दिसम्बर का महीना था !ठण्ड पूरीशक्ति से क्या मनुष्य ,क्या पशु और क्या छोटे बड़े जीव जंतु सभी को अपने आगोश में लेकर पीड़ा दे रही थी !कुछ दिनों से कुहरे और ठंडी हवाओं ने ठण्ड का प्रकोप और बढ़ा दिया था !कुछ दिनों के बाद सूर्यनारायण के दर्शन हुए !लोग शीत से बचाव के लिए सूर्य का ताप ग्रहण करने के लिए घर के बाहर चबूतरों पर या लॉन में बैठकर गर्मी लेने लगे !एक मेढक जो शीत से व्याकुल था ,वह भी मैदान में सूर्य की ताप से शीत निवारण कर रहा था !इतने मैं तीन मेढक और आये और एक एक कर पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ने लग गये ! दो मेढक तो पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ गये !तीसरा निराश हो कर चला गया ! सबसे ऊपर जो मेढक बैठा था !उसे जब यह भरोसा हो गया ,की अब मेरी पीठ पर और कोई नहीं बैठ पायेगा ! तब उसने कहा --- चिगम, चिगम ,दूसरे ने कहा ख़ुशी ना गम ( अर्थात अगर तुम मेरी पीठ पर सबार हो ,तो मैं भी किसी की पीठ पर सबार हूँ !नीचे बाला मेढक रोते हुए चिल्लाया ,मरे ससुरजू हम ! ( सिर्फ हम ही एकमात्र अभागे हैं जिसकी पीठ पर बैठ कर तुम चटकारे लेकर ख़ुशी मना रहे हो और हम तुम दोनों का भार ढोरहे हैं ,रो रहे हैं ,चिल्ला रहे हैं, और तुम्हारे सत्ता के मद से बहरे हुए कानो तक हमारा रोना नहीं पहुँच रहा है ) उसके रोने की आवाज तीसरे और दूसरे के सुख में अरण्य रोदन बन कर दब गयी ( जंगल में रोने के समान )
Geeta The Spirit
Thursday, 1 December 2016
Sunday, 27 November 2016
पंचायत राज्य आया किन्तु ग्राम स्वराज्य की स्थापना नही हुई --------- स्वतंत्रता के बाद जब संविधान का निर्माण हुआ ,उस समय संसद और विधानसभाओं में अत्यंत उत्कृष्ट देशभक्त नेता लोग जनप्रितिनिधि के रूप में चुनकर पहुंचे थे !उस समय सांसदों और विधायकों को कोई वेतन नहीं मिलता था !जब सत्र चलता था !तब दैनिक भत्ता मिलता था !उन सांसदों ने इस बात को जोर शोर से संसद में उठाया कि गांव के लिए योजनायें गांव में गांव के लोगों के द्वारा बनाई जानी चाहिए !परिणाम स्वरुप राजीब गाँधी ने पंचायती राज देश में लागू किया और युवाओं को भी मताधिकार प्रदान किया !किन्तु पंचायती राज से ग्राम स्वराज नहीं हुआ ! पंचायती राज का लक्छ्य है सत्ता का विकेन्द्रीकरण !केंद्र की सत्ता का कुछ अंश राज्यों में आया और कुछ हिस्सा जिलों और गांव में आया !यह सभी जानता हैं कि पत्थर के कितने भी टुकड़े किये जायें ,बे टुकड़े ही रहेंगे ,मक्खन नहीं बनेंगे !इसिलए जो सत्ता प्राप्त की ललक ,और सत्ता में बने रहने के लिए जो झगड़े ,और गलत काम (मतदाताओं को लालच देना ,रुपये बांटना ,जाति बाद को उभड़ना ,बेईमानी से धनसंचय करना ,झूठ बोलना ,गुंडों और दबंगों की मदद से बूथ केप्चर करना ,समाज को दलितों ,पिछड़ों ,अगड़ों ,अल्पसंख्यकों ,आदि में बाँट कर वोट प्राप्त करना ,धार्मिक उन्माद आदि उत्पन्न करना ) संसद और विधान सभाओं आदि में चुने जाने के लिए जो नेता लोग करते हैं ,बे सबके सब ग्राम पंचायत के चुनावों में भी प्रवेश कर गये ! इसको विनोबा जी मत्सर का राष्ट्रीय करण कहते थे !इस प्रकार जो ग्रामपंचायतें बनी और उनमें जो ग्राम प्रधान आदि चुन कर पहुंचते हैं या जिलापंचायतों ,या ब्लॉकप्रमुख आदि चुने जाते हैं ,बे अपने निम्न सत्ता भोग के स्वार्थों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं ,गांव की सेवा नहीं करते हैं !चुनाव जीतने के लिए धनबल और जनबल का प्रयोग करते हैं !चुने जाने पर धन कमाते हैं और दबंगों का निर्माण करते हैं !जो अधिकार प्राथमिक पाठशालाओं के नियंत्रण के ,बालकों को मध्यान्ह भोजन आदि के ग्राम पंचायतों को दिया गया हैं !और जो भी धनराशि ग्रामविकास के लिए ग्रामों में या जिलों में आती है !उसका बन्दर बाँट राज्य कर्मचारियों और प्रधानों या जिला पंचायत अध्यक्छओं में हो जाता है !ग्रामविकास के कार्य ( सड़कनिर्माण ,भवन ,निर्माण ,मनरेगा आदि ) नहीं होते हैं !ग्रामपंचायतों की स्थापना और उनको आर्थिक अधिकार देने के कारण ग्रामस्वराज्य के बजाय ग्रामविनश हो गया है! गांव वैमनस्यता ,और हिंसा तांडव के केंद्र बन गये हैं
Sunday, 13 November 2016
आज गुरु नानक देव का जन्मदिन है !जिस समय नानक देव का जन्म हुआ देश में इस्लामी हुकूमत थी !नानकदेव ने भारत की अनादी वैदिक धर्म की सनातन संस्कृति के द्वारा सर्वधर्म सद्भाव का प्रचार और प्रसार किया !इस पवित्र भूमि भारत में संतो की अविरल धारा अहिंसा प्रधान ,करुणा युक्त त्याग और तपस्या से अनुप्रेरित और प्रवाहित रही !संतों के सद प्रयत्न हिंसक और आक्रमणकारी आयातित धर्मों के कारण पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके !फिर भी संतो का अनुबरत प्रयास सर्वधर्म सद्भाव और अहिंसा का ही रहा !इस प्रयास में अनेक संतों को अपना जीवन तक अर्पित करना पड़ा !नानकदेव परंपरा के ही गुरु तेगबहादुर को मुगलिया सल्तनत ने धर्म परिवर्तन स्वीकार ना करने वाले कश्मीरी पंडितों की रक्छा के लिए अपने जीवन की कुर्वानी देनी पड़ी !गुरु गोविन्द सिंह को हिन्दू धर्म की रक्छा के लिए अपने पुत्रों को जिन्दा दीवाल में मुगलिया सल्तनत द्वारा चुनवाये जाने का ह्रदय विदारक दंश झेलना पड़ा !उन्होंने इस कट्टरता के प्रतिकार के लिए सिख धर्म की स्थापना की !और तपस्या से अर्जित ईश्वरीय शक्ति से वैदिक धर्म की रक्छा करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था ! ऐसी यह सनातन धर्म परंपरा से पवित्र भारत भूमि परिपूर्ण रही है ! जिस प्रकार खेत की फसल जंगली जानवर ना खा पायें इसीलिए बाढ़ लगानी पड़ती है ,और कष्ट से उपार्जित धन ,संपत्ति की रक्छा के लिए ताला लगाना पड़ता है ,उसी प्रकार से सिख धर्मगुरुओं ने वैदिक धर्म की रक्छा सुरक्छा के लिए नानक देव का अहिंसात्मक करुणा प्रधान सर्वधर्म सद्भाव का सन्देश भारत भूमि से अखिल विश्व को दिया !इस सनातन वैदिक धर्म की अविरल धारा प्रवाहित होती रहे इसके लिए गुरु गोविन्द सिंह ने शौर्य ,साहस और अस्त्र ,शस्त्र से युक्त सिख धर्म की स्थापना की और धर्म की रक्छा के लिए कुर्वानी का सन्देश दिया !जिस तरह से आकाश में पंछी दो पंखों से युक्त होकर उड़ते हैं !उसी प्रकार से वैदिक धर्म की रक्छा के लिए गुरुनानक देव और गुरु गोविन्द सिंह ने शांति और शौर्य के दो पंखों से रक्छा ,सुरक्छा का सन्देश प्रसारित किया !
Saturday, 12 November 2016
जैसे कोयले को सफ़ेद नहीं किया जा सकता है ,बैसे ही धन को भी सफ़ेद नहीं किया जा सकता है !कोयला लकड़ी को जलने से ही प्राप्त होता है !या जली हुई जमीन में विशेष छेत्रों में मिलता है ,इसका प्रयोग भी आग लगाने के लिए ही होता है !इसका उपयोग रचनात्मक और विध्वंसक दोनों प्रकार से हो सकताहै !इस से घर भी फूंके जा सकते हैं और भोजन भी पकाया जा सकता है ! इसी प्रकार इस कागजी नोट से लोक व्योहार को रचनात्मक दृष्टि से भी व्यबस्थित ढंग से चलाया जा सकता है !और लोकव्यकस्था भंग भी की जा सकती है कुछः समय से यह कागजी नोट लोकव्यबस्था को नष्ट करने में प्रयुक्त हो रहा था !इसका अनुचित प्रयोग ,भारत का प्रमुख दुश्मन पाकिस्तान फर्जी जाली नोट छापकर और भारत में पड़े पैमाने पर बांटकर हिंदुस्तान की आतंरिक और बाह्य सुरक्छा को खतरा पहुंचा रहा था !इस से भारत की अर्थ व्यबस्था पर भी गंभीर खतरा उत्पन होता जा रहा था ! जो असली नोट एक हजार और पांचसौ के थे ,बे अधिकाँश भारत के भ्रष्ट लोगों के पास संग्रहीत थे !ये लोग देश के चरित्र से नैतिकता को नष्ट कर रहे थे ! इसिलए यह धन काला कहलाने लगा है !इस पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया था ! इसीलिए भारत सरकार ने इन नोटों के प्रचलन को समाप्त करने का निर्णय लिया ! इस निर्णय के पीछे सरकार का राजनैतिक लाभ लेने की इक्छा की बात बहुत से लोग कह रहे है ! उनका कहना है !कि जिनके पास वास्तव में काला धन है !उनको इसकी जानकारी पहले हे दे दी गयी थी ,इसीलिए उन्होंने पहले ही कालेधन को स्वर्ण आदि खरीद कर सफ़ेद कर लिया था !इसका खामयाजा और परेशानी आम जनता को उठानी पड़ रही है ! इसकी तथ्य पूर्ण जानकारी तो संसद के शीतकालीन सत्र में होगी जब विरोधी दल के नेता इस निर्णय के विरोध में अपने वक्तव्य देंगे !फिलहाल तो बैंकों में जो भीड़ देखी जा रही है ,उसमें बो लोग नहीं दिखाई दे रहे हैं ,जिनके पास इस काले धन का जखीरा संग्रहीत है !सरकार का यह कहना कि इस से भ्रष्टाचार समाप्त होगा !यह बात बिलकुल असम्भव है !भ्रष्टाचार तो इन नोटों के कारण भी हो रहा है !लोग धड्ड्ले से एक हजार और पांचसौ के नोट आधे या पौनी कीमत देकर बदल रहे हैं !
Thursday, 27 October 2016
जागते सभी हैं किन्तु देखते अलग अलग तरह से हैं ------------ जागना भी अनेक प्रकार का होता है !नींद से जागना ,विश्वासघात से चोट खाकरजागना ,शिक्छण से ज्ञान प्राप्त कर जागना ,भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए जागना ,समाज व्यबस्था को बदलने के लिए जागना ,आदि जागृति के अनेक प्रकार है !कुछ ऐसे होते हैं जो जागते हुए भी सोये से रहते हैं .और कुछ ऐसे भी होते है जो निरंतर चिन्मय सत्ता (आत्मसत्ता ,या जीव जगत के कल्याण के लिए निरंतर सचेष्ट रहने वाले ) सोते हुए भी जाग्रत रहते हैं !ऐसे ही व्यक्ति महा पुरुष कहलाते हैं !जो अपने कार्यों से जीवित अवस्था में ही अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं !और म्रत्यु के बाद भी अमर रहते हैं !उनके नाम धाम का पता नहीं होता है !किन्तु चिन्मय सत्ता में विलीन होने के बाद भी बे आत्मरूप से सामान्यजन के व्योहार में प्रवेश कर जाते हैं ! आमजन में जब स्वार्थनिष्ठा का अभाव, दया ,प्रेम ,करुणा ,अहिंसा ,सद्भाव ,सदाचार ,सहयोग ,आदि श्रेष्ठ गुणों का दर्शन हो तो समझना चाहिये, की ये महापुरुष अपनी चिन्मय सत्ता से जीवित हैं !जब आमजन के जीवन से ये तत्त्व विलुप्त जान पड़ें तोसमझना चाहिये की दुष्ट,आत्मविघातक स्वार्थजीवी ,मरणशील संसार के सुख भोगों में आकंठ डूबे राक्छ्सी ,आसुरी ,दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का प्रेत आमजन में प्रवेश कर गया है ! भारत भूमि में अनादि काल से चिन्मय सत्ता की प्राप्ति की आकांछा में निरत मनुष्यों का प्रादुर्भाव होता रहा है !उन्हें अपने शव्दों में सर्वत्यागी ,तपस्वी ,साधु संत ,सन्यासी आदि नाम देते हैं !ऐसे महापुरुषों का ही सामूहिक नाम ब्राह्मण होता था !इसीलिए वैदिक ग्रंथों में कहा गया है की ब्राह्मण का शरीर सुख भोग के लिए नहीं त्याग और तपस्या ,योग आदि के लिए होता है !लकड़ी जलकर ही प्रकाश ,और उष्णा देती है !इसीलिए ब्राह्मण सिर्फ तप ,त्याग और तपस्या से हे प्रकाशित होता है !इसीलिए कोई भी धर्म ब्राह्मण मुक्त नहीं होसकता है !वैदिक धर्म में जिसे ब्राह्मण कहते हैं !वही बौद्ध धर्म में भिक्छु ,इस्लाम में मुल्ला ईसाईयों में ,पादरी .जैन ,में पंडित, आदि नामों से जाना जाता है !इसके अतिरिक्त भी जितने धर्म संयुक्त ,और धर्म ,रहित ,ज्ञान अज्ञान आदि हैं ,उनको प्रभावित और प्रशिक्छित करने वाले व्यक्ति का नाम कुछ भी हो लेकिन वह ब्राह्मण ही होता है !ब्राह्मण ज्ञान ,अज्ञान आदि सभी का पर्यायवाची शव्द है !आज भारत की प्राचीन आत्मनिष्ठ अनादि परंपरा के विघातक तत्त्व साक्रिय दिखाई दे रहे हैं ! संसार में दो तरह की प्राणी श्रष्टि दृष्टि गत होती है ! एक को दैवीऔर दूसरी को आसुरी शक्ति कहते हैं !दैवी गुणों से संपन्न लोगों में भय का सर्वथा अभाव ,अंतःकरण की अत्यंत शुद्धि ,ज्ञान से लोकहितकारी कर्म करने की प्रवृत्ति ,दान ,इन्द्रिय संयम स्वाध्यायाय ,कर्तव्यपालन के लिए कष्ट सहना.शरीर ,मन ,वाणी ,की सरलता ,अहिंसा ,सत्यभाषण ,क्रोध ना करना ,संसार के सुख भोगों के त्याग की प्रवृत्ति ,चुगली ना करना ,जीव जंतुओं पर दया करना ,छमा,धैर्य मान आदि की चाह ना होना प्रमुखता से होते हैं !जो आसुरी लोग होते हैं ,उनमे दम्भ ,घमंड ,अभिमान क्रोध और कठोरता ,अज्ञान ,सुख भोगों की लालसा और आमजन को भ्रमित कर अपने स्वार्थों के पोषण आदि की प्रबल भावना रहती है !स्वतंत्र भारत में आमजन को अपनी समझ के अनुकूल इन जाग्रत असुरों ,( अनादि लोकोपकारी संस्कृति और अध्यात्म विघातक लोगों ) के दुष्प्रयत्नो के प्रभाव से मुक्त होकर देश की सनातन पावन दैवी शक्तियों से युक्त जीवन परंपरा का अनुशीलन करना चाहिये !भारत में युगानुकूल दिव्य सनातन परंपरा से ही भारत का कल्याण और भारत से ही विश्वकल्याण हो सकेगा !जागो अज्ञान से ज्ञान को ओर!
Wednesday, 26 October 2016
सेवा कार्य या मालाजप ---- गांधीजी ----हरिजनसेवक१७--२--१९४६
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
Monday, 24 October 2016
नीति रक्छा का उपाय -------- गांधीजी ----- हिंदी नवजीवन २५-५-१९२४
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
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