दिसम्बर का महीना था !ठण्ड पूरीशक्ति से क्या मनुष्य ,क्या पशु और क्या छोटे बड़े जीव जंतु सभी को अपने आगोश में लेकर पीड़ा दे रही थी !कुछ दिनों से कुहरे और ठंडी हवाओं ने ठण्ड का प्रकोप और बढ़ा दिया था !कुछ दिनों के बाद सूर्यनारायण के दर्शन हुए !लोग शीत से बचाव के लिए सूर्य का ताप ग्रहण करने के लिए घर के बाहर चबूतरों पर या लॉन में बैठकर गर्मी लेने लगे !एक मेढक जो शीत से व्याकुल था ,वह भी मैदान में सूर्य की ताप से शीत निवारण कर रहा था !इतने मैं तीन मेढक और आये और एक एक कर पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ने लग गये ! दो मेढक तो पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ गये !तीसरा निराश हो कर चला गया ! सबसे ऊपर जो मेढक बैठा था !उसे जब यह भरोसा हो गया ,की अब मेरी पीठ पर और कोई नहीं बैठ पायेगा ! तब उसने कहा --- चिगम, चिगम ,दूसरे ने कहा ख़ुशी ना गम ( अर्थात अगर तुम मेरी पीठ पर सबार हो ,तो मैं भी किसी की पीठ पर सबार हूँ !नीचे बाला मेढक रोते हुए चिल्लाया ,मरे ससुरजू हम ! ( सिर्फ हम ही एकमात्र अभागे हैं जिसकी पीठ पर बैठ कर तुम चटकारे लेकर ख़ुशी मना रहे हो और हम तुम दोनों का भार ढोरहे हैं ,रो रहे हैं ,चिल्ला रहे हैं, और तुम्हारे सत्ता के मद से बहरे हुए कानो तक हमारा रोना नहीं पहुँच रहा है ) उसके रोने की आवाज तीसरे और दूसरे के सुख में अरण्य रोदन बन कर दब गयी ( जंगल में रोने के समान )
Thursday, 1 December 2016
Sunday, 27 November 2016
पंचायत राज्य आया किन्तु ग्राम स्वराज्य की स्थापना नही हुई --------- स्वतंत्रता के बाद जब संविधान का निर्माण हुआ ,उस समय संसद और विधानसभाओं में अत्यंत उत्कृष्ट देशभक्त नेता लोग जनप्रितिनिधि के रूप में चुनकर पहुंचे थे !उस समय सांसदों और विधायकों को कोई वेतन नहीं मिलता था !जब सत्र चलता था !तब दैनिक भत्ता मिलता था !उन सांसदों ने इस बात को जोर शोर से संसद में उठाया कि गांव के लिए योजनायें गांव में गांव के लोगों के द्वारा बनाई जानी चाहिए !परिणाम स्वरुप राजीब गाँधी ने पंचायती राज देश में लागू किया और युवाओं को भी मताधिकार प्रदान किया !किन्तु पंचायती राज से ग्राम स्वराज नहीं हुआ ! पंचायती राज का लक्छ्य है सत्ता का विकेन्द्रीकरण !केंद्र की सत्ता का कुछ अंश राज्यों में आया और कुछ हिस्सा जिलों और गांव में आया !यह सभी जानता हैं कि पत्थर के कितने भी टुकड़े किये जायें ,बे टुकड़े ही रहेंगे ,मक्खन नहीं बनेंगे !इसिलए जो सत्ता प्राप्त की ललक ,और सत्ता में बने रहने के लिए जो झगड़े ,और गलत काम (मतदाताओं को लालच देना ,रुपये बांटना ,जाति बाद को उभड़ना ,बेईमानी से धनसंचय करना ,झूठ बोलना ,गुंडों और दबंगों की मदद से बूथ केप्चर करना ,समाज को दलितों ,पिछड़ों ,अगड़ों ,अल्पसंख्यकों ,आदि में बाँट कर वोट प्राप्त करना ,धार्मिक उन्माद आदि उत्पन्न करना ) संसद और विधान सभाओं आदि में चुने जाने के लिए जो नेता लोग करते हैं ,बे सबके सब ग्राम पंचायत के चुनावों में भी प्रवेश कर गये ! इसको विनोबा जी मत्सर का राष्ट्रीय करण कहते थे !इस प्रकार जो ग्रामपंचायतें बनी और उनमें जो ग्राम प्रधान आदि चुन कर पहुंचते हैं या जिलापंचायतों ,या ब्लॉकप्रमुख आदि चुने जाते हैं ,बे अपने निम्न सत्ता भोग के स्वार्थों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं ,गांव की सेवा नहीं करते हैं !चुनाव जीतने के लिए धनबल और जनबल का प्रयोग करते हैं !चुने जाने पर धन कमाते हैं और दबंगों का निर्माण करते हैं !जो अधिकार प्राथमिक पाठशालाओं के नियंत्रण के ,बालकों को मध्यान्ह भोजन आदि के ग्राम पंचायतों को दिया गया हैं !और जो भी धनराशि ग्रामविकास के लिए ग्रामों में या जिलों में आती है !उसका बन्दर बाँट राज्य कर्मचारियों और प्रधानों या जिला पंचायत अध्यक्छओं में हो जाता है !ग्रामविकास के कार्य ( सड़कनिर्माण ,भवन ,निर्माण ,मनरेगा आदि ) नहीं होते हैं !ग्रामपंचायतों की स्थापना और उनको आर्थिक अधिकार देने के कारण ग्रामस्वराज्य के बजाय ग्रामविनश हो गया है! गांव वैमनस्यता ,और हिंसा तांडव के केंद्र बन गये हैं
Sunday, 13 November 2016
आज गुरु नानक देव का जन्मदिन है !जिस समय नानक देव का जन्म हुआ देश में इस्लामी हुकूमत थी !नानकदेव ने भारत की अनादी वैदिक धर्म की सनातन संस्कृति के द्वारा सर्वधर्म सद्भाव का प्रचार और प्रसार किया !इस पवित्र भूमि भारत में संतो की अविरल धारा अहिंसा प्रधान ,करुणा युक्त त्याग और तपस्या से अनुप्रेरित और प्रवाहित रही !संतों के सद प्रयत्न हिंसक और आक्रमणकारी आयातित धर्मों के कारण पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके !फिर भी संतो का अनुबरत प्रयास सर्वधर्म सद्भाव और अहिंसा का ही रहा !इस प्रयास में अनेक संतों को अपना जीवन तक अर्पित करना पड़ा !नानकदेव परंपरा के ही गुरु तेगबहादुर को मुगलिया सल्तनत ने धर्म परिवर्तन स्वीकार ना करने वाले कश्मीरी पंडितों की रक्छा के लिए अपने जीवन की कुर्वानी देनी पड़ी !गुरु गोविन्द सिंह को हिन्दू धर्म की रक्छा के लिए अपने पुत्रों को जिन्दा दीवाल में मुगलिया सल्तनत द्वारा चुनवाये जाने का ह्रदय विदारक दंश झेलना पड़ा !उन्होंने इस कट्टरता के प्रतिकार के लिए सिख धर्म की स्थापना की !और तपस्या से अर्जित ईश्वरीय शक्ति से वैदिक धर्म की रक्छा करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था ! ऐसी यह सनातन धर्म परंपरा से पवित्र भारत भूमि परिपूर्ण रही है ! जिस प्रकार खेत की फसल जंगली जानवर ना खा पायें इसीलिए बाढ़ लगानी पड़ती है ,और कष्ट से उपार्जित धन ,संपत्ति की रक्छा के लिए ताला लगाना पड़ता है ,उसी प्रकार से सिख धर्मगुरुओं ने वैदिक धर्म की रक्छा सुरक्छा के लिए नानक देव का अहिंसात्मक करुणा प्रधान सर्वधर्म सद्भाव का सन्देश भारत भूमि से अखिल विश्व को दिया !इस सनातन वैदिक धर्म की अविरल धारा प्रवाहित होती रहे इसके लिए गुरु गोविन्द सिंह ने शौर्य ,साहस और अस्त्र ,शस्त्र से युक्त सिख धर्म की स्थापना की और धर्म की रक्छा के लिए कुर्वानी का सन्देश दिया !जिस तरह से आकाश में पंछी दो पंखों से युक्त होकर उड़ते हैं !उसी प्रकार से वैदिक धर्म की रक्छा के लिए गुरुनानक देव और गुरु गोविन्द सिंह ने शांति और शौर्य के दो पंखों से रक्छा ,सुरक्छा का सन्देश प्रसारित किया !
Saturday, 12 November 2016
जैसे कोयले को सफ़ेद नहीं किया जा सकता है ,बैसे ही धन को भी सफ़ेद नहीं किया जा सकता है !कोयला लकड़ी को जलने से ही प्राप्त होता है !या जली हुई जमीन में विशेष छेत्रों में मिलता है ,इसका प्रयोग भी आग लगाने के लिए ही होता है !इसका उपयोग रचनात्मक और विध्वंसक दोनों प्रकार से हो सकताहै !इस से घर भी फूंके जा सकते हैं और भोजन भी पकाया जा सकता है ! इसी प्रकार इस कागजी नोट से लोक व्योहार को रचनात्मक दृष्टि से भी व्यबस्थित ढंग से चलाया जा सकता है !और लोकव्यकस्था भंग भी की जा सकती है कुछः समय से यह कागजी नोट लोकव्यबस्था को नष्ट करने में प्रयुक्त हो रहा था !इसका अनुचित प्रयोग ,भारत का प्रमुख दुश्मन पाकिस्तान फर्जी जाली नोट छापकर और भारत में पड़े पैमाने पर बांटकर हिंदुस्तान की आतंरिक और बाह्य सुरक्छा को खतरा पहुंचा रहा था !इस से भारत की अर्थ व्यबस्था पर भी गंभीर खतरा उत्पन होता जा रहा था ! जो असली नोट एक हजार और पांचसौ के थे ,बे अधिकाँश भारत के भ्रष्ट लोगों के पास संग्रहीत थे !ये लोग देश के चरित्र से नैतिकता को नष्ट कर रहे थे ! इसिलए यह धन काला कहलाने लगा है !इस पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया था ! इसीलिए भारत सरकार ने इन नोटों के प्रचलन को समाप्त करने का निर्णय लिया ! इस निर्णय के पीछे सरकार का राजनैतिक लाभ लेने की इक्छा की बात बहुत से लोग कह रहे है ! उनका कहना है !कि जिनके पास वास्तव में काला धन है !उनको इसकी जानकारी पहले हे दे दी गयी थी ,इसीलिए उन्होंने पहले ही कालेधन को स्वर्ण आदि खरीद कर सफ़ेद कर लिया था !इसका खामयाजा और परेशानी आम जनता को उठानी पड़ रही है ! इसकी तथ्य पूर्ण जानकारी तो संसद के शीतकालीन सत्र में होगी जब विरोधी दल के नेता इस निर्णय के विरोध में अपने वक्तव्य देंगे !फिलहाल तो बैंकों में जो भीड़ देखी जा रही है ,उसमें बो लोग नहीं दिखाई दे रहे हैं ,जिनके पास इस काले धन का जखीरा संग्रहीत है !सरकार का यह कहना कि इस से भ्रष्टाचार समाप्त होगा !यह बात बिलकुल असम्भव है !भ्रष्टाचार तो इन नोटों के कारण भी हो रहा है !लोग धड्ड्ले से एक हजार और पांचसौ के नोट आधे या पौनी कीमत देकर बदल रहे हैं !
Thursday, 27 October 2016
जागते सभी हैं किन्तु देखते अलग अलग तरह से हैं ------------ जागना भी अनेक प्रकार का होता है !नींद से जागना ,विश्वासघात से चोट खाकरजागना ,शिक्छण से ज्ञान प्राप्त कर जागना ,भौतिक जगत से आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए जागना ,समाज व्यबस्था को बदलने के लिए जागना ,आदि जागृति के अनेक प्रकार है !कुछ ऐसे होते हैं जो जागते हुए भी सोये से रहते हैं .और कुछ ऐसे भी होते है जो निरंतर चिन्मय सत्ता (आत्मसत्ता ,या जीव जगत के कल्याण के लिए निरंतर सचेष्ट रहने वाले ) सोते हुए भी जाग्रत रहते हैं !ऐसे ही व्यक्ति महा पुरुष कहलाते हैं !जो अपने कार्यों से जीवित अवस्था में ही अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं !और म्रत्यु के बाद भी अमर रहते हैं !उनके नाम धाम का पता नहीं होता है !किन्तु चिन्मय सत्ता में विलीन होने के बाद भी बे आत्मरूप से सामान्यजन के व्योहार में प्रवेश कर जाते हैं ! आमजन में जब स्वार्थनिष्ठा का अभाव, दया ,प्रेम ,करुणा ,अहिंसा ,सद्भाव ,सदाचार ,सहयोग ,आदि श्रेष्ठ गुणों का दर्शन हो तो समझना चाहिये, की ये महापुरुष अपनी चिन्मय सत्ता से जीवित हैं !जब आमजन के जीवन से ये तत्त्व विलुप्त जान पड़ें तोसमझना चाहिये की दुष्ट,आत्मविघातक स्वार्थजीवी ,मरणशील संसार के सुख भोगों में आकंठ डूबे राक्छ्सी ,आसुरी ,दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का प्रेत आमजन में प्रवेश कर गया है ! भारत भूमि में अनादि काल से चिन्मय सत्ता की प्राप्ति की आकांछा में निरत मनुष्यों का प्रादुर्भाव होता रहा है !उन्हें अपने शव्दों में सर्वत्यागी ,तपस्वी ,साधु संत ,सन्यासी आदि नाम देते हैं !ऐसे महापुरुषों का ही सामूहिक नाम ब्राह्मण होता था !इसीलिए वैदिक ग्रंथों में कहा गया है की ब्राह्मण का शरीर सुख भोग के लिए नहीं त्याग और तपस्या ,योग आदि के लिए होता है !लकड़ी जलकर ही प्रकाश ,और उष्णा देती है !इसीलिए ब्राह्मण सिर्फ तप ,त्याग और तपस्या से हे प्रकाशित होता है !इसीलिए कोई भी धर्म ब्राह्मण मुक्त नहीं होसकता है !वैदिक धर्म में जिसे ब्राह्मण कहते हैं !वही बौद्ध धर्म में भिक्छु ,इस्लाम में मुल्ला ईसाईयों में ,पादरी .जैन ,में पंडित, आदि नामों से जाना जाता है !इसके अतिरिक्त भी जितने धर्म संयुक्त ,और धर्म ,रहित ,ज्ञान अज्ञान आदि हैं ,उनको प्रभावित और प्रशिक्छित करने वाले व्यक्ति का नाम कुछ भी हो लेकिन वह ब्राह्मण ही होता है !ब्राह्मण ज्ञान ,अज्ञान आदि सभी का पर्यायवाची शव्द है !आज भारत की प्राचीन आत्मनिष्ठ अनादि परंपरा के विघातक तत्त्व साक्रिय दिखाई दे रहे हैं ! संसार में दो तरह की प्राणी श्रष्टि दृष्टि गत होती है ! एक को दैवीऔर दूसरी को आसुरी शक्ति कहते हैं !दैवी गुणों से संपन्न लोगों में भय का सर्वथा अभाव ,अंतःकरण की अत्यंत शुद्धि ,ज्ञान से लोकहितकारी कर्म करने की प्रवृत्ति ,दान ,इन्द्रिय संयम स्वाध्यायाय ,कर्तव्यपालन के लिए कष्ट सहना.शरीर ,मन ,वाणी ,की सरलता ,अहिंसा ,सत्यभाषण ,क्रोध ना करना ,संसार के सुख भोगों के त्याग की प्रवृत्ति ,चुगली ना करना ,जीव जंतुओं पर दया करना ,छमा,धैर्य मान आदि की चाह ना होना प्रमुखता से होते हैं !जो आसुरी लोग होते हैं ,उनमे दम्भ ,घमंड ,अभिमान क्रोध और कठोरता ,अज्ञान ,सुख भोगों की लालसा और आमजन को भ्रमित कर अपने स्वार्थों के पोषण आदि की प्रबल भावना रहती है !स्वतंत्र भारत में आमजन को अपनी समझ के अनुकूल इन जाग्रत असुरों ,( अनादि लोकोपकारी संस्कृति और अध्यात्म विघातक लोगों ) के दुष्प्रयत्नो के प्रभाव से मुक्त होकर देश की सनातन पावन दैवी शक्तियों से युक्त जीवन परंपरा का अनुशीलन करना चाहिये !भारत में युगानुकूल दिव्य सनातन परंपरा से ही भारत का कल्याण और भारत से ही विश्वकल्याण हो सकेगा !जागो अज्ञान से ज्ञान को ओर!
Wednesday, 26 October 2016
सेवा कार्य या मालाजप ---- गांधीजी ----हरिजनसेवक१७--२--१९४६
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
प्रश्न -------- सेवाकार्य के कठिन अवसरों पर भगवद भक्ति के नित्य नियम नहीं निभ पाते हैं ,तो क्या इसमें कोई हर्ज है ? दोनों में से किस कोप्रधानता दी जाए ,सेवा कार्य को अथवा जप को ?
उत्तर ------- कठिन सेवा कार्य हो या उस से भी कठिन अवसर हो ,तो भी भगवद्भक्ति यानी राम नाम बंद हो ही नहीं सकता है !उसका बाह्य रूप प्रसंग के मुताबिक बदलता रहेगा !माला छूटने से जो रामनाम ह्रदय में अंकित हो चुका है ,थोड़े ही छूट सकता है !
गांधीजी जो कहते थे ! वही करते भी थे !उनके जीवन में सर्वाधिक कठिन प्रसंग १९४४ से १९४८ तक उनके जीवन के अंतिम दिन ३० जनवरी तक रहे !किन्तु उन्होंने राम नाम को नहीं छोड़ा ! १९४६ में नोआखाली में हिन्दू मुस्लिम दंगा भड़क उठा !नोआखाली में जो अब बंगला देश में है ! ८२% फीसदी मुस्लिमों की आबादी थी !१८% हिन्दू थे !वहां हिंदुओं का व्यापक कत्ले आम हुआ था !उस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी !सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे ! उन्होंने खुद हिंदुओं को क़त्ल करने की खुली छूट दी थी ! गांधीजी ने वहां१०४ डिग्री बुखार में ११६ मील की पैदल यात्रा बिना चप्पल पहने की थी ! बे सायं और प्रातः प्रार्थना करते थे !उनकी प्रार्थना सर्वधर्मों के उत्तम अहिंसक भजनों से होती थी ! उस प्रार्थना में कुरान की आयतें भी होती थी !और उनके भजन के एक अंश में ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी शामिल था !और राम रहीम तथा कृष्णा करीम भी सम्मिलित था !वहां कट्टर पंथी मुसलमान ,मुल्ला ,मौलवी उनको कृष्ण ,करीम और ईश्वर अल्लाह नहीं कहने देते थे !बे कहते थे बूढ़े अगर तू यह प्रार्थना करेगा तो तेरे टुकड़े टुकड़े कर देंगे !तू राम ,कृष्ण के साथ अल्लाह और रहमान रहीम को जोड़ता है !किन्तु गांधीजी अविचिलित होकर प्रार्थना करते रहे !और शांति स्थापित करने में भी कामयाब हुए थे !१९४८ में दिल्ली में उनकी प्रार्थना सभा में भी कट्टर पंथी हिन्दू उनको कुरान की आयतें नहीं पढ़ने देते थे !प्रार्थना सभा को भंग करने की कुचेस्टा करते थे !किन्तु वहां भी गांधीजी अविचिलित रहे !२० जनबरी १९४८ को उनकी प्रार्थना सभा में बम बिस्फोट किया गया था !जिसमें गांधीजी बाल ,बाल बच गए थे !सरदार पटेल ने इस घटना के बाद गांधीजी की सुरक्छा के लिए सादी ड्रेस में पुलिस तैनात कर दी थी !जब गांधीजी को यह पता चला तो उन्होंने पटेल से कहा था !तुम यह सुरक्छा बापिस करो !मेरी रक्छा राम करेंगे !स्वतंत्र भारत में मेँ पुलिस की रक्छा में नहीं रहूँगा !उन्होंने मरना स्वीकार किया था किन्तु राम को छोड़ना स्वीकार नहीं किया था !
Monday, 24 October 2016
नीति रक्छा का उपाय -------- गांधीजी ----- हिंदी नवजीवन २५-५-१९२४
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है !
Sunday, 23 October 2016
गांधीजी और रामनाम --------गांधीजी को बचपन में भूत प्रेतों से डर लगता था !इसीलिए बचपन में इस डर से निवृत्ति के लिए उन्होंने राम का जप शुरू कर दिया था !इस मन्त्र को देने वाली उनकी धाय रम्भा थी !फिर यह राम नाम उनके जीवन का शक्ति शाली और सर्वश्रेष्ठ आधार बन गया था !एक सत्याग्रही या ऐसे व्यक्ति के नाते जो दिन रात के २४ घंटे सत्य या ईश्वर में अटल श्रद्धा रखता था, .गांधीजी ने यह समझ लिया था कि ईश्वर ही हर कठिनाई में फिर वह चाहे ,शरीररिक हो या मानसिक हो या आध्यात्मिक हो उन्हें हमेशा सांत्वना और सामर्थ्य तथा आश्रय देता है !इस सम्बन्ध में उनकी सर्व प्रथम परीक्छा ब्रह्मचर्य के पालन में हुई थी !गाँधी जी कहते थे कि अपवित्र विचारों को रोकने में राम नाम ने उनकी सबसे ज्यादा सहायता की थी !रामनाम ने ही उनको उपबास करने की शक्ति प्रदान की !रामनाम ने ही उन्हें सारे आत्म संघर्षों में विजय दिलाई थी, जो उन्हें राजनीतिक ,सामाजिक आर्थिक और धार्मिक छेत्रों में लड़नी पडी थी !अपने आपको ईश्वर के आश्रय में छोड़ने से उन्हें यह अनुभव भी प्राप्त हुआ कि राम नाम शारीरिक व्याधियों का भी इलाज है ! सत्य की खोज करने और मनुष्यों के रोगों की निबृत्ति की उत्कट इक्छा के कारण गांधीजी ने शुद्ध हवा ,मालिश ,कई तरह के स्नानों ,उपवासों ,योग्य आहारों ,मिटटी की पट्टी और ऐसे ही दूसरे साधनों के द्वारा रोग मिटाने के सादे और सस्ते तरीके खोज निकाले थे !मनुष्य सिर्फ शरीर ही नहीं है ,बल्कि और कुछ भी है !इसीलिए गाँधी जी का यह पक्का विश्वास था कि मनुष्य के रोगों का कारण सिर्फ शारीरिक ही नहीं है !शरीर के साथ रोगी के मन और आत्मा का भी इलाज आवश्यक है !गांधीजी ने अनुभव किया इस ध्येय को प्राप्त करने के लिए राम नाम में श्रद्धा और विश्वास रखने जैसी उपयोगी और कोई औषधि नहीं है !गांधीजी का विश्वास था कि जब व्यक्ति अपने आपको पूरी तरह ईश्वर के हांथों में सौंप देता है, और भोजन ,व्यक्तिगत सफाई और आमतौर पर अपने आपको काम क्रोध आदि ,विकारों को जीतने के बारे में और समस्त प्राणियों के साथ अपने संबंधों के बारे में ईश्वर के नियमों का पालन करता है ! तो वह रोग से मुक्त रहता है !यह स्थिति प्राप्त करने के लिए बे स्वयं भी प्रयत्न शील रहते थे! १९४४ में जेल से छूटने के बाद उन्होंने पुणे के पास उरलीकांचन में उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किया था !जहाँ खुद उनके द्वारा आचरण में उतारे हुए प्राकृतिक इलाज के साथ रोगियों को राम नाम की महत्ता भी बताई जाती थी !यह प्राकृतिक चिकित्सा आज भी वहां हो रही है !गांधीजी की राम नाम में आस्था और श्रद्धा इतनी दृढ थी !कि म्रत्यु के समय उनके मुख से अंतिम शव्द हे राम ही निकले थे !राजघाट पर उनकी समाधी पर हे राम ही अंकित है !राम भक्त अहिंसक ,सत्यनिष्ठ ,प्राणिमात्र की सेवा में निष्काम भाव से समर्पित गाँधी जी की हत्या भी एक पागल तथाकथित नकली बुजदिल राष्ट्र भक्त हिन्दू ने की थी ! आज भी ऐसे तमाम हिन्दू धर्म के नकली ,फर्जी और , हिन्दू धर्म के कलंक राक्छ्सी ,आसुरी वृत्ति के रावण और कंस के अवतार हिन्दू गाँधी जी को नकली फर्जी झठे
मनगढंत किस्से कहानिया गढ़ कर गाँधी जी को बदनाम करने के प्रयत्न में संलग्न है !इन लोकतंत्र विघातक तत्त्वों से हिंदुओं को सतर्क और सावधान रहना चाहिए ! ये राम भक्त नहीं काम भक्त हैं !
मनगढंत किस्से कहानिया गढ़ कर गाँधी जी को बदनाम करने के प्रयत्न में संलग्न है !इन लोकतंत्र विघातक तत्त्वों से हिंदुओं को सतर्क और सावधान रहना चाहिए ! ये राम भक्त नहीं काम भक्त हैं !
Saturday, 22 October 2016
कांग्रेस ने उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को मुख्य मंत्री बनाने के लिए विधायकों को मजबूर कर दिया था !उत्तराखंड के जमीनी नेता और विधायकों की पसंद वर्तमान मुख्य मंत्री हरीश रावत ही थे !बहुगुणा का भावनात्मक सम्बन्ध और जन्म सम्बन्ध भी कभी उत्तराखंड से नहीं रहा था !उनकी सिर्फ एक ही योग्यता थी कि वह उत्तराखंड में जन्मे हेमबती नंदन बहुगुणा के पुत्र थे !इस प्रकार की गलतियों के कारण ही कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा है ! कांग्रेस की दूसरी सबसे बड़ी गलती यह है !कि उसका संगठनात्मक ढांचा चुना हुआ नहीं है !उसके पदाधिकारी मनोनीत किये जाते हैं !परिणाम स्वरुप केंद्रीय नेताओं की पसंद से तिकडमी लोग संगठन के पदाधिकारी नामजद हो जाते हैं !अब कांग्रेस को इन गलतियों को सुधार कर संगठन को मजबूत करना चाहिए !और लोकतंत्र विघातक दलबदलुओं को कम से कम ५ साल तक संगठन में कोई पद नहीं देना चाहिए !ना ही उनको लोकसभा या विधान सभाओं का पार्टी टिकट देना चाहिए ! वास्तविक विचारनिष्ठ कार्यकर्ताओं को ही चुनाव के द्वारा संगठन की जिमेदारी देना चाहिए !और उन्ही की सिफारिश पर पार्टी को टिकट देना चाहिए !
Wednesday, 19 October 2016
भारत की पवित्र भूमि की विरासत ऋषियों ,महर्षियों ,अवतारों ,त्यागियों और तापसियों की रही है !इस भूमि पर इन महापुरुषों ने जो किया वह स्वयं प्रकाशित हुआ था !अनादि काल से आचरित यह श्रेष्ठ जीवन पद्धति समय ( काल ) के उलटफेर से क्रमशः पतित होकर नष्ट प्रायः हो गयी ! गुलामी के १००० साल ने इन श्रेष्ठ संस्कृति को बहुत अधिक नुकसान पहुँचाया !इसको गुलामी से मुक्ति के लिए ऋषियों ,महर्षियों की तपः साधना और साधु संतो की त्याग तपस्या ने अद्र्श्य ईश्वरी शक्ति का आवाहन कर स्थूल दृष्टि से आजादी के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने प्रयत्न किया और देश को स्वतंत्र कराया ! किन्तु स्वतंत्र भारत में १००० सालों की परतंत्रता के कारण भारतीय अभी भी दिमागी गुलामी से आजाद नहीं हो पाये हैं ! इसीलिए इस विशाल देश भारत की विरासत अभी भी निकृष्ट स्वार्थ और भौतिक सुखों की चाह के गहन अन्धकार से आच्छादित है !हमारे सद्वाक्यों का खोखलापन हमारे अनुशासन रहित ,निम्न स्वार्थों से युक्त और कुत्तों की तरह भोग और ऐश्वर्य के पदार्थों की प्राप्ति के प्रयत्नों में प्रतिदिन प्रकाशित होते रहते हैं !हमारे जीवन की पतवार अत्यंत पशुबत निकृष्ट सोच ने पकड़ रखी है ! अब कौन किसको सत्य का मार्ग दिखाये! आदर्श वाक्य सिर्फ कहने के लिए और पशुओं से भी निकृष्ट आचरण करने के लिए है !यही हम देख रहे हैं !और जाने अनजाने ,वश और परवश होकर इसी मार्ग पर हम तेजी से चल भी रहे हैं !
Friday, 7 October 2016
१(४२) वर्णशंकर कुलघातिओं को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है लुप्त हुई पिण्डोदक क्रिया से पितरों का पितृलोक से पतन हो जाता है और बे अधोगति को प्राप्त होते हैं श्राद्ध लोप होने का अर्थ है पितरों के द्वारा आचरित सदाचरणो की विष्मृति श्राद्ध का आजकल एक नया रूपहो गया है समाज शुधारक श्राद्ध में ब्रह्मभोज को अनुचित मानते है वह कहते हैं यह कुरीति है इसका त्याग करना चाहिए तीन प्रकार के शरीर होते हैं स्थूल सुक्छम और कारण स्थूल शरीर का दाह होता है और सुखछम तथा कारण शरीर के लिए श्राद्ध किया जाता है जिसमे ब्राह्मणो को भोजन दान आदि मृतक शरीरसे निकली आत्मा की शांति के लिए किया जाता है यह क्रिया अनादि कल से चली आरही है श्री राम ने अपने पिता का श्री कृष्ण ने भांजे अभिमन्यु का तथा yuddhister और धृराष्ट्रा ने अपने पुत्रों पौत्रों तथा बीरगति प्राप्त समस्त राजाओं का श्राद्ध किया था
Wednesday, 5 October 2016
१(३६)अर्जुन कहता है इन कौरवों के बध करने से क्या लाभ होगा यह पापी और आततायी हैं जो राजा राजधर्म का का पालन नहीं करता है वह महानपाप का भागी होता है अर्जुन नीतिनिपुण है इसके बाद भी मोहग्रस्त होकर राजधर्म का परित्याग कर रहा है आततायी अत्याचारी चाहे राजपरिवार का हो या राजपुत्र ही क्यों न हो यदि वह आततायी है तो अवश्य दंड प्राप्ति का पात्र है मोहग्रस्त व्यक्ति कर्त्तव्य च्युत होकर कितना नीचे गिर सकता है उसका यह प्रत्यक्ष उदहारण है.n
Monday, 3 October 2016
क्या सच है और क्या झूठ है ? कौन सा राजनेता देश भक्त है या पद भक्त है ? किस व्यक्ति के मन बुद्धि ,वचन में भारत राष्ट्र के प्रति वास्तविक सेवा भावना है !या सिर्फ अपनी स्वार्थों की पूर्ति का ही ध्येय है ? इन सभी बातों का सही पता लगा पाना सम्भव नहीं है !यह समस्या आज की ही नहीं है !ज्यों ज्यों व्यक्तियों की चाहत सांसारिक पदार्थों के प्रति आसक्ति में बृद्धि होती है ! वैसे ही इस प्रकार के झूठ ,छल ,कपट ,पाखंड ,बकबाद और अपने निहित तुच्छ स्वार्थों की तुष्टि के लिए सामजिक समरसता और लोक कल्याण का ताना बाना विगाड़ने वाले लोगों का बाहुल्य जीवन के समस्त छेत्रों में होने लगता है !मक्खी ,,मच्छर गंदगी में ही पैदा होते हैं ! उनके विनाश का प्रथम उपाय तो यह है !कि गन्दगी ही न होने दी जाय और दूसरा उपाय यह है कि पैदा हो जाने के बाद सफाई से और इनको नष्ट करने वाली दबाओं के प्रयोग से इनको नष्ट कर दिया जाय ! लोकतंत्र में इन स्वएतनिष्ठ व्यक्तियों को समाप्त करने के दोनों उपाय जनता के पास हैं !किन्तु जनता से ही निकले हुए लोग जनता के तुच्छ स्वार्थों का उपयोग अपने बड़े स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते हैं !इसीलिए आज जो कुछ भी देश में झूठ और छल ,कपट ,और निकृष्ट स्वार्थ का प्रदर्शन हो रहा है !और उनको सफलता भी प्राप्त हो रही है !वह सब जनता के सहयोग से ही हो रहा है ! अभी भी कुछ देश भक्त इस स्वार्थनिष्ठ लोगों के गंदे खेल के विरुद्ध प्रयत्नशील हैं !किन्तु उनके प्रयत्न उसी प्रकार सफल नहीं हो पा रहे हैं !जैसे आंधी में आँख खोल कर चलना मुश्किल होता है ! फिर भी बे विपरीत परिस्थितयों में भी समाज के व्यापक हित के लिए कार्यरत हैं !ये कौन लोग हैं ? ऐसे लोग जीवन के सभी छेत्रों ,में ,सभी ,धर्मों ,में और सभी जातियों और वर्गों में है ,!जो अपने लोकहितकारी स्वभाव के कारण सक्रिय हैं ! किन्तु रावण की अन्याय कारी व्यबस्था में में बे विभीषण जैसे अकेले हैं ! जब तक रावण ने लात मारकर विभीषण को लंका से बाहर नहीं किया था !तब तक लंका में विभीषण भी रह रहा था और रावण की अन्यायी व्यबस्था भी चल रही थी लेकिन जिस दिन विभीषण लंका से लात खाकर श्री राम की शरण में चला गया था !उसी दिन से लंका की राक्छ्सी व्यबस्था का अंत शरू हो गया था ! अभी ये स्वार्थनिष्ठ लोग समाजनिष्ठ लोगों को किसी ना किसी प्रकार से साथ लिए हुए हैं और उनका सहयोग प्राप्त कर रहे हैं !यही उनकी चाल है और उनकी सफलता का सूत्र है !इसीलिए विनोबा जी से जब सत्ता में बैठे राजनेता या विपक्छ में कार्य रत नेता मिलने और उनका आशीर्वाद लेने जाते थे तो बे कहते थे !राजनीती त्यागो और बुद्ध ,महावीर और राम की तरह लोकहित के लिए निकल पडो ! राजनीति अब काल वाह्य हो गयी है !अब लोकनीति का समय है ! धर्मगुरुओं से बे कहते थे !अब धर्म जोड़ता नहीं बल्कि तोड़ता है !इसीलिए अध्यत्मनिष्ठ बनो !और धार्मिक और मजहवी संकीर्णताओं को त्याग दो ! इसीलिए जब तक राजनीति को देशभक्तों का सहयोग और समर्थन प्राप्त होता रहेगा !तब तक स्वार्थनिष्ठ ,सत्ता परस्त नेताओं से देशमुक्त नहीं हो पायेगा !और जब तक जनता इन धार्मिक और मजहबी साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से मुक्त नहीं होगी !तब तक ना कश्मीर में शांति स्थापित होगी और ना हिंदुस्तान पाकिस्तान विवाद शांत होगा !दोनों देशो की जनता इस झूठ के मकड़ जाल में फंस कर इन मगरमच्छों की हिंसक दान्तों में फॅस कर काल कवलित होती रहेगी !
Friday, 30 September 2016
१(२२) अर्जुन अब भगवन श्री कृष्णा से कहता है की में युद्ध में उपस्थित सभी योद्धाओं को देखना चाहता हूँ कि जिनके साथ मुझे युद्ध करना है यह योद्धा की सावधनी युक्त दृष्टि है कि वह भली प्रकार यह जान ले और समझ ले की उसके बिरुद्ध युद्ध करने वालों की सामर्थ्य क्या है? ताकि वह तदनुसार तैयारी कर युद्ध मैदान में मुकाबला करने के लिए तैयार रहे.
1(21)After taking his Gandiva in his hand Arjuna tells Lord Krishna that his chariot be placed in the middle of two armies.Till now Arjuna did not show any sign of recoil from the ferocious war among the members of the same dynasty. Kings and youths of almost whole country had arrayed themselves in either side of the war entangled groups Maharshi Vyas has said jn Mahabharat that only old men and women were left in the houses almost all the youths had gone to participate in war.
Tuesday, 27 September 2016
1(15)Krishna blew Panchjanya conch(panchyajanya named Shankhroopdhari Daitya who was a symbol of terror and a signal of death to saints was killed by Lord Krishna and theLord kept him as Conch on the request of slain Daitya hence the name of His Conch is Panchjanya) and Arjuna blew his Devdutta Conch(this conch was given by Indra to Arjuna) and Brikodara Bheem who was named as BHeem karma blew Paundra conch(Bheems diet was so excessive that he consumed half of the cooked food prepraired for the whole family of Pandvas and he was named as Bheem karma as he had slain Daitya like Bakasur,Hidamb Keechak etc) His conch was called Maha shankha as it was biggest in shape and sound
1(14) In response to conch etc blew by Bhishma and his army chieftains Lord Krishna and Pandavas seated on a Big chariot driven by white coloured horses blew their divya(divine) conches.Pandavas were endowed with Divya arms Divya Rath Divya Horses Divya conches and this Divya chariot was driven by God in human form. Chariot on which Lord Krishna along with Arjuna was sitting was given by Lord Agni(the fire) this chariot had the capacity to load in it Arms which could be loaded by nine big bullock carts it was engraved by gold and it had a flag on which Hanumanji was seated and this flag spread in four Yojans(approximately 30 KMs) and its speciality was that it flew without any obstacle and the Monkey sitting on it made thunderous voice which made enemy army to shiver with fear This Divine chariot was built by Vishwakarma Himself and it was also used by Devatas against Danvas it had the history of victory hence Pandavas were sure of their victory over Kauravas' Apart from this white divine horses were given to Arjuna by Gandharva Chitraketu(gandharvas are devatas who are masters of music) and these horses if killed in war automatically regained life.
1(11) Bhishma had imposed certain restrictions on him according to the customs prevalent in contemporary times one of them was not kill women and fight against them in war. One of the chief charioteers Shikhandi was a woman by birth and who was changed to man by a Gandharva Chitraketu hence to save him from the attack of woman turned man Shikhandi Duryodhana commands his army to protect Bhishma from Shikhandi as according to his vow he will not retaliate the attack on him by Shikhandi he also commands his army men not to leave their places without command
1(10) Duryodhana exhorts his army and says that our army have valiant warriors like Karna Dronacharya Kripacharya Aswatthama dushasan vikarna etc and is led under the command of Bhishma and is larger in number then Pandvas army which is commanded byBhima comparaitively less heroic in comparison to great archer Bhishma hence our army is able to defeat the army of Pandvas easily our army is invincible.
Friday, 23 September 2016
राजनीति और समाज----------- मानव समूहों को व्यबस्थित जीवन जीने के लिए अनेक व्यबस्थायें मानव समाज ने निर्मित की !धर्म ,की व्यबस्था में मनुष्यों के अंतःकरण (मन ,बुद्धि ,चित्त ,अहंकार ) को शुद्ध ,पवित्र बने रहने के लिए करुणा ,प्रेम ,अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,अपरिग्रह ,ब्रह्मचर्य अदि के विधि विधान निर्मित किये गए !प्राणियों के द्वारा किये गए समस्त कर्म तो शरीरों से होते दिखाई देते हैं ,और उनका अच्छा बुरा परिणाम भी शरीरों पर ही होता है !किन्तु इन सभी कर्मों की अच्छी बुरी प्रेरणा अंतःकरण से ही प्राप्त होती है !अतः धर्म का मुख्य कार्य है अंतःकरण को शुद्ध ,पवित्र रख कर शरीर से उत्तम कर्म कराना !राजनीति शरीर के समस्त कार्यों को बाहर से नियंत्रण करने के लिए बाहर से नियंत्रित करती है ! इसके लिए कानूनों का निर्माण करना ,कानूनों का पालन करने के लिए कार्यपालिका का निर्माण करना ,और तोड़ने वालों के लिए दंड देने के लिए न्याय व्यबस्था को निर्मित करना !इन सब के लिए पूर्वकाल में राजा का निर्माण हुआ था !जो अब समाप्त होकर प्रजातंत्र में परिवर्तित हो गया है ! प्रजातंत्र भी मानव समूह की व्यबस्था करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है !इसीलिए अब सभी प्रकार के शासन से रहित व्यबस्था के निर्माण की खोज में कुछ मनीषी लगे हुए हैं ! अभी तो राजनीतिक व्यबस्था देश में स्वार्थ के गहरे गढ़े में तेजी से गिरती दिखाई दे रही है ! राजनीति ने शासन व्यबस्था को पूर्ण रूप से भ्रष्ट कर ही दिया है ! इस से समाज में भी धार्मिक चरित्र निर्माण और बुद्धि को शुद्ध और पवित्र करने की क्रिया भी नष्ट होती दिख रही है !चरित्र निर्माण के दो प्रमुख केंद्र धर्म और शिक्छा दोनों दूषित हो गए है !इन दोनों माध्यमों में अमावस्या के गहन अन्धकार में भी कुछ सत्य ,करुणा ,प्रेम ईश्वर प्रेम से परिपूर्ण स्वार्थ रहित सेवा के केंद्र भी जुगनू के प्रकाश की तरह और कुछ धीर ,वीर ,समाज सेवा को अर्पित युवाओं और व्यक्तियों के भी दर्शन होते हैं ! भारत की पवित्र भूमि में स्त्री पुरुषों में धर्म और सेवा के भाव स्वभाव गत हैं ! बे प्रकाशित नहीं हो पा रहे हैं !इस अवरोध का एक प्रमुख कारण राजनीति है !राजनीति पुरुषों ,महिलाओं ,और युवाओं को भी भ्रष्ट कर रही है !इसने सत्ता और महत्ता की आकांछा इतनी तीव्र कर दी है !कि इसकी प्राप्ति के भेंट समाज से सद्भाव और सेवा भाव नष्ट कर दिया हैं !सिर्फ मुख़ौटे दिखाई देते हैं !यह बीमारी कैंसर और डेंगू से भी अधिक घातक और व्यापक हैं !इसके इलाज के लिए देश में महापुरुषों के महान जीवन परंपरा विद्यमान है !सिर्फ उनका स्मरण और अनुसरण कर व्यक्तिगत जीवन में धारण कर उसको सामाजिक जीवन में प्रवाहित और प्रकाशित करने की आवश्यकता है !यह देश की प्राणशक्ति है !
Sunday, 18 September 2016
पाकिस्तान की कोई भी सरकार अपने आवाम के प्रति उत्तरदायी और बफादार नहीं रही !इसिलए उसने देश को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने का कोई प्रयत्न कभी भी नहीं किया !इस्लामिक कट्टरता को बढाबा और उसका पोषण किया !इसीलिए जिन्ना की म्रत्यु के साथ ही वहां लोकतंत्र भी दफ़न हो गया !ज्यादातर समय वहां आर्मी का शाशन सत्ता में और मुस्लिम समाज में कट्टर पंथी मुसलमानो का शासन रहा है !वहां नाममात्र का लोकतंत्र है ! वास्तविक सत्ता वहाँ आज भी सेना और कट्टरपंथी मुसलामानों के हाथों में है !वहां के विद्यालयों में गलत इतिहास बच्चों को पढ़ाया जाता है !और हिंदुओं के प्रति तीव्र घृणा का बीजारोपण उनके दिल दिमाग में वाल्यकाल से ही भर दिया जाता है !परिणाम यह हुआ है कि विभाजन के बाद हिंदुओं की आबादी जो २४% प्रतिशत थी नष्टहोकर १% रह गयी है !और जो हिन्दू रहगये हैं ,बे पूरीतरह से निस्तेज हो गए हैं !पाकिस्तान वर्तमान के वैज्ञानिक सोच की उपेक्छा कर रहा है !उसने अपने देश की जनता के साथ जो विश्वासघात किया है !उसको भारत के प्रति घृणा के वस्त्र पहना कर अत्तंकवादी हमलों के रूप में प्रस्तुत कर रहा है !भारत ने गरीवी को नेश्तनाबूद करने के लिए ,और सभीदेशबासियों के विकास के लिए तमाम विकास योजनाओं का क्रियान्वन किया !पाकिस्तान को अपना ही अभिन्न अंग मान कर उसकी सारी गुस्ताखियों को माफ़ करता रहा !उसके हमले भी नाकाम किये गए !किन्तु पकिस्तान हिंदुस्तान के प्रति अपनी दुश्मनी का विस्तार करने से बाज नहीं आरहा है !उसकी गुस्ताखियां अब वर्दास्त के बाहर हो गयी हैं !समय की मांग और भारत की जनता का एक ही आग्रह है !कि अब सरकार पाकिस्तान की खूनी हरकतों का उत्तर उसकी हरकतों के अनुरूप दे !उड़ी में सोते हुए सैनिकों पर हमला बुजदिली का घृणित उदहारण है !इसका जबाब हमले की निंदा ,और मृत सेनिको को सलूट करने से नहीं दिया जासकता है !इस हमले का जबाब नेताओं की शाब्दिक श्रद्धान्जलि से नही सेनिको को गोलियों से दिया जाना चाहिए !मोदी जी के शव्दों को अब क्रियात्मक रूप दिए जाने की आवश्यकता है !
Saturday, 17 September 2016
छमावणी पर्व और जैन समाज --------- जैन धर्म प्रयत्न प्रधान धर्म हैं !अपने आप अपना उद्धार करें ,अपना पतन ना करें , क्योंकि आप ही अपने मित्र है ! और आप ही अपने शत्रु हैं !जिसने अपने आपसे अपने आपको जीत लिया है ,उसके लिए आप ही अपना बन्धुऔर जिसने अपने आपको नहीं जीता हैऐसे अनात्मा का आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है ! जिसने अपने पर विजय करली है उस अनुकूलता ,प्रतिकूलता सुख दुःख तथा मान अपमान में निर्विकार मनुष्य को परमात्मा नित्य प्राप्त है ! यह जैन धर्म का संक्छिप्त सार है !छमा वाणी पर्व भी आत्मविजय का एक सोपान है !किन्तु इस पर्व का परिचय जैन समाज इस रूप में प्रस्तुत नहीं करता है ! कितने जैन अपने जीवन में इस छमाधर्म के स्वरुप और स्वभाव को धारण ओर समझ कर शरीर की स्थूल क्रियायों को आत्मार्पित करने का साधन बनाते हैं कहना मुश्किल हैं ! किन्तु जिस रूप में बे इस पर्व का आयोजन करते हैं !उसमें यह दिखाई नहीं देता है !मंच ऐसे वक्तागणों से सुशोभित होता है !जिनमे छमा धर्म के मर्म और स्वरुप तथा सिद्धान्त कोव्यक्तकरने का ना तो ज्ञान होता है और न समझ ही होती है !अधिकांश वक्तागण इस दृष्टि से आमंत्रित किये जाते हैं !जिनमे आयोजक लोग अपने भौतिक स्वार्थों की सिद्धि देखते हैं !इस प्रकार ये आत्मा की ओर उन्मुख करने वाला साधना पर्व गपोड़ियों के द्वारा की गयी अभिव्यक्ति का साधन बन जाता है !और आत्मज्ञान तो लुप्त ही रहता है !जैन समाज व्योपारी समाज है !धनसंग्रह में कुशल और प्रवीण है !इस धर्म में नर से नारायण बनने का ज्ञान भी पर्याप्त है !इसीलिए जैन समाज के संचालकों और मंचालकों को छमा वाणी ऐसे आत्मोद्धारक पर्व के अवसरों पर व्यबसाय बृत्ति पर संयम रख कर आत्मोत्थान के सन्देश को आत्मज्ञानी समाज सेवियों से अभिव्यक्ति देने का पाबन प्रयत्न कराना चाहिए !
Friday, 16 September 2016
राष्ट्रीय सोच ---------- प्रत्येक देश को परिस्थित और समय के अनुसार चलना पड़ता है !भूतकाल की अच्छी बातें जो समय और परिस्थिति के अनुसार प्राणियों के हित के लिए आवश्यक हों उन्हें ग्रहण करना चाहिए और जो अनावश्यक और अनुउपयोगी हैं उन्हें त्याग कर आगे बढ़ना चाहिए ! इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी ,कर्तव्य निष्ठां का अभाव ,पर्यावरण प्रदूषण और लोकतान्त्रिक संस्थाओं का सही दिशाओं में गति प्रदान करने का है !भारत धर्म प्रधान देश है !और इसमें भारत में जन्म लेने वाले धर्मों के अलावा विश्व के दो बड़े धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म भी है !इन सबमें भी समन्वय रखना आवश्यक है !जनसँख्या बृद्धि भी बहुत बड़ी समस्या है !इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए युवाओं की ऊर्जा का प्रयोग होना चाहिए !युवाओं में इस प्रकार का सोच विकसित और निर्माण करने के लिए . जिम्मेदार लोगोंको अपने आचरण को सुधार कर के सिद्ध करना चाहिए ! यदि बृद्ध पुरुष और जिम्मेदार लोग अपने आचरण में सुधार नहीं करते हैं !तो युवाओं को गाँधी ,सुभाष ,डॉ हेडगेवार और आजाद तथा मदर टेरेसा अदि के जीवन प्रसंग और इस देश की महान ऋषि परंपरा और महापुरुषों के जीवन बृतान्त कोई लाभ नहीं पहुंचा सकते हैं !कथनी से अधिक करनी का असर पड़ता है !गीता में कहा गया है !यति यति आचरती श्रेष्ठः तत एव इतरः जनः ------- जैसा श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते है उसी का अनुसरण समाज के अन्य लोग भी करते हैं !कहने से चार गुणा असर करने का पड़ता है !इसीलिए सबसे बड़ी जरुरत सदाचरण की है सद्वाक्यों की नहीं !और हिंसा ,द्वेष भाव ,घृणा ,झूठ आदि की तो बिलकुल नहीं है !इसीलिए युवाओं के इन घोर स्वार्थनिष्ठ ,लोकतंत्र विध्वंसक ,निम्न स्वार्थों को पूर्ति में संलग्न धर्म ,नीति ,सदाचार ,विकास अदि की बातों को बहुत महत्त्व ना देकर इनके स्वार्थ पूर्ति का साधन ना बनकर ,इनके जिन्दा ,मुर्दाबाद के नारों को बुलंद करने के स्थान पर अपनी दृष्टि उन उन निश्वार्थ समाज सेवकों की और केंद्रित करना चाहिए ,जिनका दर्शन ना संवैधानिक संस्थाओं में होगा ,ना भाषण मंचों पर होगा !बे वहां समाज के नवनिर्माण में कार्य करते मिलेंगे जहाँ न समाचार पत्रों की दृष्टि जाती है और ना चैंनलों की ! इसीलिए रचनाधर्मिता को जीवन में स्थान दो और अपने आपको गपोड़ियों के चुंगल से मुक्त करो !स्वाबलंबी जीवन को विकसित करो !और इन स्वार्थनिष्ठ गप्प बाजों के स्वार्थ के साधन ना बनो !
भारत विश्व का प्राचीनतम देश हैं !यह भूतकाल में विश्व गुरु कहलाता था
!उसका कारण भी यही था कि आध्यात्मिक ज्ञान की जीवन पद्धति यहीं से विश्व को
प्राप्त हुई थी !भगवान श्री कृष्ण ने गीता १७(२३)में कहा है कि परमात्मा
का निर्देश ओम तत सत इन तीन प्रकार के नामों से होता है !इन्ही तीन नामों
से परमा त्मा का संकेत किया गया है ! उसी परमात्मा ने श्रष्टि निर्माण के
समय ही वेदों तथा ब्राह्मणो और यज्ञोँ की रचना की थी !अर्थात परमात्मा के
ज्ञान और जीवन जीने की कला का ज्ञान वेदों में स्वयं दिया था !और वेद ज्ञान
को समझ कर उस ज्ञान का स्वयं आचरण करने वाले ब्राह्मणो की रचना भी
परमात्मा ने कीथी !और जीवन जीने की कला तथा बिभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक
साधनाओ के द्वारा श्रष्टि के भौतिक पदार्थों अर्थात संसार के निर्माण में
प्रयुक्त होने वाले पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश को बिना छति पहुंचाए
आत्मशकि से ही प्राप्त शक्ति से सभी लौकिक पारलौकिक स्वर्ग नर्क आदि की
प्राप्ति और अंत में मोक्छ प्राप्ति का विधान भी यज्ञोँ के माध्यम से
संसार के सामने ब्राह्मणो ने यज्ञीय जीवन पद्धति को अपने आचरण में उतारकर
संसार के सामने रखा था !वेदों ने ही लोक व्यबस्था में धर्मकी स्थिति का सही
चित्रण प्रस्तुत करते हुए !काल को चार विभागों सतयुग त्रेता द्वापर और
कलियुग में विभाजित कर दिया था !तथा युगानुसार धर्म की स्थिति भी बतायी थी
!यह कलियुग चल रहा है !अभी इसको सिर्फ ५४०० बर्ष के लगभग हुआ है !इसकी
आयु ४३२००० बर्ष बतायी गयी है !और इस युग के बारे में कहागया है !कि इस
युग में सनातन धर्म नष्ट होजायेगा !और वेद द्वारा प्रतिपादित व्यबस्था का
पालन कराने वाले लोग आचरण भ्रष्ट हो जाएंगे !और अनेक प्रकार के पंथ मजहब
उत्पन हो जाएंगे !जो भारत की वैदिक संस्कृति का नाश करेंगे !कलियुग को घोर
अधर्म युग कहा गया है !इसमें जीवन जीने की कला और इन कलियुगी मजहबीं और
मतों से वैदिक संस्कृति के साधू संतो सन्यासियोँ द्वारा अपनी तपस्या से
सनातन धर्म को सुरक्छित और संरक्छित करने के लिए विधियां बतायी गयी है
!रामायण ,गीता महाभारत उपनिषद् आदि इसी सनातन धर्म की सुरक्छा के लिए आसान
साधना के उपाय प्रस्तुत करते हैं !भारत की लगभग १३०० साल की गुलामी ने
भारत वासियों की वैदिक संस्कृति को नष्ट करके अपने अधूरे धर्मों को प्रवेश
करा दिया है !और देश में कुछ लोगों ने लालच और लोभ से तथा कुछ ने भय से इन
विदेशी धर्मों को स्वीकार कर लिया है !और कुछ विदेशी विद्वानो ने श्रष्टि
के सृजन के अपने अधूरे और कल्पित दृष्टि कौण इतिहास में प्रविष्ट करा दिए
!तथा इसी प्रकार के झूठे और मनगढंत इतिहास ने अकबर को महान और उसके समय
में देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति को स्वर्ण युग निरूपित कर दिया है !जबकि
अकबर के समकालीन तुलसीदास जी ने उस समय की भारत की दीन दशा का बहुत ही
मार्मिक और दर्द भरा चित्र प्रस्तुत किया है !अकबर के विरुद्ध युद्ध करने
वाले महान योद्धा और देश की धर्म संस्कृति स्वाभि मान के लिए लाखोँ स्त्री
पुरुषों के बलिदानो का कोई जिक्र नहीं है !अकबर अत्यंत अय्याश और वैदिक
संस्कृति को नष्ट करने वाला और मुग़ल सल्तनत को भारत में विस्तार देने वाला
साशक था ! !जिसने वैदिक संस्कृति को नष्ट करने के लिए चंद स्वार्थी राजपूत
राजाओं के सहयोग से और कुछ चाटुकार हिन्दू दरबारियोँ के माध्यम से कुशल
साशक के रूप में मुगलिया सल्तनत को स्थापित किया !और सामजिक और धार्मिक
रूप से वैदिक धर्म का नाश किया !उसी का उदाहरण ये ज्वाला मुखी देवी की
ज्वाला नाश करने का उसका कुत्सित प्रयत्न था जिसमे वह बिफल हुआ !ऐसे और भी
अनेक वैदिक संस्कृति के नाशक अकबर के प्रसंग हो सकते हैं !जिनको उजागर
किया जाना चाहिए !
Tuesday, 13 September 2016
भाजपा को अब देश का शासन चलने का अवसर प्राप्त हो गया है !इसीलिए अब इसे अपने कार्यकर्ताओं को देश में मौजूद समस्यायों के निराकरण और समाधान के लिए भगीरथ प्रयत्न करने के लिए जुट जाने के लिए लगा देना चाहिए !जो इसका प्रबल विरोध सत्ता में बैठी कांग्रेस के प्रति था !अब उस शाब्दिक विरोध में अधिक समय ना बर्बाद कर अपने आचरणों से विरोध प्रस्तुत करना चाहिए !मोदी जी ने जिन मुद्दों को जनता के सामने बहुत ताकत के साथ उछाला था ! और सत्ता में आते ही समाधान का वायदा किया था ! उनमे से सिर्फ एक केंद्र में उनकी सरकार के दौरान कोई घोटाला नहीं हुआ यह पूर्ण रूप से नियंत्रित दिखाई देता है !उनके मंत्रिमंडल में कुछ ईमानदार मंत्री है !किन्तु जो भ्रष्ट हैं उन पर प्रधान मंत्री की पैनी नजर रहती है !इस समय मोदीजी के नियंत्रण में भाजपा का संगठन और शासन प्रशासन है ! दूसरा अहम् मुद्दा जो महगाई का है !वह सुलझने का बजाय बहुत बढ़ गया है !खाद्य पदार्थों और जनता के दैनिक उपयोग की वस्तुओं में असाधारण बृद्धि हुई है ! बाजार पर सरकार का नियंत्रण दिखाई नहीं दे रहा है !यद्द्पि इसमें केंद्र से अधिक राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है !किन्तु जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें है !वहां भी स्थिति में सुधार नहीं है ! एक समस्या धार्मिक सद्भाव की है ! हिन्दू मुस्लिम समस्या देश की सबसे बड़ी साम्प्रदायिक समस्या है !जिसका समाधान देश के विभाजन और गांधीजी की सहादत के बाद भी नहीं हो सका है ! कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए जिस सख्त कदम की आवश्यकता थी !अब उसकी और मोदी सरकार जाती दिख रही है !इस अहम् समस्या के समाधान के समाधान की विफलता के लिए जनसंघ और अब भाजपा लगातार कांग्रेस की आलोचना करती रही है ! अब सत्ता भाजपा के हाथमें है !इसीलिए अब इस समस्या के समाधान का सार्थक प्रयत्न मोदीजी की सरकार को करना चाहिए ! लोकतंत्र का स्वरुप ही ऐसा है कि इसमें सत्ता में परिवर्तन अवश्य होता है !इसीलिए सत्ता में पकड़ मजबूत करने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए लोकतंत्र को विकृत नहीं करना चाहिए !भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है !इसीलिए इसको नीति आधारित और विचार प्रधान रहना चाहिए !किन्तु यह सत्ता के मोह में दलबदल को प्रोत्साहित कर लोकतंत्र में विचार के स्थान पर अवसरवाद को प्रधानता दे रही है !और दलबदलुओं को बहुत उत्साह के साथ प्रवेश दे रही है !दलबदल को विचार से संयुक्त करने के लिए किसी भी दलबदलू को कम से कम दाल में प्रवेश के बाद ना दल में और न ही विधान सभा या लोकसभा में जाने के लिए ५ साल तक कोई अवसर नहीं देना चाहिए !ये दलबदलू समर्पित कार्यकर्ताओं का अधिकार छीन कर उन्हें हतोत्साहित कर देते हैं ! जिससे विचार विकसित लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो पाती है !
Ch1(1)When Sam DAn BHed established method among kings failed peaceful efforts to resolve cisis among Kauravas and pandvas the only resort was left to use Danda against Kauravas.LOrd krishna went to the court of Dhritrastra to bring truce and he usedSAM(told to kauravas that Pandvas were their own kinsmen and they regarded dhritrasra as their sole guardian hence they must not commit dis honesty with them and to create amity they should get their king dom back but Kauravas particularly DUryodhan and his associates did not accept it , then policy of than (toaccept minimum and renounce maximum) was used Lord put the proposal to give only five villages for the livelihood of five brothers and keep the rest king dom but Duryodhan turned back this proposal and fired back that he would not give that much of land which can cover the uupper side of needle Then lord advanced the policy of Bhed(cause division in associates) but this also not got succeses. now the only way was left to use policy of dand(war) hence the great war of Mahabharat ensued due toredundancy of
duriyodhan and his covetous and warmonger greedy associates.ULtimately war ensued and Sanjaya who was endowed with divya dristi remained in KUrukchhetra for ten days and when BHisma Pitamaha fell on the ground in the battle field he came to inform this to blind king hearing this sad news he asked Sanjaya to give him the real picture of battle field from the begining Sanjaya due to DIvya Dristi had the capacity to visualise what had happened in the past and to forecast what would happen in future. Now Dhritrastra asks that what my sons and Pandavas gathered to fight each other inDharma chhetra Kuru chhetra did what did they do that how did they place them in battle field and how did they start war?
Monday, 12 September 2016
धर्म में सनातन और सामयिक दो तत्त्व होते हैं ! धर्म का नाम ही धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि वह ईश्वर निर्मित संपूर्ण श्रष्टि को धारण करता है ! इसिलए जोधर्म के सनातन तत्त्वव , सत्य, अस्तेय ,अहिंसा,ब्रह्मचर्य ,अपरिग्रह ,हैं !ये सनातन हैं !इनको क्रिया रूप में उतारने के लिए जिस नीति विधान का निर्माण ,देश ,परिस्थित स्वभाव आदि के अनुसार होता रहता है वह बदलता रहता है ! मानव समाज परस्पर सहयोग से संचालित होता है !और मानव समाज के विवेक पूर्ण सहयोग से पशु ,पक्छी आदि समस्त जीव जंतुओं का संरक्छण होता है !सभी प्राणियों के भोग के लिए ही पृथ्वी ,आकाश ,जल ,अग्नि और वायु का निर्माण हुआ है !इनसे ही प्राणियों के लिए समय और काल भेद से समस्त भोग सामग्री उत्पन होती है ! सभी धर्मों में त्याग को आवश्यक माना गया है !त्याग की इस प्रक्रिया को अनेक नाम दिया गए हैं !बलिदान ,कुर्वानी ,दान ,यज्ञ आदि अनेक नाम देशों अदि की भिन्नता मेंउन देशों में प्रचिलित मान्यताओं के अनुसार त्याग के अनेक नाम है !वैदिक संस्कृति में यज्ञ को त्याग का नाम दिया है !सभी प्राणी संसार में मल मूत्र विसर्जन से जो गन्दगी भूमि पर उत्पन्न कर देते हैं !उसकी शुद्धि के लिए ,और कतिपय दुष्ट मनुष्यो के द्वारा अधिक प्राप्ति के कारणों से जो जल .जंगल ,जमीन ,आदि प्राकृतिक साधनो को दूषित और प्रदूषित किया जाता है ,!जिस से प्रकृति चक्र अवरुद्ध हो जाता है !समय पर वर्षा नहीं होती है ,अकाल ,भूकंप ,आदि और वायु ,जल प्रदुषण आदि के कारण मानव समूह के साथ संपुर्ण प्राणी जगत के सामने असितत्व का संकट उत्पन्न हो जाता है !इसीलिए इस विषम और प्राणान्तक स्थिति से निपटने के लिए मन्त्र आदि के विधि विधान से यज्ञों का आयोजन होता था !अभी भी होता है !इसमें उत्तम सुगन्धित पदार्थों की अग्नि में आहुतियां दी जाती है !इस यज्ञ विद्या को दूषित करने के लिए कुछ धूर्तों ने पशुबलि को भी प्रबेश करा दिया था !जिसका शशक्त प्रतिरोध हुआ और इस दूषित ,हिंसक प्रथा को समाप्त कर दिया !भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में यज्ञ का शुद्ध स्वरुप समाज के सामने प्र्रस्तुत किया !और दूध घी के लिए गाय को मान्यता प्रदान कराई और स्वयं गायों को चराया !परिणाम स्वरुप गाय भारतीय अर्थ व्यबस्था की रीढ़ बन गयी !और उसके समस्त अंग हड्डी .चमड़ा ,आदि भी समाज के लिए उपयोगी हो गए !उसके गोबर समस्त प्रकार के जहरीले कीटों का विनाशक और मूत्र समस्त रोगों का नाश करने वाला होता है !तथा गाय के गोबर और मूत्र से उत्तम खाद का निर्माण होता है !करोड़ों की संख्या में गायें भारत में थी !और यहाँ घी दूध की नदियां बहती थी ! मनुष्यों ने समयानुसार अपनी सामर्थ्य ,स्वभाव भिन्नता के कारण धर्म के सम्बन्ध में अनेक धारणाएं उत्पन्न की !भारत में भी वैदिक धर्म में अनेक धारणाएं जैन ,बौद्ध ,सिख आदि के रूप में प्रगट हुई ! कालांतर में इस्लाम और ईसाई धर्म का प्रवेश भी भारत में हुआ !और बहुत से लोगों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर इन धर्मों को स्वीकार कर लिया !भारत में इन धर्माबलंबियों की बहुत बड़ी संख्या है !भारत भूमि का एक बहुत बड़ा भू भाग विभाजित होकर पाकिस्तान बन गया जो अब दो भागों में बिभाजित होगया !और एक का नाम बांग्लादेश हो गया !
आज इदुलजुहा मुसलमानो का बहुत बड़ा त्यौहार है !इसमें कुर्बानी दी जाती है !इसमें भारत में लाखों बकरे काटे जाते हैं !कहीं छिपे तौर पर गायों की भी वलि दी जाती हैं !मुस्लिम देशों में भी यह दिन भारत की तरह खुसी का होता है !किन्तु करोड़ों निर्दोष मूक पशुओं के बड़े विनाश का दिन होता है !अब कुछ मुसलमानो ने इस कुर्वानी प्रक्रिया को बदलने का प्रयत्न करना भी शुरू कर दिया है !इस दिन को अहिंसक ,करुणा और दया प्रधान धर्मों को मान ने बाले लोगों को करोङो पशुओं के सामूहिक संघार के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए !कि परमात्मा इन जीवों की आत्माओं को शांति प्रदान करे !और अल्लाह ताला से यह गुजारिश करनी चाहिए !कि मुसलमानो को इस खूंख्वार क़ुरबानी के बजाय किसी और अहिंसक कुर्बानी का मार्ग बताये !क्योंकि अल्लाह दयावान हैं !तो फिर ये करोङों जीव उसकी दया से वंचित क्यों हैं ?
आज इदुलजुहा मुसलमानो का बहुत बड़ा त्यौहार है !इसमें कुर्बानी दी जाती है !इसमें भारत में लाखों बकरे काटे जाते हैं !कहीं छिपे तौर पर गायों की भी वलि दी जाती हैं !मुस्लिम देशों में भी यह दिन भारत की तरह खुसी का होता है !किन्तु करोड़ों निर्दोष मूक पशुओं के बड़े विनाश का दिन होता है !अब कुछ मुसलमानो ने इस कुर्वानी प्रक्रिया को बदलने का प्रयत्न करना भी शुरू कर दिया है !इस दिन को अहिंसक ,करुणा और दया प्रधान धर्मों को मान ने बाले लोगों को करोङो पशुओं के सामूहिक संघार के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए !कि परमात्मा इन जीवों की आत्माओं को शांति प्रदान करे !और अल्लाह ताला से यह गुजारिश करनी चाहिए !कि मुसलमानो को इस खूंख्वार क़ुरबानी के बजाय किसी और अहिंसक कुर्बानी का मार्ग बताये !क्योंकि अल्लाह दयावान हैं !तो फिर ये करोङों जीव उसकी दया से वंचित क्यों हैं ?
18(78)Yogeshwara Krishna and ARjuna combination of yukti and Shakti or Neetior BAl(policy and strength,) would bring prosperity, victory, expansion and sound policy(srih, vijayoh, bhootih,dhruvaneetih) this is my understandig' Lord krishna an incarnation of God in human form is amply delineated in Gita and Mahabharat and Arjuna an Incarnation of ancient Rishi Nara have taken birth to eliminate adharma the preserver and reserviore of greed injustice partiality anger and all sorts of creater of troubles in the smooth running of society and annihilator of good persons etc. and to establish dharma means eradication of lust, anger and greed dominated lives without which the lives of entire creation could not subsist on this planet known as earth' Divine message is for the entire world it is a clarion call to stand against adharma to drive it out from every nook and corner of human lives
Saturday, 10 September 2016
आज ऋषि परम्परा को सामाजिक जीवन में प्रवेश करा देने वाले महान ऋषि आचार्य विनोबा भावे का जन्मदिन है !उनकी जीवन साधना अपने नाम धाम को परम शक्ति में बिलीन कर देने की थी !यही ऋषि परंपरा भारत की आध्यात्मिक परंपरा रही है !जिसमे उपनिषद जैसे सूक्छम आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व को देने वालों के नाम धाम का सही पता लगा पाना आज भी खोज और शोध का विषय बना हुआ है !भले ही विनोबा का प्रयत्न लोकदृष्टि से बचने का रहा हो !किन्तु गांधी जी जिन्हे राष्ट्र पिता कहा जाता है !और जिनकी पहचान विश्व पटल पर महापुरुषों के महा पुरुषों के रूप में जानी जाती है !उन गांधी जी ने विनोबा को पत्र लिख कर कहा था !कि विनोबा में नित्य प्रति सेकंडों लोगों से मिलता हूँ !किन्तु तुम्हारे जैसी पवित्र आत्मा का दर्शन नहीं होता है ! !लोकप्रतिस्ठा से दूर रहने वाले विनोबा ने इस पत्र को भी रद्दी की टोकरी में फेक दिया था !किन्तु विनोबा का जीवन लोकसेवा का अनूठा उदहारण पेश करता है !इसीलिए उसको कितना भी छिपाया जाय !उसको तो उजागर होना ही पड़ेगा !विनोबा को हम सर्वोदय के जनक के रूप में स्मरण कर सकते हैं !गांधी के निधन के समय सर्वोदय एक बीज रूप मन्त्र के रूप में विद्यमान था ! यह शव्द अभी बहुजन समाज के लिए अपरिचित था ! मार्च १९४८ में जब गांधी जन सेवाग्राम में मिले तब गांधी परिवार को सर्वोदय समाज नाम देने के लिए गांधीजन तैयार नहीं थे ! लोगों का कहना था कि अगर गांधी जनो सर्वोदय समाज नाम दिया जाएगा तो देश का बहु संख्यक समाज इसे समझ नहीं पायेगा ! तब विनोबा कहा अगर इसे गांधी जन अपनी कृति से लोगों के सामने उतारेंगे तो लोग इसे आसानी से समझ जाएंगे ! उन्होंने कहा इसके लिए तपस्या करनी होगी गांधी जी कि यही विरासत है अभी यह विचार बीज रूप में गांधी जी द्वारा बोया गया है ! और वह अंकुरित होकर फूलेगा फलेगा और सारी दुनिया मै फैलेगा हम को अपने चिित के मेल धो डालने होंगे ! हम नए मनुष्य बनेगे ! अहिंसा का संशोधन करेंगे !अपनी आत्मशक्ति का निरीक्छण करेंगे ! विनोबा अब इस मिसन के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो चुके थे !इसिलए घोषणा कर दी की जब तक भूदान यज्ञ का कार्य सिद्ध नहीं होगा तब तक आश्रम का आश्रय भी छोड़ता हूँ ! यह अहिंसक क्रांति का यज्ञ है ! युग पुरुष की मांग है ! मुझे ५ करोड़ एकड़ जमीन चाहिए !विद्वान चाहे मुझे पागल समझें ! मेरे हाथ में रत्न चिंतामणि आगया है ! मुझे एक जीवन कार्य मिल गया है ! अब तक बे अकेले ही थे ! शुरू में देशभर में उनकी अकेले ही यात्रा चलती रही ! परन्तु अद्भुत मस्ती में चलती थी ! बे कहते थे सूर्य अकेला ही चलता है ! बाद में हवा फैलती गयी साथी जुड़ते गए तो कहने लगे अब में शहस्त्रा बाहु बन रहा हूँ !इस तरह गांधी जी के आश्रम का एक अपरिचित आश्रम बासी लोक ह्रदय में प्रेम और आदर का स्थान पाता गया ! विनोबा ने सर्वोदय के मन्त्र को समाज व्यापी बना दिया !और सारे समाज का उत्थान हो ! समाज में नैतिक ताकत का विकास हो ! जनता का सामूहिक गुण विकास हो ! ऐसा एक व्यापक आंदोलन चलाया ! सर्वोदय का दर्शन प्रत्यक्छ व्योहार में प्रितिस्ठित हुआ ! आंदोलन के कुछ साथी थके ! कुछ विचलित हुए ! सर्वोदय का सन्देश पहुंचाने में १२ साल लग गए ! समस्त देश की एक प्रदिक्छ्णा पूरीहुई !तेरह साल तीन महीने तेरह दिन के बाद अपने आश्रम में बापिस पहंचे ! बिनोबा ने कहा था कि विश्व आत्मा और मानव आत्मा जुड़े यह युक्ति ही मुक्ति है !ऐसी खोज में विनोबा जी सारे जीवन लगे रहे !यह गांधी विनोबा की विरासत है !और गांधी जन को तदनुसार जीवन जी कर इसे लोकजीवन में उतारने का काम करना है !
Friday, 9 September 2016
उल्टी समझ---------- कभी इस देश में ऐसा जीवन जीते थे ,कि शरीर रोग मुक्त और जीवन न्याययुक्त होता था !किन्तु जब बुद्धि उलट जाती है !तो जीवन में खान पान और रहन सहन को तो ठीक किया नहीं जाता है किन्तु शरीर को रोग मुक्त करने के लिए अस्पताल और न्याय के लिए न्यायालय खोलने की मांग की जाती है ! ऐसा ही आज समाज में देखा जा रहा है !कभी इस देश में दूध घी की नदियां बहती थी !गाय का दूध घी अमृत था !गाय भारतीय अर्थ व्यबस्था की रीढ़ थी !इसीलिए स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की आवश्यकता और कर्ज के लिए साहूकार की जरुरत नहीं थी !पृथ्वी से स्वास्थ्य वर्धक अन्न ,और सब्जियां दालें आदि पैदा होती थी !सारी पृथ्वी स्वाथ्यवर्धक वायु छोड़ा ने वाले, पेड़ों और सुगंध विखेरने वाले पौधों से सजी हुई थी ! लोग आर्थिक दृष्टि से स्वाबलंबी थे !जनसँख्या नियंत्रित थी !जीवन सभी प्रकार के दम्भ पाखंड झूठ आदि से मुक्त था !इसीलिए न्यायालयों की आवश्यकता नहीं थी !नाम मात्र की पुलिस थी !और क़त्ल और बलात्कार अदि शायद ही कभी होते थे !विवाद गांव में भी सुलझ जाते थे !ना कोई वकील था और ना न्यायालय थे !आज स्थिति बुद्धि उल्टी हो जाने से पलट गयी है !अब स्वार्थी लोग ही .समाज को अपने छुद्र स्वार्थों का साधन बनाने वाले समस्त जिम्मेदार पदों पर काबिज हैं ! उन लोगों की संख्या अपेक्छा कृत कम है जिनका ध्येय सिर्फ समाज सेवा होता है !इसिलए दूध देने वाले पशुओं का क़त्ल कर उनके मास का सेवन और निर्यात किया जा रहा है !पृथ्वी को ब्रक्छ मुक्त किया जा रहा हे !पहाङो से गिट्टी और जमीन से मिटटी खोद कर आम जन के सामने पर्यावरण प्रदूषण का संकट खड़ा हो गया है !बाजारों में नकली मिलाबटी खाद्यान स्वास्थ्य नष्ट करने वाली साम्रग्री विक रही है !स्वास्थ्य विगड़ने वाले इन सभी साधनो के मध्य अस्पतालों ,मेडिकल कॉलेजों के खोलने की मांग बढ़ रही है !डॉक्टरों के यहाँ मरीजों की भीड़ बढ़ रही है डॉक्टर लोग मरीजों से मनमानी फीस ऐंठ रहे हैं ! सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर तनख्व्वाह सर्कार से लेते हैं और मरीजों का इलाज अपने नर्सिंग होमों में करते हैं ! नए नए रोग उत्पन्न हो रहे हैं !बेईमानी पराकाष्ठा पर है !क़त्ल ,बलात्कार आये दिन होते रहते हैं !अपराध थाने और न्यायालय खुलने से कम नहीं बल्कि बढ़ जाते हैं !अस्पताल और न्यायालय भ्रष्टाचार के केंद्र हैं !इन सबको देखते हुए भी इन से लाभ लेने वाले लोग इन्ही के लिए मांग कर रहे हैं! स्वार्थी लोग अपने आप सुधरते नहीं है !क्योकि उनकी जीवन चर्या का मुख्य कार्य येन केन प्रकारेण अपने नाम को प्रकाशित करने और दाम को बढ़ाने में लगा रहता है ! यह कार्य सिर्फ आत्मनिष्ठ स्वार्थ मुक्त परमार्थ सेवी मनुष्य करते हैं !यह कार्य देश में हो भी रहा है !किन्तु स्वार्थी लोगों के पास विपुल राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संसाधनों पर आधिपत्य होने के कारण और गपोड़ियों और ,चमचों के हाथों वैचारिक मंचों के होने के कारण उपयोगी स्वस्थ विचार प्रवाह का मार्ग भी अविरुद्ध हो गया है! इसीलिए ये रचनात्मक कार्य उतना परिणाम प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं !जो देश को स्वाथ्य और न्याय स्वाभाविक रूप से प्राप्त कराने में सहायक हों !
Thursday, 8 September 2016
गांधीजी की हत्या पर हुई नयी बहस ------ गांधीजी की हत्या के समस्त साक्छ्य और कारण प्रकाश में आचुके हैं !फिर भी तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है ! गांधीजी के अंतिम दिनों का म्रत्यु पर्यंत समस्त विवरण लास्ट फेज ऑफ़ महात्मा में दिया गया है !इस पुस्तक का हिंदी अनुबाद भी पूर्ण आहुति के शीर्षक से ४ भागों में प्रकाशित हो गया है ! पूर्ण आहुति के प्रथम खंड के पृष्ठ ११३ से गाँधी जिन्ना की बार्ता जो ९ सितंबर १९४४ से शरू होकर १८ दिन तक जिन्ना के मुम्बई स्थित आवास माउन्ट प्लेजेंट रोड पर हुई थी जिसमें गांधीजी ने देश का बटवारा ना करने के लिए जिन्ना को समझाने का भरसक प्रयत्न किया था !किन्तु जिन्ना बिभाजन की मांग पर दृढ था और उसने गांधीजी की बात को सिरे से अस्वीकार कर दिया था !गाँधी जिन्ना की इस मुलाकत का हिंदुओं का एक वर्ग विशेषतः हिन्दू महासभा के सदस्य तीब्र विरोध कर रहे थे ! उन्होंने सुचना दी थी कि बे बापू को झोपड़ी से नहीं निकलने देंगे ! उन्होंने गांधीजी की झोपड़ी के तीनो तरफ रास्तों में स्वयं सेवक बैठा दीये थे ! सुबह पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट ने टेलीफोन पर सुचना फोन पर दी थी कि स्वयं सेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं इसीलिए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था ! तलाशी लेने के बाद एक स्वयं सेवक से बड़ा छुरा बरामद हुआ था !पुलिस अफसर ने उनसे कहा कि यह काम आपलोग अपने नेताओं पर क्यों नहीं छोड़ देते हैं !उसका जबाब था कि गांधीजी के लिए यह अधिक सम्मान की बात होगी इस काम के लिए तो जमादार ही काफी है ! जिस व्यक्ति का जमादार के नाम से उल्लेख किया गया था वह नाथू राम गोडसे था ! और उसी ने साढ़े तीन साल बाद गांधीजी की हत्या की थी !एक झूठी खबर यह फैलाई जा रही है कि ३० जनबरी को उनकी अंतिम मुलाकात सरदार पटेल के साथ हुई थी किन्तु बात चीत किस विषय पर हुई थी इसका विवरण ज्ञात नहीं है !पूर्ण आहुति के खंड ४ में पटेल और गांधीजी की बात चीत का पूर्ण विवरण पृष्ठ ४६४ पर दिया गया हैं!४ बजे उसदिन की मुलाकातें समाप्त हुई ! इसके बाद गांधीजी पटेल और उनकी पुत्री को लेकर अपने कमरे में चले गए !गांधीजी ने पटेल से कहा कि मेरा पहले यह विचार था कि आप या जवाहर लाल को मंत्री मंडल से हटा दिया जाय लेकिन अब में निश्चित तौर पर इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि दोनों का मंत्रिमंडल में रहना आवश्यक है ! आप दोनों की जरा सी भी फूट इस स्थिति में विनाशकारी सिद्धि होगी ! इस विषय पर में शाम की प्रार्थना सभ में भी बोलूंगा !पंडित नेहरू प्रार्थना सभा के बाद मुझ से मिलेंगे उनसे भी मैं इस प्रश्न की चर्चा करूँगा ! ३० जनबरी को मालिश के बाद उन्होंने राष्ट्र के नाम अपना अंतिम वसीयत नामाअपने सचिव को दिया और कहा इसे सावधानी से पढलो और कोई बात रह गयी हो तो उसे जोड़ देना ! मेने इसे भारी तनाव में तैयार किया है !इसी अंतिम वसीयतनामे में गांधीजी ने कांग्रेस को लोकसेवक संघ के रूपमें परिवर्तित करने के लिए कहा था !उसी दिन प्रार्थना सभा में जाते समय उनकी हत्या कर दी गयी थी !कांग्रेस कार्य समिति ने गांधी जी के अंतिम वसीयत नामे पर विचार कर कांग्रेस को लोकसेवक संघ में बदलने का विचार किया था !किन्तु उस समय की विकराल परिस्थिति को देखते हुए कांग्रेसियों का यह मत था कि कांग्रेस को भंग करने के बाद इस देश की जिम्मेदारी कौन ग्रहण करेगा ? !गांधीजी यदि जीवित होते तो इसको सम्भाल लेते !जिन लोगों ने गांधीजी की हत्या के लिए माहौल ख़राब किया और गांधीजी की हत्या करुबाई !इसकी कीमत देश को बहुत महँगी पड़ेगी !
Wednesday, 7 September 2016
18(71) shradha is foundation to enter in the king dom of God shraddha developes devotion and once devotion is developed asuya (habit of seeing vices in virtues) evaporates and the seeker creates in him self to hear the abilty of Divine message and gates of grasping and adopting it in life open.Here lord krishna says that man full of faith (shraddha) and devoid of searching vices(Asuya)invirtues hears this song celestial he is relieved from all his sins and attain the abode of virtuous persons this means he understands fully well the meaning of Nishkamkarma and adopt in in his life hence enjoys Jeevan mukti in life and after death attains the lokas where saints reside He realises Atmaloka in living life and after death live in Sanatan Atmaloka
18(72)Only those seekers would get light from this divine message who will hear it with utmost attention and make it live in their life faqbric. The divine light thus gained would relieve seeker from Moha which emerge from agyan that means no real knoledge of Soul and body. Bodies are made of five Elements Earth water air fire sky and is subject to continuous change and decay and the soul which creates Chetana(consciouness) is imperishable and changeless when this factum of body and soul is well enshrined in the inner tools (mind buddhi chitta and Ahankar) of seeker attachment to ephemerral things evaporate like snow and Ignorance is converted in exact knowledge.Here lord krishna asks Arjuna whether he has heard this Divine dialogue with rapt attention and whether his attachment(Moha) born of Agyan(ignorance) has ended if not GUru Krishna may adopt some other method to relieve him from his moha'(moodhata).
Tuesday, 6 September 2016
18(70) Those who would study this spiritual dialogue between Me and Arjuna this will according to Me would be My worship by Gyanyoga. Gyan (knoledge through words) merely by words is not is not Gyan Whatever a person learns through words when turns in to action and the result of action when becomes the part and parcel of his life than it becomes Gyan in spiritual sense and when this spiritual gyan is offered means laid at the feet of lord that means become the vehicle of adoration of glory of God than it becomes Gyanyoga and this Gyan yoga becomes the worship of God Hence the study of this spiritual dialogue which delineates the Tattva(epitome) of DHarma (real meaning of spiritual life) is the worship of Lord by means of Gyanyoga.
Monday, 5 September 2016
आपने बहुत उत्तम गीता के श्लोकों का चयन किया है !यद्द्पि यह कहना कठिन है ! कि गीता का कौनसा श्लोक जीवन के लिए उपयोगी नहीं है !सभी महापुरुषोँ और गीता के भाष्यकारों ने अपनी रूचि विश्वास और जन हित को ध्यान में रख कर गीता के श्लोकों का चयन किया है !महान ग्यानी अद्वैत मत के स्थापक शंकराचार्य ने गीताके भक्ति परक श्लोक को गीता सार कहा है ११(५५)आचार्य विनोबा भावे ने ४(१०)को कहा है कि भगवान को कर्म ज्ञान उपासना और मोक्ष के सम्बन्ध में जो कुछ कहना था वह इस श्लोक में कह दिया है !स्वामी रामसुख दास ने कहा है कि ४(२३ )कर्मयोग का मुख्य श्लोक है !गांधी जी गीता के २(५४से७२)के समस्त श्लोकों को कर्म कोष कहते थे !गांधी आश्रम की दैनिक प्राथनाओं में इन श्लोकों का दैनिक सुबह शाम पाठ किया जाता है !रामनुजा चार्य के गुरु यामुनाचार्य ने ७ श्लोकों को छांट कर सप्त श्लोकी गीता लिखी है !इस प्रकार गीता ग्रन्थ से सभी मनुष्योँ की लौकिक पारलौकिक और आध्यात्मिक समस्यायों का जैसा समाधान होता है !वेशा किसी भी धर्म के अन्यग्रंथों से नहीं होता है !यह धर्मग्रन्थ विश्व के सभी आध्यात्मिक व्यक्तियों का नूरे चश्म रहा है !किन्तु हम भारत बासी इतने दुर्भाग्यी है कि इस ग्रन्थ रत्न को विद्यालयोँ में पढ़ाने में गुरेज करते हैं !
Sunday, 4 September 2016
कश्मीरी पंडितों के लिए अलग केंद्र शासित राज्य की मांग -------- अपने गृह कश्मीर घाटी से अलगॉव बादी कट्टर पंथी मुसलामानों के कारण १९९६ से दर बदर शरणार्थी के रूप में भटक रहे कश्मीरी पंडितों के लिए प्रथक केंद्र शासित राज्य ही एक मात्र विकल्प है !देश में सुरक्छा के लिए भटक रहे इन कश्मीरी पंडितों को न्याय की आशा दिखाई नहीं दे रही है ! इन्होंने अपनी बहिन बेटियों को जिस तरह से बेइज्जत होते देखा है ,अपनी पुश्तेनी संपत्ति को लुटते और पूजास्थलों को टूटते हुए देखा !और देश से पलायन करना पड़ा इसके बाद इन लोगों को उन्ही क्रूर दानवों के साथ रहने को विवश किया जाय यह तो अन्याय की पराकाष्ठा होगी !इनके साथ घोर अन्याय होता रहा !और राज्य की और केंद्र की सरकार मूक दर्शक बनी रही !इस से बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है ? क्या ऐसे नेता विश्वास योग्य हो सकते हैं ? क्या ऐसी शासन व्यबस्था से रक्छा ,सुरक्छा की गारंटी हो सकती है ? जहाँ अलगाव वादी शांति की प्रस्तावना लेकर जाने वाले विपक्छी सांसदों से उनके घर पहुंचने पर भे मिलने से इनकार कर दें !और सारी वेशर्मी को पार करके देश से ये कहा जाय कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है !और उन अलगॉव बादियों से बात की जाय जो अपना आपको भारत का न तो नागरिक मानते है और न संविधान को मानते हैं ! इस स्थिति में पंडितों के सामने दो ही विकल्प हैं यातो बे मुसलमान बन जाएँ या फिर उनको अलग केंद्र शाषित होम लैंड प्रदान कराया जाय !उनको मुसलमान नहीं बनाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अन्य कश्मीरियोंकी तरह धर्म परिवर्तन अब तक नहीं किया है !अलग होम लैंड देना सरकार का काम है !जो सरकार शायद ही करे !लेकिन किसी भी स्थिति में का श्मीरी पंडितों का पुनर्वास इन अलगपबादी कट्टर पंथियों के साथ नहीं होना चाहिए !
शिक्छक दिवस -------- देश में शिक्छाविद डॉ राधाकृष्णन की स्मृति में शिक्छक दिवस उनके जन्म दिन ५ सितंबर को मनाया जाता है !इस दिवस पर भारत के राष्ट्रपति योग्य शिक्छकों को सम्मानित भी करते हैं !देश के सभी भागों में इस दिवस पर अवकाश प्राप्त शिक्छकों को खोज कर उनको भी सम्मानित किया जाता है !वेद में शिक्छकों का वर्णन आता है ! शिक्छकों के खास दो गुण होते हैं ---- पथिकृद , विचक्चकणः! पथिकृत यानी पाथ फाइंडर ,रास्ता खोजने वाला !एक बार रास्ता बन जाएगा ,तो फिर सब लोग उस पर चलेंगे परंतु पहले रास्ता खोजने और बनाने का काम शिक्छकों का है ! मार्ग खोजने वाला कौन बनेगा ? जो विच्छकन होगा वही मार्ग खोजने वाला बन सकेगा ! विचक्छण यानी चरों तरफ देखने वाला ऐसा मनुष्य रास्ता खोजता है और नया रास्ता बनाता है !प्राचीन भारत में इसीलिए शिक्छक गुरु कहलाता था !और वह अपनी कृति से ही सम्मानित होता था ! भारत की इस ऋषि प्रणीत वेद प्रतिपादित श्रेष्ठ गुरु परंपरा का पालन और निर्वहन भारत को विश्व गुरु की पदवी से विभूषित कर सकता है !किन्तु आधुनिक समय में तो यह स्वर्णिम स्वपन ही दिखाई देता है ! शायद समय बदले और ऐसा दिखे ? यह स्थिति कोई कोरी कल्पना नहीं है !यह भारत में थी !इसीलिए फिर भी हो सकती है !डॉ राधाकृष्णन इसी ऋषि परंपरा के प्रितिनिधि थे !इसीलिए उनका स्मरण राष्ट्रपति के रूप में नहीं शिक्छक के रूप में किया जाता है !
Saturday, 3 September 2016
18(63)Lord Krishna tells that He has divulged Guhyat Guhyataram now it is for Arjuna to activate this in his life or not he should ponder over it and then whatever his desire is he should act accordingly.here Bhagwan has given him freedom to act according tohis desire or not to act.But Arjuna had surrendered himself at the feet of Lord Krishna by sayingSisyteham Sadhi mam twam Prapannam 2(7)so how Arjuna could act of his own without getting clear mandate from Lord Krishna because once deciple surrenders(Sarnagati) he has to follow the mandate of Jagad Guru krishna and the mandate of sri Krishna has been continuously Nirashi Nirmamo bhutwa Yuddhaswa Bigat Jwarah3(30) so how Arjuna could act against this hence he did not respond and remained silent and the true mandate emerged in following Slokas to which Arjuna gave his willingness and acted upon.
18(64)Now Lord krishna discloses Sarvaguhyatam which means guides Arjun and through Arjuna to all seekers the kernel of geetas preaching. to whome this preaching can be given to him only who has become dear to lord krishna by surrendering himself unconditionally at the feet of almighty. Karmayoga, gyanyoga are given to devotees who Satat yuktanam bhajati Lord with unflinching devotion Sharnagati is the Sumum Bonum of geetas message and that is the secrets of secrets which has been continuously repeated and here again lord lay emphasis Bhuyah srunu may Parmamvachah means hear My most valued Words
Friday, 2 September 2016
साधु संत कहते हैं कि दिव्य बिंद्राबन धाम चर्म चक्छुओं से दिखाई नहीं देता है !भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं और लीला धाम का दर्शन सिर्फ ज्ञान दृष्टि संपन्न साधू संतों को भगवान की कृपा से ही होता है !भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं ही गीता में इस रहस्य का उदघाटन करते हुए ७(२५)में कहा है यह जो मूढ मनुष्य समुदाय मुझे अजन्मा और अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानता उन सबके सामने योगमाया से अच्छी तरह ढका हुआ में प्रगट नहीं होता हूँ ! भगवान अवतार काल में में सबके सामने प्रगट होते हुए भी मूढ मनुष्योँ को भगवद रूप से न दिखकर मनुष्य रूपमे ही दीखते हैं ! मनुष्य अपने भावों के अनुसार ही योग माया से आब्रत्त भगवान को देखते हैं ! भगवान अलौकिक और अजन्मा तथा अविनाशी होते हुए भी योग माया से ढके रहने के कारण लौकिक और सामान्य मनुष्योँ की तरह लौकिक प्रतीत होते हैं !किन्तु उनके दिव्य जन्म और कर्मोँ का ज्ञान तो उनके भक्तोँ को ही उनकी कृपा और अनुकम्पा से होता है !दिव्य बृन्दावन के आध्यात्मिक रहस्य का साक्छात अनुभव करने वाले सिद्ध साधू महात्मा आज भी बिंद्राबन और ब्रिज छेत्र में भगवान कृष्णा की दिव्य लीलाओं का दर्शन और अनुभव करते हुए साधना रत है !निधि बन की रास लीला भी ऐसे ही श्री राधा कृष्णा प्रेम में अनुरक्त संत महात्माओं को ज्ञान चक्छुओं से ज्ञात होती है !
Thursday, 1 September 2016
इन स्थूल कथाओं के रूप में भगवान श्री कृष्णा का भगवद स्वरुप प्रदर्शित किया गया है !ये सब कथानक भगवान के अवतरण के हेतु को पुष्ट करते है !इनको समझने के लिए आध्यात्मिक रथ पर सवार होकर आत्मा की शक्ति और सौंदर्य को समझने के लिए आत्मसाधना करनी होगी !और जो लोग भौतिक दृष्टि से इन कथाओं को सुनते हैं !उन्हें भी अपनी समझ विक्सित करनी होगी कि कोई भी देहधारी मनुष्य विवाहित ८पत्नियो के अतिरिक्त १६००० युवतियोँ को शारीरिक शुख प्रदान नहीं कर सकता है !भगवान सूत्र रूप में गीता में ४(९,१०)में कहते हैं कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं जो मनुस्य तत्त्व से जान लेता है ! वह शरीर का त्याग करके मुझे ही प्राप्त होता है ! उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ! राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरी भक्ति में तल्लीन तथा ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चके हैं ! श्लोक ८ में कहते हैं कि साधुओं की रक्षा करने के लिए और पापियों का विनाश करने के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए में युग युग में प्रगट होता हूँ !कृष्णा की प्राप्ति काम मुक्ति से होती है भोग प्रधान जीवन से नहीं
Thursday, 25 August 2016
अजन्मा का जन्म कैसे और क्यों ?-------- जब भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा की मैने अविनाशी कर्मयोग को सूर्य से कहा था वही पुरातन कर्म योग मैने तुझ से कहा है !अर्जुन ने कहा आपका जन्म अभी हुआ है !और सूर्य अनंत काल से प्रकाशित है !तब मैं यह कैसे मानलूं की अपने सृष्टि के प्रारम्भ में सूर्य को ज्ञान योग का उपदेश किया था !भगवान् श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं !मैं अपने सभी पूर्व जन्मो को जानता हूँ किन्तु तू नहीं जानता है !मेरे तेरे जन्म लेने की प्रिक्रिया में भी भेद है !तेरा जन्म पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के कारण होता है !किन्तु मेरा जन्म कर्माधीन नहीं है !मैं अजन्मा ,अविनाशी और अजर तथा अमर ,निर्गुण और निराकार होते हुए भी अपनी योग शक्ति से प्रगट होता हूँ !ना मेरा जन्म होता है और ना मरण होता है !मेरा शरीर चिन्मय और दिव्य है !मेरा जन्म और कर्म दिव्य हैं !मैं अपनी योग माया से ढका रहता हूँ इसीलिए जो मूढ़ और अज्ञानी मनुष्य मुझे अजन्मा और अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानते और मानते हैं उन सबके सामने मेरा स्वरुप योग माया से ढका रहने के कारण प्रकाशित नहीं होता है ! बुद्धि हीन मनुष्य मेरे परम अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ भाव को ना जानते हुए मन और इन्द्रियों से पर मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला मानते हैं ! मूर्ख लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान ईश्वर रूप श्रेष्ठ भाव को ना जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवमानना करते हैं ! जो संसार में मोह ,राग ,द्वेष ,काम ,क्रोध ,लालच आदि से ग्रस्त लोग हैं ऐसे अविविवेकी मनुष्यों की सब आशाएं ,व्यर्थ होती हैं उनके सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं उनका ज्ञान भी निरर्थक होता है उनके सभी कर्म लोभ अदि से दूषित होने के कारण मुझ अविनाशी परमात्मा के स्वरुप को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं ! ऐसे सभी मोह ग्रस्त लोग आसुरी ,राक्छ्सी और मोहिनी प्रकृति के आश्रय में अपना जीवन जीते हैं ! ये शव्द ग्यानी आध्यात्मिक अनुभव से शून्य व्यक्ति मुझ परमात्मा के अविनाशी स्वरुप को नहीं समझ पाते हैं !
परमात्मा का अवतार क्यों होता है !? ------ साधुओं की रक्छा के लिए ---------- साधुओं के लक्छण -------१-----
जो सब प्राणियों में द्वेष भाव से रहित और मित्र भाव बाला,तथा दयालु ,ममता रहित ,अहंकार रहित ,सुख ,दुःख की प्राप्ति में सम छमाशील निरंतर संतुष्ट ,योगी शरीर को अपने बस में रखने वाला अध्यात्म धारण का दृढनिश्चय वाला और परमात्मा को अपनी मन बुद्धि अर्पण करने वाला जो साधु है वह परमात्मा को प्रिय होता है !
२------जिस से कोई भी प्राणी छुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से छुब्ध नहीं होता तथा जो हर्ष ,ईर्ष्या ,भय और उद्वेग से रहित है !ऐसा साधु भगवान् को प्रिय है !
३----------जिसने सम्पूर्ण आवश्यकताओं का मन से त्याग कर दिया है जो बाहर भीतर से पवित्र है, जिसके जीवन का लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है! और इसके लिए वह चतुराई के साथ ईश आराधना में अपने चित्त को पिरोये रखता है ! सांसारिक भोगों के प्रति उदासीन है, व्यथा से रहित और सभी प्रकार के लौकिक कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है 1
४----------जो न कभी हर्षित होता है और न द्वेष करता है ना शोक करता है ना कामना करता है ,और जो शुभ अशुभ कर्मों से ऊँचा उठ गया है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है !
५-------जो शत्रु और मित्र में तथा मान अपमान में सम है और मौसम की अनुकूलता और प्रतिकूलता और सुख दुःख आदि में सम तथा आसक्ति रहित है और ईश्वर भक्ति में जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है ऐसा भक्त साधु भगवान् को प्रिय है !
६-------जो प्रसंशा और निंदा को समान भाव से देखता है ! और जीवन निर्वाह की वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह में संलग्न नहीं रहता है, जिसकी भौतिक सम्पति गृह आदि में असाक्ति नष्ट हो गयी है ऐसे भगवान् के भक्त साधु भगवान् की प्रिय हैं !
७------ इन उत्तम साधू लक्छणों की प्राप्ति में जो गृहस्थ संलग्न है ,भगवान् को बे विशेष रूप से प्रिय हैं !
जब ऐसे उपरोक्त साधुओं का समाज में अपमान होता है !भोगी दुष्ट लोग उनकी जीवन पद्धति पर हमला करते हैं !उनके प्राणों का हरण करते हैं !उनके आश्रमों का नाश करते हैं !जब ऐसे साधु दुखी होकर भगवान् को पुकारते हैं !तब वह निराकार अजन्मा ईश्वर इन साधुओं की रक्छा और आततायी दुष्टों के विनाश के लिए योग माया से विविध रूपों में प्रगट होता है !
पापी मनुष्य कौन होते हैं ---------अपनी बहुत बढ़ाई करने वाले ,सत्ता ,महत्ता ,धन संपत्ति की लिए लोलुप तनिक से भी अपमान को सहन ना करने वाले ,क्रोधी ,चंचल और आश्रितों की रक्छा न करने वाले अत्यंत घमंडी ,सम्भोग में ही मगन रहने वाले ,विषमता बढ़ाने वाले दान देकर पश्चाताप करने वाले अत्यंत कृपण ,धन और काम भोगों की प्रसंशा करने वाले तथा स्त्रियों का अपमान करने वाले और उनको सिर्फ काम दृष्टि से देखने वाले बलात्कारी अपने निम्न स्वार्थों के लिए सामाजिक ताना वाना छिन्न भिन्न करने वाले आदि ये सब महान पापी हैं !इनकी समाज में जब बृद्धि हो जाती है !और समाज की शासन व्यबस्था जब इन नराधमों के हाथ में चली जाती है !और इनका विनाश जब शुद्ध साधु प्रकृति के लोगों से संभव नहीं हो पाता है !तब इनके विनाश के लिए परमात्मा शरीर धारण करता है
अधर्म का नाश कर धर्म की पुनर स्थापना करते हैं ---------- पापी लोग धर्म को भी विकृत कर देते हैं !धर्म का नाम धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि यह सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने का शिक्छण प्राणिमात्र को देता है !धर्म में हिंसा और क्रूरता को कोई स्थान नहीं है !जो धर्म ऐसे धर्म का विनाश करता है ! और धर्म को जीव हिंसा से युक्त करता है !ऐसा धर्म अधर्म होता है !जब हिंसा में बृद्धि होती है !तब इन निरीह जीवों का करुण चीत्कार परमात्मा को विचिलित कर देता है !तब परमात्मा समस्त जीवों की रक्छा के लिए और साधुओं को कष्ट मुक्त करने के लिए इन धर्मध्वजी अधर्म परायण नृशंस मनुष्य के रूप में राक्च्छसों का विनाश कर सर्व समावेशी सभी जीवों के धारण पोषण करने वाले शुद्ध धर्म की स्थापना करता है !यही भगवान् के देह धारण का हेतु है !भगवान् श्री कृष्ण ने द्वापर के अंत में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए देह धारण की थी !और गीता का अमर उपदेश देकर कर्मयोग का ज्ञान समाज को दिया था !निष्काम कर्मयोग की औषधि मनुष्यों के सभी प्रकार के मानस रोगों को समाप्त करने की अचूक औसधि है !इसका सेवन सभी लोगों को करना चाहिए !
परमात्मा का अवतार क्यों होता है !? ------ साधुओं की रक्छा के लिए ---------- साधुओं के लक्छण -------१-----
जो सब प्राणियों में द्वेष भाव से रहित और मित्र भाव बाला,तथा दयालु ,ममता रहित ,अहंकार रहित ,सुख ,दुःख की प्राप्ति में सम छमाशील निरंतर संतुष्ट ,योगी शरीर को अपने बस में रखने वाला अध्यात्म धारण का दृढनिश्चय वाला और परमात्मा को अपनी मन बुद्धि अर्पण करने वाला जो साधु है वह परमात्मा को प्रिय होता है !
२------जिस से कोई भी प्राणी छुब्ध नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से छुब्ध नहीं होता तथा जो हर्ष ,ईर्ष्या ,भय और उद्वेग से रहित है !ऐसा साधु भगवान् को प्रिय है !
३----------जिसने सम्पूर्ण आवश्यकताओं का मन से त्याग कर दिया है जो बाहर भीतर से पवित्र है, जिसके जीवन का लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है! और इसके लिए वह चतुराई के साथ ईश आराधना में अपने चित्त को पिरोये रखता है ! सांसारिक भोगों के प्रति उदासीन है, व्यथा से रहित और सभी प्रकार के लौकिक कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करता है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है 1
४----------जो न कभी हर्षित होता है और न द्वेष करता है ना शोक करता है ना कामना करता है ,और जो शुभ अशुभ कर्मों से ऊँचा उठ गया है ऐसा साधु भगवान् को प्रिय होता है !
५-------जो शत्रु और मित्र में तथा मान अपमान में सम है और मौसम की अनुकूलता और प्रतिकूलता और सुख दुःख आदि में सम तथा आसक्ति रहित है और ईश्वर भक्ति में जिसकी बुद्धि स्थिर हो गयी है ऐसा भक्त साधु भगवान् को प्रिय है !
६-------जो प्रसंशा और निंदा को समान भाव से देखता है ! और जीवन निर्वाह की वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह में संलग्न नहीं रहता है, जिसकी भौतिक सम्पति गृह आदि में असाक्ति नष्ट हो गयी है ऐसे भगवान् के भक्त साधु भगवान् की प्रिय हैं !
७------ इन उत्तम साधू लक्छणों की प्राप्ति में जो गृहस्थ संलग्न है ,भगवान् को बे विशेष रूप से प्रिय हैं !
जब ऐसे उपरोक्त साधुओं का समाज में अपमान होता है !भोगी दुष्ट लोग उनकी जीवन पद्धति पर हमला करते हैं !उनके प्राणों का हरण करते हैं !उनके आश्रमों का नाश करते हैं !जब ऐसे साधु दुखी होकर भगवान् को पुकारते हैं !तब वह निराकार अजन्मा ईश्वर इन साधुओं की रक्छा और आततायी दुष्टों के विनाश के लिए योग माया से विविध रूपों में प्रगट होता है !
पापी मनुष्य कौन होते हैं ---------अपनी बहुत बढ़ाई करने वाले ,सत्ता ,महत्ता ,धन संपत्ति की लिए लोलुप तनिक से भी अपमान को सहन ना करने वाले ,क्रोधी ,चंचल और आश्रितों की रक्छा न करने वाले अत्यंत घमंडी ,सम्भोग में ही मगन रहने वाले ,विषमता बढ़ाने वाले दान देकर पश्चाताप करने वाले अत्यंत कृपण ,धन और काम भोगों की प्रसंशा करने वाले तथा स्त्रियों का अपमान करने वाले और उनको सिर्फ काम दृष्टि से देखने वाले बलात्कारी अपने निम्न स्वार्थों के लिए सामाजिक ताना वाना छिन्न भिन्न करने वाले आदि ये सब महान पापी हैं !इनकी समाज में जब बृद्धि हो जाती है !और समाज की शासन व्यबस्था जब इन नराधमों के हाथ में चली जाती है !और इनका विनाश जब शुद्ध साधु प्रकृति के लोगों से संभव नहीं हो पाता है !तब इनके विनाश के लिए परमात्मा शरीर धारण करता है
अधर्म का नाश कर धर्म की पुनर स्थापना करते हैं ---------- पापी लोग धर्म को भी विकृत कर देते हैं !धर्म का नाम धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि यह सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने का शिक्छण प्राणिमात्र को देता है !धर्म में हिंसा और क्रूरता को कोई स्थान नहीं है !जो धर्म ऐसे धर्म का विनाश करता है ! और धर्म को जीव हिंसा से युक्त करता है !ऐसा धर्म अधर्म होता है !जब हिंसा में बृद्धि होती है !तब इन निरीह जीवों का करुण चीत्कार परमात्मा को विचिलित कर देता है !तब परमात्मा समस्त जीवों की रक्छा के लिए और साधुओं को कष्ट मुक्त करने के लिए इन धर्मध्वजी अधर्म परायण नृशंस मनुष्य के रूप में राक्च्छसों का विनाश कर सर्व समावेशी सभी जीवों के धारण पोषण करने वाले शुद्ध धर्म की स्थापना करता है !यही भगवान् के देह धारण का हेतु है !भगवान् श्री कृष्ण ने द्वापर के अंत में धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए देह धारण की थी !और गीता का अमर उपदेश देकर कर्मयोग का ज्ञान समाज को दिया था !निष्काम कर्मयोग की औषधि मनुष्यों के सभी प्रकार के मानस रोगों को समाप्त करने की अचूक औसधि है !इसका सेवन सभी लोगों को करना चाहिए !
Saturday, 20 August 2016
धरम छेत्रे कुरुच्छेत्रे -----धर्म के ८मर्ग हैं ---यज्ञ दान शाश्त्रों का अध्ययन और तप इन चारों का तो कोई दम्भी पुरुष भी आचरण कर सकता है ! किन्तु इन्द्रिय निग्रह सत्य सरलता तथा कोमलता का इन चार का तो संत लोग ही अनुसरण करते हैं !जो महात्मा नहीं है ! उनमे सत्य छमा दया और निर्लोभता तो रह ही नहीं सकते हैं !धृतराष्ट्र और दुर्योधन करण शकुनि आदि सभी कौरव वेद पाठी थे ! नित्य अग्निहोत्र करते थे !किन्तु उनमे धर्म के अंग सत्य छमा दया और निर्लोभता के गुण नहीं थे !बे शब्द ग्यानी थे !उनमे धर्म का श्रेष्ठ आचरण प्रधान आचरण नहीं था !धर्म छेत्रे कुरु छेत्रे का अर्थ है की गीता केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं है प्रत्यक्छ आचरण में उतारने के लिए है ! पांडव युद्ध के पक्छ में नहीं थे ! बे चाहते थे की १२ वर्ष का बनवास और १बर्श का अज्ञात वास बिताने के बाद उनको उनका राज्य बापिस मिल जाना चाहिए था !राजा विराट की सभा में देश के तमाम राजाओं और श्री कृष्ण की उपस्थिति में यह निर्णय हुआ की विराट का राज पुरोहित हस्तिनापुर जाकर धर्म और नीतियुक्त सन्देश दुर्योधन आदि को दे ! और पांडवों को उनका राज्य देने की बात कहे धर्म राज युधिस्ठर धर्म के विरुद्ध इंद्रासन भी स्वीकार नहीं करेंगे ! राज पुरोहित ने पुष्य नक्छत्र से युक्त जय नामक महूर्त में हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया ! उन्होंने नीति और धर्म से युक्त बातों का कथन कौरव सभा में कहा ! भीष्म पितामह ने राज पुरोहित के कथन का समर्थन किया ! किन्तु करण ने विरोध किया ! धृतराष्ट्र ने राजदूत को यह कहकर बापिस कर दिया कि वह सोच विचार कर संजय को पांडवों के पास भेजेंगे ! संजय जब धृतराष्ट्र का सन्देश लेकर पांडवों के पास गया ! तब युधिस्ठर ने संजय से कहा की दुर्योधन से बार बार अनुनय बिनय करके कहना की पांडव शांति चाहते हैं ! हम सब में परस्पर प्रीति बनी रहे ! इसलिए हम पांच भाई सिर्फ पांच गाओं पाकर ही संतुष्ट हो जाएंगे ! और इसी पर युद्ध की सम्भावना समाप्त हो जायेगी ! संजय ने कौरव सभा में संधि की बात कही भीष्म पितामह ने भी दुर्योधन को संधि के लिए समझाया किन्तु दुर्योधन ने युधिस्ठर के शांति विषयक प्रस्ताव को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि पांडव मेरी सेना और मेरे प्रभाव के कारण इतने भयभीत हो गए हैं ! कि बे राजधानी या नगर लेने की बात छोड़ कर अब पांच गाओं मांगने लगे हैं ! धृतराष्ट्र वेदव्यास परशुराम गांधारी आदि ने भी दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह दी ! किन्तु दुर्योधन करण आदि ने अहंकार पूर्वक पांडवों से युद्ध करने का ही निश्चय व्यक्त किया ! पांडवों ने युद्ध न हो इसके लिए भगवान श्री कृष्णा को दूत के रूप में कौरवों के पास भेजा युधिस्ठर ने श्री कृष्ण से कहा कि युद्ध में प्रायः लज्जाशील श्रेष्ठ धीर वीर ही मारे जाते हैं ! और अधम श्रेणी के व्यक्ति जीवित बच जाते हैं ! युद्ध रूप कर्म तो पाप ही है ! युधिस्ठर ने कहा आप ही समस्त कौरवों के सुहृद तथा दोनों पक्च्छोँ के नित्य प्रिय सम्बन्धी है ! पांडवों सहित धृतराष्ट्र पुत्रों का मंगल सम्पादन करना आपका कर्तव्य है ! आप उभय पक्छ में संधि कराने की शक्ति भी रखते हैं !आप यहाँ से जा कर दुर्योधन से ऐसी बातेंकहें जो शान्ति स्थापना में सहायक हों ! भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मै वही कहूँगा जो धर्म संगत तथा हम लोगों के लिए हितकर तथा कौरवों के लिए भी मंगल कारक हो ! कार्तिक मॉस रेवती नक्छत्र में मैत्री नामक महूर्त में श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की !श्री कृष्णा ने कोरब सभा में धृतराष्ट्र से कहा इस समय दोनों पक्छों में संधि कराना आपके और मेरे अधीन है ! आप अपने पुत्रों को मर्यादा में रखिये और में पांडवों को नियंत्रण में रखूँगा ! युद्ध छिड़ने पर तो महान संघार ही दिखाई देता है इस प्रकार दोनों पक्छों का विनाश कराने में आप कौन सा धर्म देखते हैं आपके पुत्र लोभ में अत्यंत आसक्त हो गए हैं ! उन्हें काबू में लाईये ! शत्रुओं का दमन करने वाले कुन्तीपुत्र आपकी सेवा के लिए भी तैयार हैं ! और युद्ध के लिए भी तैयार हैं ! जो आपके लिए विशेष हितकर जान पड़े उसी मार्ग का अनुशरण कीजिये !किन्तु कौरवों ने श्री कृष्णा की सलाह ना मान कर उलटे उनको ही बंदी बनाने की चेस्टा की !परिणाम स्वरुप युद्ध अवश्यमभाभी हो गया था !
Thursday, 18 August 2016
एक बहुत निरथर्क विवाद भारत के राजनीतिक नेताओं और उनके अंध भक्तों द्वारा चर्चा में छाया रहता है !कि देश की आजादी अहिंसा से आयी या हिंसा से आयी ? यह राजनेताओं की वर्तमान समस्यों से पलायन करने और सत्ता को अपने दल या व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने का लोकतंत्र विनाशक कदम है ! आजादी किसके लिए आयी ? उस दिशा में देश कितना बढ़ा है ? आजादी अंतिम व्यक्ति के दरवाजे तक पहुँची या नहीं ? क्यों नहीं पहुँची ? !और प्रगति करते करते हम वहां तक पहुंचेंगे और कैसे पहुंचेंगे ? कि देश में अंतिम और प्रथम व्याक्ति नाम की श्रेणियां भी समाप्त हो जाए ! इस पर विचार होना चाहिए !जो बाधाएं आजाद भारत में निर्मित हो गेयें हैं !उनको कैसे समाप्त किया जाय , देश में सभी देश वासियों को जीवन धारण करने के लिए आवश्यक सामग्री पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो ! इस प्रयत्न की और लोगों को लगाना चाहिए !राजनेता ऐसा प्रयत्न शायद ही करें ? क्योंकि राजनीति में सत्ता प्राप्त करने के लिए उनकी हालात उस वासना ग्रस्त व्यक्ति की तरह होती है !जिसका सारा प्रयत्न सत्ता सुख का होता है !किन्तु बातें लोक कल्याण की होती है !ये लोग पब्लिक की समस्यायों को उलझाते ज्यादा और सुलझाते कम हैं !इन्ही लोगों से सत्ता सुख के कुछ टुकड़े प्राप्त लोग इनके समर्थन में भौंकते रहते हैं !लोकतंत्र की जान बे स्वतंत्र विचारक होते हैं !जो अपनी वैचारिक स्वतंत्रता की कीमत सभी यंत्रणाओं ,और जीवन को दाव पर लगाके भी चुकाते हैं !इस प्रकार से दो प्रकार की शक्तिया स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना में बाधा बन कर आजादी के यथार्थ उद्देश्य को सिद्ध नहीं होने दे रहें हैं !ऐसे गपोड़िये देश में बहुत है जो भगत सिंह ,राजदेव ,आदि क्रांति कारियों की बात करेंगे !किन्तु जब साहस और शौर्य प्रदर्शन का अवसर आयेग ,तो खोजने पर भी नहीं मिलेंगे !स्वतंत्रता संग्राम में जिन लोगों त्याग किया उनमें से बहुसंख्यक स्वतंत्रता के लिए जीवन समर्पित करने वाले आज भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में लुप्त हैं !उनमें से कुछ सही लोगों के नाम उजागर हैं ,बहुत से फर्जी हैं !मैं निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि कितने असली और कितने Yeseफर्जी है ? किन्तु आपात काल में बहुत से साथी जो देश भक्ति के गीत गाते थे ,शस्त्र क्रांति की बात करते थे !बे ऐसे नदारद हुए की उनका पता भी नहीं चला !जैसे ही आपात काल समाप्त हुआ बे फिर देश भक्ति का चोला ओढ़कर भगत सिंह और सुभाष बोस आदि के गीत गाने लगे !और उनमे से कुछ जेल ही नहीं गए बे भी लोकतंत्र सेनानी घोसित होगये !इसीलिए लोकतंत्र को वास्तविक बनांने का काम और देश के लिए सेवा भाव से समर्पित और राजनैतिक सत्ता ,महत्ता या पद प्रतिस्ठा की दौड़ से बाहर रहने वाले अपने आचरणों से सद्भाव का सन्देश देने वाले सिर्फ अहिंसक गाँधी वादी ही कर सकते हैं !क्योंकि बे आज भी समर्पित भाव से अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार अहिन्सक समाज निर्माण के कार्य में संलग्न हैं !ऐसे और भी बहुत से देश के लिए समर्पित भाव से कार्य करने वाले असंख्य देश भक्त स्त्री पुरुष हैं !जिनका नाम समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों मैं नहीं है !विनोबा जी उनको jहरिसेवक कहते थे ! ऐसे हरि सेवकों का विशाल समुदाय गांधीजी ने और विनोबा जी ने देश मैं खड़ा किया था !जिनका विस्तार देश के बाहर भी हो गया हैं !उन्हें पहचानकर उनसे दिशा निर्देश प्राप्त कर सर्व समावेशी भारतीय समाज की रचना की आवश्यकता है !
Thursday, 11 August 2016
अंतर राष्ट्रीय युवा दिवस -------- शेक्छणिक गुणबत्ता और राजनैतिक स्वक्छ्ता का निर्माण करें -------
!---- नक़ल कर के परीक्छा पास होने के जहर का पान कर अपने भविष्य का सत्यानाश ना करें
२-- फर्जी डिग्रीयां प्राप्तकर डिग्री धारी महामूर्ख ना बने
३---- आरक्छण की बजाय जीवन में स्वाबलंबन को विकसित और धारण करें !अनारकच्छित छात्र अपने जीवन का ध्येय सरकारी नॉकरी ना बनाकर जीवन यापन के लिए नए रचनात्मक छेत्रोका निर्माण करें ! और अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बने !
४ वैदिक धर्म के उत्कृष्ण ग्रन्थ महाभारत गीता आदि का गहरा अध्यन ,चिंतन ,मनन करें !और सभी धर्मों का उत्कृष्ट करुणा और अहिंसा और प्रेम प्रगट करने वाले आचार्य विनोबा भावे के बाइबिल,कुरान ,गीता ,रामायण ,जपुजी , धम्म पद , जैन धर्म ,पारसी धर्म तुकाराम के अभंग ,ज्ञानेश्वरी ,तमिलनाडु ,दक्छिण के संत पूर्व पश्चिम और कश्मीर के संत आदि के जीवन निर्माण के लिए हिंसा मुक्त सर्वधर्म समावेशिक ग्रंथों का अवश्य अध्यन करें और कराएं यह महान संत इस युग के लिए प्रेरणा पुंज और भविष्य के अति उत्तम निर्माण की जीवन विधि का मार्ग प्रस्तुत करता है !आचार्य विनोवा भावे के कार्यों की संपूर्ण जानकारी उनके लोकोपकारी समस्त ग्रंथों के पठन पाठन की सामग्री पवनार महाराष्ट्र में स्थापित ब्रह्म विद्या मंदिर से ही उपलब्ध हो सकती है !यह सब ग्रन्थ ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार में उपलब्ध हैं ! इस आश्रम में तपोनिष्ठ साधिकाएं निवास कराती हैं !जो विनोबा के नव निर्माण का चित्र अपनी त्याग ,तपस्या युक्त जीवन से प्रस्तुत करती हैं !ये बहिनें आदर्श और सेवा कीप्रतिमुर्ति है !धर्म के आध्यात्मिक स्वरुप का दर्शन इस आश्रम में होता है !
५ विनोबा के ग्रन्थ स्वच्छ राजनीति उत्तम शेक्छणिक गुणबत्ता के विकास का मार्ग प्रस्तुत करते हैं
!---- नक़ल कर के परीक्छा पास होने के जहर का पान कर अपने भविष्य का सत्यानाश ना करें
२-- फर्जी डिग्रीयां प्राप्तकर डिग्री धारी महामूर्ख ना बने
३---- आरक्छण की बजाय जीवन में स्वाबलंबन को विकसित और धारण करें !अनारकच्छित छात्र अपने जीवन का ध्येय सरकारी नॉकरी ना बनाकर जीवन यापन के लिए नए रचनात्मक छेत्रोका निर्माण करें ! और अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बने !
४ वैदिक धर्म के उत्कृष्ण ग्रन्थ महाभारत गीता आदि का गहरा अध्यन ,चिंतन ,मनन करें !और सभी धर्मों का उत्कृष्ट करुणा और अहिंसा और प्रेम प्रगट करने वाले आचार्य विनोबा भावे के बाइबिल,कुरान ,गीता ,रामायण ,जपुजी , धम्म पद , जैन धर्म ,पारसी धर्म तुकाराम के अभंग ,ज्ञानेश्वरी ,तमिलनाडु ,दक्छिण के संत पूर्व पश्चिम और कश्मीर के संत आदि के जीवन निर्माण के लिए हिंसा मुक्त सर्वधर्म समावेशिक ग्रंथों का अवश्य अध्यन करें और कराएं यह महान संत इस युग के लिए प्रेरणा पुंज और भविष्य के अति उत्तम निर्माण की जीवन विधि का मार्ग प्रस्तुत करता है !आचार्य विनोवा भावे के कार्यों की संपूर्ण जानकारी उनके लोकोपकारी समस्त ग्रंथों के पठन पाठन की सामग्री पवनार महाराष्ट्र में स्थापित ब्रह्म विद्या मंदिर से ही उपलब्ध हो सकती है !यह सब ग्रन्थ ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार में उपलब्ध हैं ! इस आश्रम में तपोनिष्ठ साधिकाएं निवास कराती हैं !जो विनोबा के नव निर्माण का चित्र अपनी त्याग ,तपस्या युक्त जीवन से प्रस्तुत करती हैं !ये बहिनें आदर्श और सेवा कीप्रतिमुर्ति है !धर्म के आध्यात्मिक स्वरुप का दर्शन इस आश्रम में होता है !
५ विनोबा के ग्रन्थ स्वच्छ राजनीति उत्तम शेक्छणिक गुणबत्ता के विकास का मार्ग प्रस्तुत करते हैं
मोहनजोदड़ों के लोगों का भोजन और रहन सहन -------- लोगों के खान पान रहन सहन ,आचार अदि को ही संस्कृति कहते है !यह संस्कृति कृति से जब संस्कारित हो जाती है !तब संस्कृति कहलाती है !इस संस्कृति का मूल आधार धर्म होता है !और भारत में धर्म का मूल आधार वेदों को माना जाता है !भोजन को तीन भागों उत्तम ,मध्यम और अधम में वेदों के सार गीता में निरूपित किया गया है !आयु ,सत्त्वगुण ,शक्ति ,आरोग्य सुख ,आनंद की बृद्धि करने वाले रस युक्त , घी ,मक्खन दूध ह्रदय की शक्ति बढ़ने वाले और लंबे समय तक शरीर को पुष्ट करने के लिए स्थिर रहने वाले ऐसे भोज्य पदार्थ सात्त्विक मनो बृत्ति ,अहिंसक लोगों को प्रिय होते हैं! ऐसा भोजन श्रेष्ठ भोजन माना गया है !जो भोजन अति कडुए अति खट्टे ,अति नमकीन ,अति गरम अति तीखे (चटपटे )अति रूखे और ह्रदय में जलन पैदा करने वाले और दुःख शोक ,और रोगों को उत्पन्न करने वाले भोज्य पदार्थ सिर्फ स्वाद के लिए भोजन करने वाले और इस प्रकार की भोज्य सामग्री से बीमारी होती है , भोजन केपरिणाम विचार ना कर भोजन करने विषयानुरागी भोगी मध्यम श्रेणी के पुरुष होते हैं !इसीलिए यह भोजन मध्यम गुण वाला कहा गया है ! जो भोजन सड़ा हुआ है ,रसरहित है ,जूठा है ,दुर्गन्धित बासी तथा मास ,मछली ,अंडे आदि है !ऐसा भोजन अधम अर्थात अत्यंत निम्न कोटि का माना गया है !और यह भोजन हिंसक स्वभाव के लोगों को प्रिय होता है !समाज किसी भी काल में एक जैसे विचार ,व्योहार के लोगों का नहीं होता है !उसमें भिन्न भिन्न रुचियों के स्त्री पुरुष हमेशा होते हैं !मोहन जोदड़ो में भी उत्तम ,मध्यम ,और अधम भोजन के पदार्थ खाने वाले लोग थे !
दो प्रकार के पक्के मूर्ख ------- एक प्रकार के मूर्ख बे हैं जो सनातन धर्म को ना समझ कर उसकी निंदा करते हैं !दूसरे प्रकार के मूर्ख बे हैं, जो सनातनी गृहस्थ होते हुए भी सनातन धर्म के सनातन तत्त्वों का अनुशीलन नहीं करते हैं !औरजिस सनातन धर्म में अगड़ा ,पिछड़ा दलित आदि शव्द ही नहीं है !और जो धर्म सर्वे भवन्तु सुखिनः की उद्घोषणा करता है !उसमें छुआ छूत आदि का अधार्मिक प्रवेश कराकर लोगों को सार्वजानिक स्मशान पर शव दाह करने से रोकते हैं !मंदिरों में पूजा नहीं करने देते ,सार्वजानिक कुओं अदि से पानी नहीं भरने देते है !इन सनातन धर्म के नासक लोगोंके कारण ही धर्म परिवर्तन हुआ !और इन्ही के कारण बहुत से ऐसे मूर्खों का जन्म हुआ जो सुबह से शाम तक !सिर्फ सनातन धर्म को गलियां देने का ही काम करते रहते हैं !सर्वाधिक पापी ,अधम ,पाखंडी बो लोग हैं, जिन्होंने सनातन धर्म के तत्त्व ज्ञान की चर्चा करने का ब्रत ले लिया है ! और तदनुसार वेश भी धारण कर लिया है !किन्तु सनातन धर्म में वर्णित तत्त्व ज्ञान को आचरण में नहीं उतारते हैं !
आजकल योग कोबड़ी प्रधानता प्रदान की जा रही है !महर्षि पातंजलि के नाम पर एक बहुत बड़ा व्योपारिक प्रतिष्ठान भी खड़ा हो गया !और विश्व योग दिवसभी मनाया जाने लगा है !पवित्र भूमि भारत में जन्मे और आचरित इस योग की सिद्धि और आचरण के विषय में क्या कहा गया है ? इसका कथन अनेक आख्यानों में महाभारत में किया गया है !ऐसे ही एक आख्यान को में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ !
१-----छुरे की तीखी धार पर कोई सुख पूर्वक खड़ा रह सकता है ! किन्तु जिसका चित्त शुद्ध नहीं है ऐसे मनुष्यों का योग धारणाओं में स्थिर रहना अत्यंत कठिन है !
२------ जैसे समुद्र में बिना नाविक की नाव मनुष्यों को पार नहीं लगा सकती ,उसी प्रकार यदि योग की धारणाएं सिद्ध न हुई तो बे शुभ गति की प्राप्ति नहीं करा सकती हैं !
३-------- जो विधि पूर्वक योग की धारणाओं में स्थिर रहता है ,वह जन्म ,म्रत्यु ,दुःख और सुख के बंधनों से छुटकारा पा जाता है !
४------योग का मार्ग दुर्गम है कोई बिरला ही इस मार्ग को कुशलता पूर्वक तै कर सकता है !
५-------- काम ,क्रोध ,सर्दी ,गर्मी ,वर्षा ,भय ,शोक ,स्वांश ,सामान्य मनुष्यों के प्रिय लगने वाले विषय भोग, दुर्जय असंतोष घोर तृष्णा , स्पर्श ,निद्रा तथा दुर्जय आलस्य को जीत कर वीत राग महान एवं उत्तम बुद्धि से युक्त महात्मा योगी स्वाध्याय तथा ध्यान का संपादन करके बुद्धि के द्वारा सूक्छम आत्मा का साक्छात्कार लेते है !
ये योगियों के संक्छेप में कुछ थोड़े से लक्छण यहाँ प्रस्तुत किये हैं !जिस प्रकार भौतिक ज्ञान का अध्यन विधिबत करने के लिए तदनुसार शिछण ग्रहण करना पड़ता है !उसी प्रकार समस्त धर्मों के मूल सनातन धर्म का शिछण भी बीत राग तपोनिष्ठ महात्माओं से प्राप्त किया जा सकता है !खोजने पर ऐसे तत्त्वनिष्ठ तपस्वी महात्मा मिल जाएंगे !अगर भोग गुरु को योग गुरु समझ कर योग सीखोगे तो बहि रंग योग को ही योग समझ कर भटक जाओगे !और गीदड़ को शेर समझ लोगे !
आजकल योग कोबड़ी प्रधानता प्रदान की जा रही है !महर्षि पातंजलि के नाम पर एक बहुत बड़ा व्योपारिक प्रतिष्ठान भी खड़ा हो गया !और विश्व योग दिवसभी मनाया जाने लगा है !पवित्र भूमि भारत में जन्मे और आचरित इस योग की सिद्धि और आचरण के विषय में क्या कहा गया है ? इसका कथन अनेक आख्यानों में महाभारत में किया गया है !ऐसे ही एक आख्यान को में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ !
१-----छुरे की तीखी धार पर कोई सुख पूर्वक खड़ा रह सकता है ! किन्तु जिसका चित्त शुद्ध नहीं है ऐसे मनुष्यों का योग धारणाओं में स्थिर रहना अत्यंत कठिन है !
२------ जैसे समुद्र में बिना नाविक की नाव मनुष्यों को पार नहीं लगा सकती ,उसी प्रकार यदि योग की धारणाएं सिद्ध न हुई तो बे शुभ गति की प्राप्ति नहीं करा सकती हैं !
३-------- जो विधि पूर्वक योग की धारणाओं में स्थिर रहता है ,वह जन्म ,म्रत्यु ,दुःख और सुख के बंधनों से छुटकारा पा जाता है !
४------योग का मार्ग दुर्गम है कोई बिरला ही इस मार्ग को कुशलता पूर्वक तै कर सकता है !
५-------- काम ,क्रोध ,सर्दी ,गर्मी ,वर्षा ,भय ,शोक ,स्वांश ,सामान्य मनुष्यों के प्रिय लगने वाले विषय भोग, दुर्जय असंतोष घोर तृष्णा , स्पर्श ,निद्रा तथा दुर्जय आलस्य को जीत कर वीत राग महान एवं उत्तम बुद्धि से युक्त महात्मा योगी स्वाध्याय तथा ध्यान का संपादन करके बुद्धि के द्वारा सूक्छम आत्मा का साक्छात्कार लेते है !
ये योगियों के संक्छेप में कुछ थोड़े से लक्छण यहाँ प्रस्तुत किये हैं !जिस प्रकार भौतिक ज्ञान का अध्यन विधिबत करने के लिए तदनुसार शिछण ग्रहण करना पड़ता है !उसी प्रकार समस्त धर्मों के मूल सनातन धर्म का शिछण भी बीत राग तपोनिष्ठ महात्माओं से प्राप्त किया जा सकता है !खोजने पर ऐसे तत्त्वनिष्ठ तपस्वी महात्मा मिल जाएंगे !अगर भोग गुरु को योग गुरु समझ कर योग सीखोगे तो बहि रंग योग को ही योग समझ कर भटक जाओगे !और गीदड़ को शेर समझ लोगे !
Tuesday, 9 August 2016
हिन्दू मुस्लिम एकता --------- साम्प्रदायिक सद्भाव की यह समस्या अनसुलझी आज भी है !यह समाचार प्रकाशित होते रहते हैं कि फलां स्कूल में राष्ट्रगान एक सम्प्रदाय विशेष के बच्चे नहीं गाएंगे क्योंकि यह उनके मजहब के खिलाफ है भारत माता की जय नहीं बोलेंगे ,वन्दे मातरम गीत नहीं गाएंगे आदि ! गाँधी जी ने अपना संपूर्ण जीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए समर्पित कर दिया था ! किंतुबे इसमें सफल नहीं हो सके और इसी कारण उनकी हत्या भी कर दी गयी देश का विभाजन भी हो गया ! फिर से नए बिभाजन की बातें सुनने में आती है 1 देश टूट जायेगा ये बातें भी नेता लोग करते सुनायी देते है ! एक लेख गांधीजी ने ८-७-१९२० में यंग इंडिया में तीन राष्ट्रीय नारों के शीर्षक से प्रकाशित किया था ! जिस समस्या के समाधान के लिए यह लेख लिखा गया था वह आज और अधिक विकराल रूप में मौजूद है ----- उन्होंने लिखा था ---- मद्रास (चेन्नई )दौरे के सिलसिले में बेजवाड़ा में मेने राष्ट्रीय नारों के समबनध में कुछ बातें कही थी और लोगों को सुझाव दिया था कि व्यक्ति विशेष की अपेक्छा आदर्शों के जय के नारे लगाना ज्यादा अच्छा होगा ! मेने श्रोताओं से महात्मा गांधीकी जय और मुहम्मद अली शौकत अली की जय के बदले हिन्दू मुसलमानों की जय का नारा लगाने का सुझाव भी दिया था ! मेरे बाद शौकत अली भाई भी बोले थे ! उन्होंने तो इस सम्बन्ध में नियम ही निश्चित कर दिया है ! उन्होंने कहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता के बाबजूद मैं देखता हूँ कि अगर हिन्दू वन्दे मातरम् का नारा लगाते हैं तो मुसलमान अल्लाह हू अकबर की आवाज बुलंद करते हैं ! भाई अली ने ठीक ही कहा है कि यह चीज कानों को बहुत कड़वी लगती है और लगता है कि लोग अब भी एकमन से काम नहीं कर रहे हैं ! इसीलिए केवल तीन ही नारे स्वीकार किये जाने चाहिए !एक तो अल्लाहो अकबर का नारा हिन्दू और मुसलमान दोनों लगाएं इस से अपना यह विश्वास प्रगट करें कि ईश्वर ही महान हैंऔर कोई नहीं ! और दूसरा नारा होना चाहिए वन्दे मातरम् या भारत माता की जय और तीसरा नारा होना चाहिए हिन्दू मुस्लिम की जय ,जिसके बिना भारत को जय नहीं मिल सकती है ! बेसक में चाहता हूँ अखबारों और सामाजिक कार्य करने वाले लोग मौलाना साहब का सुझाव अपनाएँ और जनता को केवल ये तीन नारों को लगाने की प्रेरणा दें इन तीनों में बहुत अर्थ भरा हुआ है ! पहला नारा एक प्रार्थना है ! वन्दे मातरम् के साथ जिन अद्भुत बातों की स्मृति जुडी हुई है वह तो है ही इसके अलावा यह एक राष्ट्रीय आकांछा है अर्थात भारत पूरी उचाई तक उठे की अभिव्यक्ति है ! में भारत माता की अपेक्छा वन्दे मातरम् को ज्यादा पसंद करूँगा ! इन नारों के सम्बन्ध में कोई विवाद नहीं होना चाहिए ! गांधीजी की हत्या हो गयी !मौलाना शौकत अली और मुहमद अली भी अल्लाह को प्यारे होगये !विवाद अभी भी मौजद है !भारत भारत ना रहने पाए !इसकी चेस्टा पूरी ताकत से आज भी चल रही है !
Monday, 8 August 2016
करो या मरो--------------- जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने अंग्रेजो भारत छोडो का प्रस्ताव पारित कर दिया और इस सबसे महत्त्व पूर्ण आंदोलन का नेतृत्त्व गाँधी जी को सौंप दिया !इस अवसर पर गांधीजी ने अपने भाषण में कहा ---आपने अभी जो प्रस्ताव पास किया है उसके लिए में आपको बधाई देता हूँ ! में आपसे जो कुछ कह रहा हूँ वह स्वतंत्रता का सार है !गुलाम की बेड़ियाँ उसी समय टूट जाती है जब वह अपने आप को स्वतंत्र समझने लगता है !एक छोटा सा मन्त्र में आपको देता हूँ !आप इसे अपने ह्रदय पटल पर अंकित कर लीजिये ---- वह मन्त्र है करो या मरो ! और आप इस मन्त्र का हर स्वांस के साथ जप कीजिये !या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे !हम अपनी आँखों से अपने देश को सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे ! प्रत्येक सच्चा कांग्रेसी चाहे वह स्त्री हो या पुरुष इस दृढ निश्चय के साथ संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बन्धन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिन्दा नहीं रहेगा ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए ! अगर सरकार मुझ को गिरफ्तार नहीं करेगी तो में आपको जेल भरने का कष्ट नहीं दूंगा ! ईश्वर को और अपने अंतःकरण को साक्छी रखकर यह प्रण कीजिये कि जब तक आजादी नहीं मिलेगी तब तक हम दम नहीं लेंगे ओरजादी के लिए अपनी जान देने के लिए भी हम तैयार रहेंगे ! जो जान देगा उसे जीवन मिलेगा और जो जान बचाएगा वह जीवन से वंचित हो जाएगा ! स्वन्त्रता कभी कायर और डरपोक को नहीं मिलाती है !
प्रस्ताव पारित होजाने का मतलब आंदोलन आरम्भ होना नहीं था ! गांधीजी ने कहा वास्तविक संघर्ष तो इस छन शुरू नहीं हो रहा है !आपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिये हैं अब में वाइस राय से भेंट करने जॉऊँगा और उनसे कांग्रेस की मांग स्वीकार करने के लिए कहूंगा ! इस काम में दो तीन सप्ताह लग सकते हैं ! किन्तु अंग्रेजों का इरादा गांधीजी को जरा भी समय देने का नहीं था ! ९ अगस्त को प्रातः पांच बजे उन्हें तथा बम्बई में उपस्थित सभी शीर्षास्थ कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लियागया और गिरफ्तारकरके उनकी नजर बंदीके लिए पहले से ही तय स्थानों को ले जाया गया !उसी दिन देश भर में इसी तरह की गिरफ्तारियां की गयीं ! और तब आरम्भ हुआ आतंक का वह दौर जो देश के अबतक के इतिहास में अभूत पूर्व था ! इसके उत्तर में देश भर के विद्यार्थी ,कारखाना मजदूर ,किसान और बुद्धिजीबी उठ खड़े हुए ! यत्र तत्र कुछ हिंसक घटनाएं भी हुई संपत्ति का विनाश भीहुआ ! सरकारी प्रचार तंत्र ने इस सबका दोष गांधीजी के माथेमढ़ा ! इस दोषा रोपण का प्रतिबाद करते हुए गांधीजी ने कहा कि यदि सरकार ने महामहिम वाइस राय के साथ मेरे संकल्प पत्र और उसके परिणाम की प्रतीक्छा की होती तो देश पर कोई मुसीबत ना आयी होती ----- लगता है बड़ेपैमाने पर कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी से लोग गुस्से से इतने पागल हो गए हैं कि उन्होंने आत्मसंयम खो दिया है ! मेरा ख्याल है कि जो तबाही हुई है उसके लिए सरकार जिम्मेदार है न की कांग्रेस ! सरकार ने इस पत्र को जान बुझ कर दबा दिया था !इसी जेल की अविधि में आगा खां पैलेस में गांधीजी के साथ नजर बंद उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी और सचिव महादेव देसाई की म्रत्यु भी हो गयी
प्रस्ताव पारित होजाने का मतलब आंदोलन आरम्भ होना नहीं था ! गांधीजी ने कहा वास्तविक संघर्ष तो इस छन शुरू नहीं हो रहा है !आपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिये हैं अब में वाइस राय से भेंट करने जॉऊँगा और उनसे कांग्रेस की मांग स्वीकार करने के लिए कहूंगा ! इस काम में दो तीन सप्ताह लग सकते हैं ! किन्तु अंग्रेजों का इरादा गांधीजी को जरा भी समय देने का नहीं था ! ९ अगस्त को प्रातः पांच बजे उन्हें तथा बम्बई में उपस्थित सभी शीर्षास्थ कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लियागया और गिरफ्तारकरके उनकी नजर बंदीके लिए पहले से ही तय स्थानों को ले जाया गया !उसी दिन देश भर में इसी तरह की गिरफ्तारियां की गयीं ! और तब आरम्भ हुआ आतंक का वह दौर जो देश के अबतक के इतिहास में अभूत पूर्व था ! इसके उत्तर में देश भर के विद्यार्थी ,कारखाना मजदूर ,किसान और बुद्धिजीबी उठ खड़े हुए ! यत्र तत्र कुछ हिंसक घटनाएं भी हुई संपत्ति का विनाश भीहुआ ! सरकारी प्रचार तंत्र ने इस सबका दोष गांधीजी के माथेमढ़ा ! इस दोषा रोपण का प्रतिबाद करते हुए गांधीजी ने कहा कि यदि सरकार ने महामहिम वाइस राय के साथ मेरे संकल्प पत्र और उसके परिणाम की प्रतीक्छा की होती तो देश पर कोई मुसीबत ना आयी होती ----- लगता है बड़ेपैमाने पर कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी से लोग गुस्से से इतने पागल हो गए हैं कि उन्होंने आत्मसंयम खो दिया है ! मेरा ख्याल है कि जो तबाही हुई है उसके लिए सरकार जिम्मेदार है न की कांग्रेस ! सरकार ने इस पत्र को जान बुझ कर दबा दिया था !इसी जेल की अविधि में आगा खां पैलेस में गांधीजी के साथ नजर बंद उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी और सचिव महादेव देसाई की म्रत्यु भी हो गयी
Sunday, 7 August 2016
जितनी छति सनातन धर्म की गुलाम भारत में नहीं हुई !उस से ज्यादा छति आज हो रही है !देश में गुलाम भारत में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन हुआ इसके बाद भी हिन्दू जीवन के मूल तत्त्व कृषि ,स्वाबलंबन अदि और हिंदुओं के सत्य सद्भाव आधारित स्वभाव का नाश नहीं हो पाया ! किन्तु आज जिस तरह से सनातन धैम के आतंरिक स्वरुप को नष्ट किया जा रहा है !यह सनातन धर्म की मूल संस्कृति और आत्मा का ही नाश कर देगा !लोकतंत्र की शासन व्यबस्था का आधार शासन सत्ता में बने रहना नहीं है !बल्कि जनता को अधिक जागरूक ,जिम्मेदार और सशक्त तथा स्वाबलंबी बनाने का है !सत्ता पुरुष्कार और सम्मान के लिए नहीं .बल्कि जन कल्याण के लिए होती है !लोकतंत्र का यह ध्येय तो सत्ता लोलुप अंधे नेताओं ने लुप्त ही कर दिया है ! सत्ता प्राप्ति के और उसमें बने रहने के जितने भी जाति वादी ,अगड़े पिछड़े ,दलित ,आदिवासी ,महिला शसक्तीकरण ,समाजवाद ,समरसता अदि के जितने भी साधन हो सकते हैं !उनसबका उपयोग राजनेता उपयोग करके अपनी आर्थिक और सामाजिक सत्ता और समृद्धि की बृद्धि के लिए निर्लज्जता पूर्वक कर रहे हैं !प्राचीन सामंतवाद ,पूंजी बाद ,भेद भाव अदि के स्थान पर आज राजनैतिक सत्ता में प्रवेश करने वाले चाय बेचने वाले दलित ,पिछड़े ,आदिवासी ,अगड़े और बहुत से पूर्व राजे महाराजे ये सब मिलकर एक नया सामंत बाद बंश परंपरा बाद और पूंजी बाद निर्मित कर रहे हैं !जिस के आगे प्राचीन राजाओं ,महाराजाओं की समृद्धि ,भोग .विलास और ऐश्वर्य भी फीका पड़ गया हैं !देश में चारों तरफ कागजी करेंसी के संग्रह में सभी लोग संलग्न दिखाई देते हैं !इस सामजिक कोढ़ में अब एक नया मुद्दा गाय की रक्छा का भी जुड़ गया है !गाय की रक्छा का प्रयत्न तो गांधीजी ने भी किया था !किन्तु जिस तरह से गाय की रक्छा को राजनैतिक लाभ का मुद्दा बनाकर ये तथा कथित गो भक्त देश में असुरक्च्छा का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं !उस से गाय के प्राणों की रक्छा कभी नहीं हो पायेगी !गाय के क़त्ल और माश खाने वालों से कहीं बहुत अधिक जिम्मेदार बे सरकारें हैं !जिन्होंने गोचर की भूमि को पटटों पर दे दिया है !और शहरों का विकास और नए नए शहरों का निर्माण करके एक लाख गांव का नाम निशान ही मिटा दिया है !और कृषि की भूमि पर भवनों और अट्टालिकाओं का निर्माण कर के किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया है ! ये तथाकथित गो भक्त दलितों की मार पीट करते हैं !किन्तु कभी ये आँखों के अंधे यह नहीं देखते हैं !क़ि आबारा गायों के झुण्ड के झुण्ड इस गांव से उस गांव में कृषि फसल को नुक्सान पहुंचा रहे है !और शहरों में आवागमन में दिक्कत पैदा कर दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं !देश में इन्ही धर्मध्वजी ,धर्मनाशक सत्ता धारियों के संरक्छण में हिन्दू व्योपारी गाय के मास का नित्यात कर रहे हैं ! अगर गो भक्तों को गाय के प्राणों की रक्छा करना ही है ! तो उनको गाय के प्राणों भक्छक इन असली कसाईयों के विरुद्ध आंदोलन करना चाहिए ! सर की बीमारी का इलाज हाथ काटने से नहीं हो सकता है !पहले से ही गरीबी और भूख से त्रस्त अन्याय पीड़ित भारत को धर्म के नाम से अधर्म के मार्ग पर मत चलाइये !
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