छमावणी पर्व और जैन समाज --------- जैन धर्म प्रयत्न प्रधान धर्म हैं !अपने आप अपना उद्धार करें ,अपना पतन ना करें , क्योंकि आप ही अपने मित्र है ! और आप ही अपने शत्रु हैं !जिसने अपने आपसे अपने आपको जीत लिया है ,उसके लिए आप ही अपना बन्धुऔर जिसने अपने आपको नहीं जीता हैऐसे अनात्मा का आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है ! जिसने अपने पर विजय करली है उस अनुकूलता ,प्रतिकूलता सुख दुःख तथा मान अपमान में निर्विकार मनुष्य को परमात्मा नित्य प्राप्त है ! यह जैन धर्म का संक्छिप्त सार है !छमा वाणी पर्व भी आत्मविजय का एक सोपान है !किन्तु इस पर्व का परिचय जैन समाज इस रूप में प्रस्तुत नहीं करता है ! कितने जैन अपने जीवन में इस छमाधर्म के स्वरुप और स्वभाव को धारण ओर समझ कर शरीर की स्थूल क्रियायों को आत्मार्पित करने का साधन बनाते हैं कहना मुश्किल हैं ! किन्तु जिस रूप में बे इस पर्व का आयोजन करते हैं !उसमें यह दिखाई नहीं देता है !मंच ऐसे वक्तागणों से सुशोभित होता है !जिनमे छमा धर्म के मर्म और स्वरुप तथा सिद्धान्त कोव्यक्तकरने का ना तो ज्ञान होता है और न समझ ही होती है !अधिकांश वक्तागण इस दृष्टि से आमंत्रित किये जाते हैं !जिनमे आयोजक लोग अपने भौतिक स्वार्थों की सिद्धि देखते हैं !इस प्रकार ये आत्मा की ओर उन्मुख करने वाला साधना पर्व गपोड़ियों के द्वारा की गयी अभिव्यक्ति का साधन बन जाता है !और आत्मज्ञान तो लुप्त ही रहता है !जैन समाज व्योपारी समाज है !धनसंग्रह में कुशल और प्रवीण है !इस धर्म में नर से नारायण बनने का ज्ञान भी पर्याप्त है !इसीलिए जैन समाज के संचालकों और मंचालकों को छमा वाणी ऐसे आत्मोद्धारक पर्व के अवसरों पर व्यबसाय बृत्ति पर संयम रख कर आत्मोत्थान के सन्देश को आत्मज्ञानी समाज सेवियों से अभिव्यक्ति देने का पाबन प्रयत्न कराना चाहिए !
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