आचरण योग्य नीति -----(१)दूसरों में फूट डालने का जिनका स्वाभाव है ! जो कामी ,निर्लज्ज शठ और प्रिसिद्ध पापी हैं बे साथ रखने के अयोग्य और निन्दित माने गए हैं ! इन दोषों के अतिरिक्त और भी जो महान दोष हैं उनसे युक्त मनुष्यों का जहाँ तक संभव हो साथ नहीं करना चाहिए ! ऐसे व्यक्तियों से जब सौहाद्र भाव किसी भी कारण से समाप्त हो जाता है ! तब उस सौहाद्रसे होने वाली सिद्धि का फल और प्रेम तथा सुख का भी नाश हो जाता है ! फिर बे व्यक्ति निंदा करने लगते हैं ! और विनाश करने का उद्द्योग भी करने लगते हैं ! इस प्रकार के नीच और अधम क्रूर पुरुषों से होने वाले संग पर अपनी बुद्धि से पूर्ण विचार करके विद्वान पुरुष उन्हें दूर से ही त्याग दे !
(२)जो बुद्धिमान पुरुष अपने पोषण योग्य कुटुम्बियों ,दरिद्र ,दीन तथा रोगी पर अनुग्रह करता है ! वह सभी प्रकार की समृद्धि से युक्त हो कर अनंत कल्याण का अनुभव करता है !
(३)जो लोग अपने भले की कामना करते हैं ! उन्हें अपने देश बासियों को उन्नति शील बनाना चाहिए ! जो अपने देश बशियों से प्रेम करता है ! ,उनका आदर और सत्कार करता है ! उसकी इस भावना और कृत्य से उसके हित के साथ राष्ट्रहित की भी बृद्धि होती है ! जो अपने राष्ट्र बासियों को उन्नतिशील बनाता है ! उसकी उन्नति भी अपने अप्प ही हो जाती है !
(४)जो मनुष्य धीर और राष्ट्र प्रेम से युक्त पुरुषों के वचनो के परिणाम पर विचार करके उन्हें कार्य रूप में परिणित करता है ! वह चिरकाल तक यश का भागी बना रहता है !
(५)अत्यंत योग्य एवं कुशल विद्वानो द्वारा भी किया गया ज्ञान व्यर्थ ही है ! यदि उस से कर्तव्य का ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होने पर भी उसको कर्तव्य रूप में धारण नहीं किया !
(२)जो बुद्धिमान पुरुष अपने पोषण योग्य कुटुम्बियों ,दरिद्र ,दीन तथा रोगी पर अनुग्रह करता है ! वह सभी प्रकार की समृद्धि से युक्त हो कर अनंत कल्याण का अनुभव करता है !
(३)जो लोग अपने भले की कामना करते हैं ! उन्हें अपने देश बासियों को उन्नति शील बनाना चाहिए ! जो अपने देश बशियों से प्रेम करता है ! ,उनका आदर और सत्कार करता है ! उसकी इस भावना और कृत्य से उसके हित के साथ राष्ट्रहित की भी बृद्धि होती है ! जो अपने राष्ट्र बासियों को उन्नतिशील बनाता है ! उसकी उन्नति भी अपने अप्प ही हो जाती है !
(४)जो मनुष्य धीर और राष्ट्र प्रेम से युक्त पुरुषों के वचनो के परिणाम पर विचार करके उन्हें कार्य रूप में परिणित करता है ! वह चिरकाल तक यश का भागी बना रहता है !
(५)अत्यंत योग्य एवं कुशल विद्वानो द्वारा भी किया गया ज्ञान व्यर्थ ही है ! यदि उस से कर्तव्य का ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होने पर भी उसको कर्तव्य रूप में धारण नहीं किया !