५(२५)जैसे विद्द्युत एक शक्ति होती है उसका उपयोग विवाह मंडप में भी होता
है और मुर्दा घर में भी मुर्दा को जलाने में होता है किन्तु विवाह मंडप में
न तो उसे प्रस्सन्न्ता होती है और न मुर्दा घर में वह दुखी होतीहै उसी
प्रकार ब्रह्म भी एक शक्ति है और वह भौतिक और आध्यात्मिक रूप में सभी जगहों
में काम करती है उसका स्वाभाव शांत है क्योँकि वह स्थिति परिश्थिति काल
धर्म उपयोग को लेकर सुखी दुखी नहीं होता है वह रिषि भी इस ब्रह्म शांति को
प्राप्त हो जाता है जिसके सब पाप नष्ट हो गए है अर्थात
वह कर्म के बाह्य परिणामो से प्रभावित नहीं होता है जिसके सब संशय ज्ञान
के द्वारा निब्रत्त हो गए है अर्थात उसे इस बात का बोध हो गया है की कर्म
शरीर गत है और आत्मा अकर्ता है और जिसके समस्त कर्म प्राणी मात्र के हित
में होते है क्योँकि वह पूर्ण रूप से स्वार्थ रहित होता है उसका मन उसके
नियंत्रण में रहता है क्योँकि वह बासना रहित होता है उसका मन निश्छल भाव से
परमात्मा में स्थिर रहता है यह ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म में
स्थापित होता है मनुष्य के लिए दो ही स्थान है या तो अशांति युक्त संसार या
सांत ब्रह्म
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