Tuesday, 13 October 2015

ठीक बात है !कि किसी के खाने पीने पर प्रितिबंध  नहीं होना चाहिए !किन्तु खाना भी देश काल और संस्कृति के अनुकूल होना चाहिए !और खाने से विधि विधान का उल्लंघन भी नहीं होना चाहिए !अमेरिका आदि में जो गायें होती हैं ! बे वास्तव में गायें नहीं गवय होते है !  बे गाय की आकृति के समान एक प्रकार का जंगली पशु होता है! जिसको पाल पोश कर पालतू बना लिया गया है ! उस कि आकृति गाय के समान होती है ! किन्तु उसमे  गाल कम्बल नहीं होता है ! भारत में भी  यह गवय प्राचीन काल में हिमालय के आस पास पाया जाता था !  हो सकता है आज भी हो  !महाभारत में इसका वर्णन किया गया है ! गंध मदन पर्वत के पास मोर चामरी गायें बन्दर रुरु मृग सूअर गवय और भेंस आदि पशु विचार रहे थे (१५) १३५० ! इसीलिए अमेरिका में जो बीफ खाया जाता है !उसमे भारतीय गाय का मास शामिल नहीं किया जा सकता है !मास का आहार करने वालों के लिए पशु पक्छी सूअर आदि बहुत प्रकार के जीव जंतु हैं ! इसीलिए मासा हारी गाय की उपयोगिता को ध्यान में रखकर इसका मास खाना बंद कर सकते हैं !गाय केमास से कछ लोगों का ही पेट एक दिन भर सकता है !जबकि  जीवित गाय स्वास्थ्यबर्द्धक दूध मक्खन घी दही पनीर आदि १५ साल तक दे सकती है !और बहुत से परिवारों कापोषण करती है !उसके गोबर और मूत्र में कीटाणु विनाश  करने की शक्ति है !इसीलिए ध्यान आदि करने के पहले आध्यात्मिक पुरुष ध्यान के लिए निश्चित किये हुए स्थान को गाय के गोबर से लीप कर पवित्र करते हैं !उस से कृषि के लिए सस्ती उर्बरक खाद की भी प्राप्ति होती है !और स्वाभाविक मृत्यु के बाद गाय की चमड़ी और हड्डी भी काम आती है !गाय के मूत्र से कैंसर ऐसे संघातक रोग भी ठीक होते हैं !इसलिए  भारत में जो लोग गाय के मास को खाने की जिद पर अड़े हुए है !और गाय के मास के खाने पर रोक लगाने का यह कहकर विरोध कर रहे हैं !की यह उनके खाने पीने की आजादी पर हमला है !बे बहुसंख्यक गाय का दूध माखन आदि खानेवालों के हित का ध्यान रखते हुए ! और गाय से प्राप्त होने वाले  अन्य अनेक लाभों को दृष्टिगत रख गाय के मास को खाने की जिद छोड़ कर अन्य जीव जंतुओं का मास खाकर अपनी खाने पीने की आजादी को कायम रख सकते हैं !अगर ये लोग चाहें तो इंग्लैंड अमेरिका आदि देशों से गवय का निर्यात कर उसका मास भक्छण कर सकते हैं !

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