ और अंत होता है और बे शरीर द्वारा किये जाते है आत्मा अकर्ता है इस प्रकार समझ कर मनुष्य जरा मरण के भय से मुक्त होकर परमात्मा आत्मा अध्यात्म कर्म का वास्तविक स्वरुप समझ कर जन्म जरा और मरण से मुक्त हो जाता है

Monday, 28 December 2015

Gandhi ji lived and preached nonviolence and truth all through his life.Truth and Nonviolence are perennial .They can not be substituted or replaced.they must be made the vehicle of all sort of actions.If some body wants to follow Gandhiji he will have to inculcate in himself this trend and trait in hislife
परमात्मा अजर अविनाशी अजन्मा है यह सिद्धांत अन्य धर्मों की तरह वैदिक धर्म को भी मान्य है क्योँकि यही सत्य है किन्तु शरीरों में तथा समस्त पदार्थों में परमात्मा का बास है इसका अनुभव साधना से आता है जो जीव हत्या करते है तथा जगत के छण भंगुर स्वभाव को आँखोँ से देखते हुए भी तथा अनुभव करते हुए भी कामनाओं की तृप्ति के लिए संसार की व्यबस्थाओं को बिगड़ कर नारकीय जीवन की स्थापना कर देते हैं और सभी व्यबस्थाओं साधनो पर आधिपत्य स्थापित कर लेते है और सन्सार का वास्तविक स्वरुप समझ कर जीने वाले साधु पुरुषों का नाश करना शुरू कर देते हैं और इस नारकीय स्थिति को समाप्त करने के मानवीय प्रयास कम पड़ते है तब इस स्थिति को समाप्त करने के लिए वह परमशक्ति युगानुसार भिन्न रूपों स्वरूपों में जन्म नहीं अवतार ग्रहण करती है अवतार और जन्म में फर्क है जन्म हमारे पूर्व कर्मों के कारण होता है किन्तु अवतार व्यबस्था के सुधार के लिए होता है भोग परायण दुष्ट लोग परमात्मा के अवतार तत्त्व का रहस्य न समझ कर उनको मानव शरीर धारी समझ कर उनकी अविज्ञा करते हैं बुद्धिं हीन पुरुष परमात्मा के उत्तम अविनाशी परम भाव को ना जानते हुए मन इन्द्रिओं से परे सच्चिदानंद परमात्मा को भी मनुष्य भाव को ही प्राप्त हुआ मानते है दुष्ट मनुष्योँ में भोग भाव इतना प्रबल होता है की भोगों की प्राप्ति कराने वाले भगवान का बे अपने हित पोषण के लिए निर्माण कर लेते हैं और विनाश को प्राप्त होते हैं किन्तु अवतार दुष्टों की क्रियाओं के अनुसार कभी वैचारिक सुधार करता है और कभी जैसे कुछ वस्तुएं जब उपयोगी नहीं रहती हैं तो उनको बदलना होता है इसी प्रकार उनके शरीरों के विनाश का उपाय करना पड़ता है अवतार अपने कार्योँ से नवीन धार्मिक जीवन दृष्टि भी प्रदान करता है इस प्रकार अवतार कार्य दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना करता है

Thursday, 17 December 2015

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजनेता एक दूसरे पर प्रहार करते रहते हैं !और सभी राजनेता राजनीति में भ्रष्टाचार से पोषित होकर ही  गाओं सभा से लेकर  संसद तक पहुँचने की अपनी यात्रा पूरी करते हैं !तथा प्रधानमन्त्री से लेकर गाओं सभा के प्रधान तक की प्राप्ति भी भ्रष्टाचार के द्वारा ही प्राप्त करते हैं !भ्रष्टाचार का यह दौर अभी थमेगा नहीं  ! राजनेताओं के भ्रष्टाचार ने जीवन के सभी छेत्रों शिक्छा स्वास्थ्य ,न्याय, व्योपार ,अधिकारीयों आदि में प्रवेश करा दिया है !बर्तमान भारत में सभी प्रकार का मान सम्मान पद प्रितिष्ठा भ्रष्ट लोगों को ही प्राप्त है !भ्रष्टाचार आचरण में ग्राह्य किन्तु शव्दों में बहिष्कृत है ! भ्रष्टाचार जन सहयोग से संचालित  हो रहा है !इसका खुला दर्शन चुनाव में होता है !और छिपा हुआ अनुभव अधिकारियोँ और कर्मचारियों से जब किसी का संपर्क होता है  तब !आता है !जैसे बीमारियों के विविध रूप है !ऐसे ही भ्रष्टाचार भी देश में विविध  रूपों स्वरूपों में विद्यमान है ! सभी प्रकार  के भ्रष्टाचार के केंद्र में रुपया की प्राप्ति ही महत्त्व पूर्ण है !जिनके पास वैधानिक अवैधानिक ढंग से प्राप्त रुपया है !उनको सभी प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त हैं !और जिनके पास रुपया नहीं है !वे जीवन की जरुरी आवश्यकताएं  भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं ! !जबकि रुपया सरकारी प्रेस में छपता है !और इसका आंतरिक मूल्य शून्य है !इसीलिए इस रूपया के संग्रह और उपार्जन में संलग्न व्यक्तियों का भी आतंरिक मूल्य शून्य है !भ्रष्टलोग फूले हुए गुब्बारे के समान है !जिनका आकर बड़ा है किन्तु बजन कुछ भी नहीं है !रूपया उपार्जन में लगे ये अन्धभक्त रूपया के संग्रह में लगे हुए हैं !इनकी दृष्टि रूपया से प्राप्त होने वाली भ्रष्ट सेवाओं और मिलाबटी खाद्य पदार्थों की और नहीं है !भ्रष्ट लोग उस डाल को काट रहे हैं जिस पर ये बैठे हैं !भारत धार्मिक देश हैं !यहाँ जब जब राक्छ्सिओं और दैत्यों से जनमानस पीड़ित हुआ है !भगवान स्वयं अवतरित होकर उनका विनाश करते हैं !भ्रष्टाचार के दानव का अंत भी कोई देवनिर्मित महापुरुष ही करेगा !तब तक सामान्य लोगों को इन भ्रष्ट दानवों से त्रस्त रहकर पीड़ा  भोगनी ही पड़ेगी !

Tuesday, 15 December 2015

राजनीति में प्रमाणिकता और विश्वसनीयता नष्ट करने का काम सत्ताभोग से पीड़ित राजनेताओं ने ही किया है !अब यह पुब्लिक तक पहुँच गयी है !देश में अविश्वसनीयता का घोर अन्धकार छा गया है !और यह राजनेताओं के कारण और गहराता जा रहा है !प्रमाण और विश्वसनीयता रहित लोकतंत्र षड़यंत्र तंत्र बनजाता है !भारत का लोकतंत्र वैसा ही बनता दिखाई दे रहाहै !देश में  सीबीआई जैसे  सबसे बड़े  अपराधों की जाँच तंत्र t पर भी विपक्छी नेता सरकार के दबाव में काम करने और विरोधियों को फ़साने का आरोप लगाते रहे हैं !और सत्ता धारी दल हमेशा उसका बचाव करता रहा है !सत्य हमेशा पक्छपात के कारण लुप्त रहा है !इस समय केंद्र में जो पार्टी सत्ता में है !वह भी जब कांग्रेस सत्ता में रही तो सीबीआई पर सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाती रही है !और कांग्रेस सीबीआई की निष्पक्छता का बचाव करती थी !अब कांग्रेस सहित आम आदमी पार्टी सीबी आई पर सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगा रही है !सीबीआई जाँच में जिन राजनेताओं पर आय से अधिक संपत्ति संग्रह के आरोप लगे थे !बे भी सीबीआई पर सरकार के दबाव में उनपर झूठे आरोप लगाने की बात कहते हैं !सुप्रीम कोर्ट ने तो सीबीआई को सरकारी तोता तक कहने के साथ यह तक कहा तथा कि इसकी जाँच के लिए भी कोई जाँच एजेंसी निर्मित करनी पड़ेगी !सीबीआई सरकारी दबाव में या कानून के अंतर्गत कार्य करता है या नहीे? !इसकी तथ्यसंगत जाँच की जानी चाहिए !और इसमें पूर्व सीबीआई के अधिकारियों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की जाँच समिति गठित की जानी चाहिए !ताकि वास्तविकता उजागर हो !और उसमे तदनुसार सुधार किये जा सकें !सीबीआई ने जो कार्यबाही दिल्ली सरकार के प्रमिख सचिव के विरुद्ध की है !तथा उसके कार्यालय पर छापा मारी की है !उसका तीव्र विरोध दिल्ली के मुख्यमंत्री ने किया है !और प्रधानमंत्री के विरुद्ध अत्यंत अभद्र शव्दों का प्रयोग किया है !जो नहीं किया जाना चाहिए था !यह आरोप भी सही प्रतीत नहीं होता है !की छापेमारी की कार्यबाही प्रधानमन्त्री के निर्देश या आदेश पर हुई है !देश का प्रधानमन्त्री इतने  निचले स्तर तक नहीं उत्तर सकता कि बो किसी अधिकारी से कहे की तुम किसी प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध झूठा मुकदद्मा दायर करो और मुख्यमंत्री के कार्यालय पर छापामारी करो !दिल्लीके मुख्य सचिव के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं !उसी सन्दर्भ में यह  छापामारी उसके कार्यालय पर हुई है !चूँकि वह मुख्यमंत्री से सम्बद्ध है !और उनके कार्यालय में बैठता है !इसिलए सीबीआई को वहां जाँच के लिए जाना पड़ा होगा !सीबीआई अपराध दर्ज होने के बाद जांच करती है !और जांच के लिए उसको किसी मुख्यमंत्री या मंत्री की इजाजत  लेने की आवश्यकता नहीं है !सीबीआई किसी अपराध की रपोर्ट खुद नहीं करती है !पीड़ित व्यक्ति की रिपोर्ट पर जांच करती है !इसलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री जो भ्रष्टाचार के विरोधी हैं  !को सीबीआई जाँच में सहयोग करना चाहिए !जाँच में यदि यह पाया जाय की प्रशासनिक  अधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोप असत्य हैं !तो कानून में प्राबधान है  कि झूठे आरोप लगाने वाले के विरुद्ध दंडात्मक कार्यबाही की जा सकती है !देश में एक बात जरूर देखने में आती है !कि अब भारतीय प्रशानिक सेवा और अन्य अधिकारी सत्ताधारी राजनेताओं की चमचागीरी करते हैं !उनके पैर भी छूते देखे जाते हैं !इसीलिए यह संभव हो सकता है !कि सीबीआई भी केंद्र की सत्ता धारी पार्टी को प्रसन्नकरने के लिए कोई काम करे !किन्तु यह एक दम असंभव है !की देश का प्रधान मंत्री किसी अधिकारी  को बुलाकर यह कहे कि तुम केजरीवाल के कार्यालय पर छापा लगाओ !

Sunday, 13 December 2015

इस युग की अहम मांग सुख प्राप्तिकेसाधनो में केंद्रित हो गयी है !यह मांग इतनी प्रवल है ! कि सुखानुरागी मनुष्य अब सुख प्राप्ति के लिए कर्तव्य पालन और गुण विकास की और ध्यान ना देकर सिर्फ प्राचीन लोकहित कारी श्रेय प्रदान करने वाली परम्पराओं का नाम मात्र का दिखावटी पालन करने लगे हैं !और परम्परा निर्बहन के जो मानदंड हैं !उनका पालन न तो भोगासक्त पैर छूने वाले करते हैं !और ना बिना योग्यता के सम्मान प्राप्ति के आकांछी पैर छुलाने वाले करते हैं !इसीलिए इस अत्यंत उपयोगी कल्याण प्रद परम्परा का कल्याणकारी स्वभाव बिलकुल लुप्त होता दिखाई दे रहा है !सनातन धर्म में बृद्ध पुरुष सिर्फ आयु ब्रध पुरुष को नहीं माना गया है !जो ज्ञान बृद्ध है !तपस्वी है !जिसने साधना संयम और आत्मज्ञान से अपनेसमस्त भोग कामना के दोषों को जला दिया है !और जो आत्मज्ञान और  परमात्म  से युक्तहै !उसको भी बृद्धपुरुष माना गया है ! ऐसे व्यक्तियों के विधिबत चरण स्पर्श करने से  सुख संपत्ति आत्मज्ञान आदि की प्राप्ति होती है ! सनक सनन्दन सनातन सनत्कुमार ,आदि शंकराचार्य अष्टाबक्र, ,सुखदेव , स्वामी राम तीर्थ, ज्ञान देव, स्वामी विवेकानंद आदि ये सभी तपस्या से बृद्ध कोटि मेमाने जाते हैं !और इन्हे स्वभाव सिद्ध आशीर्वाद देने कीशक्ति प्राप्त थी !ऐसे महापुरुषों के समक्छ शाष्टांग प्रणाम करने से आशीर्वाद की प्राप्तिहोतीहै ! साष्टांग   प्रणाम करने से मष्तिष्क का  स्पेर्श दोनों चरणो पर होता है !और हाथों से स्पर्श पैरों की अँगुलियों और अंगूठों पर होता है !जो महापुरुष आत्मज्ञान से युक्त और भोग कामनाओं से मुक्त होते हैं !उनके चरणो और पेरोंकी अँगुलियों से शक्ति  का संचरण होता है ! उनके ह्रदय में लोक कल्याण की भावना होती है !जिसके कारण पैर छूने  वाले को सभी प्रकार के धन संपत्ति आयु बृद्धि आदिके लाभ प्राप्त होते हैं !माता पिता ,गुरुजन और आयु बृद्ध पुरुषोंके चरण स्पर्श से भी लाभ  होता है !इनके चरण स्पर्श से सुख की प्राप्ति तो होती है !किन्तु आशीर्वाद की प्राप्ति नहीं होती है !क्योँकि  ये राग द्वेष से मुक्तनहीं होते हैं ! इसलिए इनके चरण स्पर्श करने से लोकपरम्परा का निर्बाह होता है !और माता पिता तथा गुरुजनो और अपने से अधिक आयु बृद्ध लोगोंके समक्छ नतमस्तक होने से अभिमान का निरसन होता है !आजकल तो चरण छूने की परम्परा पूरी तरह से विकृत हो गयी है !चरण छूने  वाले अपने निम्न स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी के भी चरणछूने का नाटक करते हैं !इसीलिए अब चुनाव लड़ने वाले लोग मतदाताओं के समक्छ जैसी मतदाता की ताकत होती है !उसी के अनुसार साष्टांग  दण्डवत  से लेकर चरणस्पर्श तक करतेहैं !और अब यह चरण स्पर्श करना इतना औपचारिक हो गया हैं !कि लोग सिर्फ घुटनो का ही स्पर्श करते हैं !जब ये नेता चुनाव जीत जाते हैं !तब इनके चरणस्पर्श बो लोगकरनेलगजाते हैं ! जिनके चरण स्पर्श इन्होने किये थे !और जो चुनाव हार जाते हैं !बे चरण छुलाने वालों का अभिनन्दन अभद्र शव्दों से करते हैं !
चरणस्पर्श करने वाली इस कल्याणप्रद परम्परा का विधिवत पालन करने से हीयहपयोगी हो सकती है !

Friday, 11 December 2015

आचार्य रजनीश ने ध्यान से अदभुद शारीरिक आकर्षण प्राप्त कर लिया  था !गहरे ध्यान में उतरने के लिए जिस निर्भयता की आवश्यकताहोती है !वह उनमे थी !जब ध्यानी स्थूल जगत के संपर्क से ध्यानस्थ  होने पर बिलग होता है !तब आतंरिक जगत में प्रवेश में  अभ्यस्त ना होने के कारण साधक भयग्रस्त हो जाता है !और कभी कभी इसके गंभीर परिणाम भी शरीर पर होते हैं !रजनीश दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी थे !उन्होंने विश्व के महान दार्शनिको नीत्शे फ्रायड आदि का गंभीर अध्यन किया था !इसके अलावा ताओ कन्फूसियस आदि की ध्यान विधियों का भी उन्होंने अभ्यास किया था !और यह बे समझते थे की ध्यान के परिणाम हानि प्रद नहीं हो सकते हैं !इसीलिए उन्होंने ध्यान से शक्ति प्राप्त की थी !किन्तु ध्यान से प्राप्त शक्ति का उपयोग उन्होंने आत्मशक्ति की प्राप्ति के लिए ना कर भौतिक शक्ति प्राप्ति के लिए किया !उनमे वैराग्य का सन्यासियों की तरह का भाव नहीं था !उन्होंने ध्यान योग को भोग की चादर में लपेटकर भोग भाव से ग्रस्त नर नारियों युवाओं और युवतियोँ को आकर्षित किया !भोगी व्यक्ति कभी आत्मशांति और अध्यात्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता है !भोग भाव के केंद्र में स्त्रियों के प्रति आकरषण प्रमुख रूप से होता है !रजनीश के सानिध्य में जो ध्यान साधना चलती थी !उसमे युवा यवतियों को शारीरिक सम्बन्ध बंनाने की पूरी आजादी थी !इसिलए भारतीय युवा युवतियां बड़ी संख्या में उनके शिष्य बने !और विदेशी युवा युवतियों में सामान्य तौर पर वैध अवैध यौन सम्बन्ध वर्जित नहीं होते हैं !इसीलिए अपने स्वभाव सिद्ध आचरण में बिना परिवर्तन के उन्हें भी रजनीश की ध्यान साधना ठीक मालूम पड़ी !रजनीश के सन्यासी और सन्यासिन सभी यौन सम्बन्ध बनाते थे इन सन्यासियोँ के नमो में सबसे विकृत और अनर्थकारी बात यह थी कि सन्यासिन माँ आनंद शीला माँ योग प्रभा ,माँ ज्योतिर्मयी आदि कहलाती थी !और सन्यासी प्रज्ञान भारती स्वामी वेदांत स्वामी दिव्य चक्छु आदि नाम धारी होते थे !इन नामों की पवित्रता रजनीश ने नष्ट कर दी थी !जिस महिला को हम माँ कहकर सम्बोधित करते हैं !वह सम्बोधन करने वाले पुत्रबत व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध कैसे कर सकती है ?  !उनके आश्रम में ध्यान से प्राप्त समाधि का नाटक करते हुए !उनके सन्यासी काम भोग में मगन  होकर एक दूसरे से लिपटजाते थे !यही उनकी सम्भोग से समाधी की अवधारणा थी !माँ शीला रजनीश की लम्बे समय तक विश्वास पात्र रही !और सन्यासिनी के रूप में इन्होने भरपूर यौन सुख भी भोगा !किन्तु अमेरिका में इनको काराबास की सजा भी हुई !और रजनीश के साथ अंतरंग जीवन जीने वाली शीला आज रजनीश की घोर विरोधी है !शीला और रजनीश का संयोग योग के नाम पर भोग प्रधान था  !और भोग प्रधान सम्बन्ध जहां अन्य स्त्री पुरुषों का भी प्रवेश हो स्थायी नहीं रह सकता है !उसमे अवश्य दरार पड़ती है !और उस दरार से शत्रुता का जन्म होता है !शीला रजनीश के बारे में तो बता रही हैं !किन्तु अपने बारे में सही तथ्योँ को छिपा रही हैं !इनके कुकर्मों और रजनीश के प्रति विश्वासघात की फेहरिस्त भी बहुत लम्बी है !

Thursday, 10 December 2015

समावेशी जनतंत्र -------दैनिक जागरण   ने जागरण फोरम के द्वारा इस महत्त्व पूर्ण विषय पर चर्चा आयोजित की जिसमे देश के प्रधान मंत्री से लेकर राज्योँ के मुख्य मंत्रियों आदि राजनैतिक नेताओं ने और जागरण फोरम के द्वारा समझे जाने वाले  बुद्धि जीवियों और विचारकों ने हिस्सा लिया ! जंततंत्र को सर्व समावेशी होना ही चाहिए !क्योंकि जनतंत्र का जन्म ही जनता के द्वारा होता है !अगर सर्व का  समावेश जनतंत्र में नहीं है !तो वह मुर्दा जनतंत्र है !क्या भारतीय जनतंत्र में ६८ साल की स्वतंत्रता के बाद भी सर्व का समावेश नहीं हो पाया है ?क्या देश में मुर्दा लोकतंत्र चल रहा है ?क्या इस सम्बन्ध में पूर्व की सरकारों ने कोई प्रयत्न नहीं किये ?क्या संसद कीकार्यबाही  पहले कभी बाधित नहीं हुई ?क्या  संसद मनोतंत्र और मनी तंत्र से चलती रही है ?संसद में मनोतंत्र और मनी तंत्र के प्रभाव का विकास होते होते आज चरम पर पहुँच गया है  ?क्या देश के समाचार पत्र और चैनल्स सर्व समावेशी लोकतंत्र का विकास कर रहे हैं .उसमे सहयोग कर रहे हैं ?या सभी लोग सर्व समावेशी जनतंत्र का नाम लेकर अपने निम्न स्वार्थोँ की सिद्धि कर रहे हैं ?और इन सभी चर्चाओं का परिणाम जो संसद से लेकर समाचार पत्र द्वारा आयोजित फोरमों पर होता है और हो रहा है  के परिणाम शून्य आ रहे हैं ?आदि आदि !इस समय दोषों का बल बढ़ रहा है और अच्छे गुण दब रहे हैं ! इसलिए दोषों को दबाने की आवश्यकता है ! और उत्तम गुणों के विकास की आवश्यकता है ! सबसे बड़ा दोष है लोभ  उसी से प्रेरित हो कर लोग नहीं करने वाले काम भी कर रहे हैं ! लोभ  के बश में पड़े हुए लोग नीच कर्म करने की और दौड़ते हैं ! लोभ से तृष्णा का जन्म  होता होता है !  लोभ और तृष्णा दोनों महान दुर्गुण एक दूसरे का पोषण और संवर्धन करते हैं ! लोभी मनुष्य जब राजनीति और समाज के महत्त्व पूर्ण छेत्रों में प्रवेश कर राष्ट्र के नियामक और कर्णधार बन जाते हैं तब बे अपने शरीर की पूजा और प्रतिष्ठा में लगे रहकर सद्गुणों की बातें और दुर्गुणों का विकास करते हैं ! इसलिए इस लोभ के स्वरुप को अच्छी तरह समझ कर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और निस्वार्थ  भाव के विकसित करने की आवश्यकता है ! इसी से बास्तविक समावेशी जनतंत्र का उदय होगा! और  तभी  वास्तविक सर्व समावेशी लोकतंत्र की प्राप्ति होगी !

Wednesday, 9 December 2015

संत चाहे वस्त्र धारी हौं या दिगंबर बे तो सद्भावना के केंद्र होते हैं ! क्योँकि बे विषय भोगों के चिंतन के स्थान पर आत्मचिंतन और परमात्म चिंतन में संलग्न रहते हैं i सारी श्रष्टि को आत्मरूप में देखने के कारण उनमे विषमता का अभाव हो जाता है !  संतो की इस उपलब्धि और आचरण पद्धति को सभी सामान्यजन अपने जीवन में उतारें और सर्वत्र सद्भाव और स्नेह तथा प्रेम का बातावरण  उत्पन्न हो इसके लिए सभी को क्रोध के कारणों और उसके निवारण का उपाय भी  जानना चाहिए ! जब तक किसी भी कार्य के कारण का निवारण नहीं होगा तब तक उस कार्य से मुक्ति नहीं हो सकती है ! भगवान श्री कृष्ण ने गीता में २(६२ ,६३)में क्रोध के कारण बताये हैं और २(६४,६५)में क्रोध मुक्त होने के बाद प्राप्त होने वाली आत्मशांति और आत्मलाभ होने की बात भी बतायी है ! सिकंदर महान की इस घटना को और भी रूपों में बताया गया है !सिकद्दर का गुरु महान दार्शनिक अरस्तू था !जब सिकद्दर विश्व विजय पर निकला तो वह अपने गुरु के पास आशीर्वाद लेने गया था !अरस्तु ने सिकद्दर से कहा कि तुम जब भारत में पहुंचोगे तो तुम्हें वहां ऐसे  आत्मविजयी संतों के दर्शन होंगे !जिन्होंने आत्मविजय की साधना कर प्राणियोँ के सबसे बड़े शत्रु कामशक्ति का नाश कर राग द्वेष कामना आदि से मुक्ति प्राप्त कर विश्व विजव से भी बड़ी विजय अखिल ब्रह्माण्ड के निर्माता परमात्मा से साधर्म्य स्थापित कर ब्रह्माण्ड विजय को प्राप्त कर लिया है !सिकद्दर को पंजाब में यह ज्ञात हुआ कि रावी नदी के तट पर कोई दिगंबर संत निवास करते हैं !सिकद्दर  उन संत के दर्शन के लिए राबी नदी के तट पर गया !सिकद्दर अपने शौर्य और सामराज्य  विजय की सिद्धि से दर्प और अभिमान से ग्रस्त था !उसने आत्माभिमान से युक्त बाणी से कहा में विश्व विजयी सिकद्दर हूँ !और आपको अपने साथ ले जाना चाहता हूँ !संत ने कहा मुझे आप सहित किसी की भी आवश्यकत नहीं है !आप मेरे सामने से हठ जाइए क्योँकि तुम्हारे सामने खड़े होने से सूर्य का प्रकाश जो मेरे शरीर पर पड़  रहा था ! वह वाधित हो रहा है !सिकद्दर ने कहा आप मेरी अवज्ञा कर रहे हैं !मेरे नाम मात्र को सुनकर बड़े बड़े राजे महाराजे राज्य छोड़कर पलायन कर जाते हैं !उनका जीवन मेरी कृपा पर अबलम्बित होता है !संत ने कहा तुम जीवन ले सकते हो !किन्तु जीवन दे नहीं सकते हो !तुम्हारी आयु के अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं !तुम अपने शरीर से जीवित अपने देश वापिस नहीं पहुँच पाओगे !संत के इस कथन ने सिकद्दर के विजय रथ को रोक दिया था !और वह वहीं से अपने देश की ओर प्रस्थान कर गया था !किन्तु संत की वाणी के अनुसार वह अपने देश में पहुंचने के पहले ही रोग ग्रस्त हुआ !तब उसने अपने अंतिम समय में अपने सेनापति और सैनिकों से कहा था !कि मेरी ल्हाश के चारों तरफ मेरे द्वारा संग्रहीत संपूर्ण धन को सजा देना ! और मेरे दोनों हाथ कफ़न से बाहर निकाल देना तथा पास में मेरी तलवार रख देना ताकि लोग यह देखें की अपार संपत्ति धारण करने वाला सिकद्दर भी  अंत में खाली हाथ गया !सिकद्दर और दिगंबर संत के मिलन की यह घटना भोग पर योग की विजय को भी सिद्ध करती है !
में १९६१ में महाकौशल महाविद्यालय में एम ये प्रथम बर्ष का छात्र था !उक्त विद्यालय में आचार्य रजनीश दर्शन शाश्त्र के प्राध्यापक थे !महाकौशल महाविद्यालय पूर्व में राबर्टसन कॉलेज कहलाता था !आचार्य रजनीश सफ़ेद धोती कुर्ता पहने और पैरों में चप्पले पहने हुए लेडीज साइकिल से आते थे !उनका व्यक्तित्त्व अत्यंत आकर्षक था ! जो सहज ही लोगों का ध्यान अपने आप खींच लेता था !उनका भासण अत्यंत प्रभाव शाली होता था !उनकी वाणी में विलक्छण आकर्षण  था !मेने उनका भासण तरन तारण  जयंती पर जबलपुर में फुहारा पर सुना था !इसके अलावा भी एकाध बार उनको विचार गोष्ठी में भी शाहीद स्मारक में उनको सुनने का अवसर प्राप्त हुआ था !रजनीश जी अपने उन्मुक्त विचारों और उन्मुक्त जीवन चर्या के कारण जबलपुर में भी विवादित थे !बाद में त्यागपत्र देकर बे भगवान रजनीश बने और अंत में ओशो के नाम से विख्यात हुए !उनकी मृत्यु भी बहुत संदिग्ध स्थितिमे हुई !उनके समर्थक यह कहते हैं !अमेरिका में उनको जहर दिया गया था ! जिस से उनकी धीरे धीरे मृत्युहो गयी !उन्होंने कोई भी पुस्तक नहीं लिखी !जो प्रवचन उन्होंने दिये थे उन्ही प्रवचनों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करदिया गया है !उन्होंने अपनी व्याख्याओं में धर्म की जो व्याख्या प्रस्तुत की उसमे संयम इन्द्रिय निग्रह ब्रह्मचर्य आदि को पूरी तरह से नकार दिया था !और उन्होंने सन्यासी का एक विचित्र स्वरूपप्रस्तुत किया !उनकी सभी सन्यासिने माँ के नाम से सम्बोधित होती थी और जो लोग उनको माँ कहकर बुलाते थे ! उनमे से उनकी इक्छा से किसी के साथ  उनके यौन सम्बन्ध भी स्थापित होते थे !जिस संन्यास की सिद्धि तपस्या और ब्रह्मचर्य से होती थी !उसकी सिद्धि आचार्य  रजनीश ने  भोग और  काम की तृप्ति से जोड़ दी थी !उनका संन्यास योग प्रधान नहीं भोग प्रधान था !उनकी ध्यान की विधियोँ में किसी भी प्रकार के प्राचीन काल के इन्द्रिय संयमकी मर्यादा और आवश्यकता  नहीं थी !इसीलिए उनकी यह ध्यान पद्धति जिसमें संयम की आवश्यकता नहीं थी !पश्चिमी देशों के युवाओं युवतियोँ  और भारत के धनी युवकों को बहुत पसंद आई !और बे ही उनके शिष्य हुए ! और उन्ही से आचार्य रजनीश   को रोल्स रॉयस कारों की उपलब्धि हुई !मेरी अपनी समझ यह है !कि आचार्य रजनीश ने गहरी ध्यान समाधि से प्राप्त ऊर्जा का प्रयोग आत्मलाभ के साथ भौतिक समृद्धिके लिए भी   किया ! !देश में जितने भी उच्च कोटि  के साधु संत और महात्मा सन्यासी आदि  हुए हैं !बे आत्मशक्ति का प्रयोग सिर्फ  परमत्मशक्तिके लिए ही करते रहे हैं  !बुद्ध महावीर आदि के जीवन इस तथ्य के प्रत्यक्छ प्रमाण है !आचार्य रजनीश के पूर्व ऐसे किसी आध्यात्मिक संत का जीवन वृतांत  मालूम नहीं पड़ता है ! जिसने योग से भोग प्राप्त किया  हो !योग के लिए ऐश्वर्य राज्य धनसम्पत्ति भोग छोड़ने के सहस्त्रों उदाहरण हैं !
भारत अनादि काल से आत्मज्ञान का केंद्र रहा है !श्रष्टि के निर्माता और नियंता ने b इस भूमि कोजो सौंदर्य और प्राकृतिक  संसाधन प्रदान किये हैं ! बे  विश्व के किसी भी देश को प्राप्त नहीं हैं !यहाँ परमात्मा भी भिन्न भीं रूपों में अवतरित होते रहे हैं !मनुष्य जीवन का अंतिम ध्येय मोक्ष की प्राप्ति है !इसी को केंद्र में रख कर यहाँ के सन्यासी साधु गृहस्थ राजे महाराजे और धन सम्पदा से संपन्न धनिक भी अपना जीवन जीते रहे हैं !यह वह पवित्र भूमि हैं जहाँ राजा भी राजऋषि होते थे !इस देश में भौतिक समृद्धि की विपुलता भी आत्मबल से प्राप्त होती थी !  धार्मिक आचरण की पूर्णता निःश्रेयस की प्राप्ति और भौतिक समृद्धि  के दर्शन इसी भारत भूमि में प्रत्यक्छ  दिखाई देती थी ! इस देश में स्वक्छ और निर्मल जल से युक्त अत्यंत पवित्र गंगा जमुना नर्बदा कावेरी विपासा झेलम धसान बेतवा सरस्वती आदि जैसी सहस्त्रों छोटी बड़ी नदियां बहती थी !यहाँ हिमालय विंध्याचल नीलांचल  गन्धमादन जैसे महान और छोटे बड़े सेकंडो पर्वत विद्यमान थे ! और अभीभी हैं !यहाँ के जंगल अनेक प्रकार के स्वादिष्ट फलों के ब्रक्छोँ  से सुशोभित होते थे !सभी प्रकार के  पक्छियोँ के कलरव गान से गूंजते रहते थे !ऋषियों केआश्रम इन्ही बनो में नदियों के किनारे स्थापित थे !ये सभी आश्रम स्वाबलम्बी होते थे !किसी राजा या धनवान के दान से नहीं चलते थे !तपस्या के प्रभाव से जो शक्ति इन आश्रमों मेंविराजती थी !उस शक्ति को प्राप्त करने के लिए राजा इन ऋषियों के शरणागत होकर इनका आशीर्बाद प्राप्त करते थे !यहाँ जो वायु बहती थी वह ऋषियों की तपस्या से संयुक्त होकर बनो से सुगन्धित पुष्पों की गंध लेकर सहज में ही सामान्य व्यक्तियों को भी समाधिस्थ कर देती थी !कैलाश पर्वत तो भगवान शिव का बास स्थान है !किन्तु इस समय इसके कुछ  भू भाग पर चीन का अधिकारहै !इसीलिए इसकी धार्मिक यात्रा के लिए चीन से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है !यद्द्पि कैलाश यात्रा अब पहले से भारतीय प्रधान मंत्री के प्रयत्न से अधिक आसान हो गयी है !प्रत्येक बर्ष  धर्म यत्री इस यात्रा पर जाते हैं !और कैलाश पर्वत का मनोहारी दर्शन करते हैं !और प्राकृतिक सम्पदा से युक्त दृश्यों का अवलोकन कर पवित्र झील मानसरोवर में स्नान करते हैं !और भगवान शिव के इस  स्थान का दर्शन कर पुण्य और आत्मशांति प्राप्त करते हैं !इन पुण्य स्थलों के कारण ही भारत भूमि पुण्यभूमि कहलाती हैं !इस भूमि के कण कण में त्याग तपस्या भक्ति ज्ञान और निष्काम कर्म की तरंगें गूँजती रहती हैं !

Tuesday, 8 December 2015

६(८,९)मिटटी पत्थर सोने में समानता तथा अकारण लाभ पहुचाने वाले सुहृद तथा मित्र शत्रु उदासीन मध्यस्थ द्वेष्य तथा बंधू गणो धर्मात्माओं और पापों में सामान भाओ रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है मिटटी पत्थर सुवर्ण ये वस्तुएं हैं तथा सुह्रद आदि व्यक्ति इन सब में समता का भाव उत्पन्नकरने के लिए मन बुद्धि चित्त अहंकार की ज्ञान से शुद्धि होती है जिस से जीती हुई इन्द्रिओं की प्राप्ति तथा समस्त विकारों से रहित जीवन चर्या तथा आचरण की प्राप्ति होती है जिस से परमात्मा काबोध प्राप्त होता है भगवान की खोज मूर्ति मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे आदि में धर्म के वाह्य भिन्न प्रकारों के अलावा उसके द्वारा रचित श्रिष्टि में धार्मिक बंधनो से से उन्मुक्त जीवन दृष्टि से भली प्रकार शुलभ होती है क्योँकि यह साधक के स्वयं के ज्ञान विज्ञानं पर आधारित होती है धार्मिक संस्थाएं अब कल बाह्य होती जा रही हैं किसी ज़माने में इन्होने समाज में आत्मतत्त्व का ज्ञान जन जन तक पहुचने का कार्य किया किन्तु आज ये समाज को विभाजित करने का काम कर रही है तथा धार्मिक कटटरता की पोषक हो गयी है आज युग की मांग समता है विषमता और विभाजन नहीं है और युग के अनुकूल सम्भाव युक्त परमात्मा के बोध के लिए यहा जो बताया गया है उस से जीवन में समत्त्व भाव की प्राप्ति हो सकती है समता आंतरिक होती है किन्तु वाह्य व्योहार वस्तुओं व्यक्तिओं के साथ उनकी स्थिति योग्यता आदि के आधार पर ही किया जाता है सोना भी मिटटी से ही निकलता है किन्तु उसकी कीमत मिटटी के सामान नहीं मानी जा सकती है इसी प्रकार मित्र और शत्रु यद्द्पि आत्मदृष्टि से एक है किन्तु व्योहार दृष्टि से समान नहीं समझे जा सकते है यही बात जीवन के अन्य व्योहारोँ के लिए भी समझनी चाहिए

Monday, 7 December 2015

गीता भारत का ग्रन्थ राज है जिसमे किसी भी धर्म की पूजा इत्यादि पद्धति नहीं है यह विशुद्ध आध्यात्मिक ग्रन्थ है जिसमे जीवन जीने की कला बताई गयी है गीता जीवन योग है इसका प्रचार प्रसार आध्यात्मिक ग्रन्थ के रूप में सारे विश्व में हुआ है इस पर महान साधु संतो सन्यासिओं के अतिरिक्त तिलक गांधी अरविंदो विनोबा भावे डॉक्टर राधाकृष्णन आदि महान भारतीओं के अतिरिक्त एडविन अर्नाल्ड आदि विदेशिओं ने भी भाष्य लिखे है इस श्रेस्ठ ग्रन्थ का दुर्भाग्य यह है की यह ज्ञान भारत भूमि में हुआ है इसलिए उसको लोक में वह सम्मान नहीं दिया जा सकता है जिसका राष्ट्र हित में दिया जाना आवश्यक है हलाकि सरकार और राजनेताओं की और से भले ही यह राष्ट्रिय ग्रन्थ न हो किन्तु ज्ञान दृष्टि से तो यह राष्ट्रीय ग्रन्थ है ही जो लोग इसको राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किये जाने का विरोध कर रहे हैं हो सकता है उन्होंने इस ग्रन्थ को पड़ा न हो और अगर पड़ा भी हो तो हो सकता है समझा न हो और समझा भी हो तो वोटों की खातिर समझ कर भी इसका विरोध कर रहे हों कुछ भी हो भारत में जन्मे इस ज्ञान की अवमानना होरही है
भारत धर्म निर्पेक्ष देश है इसलिए यहां वैदिक धर्म में अनादिकाल से पोषित भूमि पूजन आदि का पालन किसी नए कार्य का प्रारम्भ करने के लिए सरकारी कार्यों में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए यह ओवेसी का कथन है वह कहते है इस से धर्म निरपेक्सता समाप्त होती है तथा साम्प्रदायिकता बढ़ती है अधिकांश मुस्लिम राष्ट्र धर्म निर्पेक्ष नहीं है वहां इस्लाम में जिस धार्मिकनियम के पालन पालन की आज्ञा नहीं है ऐसी किसी धार्मिक विधि का पालन नहीं करने दिया जाता है कोई मंदिर चर्च या पूजा गृह का निर्माण नहीं कर सकता है पाकिस्तान बांग्ला देश में भी हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार संपत्ति की लूट हत्या जबरन धर्म परिवर्तन बलात्कार आदि की घटनाएँ रोज समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है ओवेसी आजम ऐसे मुसलमान यह शान से कहते है की बे पहले मुसलमान है बाद में भारतीय है में यह जानना चाहूंगा क्या मुसलमान धर्म निर्पेक्ष हो सकता है ?कौनी इस्लाम में पवित्र कुरान को अल्लाह की किताब मन जाता है और उसमे जो कहा गया है उसके अतिरिक्त किसी और धर्म में वर्णित धार्मिक नियमो का पालन करने पर उसे इस्लाम से ख़ारिज कर दिया जाता है ऐसे इस्लाम से ख़ारिज किये सलमान खान शाहरुख़ खान आदि बहुत से मुसलमान हिंदुस्तान में तथा विश्व में अन्य देशों में भी हैं मुझे लगता है समूह रूप में हिन्दू हिट की बात करना साम्प्रदायिक नहीं मन जाना चाहिए १५००वर्श तक गुलामी के कारण पूरी तरह से टूट गया यह हिन्दू समाज जिसको तोड़ने का काम अब अगड़े पिछड़े दलित आदि में निजी स्वार्थों के कारण नेता लोग कर रहे हैं मुझे पता नहीं हैं की बे जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काट रहे है ऐसा अहसास उन्हें है या नहीं ?में कट्टर हिन्दू धर्म का समर्थक नहीं हूँ किन्तु धर्म सुरक्षित रहे यह चिंता जरूर है

Sunday, 6 December 2015

ओवेसी जिस तरह से व्यान बाजी कर रहे हैं ! और जिस आवाज में बोल रहे हैं ! उस से इस्लामिक कट्टरता की गंध भी आती है ! और उनकी भारत के संविधान और उच्च न्यायालय के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है !ओवेसी ऐसे लोगों को इस प्रकार बोलने का अवसर तो उन लोगों ने दिया है !जिन्होंने २३ साल पूर्व आज के ही दिन जहां रामलला विराजमान थे ! उस जगह को कानून अपने हाथ में लेकर तोड़ दिया था !उनका यह काम कानून के खिलाफ तो था ही !वह भारतीय संस्कृति के भी खिलाफ था ! उन्होंने उस बाबरी मस्जिद को तोड़कर हिन्दुओं का बहुत नुक्सान किया था ! इसका अहसास उनको है या नहीं ?उनको मुसलमानो की कटटरता और इस्लाम के प्रति उनकी  धर्मान्धता और हिन्दुओं के प्रति उनकी नफरत का आकलन यह मस्जिद तोड़ने के पहले भली प्रकार कर लेना चाहिए था !उन्हें यह भी समझना चाहिए था ! कि सनातन धर्म के अधिकाँश लोग उनके इस अवैधानिक कृत्य का समर्थन नहीं करेंगे !किन्तु इन लोगों ने इस बात की चिंता किये बगैर मस्जिद ढहादी !जिसके गंभीर परिणाम पाकिस्तान और बंगलादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भोगने पड़े !वहां सेकंडो हिन्दू मंदिरों को ढहा दिया गया था !और अनेको हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था ! और उनकी जमीन जायदाद लूट ली गयी थी ! तथा महिलाओं की बेइज्जती की गयी थी !पाकिस्तान और बांग्लादेश की बात जाने दीजिये  भारत में भीकश्मीर में मंदिर तोड़े गए थे ! और मुम्बई में भी सेकंडों लोग मार डाले गए थे !और जिन राम के ये भक्त हैं ! बो पहले तो बिल्डिंग के अंदर विराजमान थे ! और उनके दर्शन भी सभी को सुलभ थे ! किन्तु अब बे तिरपाल के टेन्ट में विराजे हैं ! जो पुराना पड़ गया है ! तथा जिसमे छेद हो गए हैं !और अब वहां पुलिस का कड़ा पहरा रहता है !और उनके दर्शन भी आसानी से नहीं होते हैं !भारत पर कट्टर पंथियों के हमले होते रहते हैं और हमलों की धमकीभी मिलती रहती है !आत्तंकवादी टहलते हुए भारत में प्रवेश कर जाते हैं और हमला करके भागने में सफल भी होजाते हैं !और जो एकाध पकड़ में भी आजाता हैं ! उन पर सालों मुकदद्मा चलता है ! और उनकी सुरक्छा में करोड़ों रुपया खर्च होते हैं !बाबरी मस्जिद ढहाने वालों में मुसलमानो जैसी धर्म के लिए कुर्बान होने की भावना भी नहीं है !हिन्दू और मुसलमानो में बैसे भी दंगे होते रहे हैं !
बाबरी  मस्जिद विध्वबंस के बाद दंगे और वैमनस्यता और अधिक बढ़ गयी है !और अब राष्ट्रिय सोच के जावेद अख्तर ,शबाना आजमी ,राशिद अल्वी ,मौलाना मदनी आरिफ मुहम्मद आदि को मुसलमान सुनना कम पसंद करते हैं उनका स्थाम ओवेसी आदि जैसे मुसलमानो ने ले लिया है !गरजते बादल बरसते नहीं हैं !मंदिर बनाने की घोसणा के बजाय मंदिर बना के दिखाना चाहिए !अभी तो रामलला तिरपाल के टेंट में और मंदिर बनाने की घोसणा करने वाले सत्ता के सिंघासन पर बैठे हुए हैं  !राजमहल में जन्मे राजाराम टेंट में है! और साधारण घरों में जन्मे सत्ता के महलों में हैं !

Saturday, 5 December 2015

भारत अमेरिका की तरह पाकिस्तान में घुस कर हाफिज सईद को नहीं मार सकता है अमेरिका की सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी है और प्रत्येक राष्ट्रीय मसले पर वहां जनता की राय सुनी जाती है इसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है यहां राजनेताओं ने जनता को कई प्रकार के रूपों में बाँट दिया है और नेता अपने धार्मिक जातीय समूहों को प्रति उत्तर दाई रहते है हालाँकि वास्तव में तो वह अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते है यह देश नेताओं अधिकारिओं कर्म चरिओं व्योपारिओं के लिए स्वर्ग बन गया है केंद्र की बर्तमान सरकार हिन्दुओं की सरकार मानी जा रही है तथा सभी नेता मोदी को मुसलमानो का हत्यारा लम्बे समय से बताते चले आरहे है चूँकि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है इसलिए मुझे नहीं लगता है की मोदी सरकार ऐसा कोई कठोर कदम उठाए गी यदि अगले ५ वर्षों के लिए भी मोदी सरकार केंद्र में आती है तो फिर स्थिति बदल सकती है वैसे भी सईद भारत के लिए बड़ा खतरा नहीं है हाँ अगर पाकिस्तान भारत पर हमलाबर होता है तो फिर पाकिस्तान सहित आतंक वादिओं भारी छति उठानी पड़ सकती है
डॉ आंबेडकर  और गांधीजी -------सत्ता रूढ़ होने की आकांछा से ग्रस्त और लोकतंत्र की रफ़्तार में वाधा उत्पन्न करने वाले कुछ दलित जो आजकल डॉ आंबेडकर की प्रतिभा और प्रयत्न से तथा गांधी जी के अस्पृस्यता  उन्मूलन के आजीवन कार्य से नेता बन कर और आरक्छण का लाभ उठाकर अपने परिवार पोषण और धन संपत्ति के संग्रह में लगे हुए हैं ! और दलित हित पोषण के नाम से दलितों के महान शत्रु हैं ! और अपने भोग विलास की बृद्धि के लिए भारतीय समाज में समरसता का नाश कर रहे हैं !गांधीजी और डॉ आंबेडकर के विवेक और नीति प्रधान विचार विरोध को सही दृष्टि से स्वीकार ना कर गांधी जी को दलित विरोधी और नौटंकी बाज कहते हैं ! ये वह दलित हैं जिनके लिए आंबेडकर ने कहा था ! इन लोभ और अवांछनीय इक्छाओं की पूर्ति में लगे हुए दलितों  ने मुझे धोखा  दिया है ! और मेरे साथ विश्वास घात किया है !गांधी जी की दृष्टि में डॉ अम्बेडकर वैचारिक मतभेद के बाद भी हमेशा सम्मान के पात्र रहे ! डॉ आंबेडकर दलित जाति में जन्म लेने के कारण दलितों के उत्थान के लिए समर्पित रहे ! और गांधी जी सवर्ण होते हुए भी जीवन भर भंगी कार्य करते रहे  !और दलितों का जीवन उनके साथ आत्मीयता और उनके उत्थान के लिए उनके बीच रहकर उनका ऐसा ही जीवन जीते रहे ! उन्होंने राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में १९३१ में लंदन में  अपनी जाति भंगी और अपना पेशा  जुलाहा बताया था  !जो काम उच्चकोटि की शिक्छा प्राप्त और दलित जाति में उत्पन्न दलितों के मसीहा डॉ अम्बेडकर पाखाना साफ़  करने का नहीं कर सके वह काम पाखाना साफ़ करने का गांधी जी ने जीवन भर किया


और  अपने आश्रमों में विनोबा जैसे  महान संत और राजकुमारी अमृतकौर और विदेशी ,देशी सभी आश्रम वासियों से कराया ! आज भी गांधी विचारनिष्ठ व्यक्ति सभी इस कार्य को करते हैं ! गांधी  आश्रमों में जाति धर्म आदि का पूरी तरह आचरण में नाश हो गया है !
--------------स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर जब नेहरूजी अपनी अंतरिम मंत्री परिषद के गठन में संलग्न थे ! गांधी जी ने नेहरूजी से डॉ आंबेडकर को अपने मंत्रिमंडल में कांग्रेस का सदस्य  ना  होने के बाद भी सम्मिलित कराया था ! और वह भारत के प्रथम कानून मंत्री और संविधान का प्रारूप तैयार करने वाली समिति के अध्यक्छ नियुक्त किये गए थे  !परिणाम स्वरुप डॉ अम्बेडकर को दलितों के हित में कामकरने के पर्याप्त अवसर गांधीजी की सहायता से ही प्राप्त हुए थे ! परिणाम स्वरुप बे दलितों के हितों को कानूनी स्वरुप देने में सफल हुए 1 और कानून मंत्री रहते हुए कांग्रेस के सहयोग से हर प्रकार की अस्पृस्यता  पर पूर्ण रूप से प्रतिबन्ध लगा सके थे ! आजादी के बाद भारत में कांग्रेस का आश्चर्यजनक प्रभाव था ! आजकल के दलित नेताओं को कांग्रेस के दलितंहित में किये गए गांधीजी के प्रभाव और अस्पृस्यता उन्मूलन के इस कार्य को नजर अंदाज  नहीं करना चाहिए 1
-------------------------------धनजय  कीर जो डॉ अम्बेडकर की आत्मकथा के लेखक है  !और जो डॉ आंबेडकर को आधुनिक मनु कहते हैं ! ने लिखा है कि एक अस्पृस्य  व्यक्ति जिसे अपने बचपन में दुत्कार कर गाड़ी से उतार दिया गया था ! और स्कूल में अलग बिठाया गया था  ! जिसकी एक प्राचार्य के रूप में अवमानना हुई थी ! .जिसे छात्रावास , भोजनालयों ,नाइकी दुकानो,और  ,मंदिरों से बेदखल किया गया हो ! और जिसे अंग्रेजों के पिट्ठुओं के रूप में धिक्कारा जाता रहा हो ! उन डॉ अम्बेडका को अब एक स्वतंत्र देश का प्रथम कानून मंत्री और उसके संविधान का प्रथम शिल्पी गांधी जी के प्रभाव से कांग्रेस ने बनाया था ! यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! और भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा चमत्कार था ! तथाकथित दलित नेताओं के गांधीजी के इस योगदान को नकार कर कृतघ्नता से बचना चाहिए ! और स्वयं के विलासपूर्ण जीवन को अंकुश में रखकर गांधी जी के त्यागपूर्ण जीवन का  अनुसरण  कर और डॉ आंबेडकर की प्रतिभा को धारण कर दलित समाज को स्वाबलंबी, आत्मनिर्भर और सम्मान से युक्त करने का प्रयत्न करना चाहिए !डॉ अम्बेडकर की कोरी शव्दिक प्रसंशा और गांधी जी और अम्बेडकर के वैचारिक  मतभेद  को बढ़ाचढ़ाकर पेश करने से दलितों के उत्थान की रफ़्तार रोकने की चेस्टा नहीं करनी चाहिए  !
5(29)ईश्वर में विश्वास और आस्था रखनेवाले भक्तजन यह मानते है कि समस्त ब्रह्माण्डों का रचैता ईश्वर है तथा जीवात्मा का एक मात्र लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है परमात्मा की प्राप्ति के लिए कुछ लोग शादी न कर घर नहीं बसाते है जिन्हे हम सन्यासी के नाम से जानते हैं जो गेरुवा वस्त्र आदि धारण करते है कुछ साधु संत भी अविवाहित रह कर सारा जीवन परमात्मा के ध्यान में लगते है किन्तु कुछ साधु संत ऋषि विवाहित भी होते है किन्तु कुछ सन्यासी वेश से सन्यासी संत साधु तो होते है किन्तु कर्मो से भृष्ट होते है तथा उनकी भोगेक्छा सामान्य गृहस्थों से भी बहुत अधिक होती है इसलिए उनकी आस्था परमात्मा से अधिक सांसारिक भोगों में होती है और उनकी प्राप्ति के लिए बे सन्यास के पवित्र कर्म और वेश का नाश करते रहते है यहां भगवान श्री कृष्णा साधु संतों सन्यासिओं की जीवन दृष्टि को बता रहे है जिसके लिए किसी वेश की आवश्यकता नहीं है सिर्फ जीवन जीने की कला की आवश्यकता है जो परमात्मा को सब पारमार्थिक कर्मो का तथा कर्तव्यों के फलों का भोक्ता तथा संपूर्ण लोकों की शृष्टिओं के निर्माता ईश्वरों का भी ईश्वर तथा संपूर्ण भूतों का बिना भेद भाव छोटे बड़े का भेद न मानते हुए निश्वार्थ दयालु प्रेमी जानता है वह परमात्मा की परम शांति को प्राप्त हो जाता है अर्थात ईश्वर भक्तो के जीवन में अपनेलिये कुछ करने का अभाव और समाज देश तथा प्राणिमात्र के प्रिति निश्वार्थ ईश्वरार्पित कर्म करने की प्रवृत्ति होती है इसलिए उन्हें नित्य परमानन्द की प्राप्ति होती है
५(२५)जैसे विद्द्युत एक शक्ति होती है उसका उपयोग विवाह मंडप में भी होता है और मुर्दा घर में भी मुर्दा को जलाने में होता है किन्तु विवाह मंडप में न तो उसे प्रस्सन्न्ता होती है और न मुर्दा घर में वह दुखी होतीहै उसी प्रकार ब्रह्म भी एक शक्ति है और वह भौतिक और आध्यात्मिक रूप में सभी जगहों में काम करती है उसका स्वाभाव शांत है क्योँकि वह स्थिति परिश्थिति काल धर्म उपयोग को लेकर सुखी दुखी नहीं होता है वह रिषि भी इस ब्रह्म शांति को प्राप्त हो जाता है जिसके सब पाप नष्ट हो गए है अर्थात वह कर्म के बाह्य परिणामो से प्रभावित नहीं होता है जिसके सब संशय ज्ञान के द्वारा निब्रत्त हो गए है अर्थात उसे इस बात का बोध हो गया है की कर्म शरीर गत है और आत्मा अकर्ता है और जिसके समस्त कर्म प्राणी मात्र के हित में होते है क्योँकि वह पूर्ण रूप से स्वार्थ रहित होता है उसका मन उसके नियंत्रण में रहता है क्योँकि वह बासना रहित होता है उसका मन निश्छल भाव से परमात्मा में स्थिर रहता है यह ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म में स्थापित होता है मनुष्य के लिए दो ही स्थान है या तो अशांति युक्त संसार या सांत ब्रह्म
भगवान बुद्ध और ब्राह्मण ------ आजकल कुछ लोग ब्राह्मणो के विरुद्ध अज्ञान के कारण बहुत असभ्य और अपमानजनक टिप्पड़ियां करते हैं ! बहुत से लोग यह समझते नहीं है ! कि धर्म परिवर्तन कराने  वाले धर्मो ने वैदिक धर्म के प्रति  अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए उनलोगों ने मनगढंत आरोप ब्राह्मणो पर लगाए ! इसी षड्यंत्र के शिकार आज  भी बिना सोचे समझे ब्राह्मणो को असभ्य और गन्दे अपमानजनक शव्दों से नबाजते  रहते हैं  !और झूठ की पराकाष्ठा तो जब हो जातीहै ! जब भगवान बुद्ध को भी ब्राह्मणो के विरुद्ध खड़ा कर देते  हैं ! बौद्ध धर्म का सर्व श्रेष्ठ और सर्वमान्य ग्रन्थ धम्मपद है !उसमे ब्राह्मण बग्गो नाम से एक अध्याय है जिसमे ब्राह्मणत्त्व  की महिमा और प्रसंगों में ४१ गाथाएं हैं ! उनमे से में सिर्फ एक दो गाथाओं का जिक्र यहां कर रहा हूँ अगर किसी को ब्राह्मणत्त्व  की महत्ता के सम्बन्ध में बुद्ध के विचारों की जानकारी करनी हो तो उसे उन सभी गाथाओं को ध्यान पूर्वक  पढ़ना चाहिए
गाथा ३८३------हे ब्राह्मण तृष्णा के श्रोत को छिन्न कर दे ! पराक्रम कर ! कामनाओं को दूर कर दे ! हे ब्राह्मण संस्कारों के छय कोजानकार तू निर्वाण का पात्र हो जा ! ------ श्राबस्ती में एक बहुत श्रद्धालु ब्राह्मण रहते थे ! उन्होंने एक दिन तथागत (बुद्ध )का उपदेश सुना ! उपदेश को सुनकर वह पवित्र ब्राह्मण नित्य सोलह भिक्छुओं को दान देने लगे ! जब भिक्छु उनके पास जाते थे ! तो वह अत्यंत आदर से भिक्छुओं से कहते थे ! आईये अरहंत लोग ! बेठिये अरहंत लोग ! मेरे यहां भोजन कीजिये ! (अरहंत सिद्ध भिक्छु को कहते हैं ! (!यह अत्यंत उच्च स्थितिहै )  एक दिन जब कोई भिक्छु उन ब्राह्मण देवता के यहाँ भोजन करने नहीं गया ! तब बे तथागत के पास गए और कहा आज कोई भी भिक्छु मेरे यहाँ भोजन करने नहीं आया ! यह सुनकर भगवान बुद्ध ने भिक्छुओं को बुलाकर भोजन न करने जाने का कारण पूंछा तो भिक्छुओं ने कहा यह ब्राह्मण हमको अर्हन्त कहते हैं ! जिस से हमको संकोच होता है ! तब भगवान ने कहा यह ब्राह्मण श्रद्धा से अर्हन्त कहते हैं ! श्रद्धा से कहने में तुम्हें संकोच नहीं करना चाहिए ! चूँकि ब्राह्मणो को अर्हन्तो से अधिक प्रेम है ! इसके लिए तुम्हे भी तृष्णा  के श्रोतों को काट कर अर्हन्तत्व की प्राप्तिकरनी चाहिए ! ऐसा कहकर भगवान बुद्ध ने इस गाथा को सुनाया था !इस गाथा को सुन ने के बाद जो अनावश्यक रूप से मनगढंत  आधारों को अपनी कल्पना में संजोकर ब्राह्मणो को घमंडी और बुद्ध धर्म का दुश्मन बताते रहते हैं !और ब्राह्मणो को मुफ्त का भोजन करने वाला निरूपित करते रहते हैं !उनको अपना अज्ञान और मूढ़ता निबृत्त कर लेनी चाहिए !इसके बाद भी अगर ये लोग सुधरने को तैयार नहीं होते हैं !तो फिर हम यही समझेंगे कि ये अपने स्वभाव से ही ब्राह्मण विरोधी हैं !

Friday, 4 December 2015

5(18}एक आरोप वैदिक धर्म विरोधी वैदिक धर्म पर यह लगाते रहते है की वैदिक धर्म जन्म से वर्ण व्यबस्था को मानता है इसमें शूद्रों के साथ भेद भाव की नीति मूल रूप से विद्द्यमान है यहां भगवान श्रीकृष्णा गुणों और कर्मो के आधार पर पंडित की व्याख्या करते हुए कहते है ज्ञानीजन (पंडित)विद्द्या और विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गाय हाथी कुत्ते और चांडाल में में भी सम्भाव रखते है तो ज्ञानी वह नहीं है जो किसी जाति विशेष में उत्पन्न हुआ है बल्कि ज्ञानी वह है जो प्राणिमात्र को आत्म दृष्टि से देखता है चाहे वह विद्द्या विनय से युक्त ब्राह्मण हो फांसी की सजा प्राप्त को शूली पर चढ़ाने वाला जल्लाद हो गाय हो या कुत्ता या हाथी उपयोगता के हिसाब से वाह्य ब्वोबहार में तो अंतर होगा किन्तु सभी में परमात्मा का निवास है और सभी परमात्मा द्वारा रचे गए है इस लिए उनके प्रति उंच नीच का भाव नहीं होगा जैसे स्वार्थ के कारण आज देश में रिश्वत खोरी दलाली चल रही है किन्तु यह जायज नहीं है यह बुराई है जिसके कारण भारत की पृथिष्ठा को धक्का पहुंचा है उसी प्रकार स्वार्थ के कारण लोगों ने छुआ छूत उंच नीच आदि चीजो को उत्पन्न किया है यह बुराई है और इसकी समाप्ति के लिए महापुरुषों ने प्रयत्न कर सफलता भी पायी है और इन महापुरुषों के कारण जाति प्रथा लगभग समाप्ति की और बढ़ रही थी किन्तु राजनीती ने गुणबिहीन जाति प्रथा को फिर जीवित कर दिया है

Thursday, 3 December 2015

देश की सभी समस्यें सिर्फ देश की सुरक्षा को छोड़कर हल हो जाएँ हम में से नेता बने लोगों ने अपने लिए सुख सुविधा संपत्ति पद की जितनी प्राप्ति की है यदि इतने पर ही रुक जाएँ और आगे न बढ़ें यही उनकी बड़ी कृपा होगी क्योँकि अब तक जो बर्बादी देश की वह कर चुके हैं वह संसद से लेकर गाओं सभा तथा कर्म चरिओं अधिवक्ताओं अध्यापकों व्योपारिओं छात्र संघो आदि तक के चुनाओं तक में प्रवेश कर गयी हैऔर सेवा तथा रचनातमक दृष्टि समाप्त हो गयी है जिस तरह से कमीशन खोरी और परिवारवाद का प्रचलन तथा चुनाव जीतने के लिए जाति का सहारा तथा धार्मिक सम्प्रदाय बाद का विस्तार किया गया है उस से देश की जनता को नारकीय स्थिति में धकेल दिया है चारों तरफ देश की नैतिक तथा कर्त्तव्य पालन की वृत्ति का नाश करने वाले युवाओं से लेकर बुजुर्ग नेताओं की भीड़ दिखाई देती है अधिकारी कर्म चारी सुख का भोग देशवासिओं को नारकीयजीवन प्रदान कर भोग रहे है जिस किसान के पास ५एकर जमीन है उसकी आय भी १लाख रूपए बार्षिक नहीं है जबकि चपरासी की आय १लाख रुपये से अधिक है कर्म चरिओं का वार्षिक वेतन लाखों में है और अधिकारिओं का तो मासिक बेतन लाख रूपए से अधिक है किन्तु चपरासी से लेकर अधिकारी तक को इतना मोटा बेतन पाकर संतोष नहीं है बे कोई भी काम बिना रिश्वत लिए नहीं करते है अपने ही देश वासिओं की गरीबी देख कर उनका दिल नहीं पसीजताहै कमीशन लेकर योजनाओ का भी सत्यनाश करते है नेताओं अधिकारिओ कर्मचारिओं का सुधार कानून नहीं कर सकता है यह तो उन्हें अपनी अंतरात्मा जगा कर खुद करना होगा

Wednesday, 2 December 2015

लोभ ----- युधिस्ठर ने भीष्म पितामह से पूंछा ----पाप का अधिष्ठान क्या है ?एक मात्र लोभ ही पाप का अधिष्ठान है  ! लोभ से ही पाप की प्रवृत्ति होती है! लोभ से ही पाप अधर्म शठता तथा छल कपट आदि का जन्म होता है ! और लोभी व्यक्तियों के कारण ही राष्ट्रों को दुःख उठाने पड़ते हैं! लोभ से ही क्रोध प्रगट होता है ! लोभ से ही काम की प्रवृत्ति होती है ! और लोभ से ही माया मोह अभिमान उद्दण्ता तथा पराधीनता आदि दोष प्रगट होते हैं ! इसी से मनुष्य पापाचारी हो जाता है ! असहन शीलता निर्लज्जता  संपत्ति नाश धर्म छय  चिंता और अपयश ये सब लोभ के कारण ही होते हैं ! लोभ से ही कृपणता अत्यंत तृष्णा समाज को अहित पहुंचाने वाले काम करने की प्रवृत्ति पद विषयक अभिमान और पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए सभी वैधानिक नियमों का उल्लंघन, समस्त प्राणियों से निम्न स्वार्थ आधारित सम्बन्ध अभिमान सद्गुणों का तिरस्कार सद्गुणी लोगों की उपेक्छा तथा कुटिलता पूर्ण व्योहार होते हैं  !जो मनुष्यों के बृद्ध होने पर भी जीर्ण नहीं होता है ! वह लोभ ही है ! लोभी मनुष्य बहुत सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता है ! भोगों से वह कभी तृप्त नहीं होता ! बहुश्रुत विद्वान बड़े बड़े धर्मग्रंथों को कंठस्थ कर लेते हैं  ! परन्तु लोभ में फँसकर उनकी भी बुद्धि मारी जाती है ! और बे निरंतर क्लेश में रहते हैं ! बेलोभ में फसकर शिष्टाचार का  त्याग कर देते हैं ! और दिखाबे के लिए मीठे वचन बोलते हुए भीतर से अत्यंत लोभी होते हैं  !युक्ति बल का आश्रय लेकरबहुत से असत पाखण्ड युक्त  धर्म खड़े कर देते हैं ! तथा लोभ और अज्ञान में स्थित हो धर्म मर्यादाओं का नाश करने लगते हैं ! जो सदा लोभ में डूबे रहते हैं उन्हें तुम अशिष्ट समझो ! तुम्हें शिष्ट पुरुषों से ही अपनी शंकाएं पूँछना चाहिए जिन्हे शिष्टाचार प्रिय है ! जिनमे इन्द्रिय संयम प्रितिष्ठित है ! जिनके लिए सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ समान है ! सत्य ही जिनका परम आश्रय है ! बे देते हैं लेते नहीं ! उन्हें सत्कर्म से विचलित नहीं किया जा सकता !  बे केवल सद्भाव के लिए ही प्रयत्न शील रहते हैं जिनमे लोभ और मोह का अभाव है ! उन धर्म प्रेमी महान भावों का तुम सावधान होकर सेवा सत्कार करो ! ये सब महापुरुष स्वभाव से ही बड़े गुनबान होते है ! और शुभ  अशुभ के विषय में उनकी वाणी यथार्थ होती है ! दूसरे लोग तो केवल बातें बनाने वाले होते हैं !
५(१४)मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है पर कर्मफल भोगने में परतंत्र है मनुष्य समाज और स्वयं का निर्माण अपने कर्मो द्वारा ही करता है परमात्मा ने श्रिष्टि निर्माण के पूर्व ही समस्त प्राणियों के जीवन यापन के लिए समुचित सामग्री की व्यबस्था कर यह अधिकार मनुष्यों को सौंप दिया था की वह समस्त प्राणियों को उनका उचित भाग प्रदान करे श्रिष्टि में स्त्री और पुरुष दो ही सर्वाधिक बुद्धि संपन्न जीवधारी उत्पन्न किये गए थे इसलिए श्रिष्टि के संरक्छण पोषण का कार्य विशेष तौर पर उन्ही का था मनुस्यों ने अपनी भोग बुद्धि के अनुसार ऐसी व्यबस्था का निर्माण किया की सारी विश्व व्यबस्था संकट के घेरे में हैं भोग प्रधान जीवन दृष्टि से जीवन जीने वालों ने एक नयी बात प्राणिमात्र को अपना भोग माध्यम बनाने के लिए इन अधर्मिओं ने यह बात गढ़ी की संसार में जो विषमता है उसका निर्माता भगवान है उसी की व्यबस्था के तहत लोग गरीब अमीर है उसी की व्यबस्था में पशुओं पक्षिओं को मारने का अधिकार हमें प्राप्त हुआ है इस प्रकार सारी अनैतिकता दुस्टता अन्याय का करता भगवान को बताकर मनमाने तरीके से अन्याय युक्त जीवन जीने का अनुज्ञा पत्र भगवान से प्राप्त कर लिया विश्व व्यबस्था में भगवान के नाम पर अशीमित भोग भोगने वालेइन भिन्न भिन्न रूपों में दिखने वाले इन प्राणिमात्र का शोषण करने वालों ने भगवान के नाम पर थोड़ा बहुत दान पुण्य कर समाज को कष्ट के गर्त में धकेल कर सारी विश्व व्यबस्था को अपने मनोवांछित भोग प्राप्ति का साधन बनाकर इसका ठीकरा भगवान के सर पर फोड़ दिया है यहां भगवान इस व्यापक अन्याय बृत्ति से परमात्मा को पृथक बताते हुए कहते है की परमेश्वर न तो मनुष्यों के कर्तापन को और न कर्मों को और न कर्म फल संयोग की ही रचना करते है मनुष्य जो कुछ भी कामकरताहै है वह स्वभाव के अनुसार करता है उसके कर्म करने में परमात्मा की कोई भूमिका नहीं है
५(१०)कर्म करते हुए कर्म मुक्ति के अनेक मार्ग गीता में बताये गए है आखिर कर्म बंधन से मुक्ति का क्या लाभ है ?कर्म स्वाभाव से ही होते है किन्तु चाहा गया कर्मफल हमेशा प्राप्त नहीं होता है और यदि होता भी है तो कर्ता उसको अपने द्वारा किये गए कर्म का फल मान लेता है जो कि सही नहीं है कर्म चाहे छोटा हो या बड़ा अन्य बस्तुओं व्यक्तिओं के सहयोग से ही पूर्ण होता है इसलिए कर्मफल के विषय में भ्रामिक समझ का अंत होने से अभिमान का निरसन तथा स्वस्थ कर्म करने की प्रवृत्ति विकसित होती है कर्म बंधन से मुक्ति के लिए कर्म फल मुक्ति आवश्यक है यह भौतिक जीवन में सत्कर्म विकास में सहायक होती है कर्म बंधन मुक्ति का आध्यात्मिक लाभ यह है की कर्मबंधन से मुक्त व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है और उसके लिए यह वास्तविक समझ गीता विकसित करती है की जड़ चेतन के रूप में एक मात्र परमात्मा ही ब्रह्माण्ड में समय हुआ है कर्म सामग्री भी वह है और कर्म का कर्ता भी वह है इसलिए समस्त कर्म परमात्मा को सम्पर्पित कर अपने आपको कर्म फल से पृर्थक रख कर कर्म करने से वह उसी प्रकार मुक्त रहेगा जैसे जल में रहते हुए भी कमल जल से मुक्त रहता है कर्म फल की मुक्ति का दोहरा लाभ है संसार में चिंता अहंकार सफलता असफलता आदि से मुक्ति रहित कर्म करने की शक्ति का विकास और अंत में आध्यात्मिक फल के रूप में जन्म मरण से मुक्ति और परम धाम की प्राप्ति

Tuesday, 1 December 2015

असहनशीलता ------ भारत में प्राकृतिक  विविधता के कारण आचरणगत विविधता भी अनादि काल से है !यह एक ऐसा देश है जिसमे सम्पूर्ण विश्व का दर्शन होता है ! और इसी देश में विश्व के निर्माता और सम्पूर्ण श्रष्टि के पालक पोषक और संघार कर्ता ईश्वर  का भी विविध रूपों और स्वरूपों में अवतार हुए हैं !सभी  प्रकार के आस्तिक नास्तिक , आत्मा ,परमात्मा को स्वीकारने और अस्वीकारने  वाले लोगों और पुनर्जन्म के मानने वाले और ना मानने वाले धर्मों का भी स्वागत इस भारत भूमि में हुआ है !जिस प्रकार प्राकृतिक विविधता इस महान देश की सुंदरता और गौरव गरिमा की बृद्धि करती  रही इसी प्रकार यह धार्मिक और आचरणगत विविधता भी इस देश की विशेषता रही !अब स्थिति बदल गयी है !अब यह विविधता जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करने लगी है ! जीवन के सभी छेत्रों में यह विविधता अब तोड़ने का काम कर रही है !और इसकेरूप स्वरूपभी बहुत संकीर्ण होते जा रहे हैं !हिंन्दु मुसलिम सिख ईसाई जैन बौद्ध और पारसी आदि के नाम से विविधता के कारण देश की अखंडता बिखंडता में परिवर्तित करने का प्रयत्न दृष्टिगोचर होता है !अब अगला ,पिछड़ा सवर्ण दलित अति दलित अति पिछड़ा आदि भी तोड़ने का काम कर रहे हैं !देश में जातियों के छोटे छोटे ग्रुप भी सक्रिय दिखाई देते हैं !और कुछ धार्मिक गठबंधनों कीपद्धति भी विकसित हो गयी है !सारे देश में किसी न किसी नाम से देश को तोड़ने की तमाम एजेंसियां कार्य रत हैं !उसीका परिणाम यह असहनशीलता हैं !इसका सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र राजनीति है! जो राजनेता पद प्रतिष्ठा धन संपत्ति आदि वैभव प्राप्त करने के लिए इस विविधता का दुरपयोग  कर रहे हैं !बे ही लोग असहनशीलता पर बहस भी कर रहे हैं !और इसको समाप्त करने की बजाय इसमें बृद्धि कर रहे हैं !जिस प्रकार से वरसात के पानी के अभाव में कृषि सूख जाती है !उसी प्रकार असहनशीलता के विनाश से राजनेताओं की इस विभाजन और बिघटनकारी राजनीति का विनाश हो जायेगा और उनका वैभव और पद प्रतिष्ठा का विनाश भी  हो जाएगा !अन्धे को भी राजनेताओं की राजनैतिक सफलता की पृष्ठ भूमि में यह बात साफ़ समझ में आसकती है !अगर कोई गम्भीरता से  इस पर विचार करके इस पर दृष्टि पात करे तो समझ में यह बात आ जायेगी  !चुनाव में एक मुद्दा विकास का होता है !विकास राजनेताओं का होता है !एक मुद्दा धार्मिक सद्भाव का होता है !उसमे हिन्दू मुसलिम गठ बंधन का होता है !कहीं हिंदुत्तव का होता है !कहीं जिस धर्म के लोगों का बाहुल्य होता है उनका साथ पाने के प्रयत्न में होता है !जाति प्रथा के विनाश की बात होती है !उसके लिए अगड़ा पिछड़ा दलित आदि के नाम पर वोट प्राप्त करने की चेस्टा की जातीं है !और जाति प्रथा को मजबूत किया जाता है !इस प्रकार लोकतान्त्रिक पद्धति में उन गुणों का नाश कर दिया जाता है !जिन्हे ईमानदारी देशभक्ति त्याग सेवा आदि नामों से जाना जाता है !इसीलिए इन राजनैतिक निम्न स्वार्थों के रहते देश में असहनशीलता अभी और विकसित होगी !और यह जबतक क्रियाशील और विकसित होती रहेगी जब तक लोगों को इन राजनेताओं के छुद्र स्वार्थों को  समझ कर नष्ट करने की प्रवृत्ति का जन्म नहीं होगा !



 समाज व्यबस्था को सुचार रूप से संचालित करने केलिए मनुस्मृति का जन्म हुआ था !मानव समाज को व्यबस्थित करने के लिए यह पहली विधान की पुस्तक है !जिसमे धर्म अर्थ काम और नीति का के वर्णन के साथ आचरण विधि का भी वर्णन किया गया है !इसमें बहुत सा विधान वर्णाश्रम के अनुसार है !किन्तु धीरे धीरे युग परिश्थिति और काल क्रम से वरुणाश्रम धर्म  में दोष उत्पन्न होने लगे !परिणाम स्वरुप युग के अनुसार और भी स्मृतियाँ भी लिखी जाने लगी थी  !इसीक्रम में याग्यवल्क्य  स्मिृति ,शुक्र नीति ,बृहस्पति स्मिृति  कौटल्य का अर्थशाश्त्र आदि १०८ स्मिृतियों  का निर्माण हुआ !राजतन्त्र की समाप्तिके बाद अब लोकतंत्र की स्मृति हमारा संविधान है !यही हमारा विधान शाश्त्र है !और इसी के द्वारा जनता के सभी प्रकार के आचरणों का नियमन और नियंत्रण होता है !मनुस्मृति के बहुत से प्रावधान संविधान में है !और बहुत से प्रावधान हटा दिए गए हैं !डॉ अम्बेडकर जो संविधान निर्माण समिति के चेयरमैन  थे मनुस्मृति के कुछ प्रावधानों के कट्टर विरोधी थे !और आज भी उनकी विचारधारा के राजनैतिक समर्थक मनुवाद का तीब्र विरोध करते हैं !राजस्थान हाई कोर्ट के प्रांगण में कानून के आदि निर्माता मनु का स्टेचू बना हुआ है !उसका भी विरोध इसी विचार धारा के लोग किया करते हैं !भारत लम्बे समय तक गुलाम रहा है !इस दौरान वैदिक धर्म को लांछित और अपवित्र करने के लिए वेदिकधर्म द्रोहियोँ ने इस धर्म के ग्रंथो में बहुत सी मनगढंत बातों का प्रवेश करा दिया है !यह मनु स्मृति के साथ भी ऐसा  हुआ है !उसी विकृत मनुस्मृति के कारण डॉ अम्बेडकर इस स्मिृति के विरुद्ध हो गए थे !मनु स्मृति के काल परिश्थिति और समय के अनुसार कुछ सिद्धांत आज भी आचरण में उतारे जा सकते हैं !
बिना बजह किसी भी घटना को राजनैतिक बहस का मुद्दा बना लेना इस समय राजनेताओं का स्वभाव बन गया है !मोदीजी की और नवाजशरीफ की मुलाकात पर झट पट आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और श्री दिग्विजय सिंह ने मोदीजी पर प्रहार करना शुरू कर दिया है !आप पार्टी के प्रवक्ता में राजनैतिक समझ कितनी है !इसकी जानकारी मुझे नहीं है !किन्तु श्री दिग्विजय तो एक अनुभवी नेता हैं !किन्तु इधर कुछ समय से उनके कमेंट्स बहुत जल्दबाजी में बिना किसी गंभीर राजनैतिक दृष्टि से होने लगे हैं !उन्हें यह जानकारी है !कि पाकिस्तान का लोकतंत्र  वहां की सेना और कट्टरपंथी भारत विरोधी शक्तियों के हाथ में है !नवाजशरीफ चाहते हुए भी भारत के साथ सौहाद्र पूर्ण सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते हैं !कांग्रेस पार्टी हमेशा से भाजपा की दृष्टि में मुसलमानो की हिमायती पार्टी मानी जाती रही है ! उस पर हमेशा और आजभी मुसलिम तुष्टीकरण का आरोप लगता रहा है !जब कांग्रेस सौहाद्र स्थापित नहीं कर पायी तो मोदीजी जिनको

  पाकिस्तान के कट्टर पंथी फूटी आँख देखना पसंद नहीं करते  !तो इस  मुलाकात को इतना राजनैतिक महत्त्व देकर चर्चा की सुर्खियां बनाने की क्या आवश्यकता है!
कोई ३०,४० साल से नेताओं ब्लैक मार्केटरों भू माफिआओं दबंगो चापलूसों दलबदलूँ घूसखोर अधिकारिओं कामचोर कर्मचारिओं ना पढ़ाने वाले अध्यापकों नक़ल टीप कर पास होने वाले विद्द्यार्थिओं दलाली करने वाले अधिवक्ताओं आदि का यह स्वर्णिम काल रहा है नेताओं ने दलितों अगड़ों पिछड़ों जातिओं के गठजोड़ से सम्मान भी पाया अकूत संपत्ति भी पायी तथा परिवार का भी प्रिवेश कराया छात्र नेताओं ने भी अध्यन करने के बजाय छात्र संघो को अपनी आमदनी का माध्यम बनाया मुनाफा खोरों ने भी खूब चांदी काटी भू माफिया जमीनो बालू गिट्टी मिटटी पर अवैधानिक कब्ज़ा करने में सफल रहे नेताओं की चापलूसी करने वाले लोगों को भी नेताओं के भोग से बचा हुआ प्रसाद प्राप्त हुआ दलबदलू भी सत्ता प्राप्ति के भूखे नेताओं के द्वारा लाभान्बित हुए अधिकरिओं ने भी घूस से अकूत संपत्ति एकत्रित की तथा कर्मचारिओं में जो बिलकुल भी काम नहीं करना चाहते थे बे कर्मचारी नेता बन गए और कर्मचारिओं ने आंदोलन कर तनख्वाहें तो खूब बढ़वाई किन्तु कर्म संस्कृति इसके बाद भी घूस खोरी से युक्त रही अध्यापकों ने तो भारी भरकम वेतन प्राप्ति के बाद भी विद्द्यालयों में न जाने का संकल्प ही कर लिया जिस से प्राइवेट स्कूल पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं विद्द्यार्थिओं ने पड़ने के बजाय नक़ल टीप कर डिग्री प्राप्त करने का उद्देश्य ही बना डाला अधिवक्ताओं को भी दलाली से बिना मेह्नत के पैसा कमाने की पद्धति अधिक लाभ दायिक प्रतीति हुई किन्तु इस स्वर्णिम काल काअब अंत होने वाला है क्योँकि जनता की सहनशक्ति जबाब दे चुकी है और बर्बादी भी बहुत हो चुकी है तथा इस स्वर्ण काल का समय भी पूरा हो चूका है और आगे आने वाला समय ईमानदार आदर्श व्यक्तिओं का होगा
देश में असहन शीलता है !यह एक सत्य तथ्य है !इस पर बहस इस तथ्य को स्वीकार करने  के बाद इसको समाप्त करने के लिए  होना चाहिए थी  !किन्तु संसद ने इस मुख्य बिंदु पर विचार नहीं किया !सभी विपक्छीदल भाजपा पर असहनशीलता के लिए हमला करते दिखे !और भाजपा हमेशा की तरह कांग्रेस पर हमलाबर रही !और असहनशीलता के समाधान का कोई मार्ग नहीं खोजा गया !असहनशीलता के केंद्र में  धार्मिक और सांस्कृतिक संकीर्णता है !इस समय इसी पर विचार किया जाना चाहिए था
 मुसलिम तुष्टीकरण के नाम पर कांग्रेस पर  हमला हो रहा है !यह हमला नया नहीं है !इसी कारण गांधीजी की हत्या हुई थी !और यही इस समय भी मुख्य रूप से असहनशीलता के रूप में दिखाई दे रही है !देश में दंगे , आदि मुख्य रूप से मुसकमानो और हिन्दुओं के बीच ही होते हैं !और इन्ही में  ,सद्भाव रहे ,इनके मध्य साम्प्रदायिक दंगे ना होँ !मुख्य रूप से इस पर विचार किया जाना चाहिए था !जो नहीं हुआ !और कभी होगा भी नहीं !इसका समाधान राजनीति से कभी नहीं निकलेगा और ना निकल सकता है !इसका समाधान तो स्वतः  निकलेगा जब दोनों धर्मों के संकीर्णता फैलाने वाले  और राजनैतिक लाभ लेनेवाले नष्ट हो जाएंगे !
महाभारत आध्यात्मिक ग्रन्थ है !इसीलिए उसमे बर्णित सभी स्थूल घटनाओं को आध्यात्मिक दृष्टि से देखना चाहिए !अध्यात्म के संपूर्ण रहस्य सभी सामान्य जनो पर प्रकाशित नहीं होते हैं !इसीलिए कुछ घटनाओं को श्रद्धा और भक्ति से तथा शाश्त्र के अनुसार सही और प्रमाणित माना ना पड़ता है !अश्वत्थामा आज भी जीवित है !इसको सिर्फ श्रद्धा और भक्ति तथा शाश्त्र प्रमाण से ही प्रमाणिक माना जा सकता है !भगवान श्री कृष्ण ने गीता में २(२७)में कहा है कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी ! और जिसकी मृत्यु हुई है ! उसका जन्म अवश्य होगा ! इस जन्म मृत्यु रूप परिवर्तन के प्रवाह का निवारण नहीं हो सकता है ! अतः इस विषय में किसी को शोक नहीं करना चाहिए !