अजित डोभाल के प्रति जिस असभ्य भाषा का प्रयोग इस पाकिस्तानी एंकर द्वारा किया गया है !ऐसे शब्दों का प्रयोग तो हंसी मजाक में भी नहीं किया जाना चाहिए था !असल बात यह है की पहले इस एंकर ने भारतीय सुरक्छा सलाहकार के विरुद्ध अत्यंत असभ्य भाषा का प्रयोग जान बूझ कर भारत को अपमानित करने के लिए किया फिर यह झूठ बोला की उसने इन शब्दों का प्रयोग गपशप कार्यक्रम में हलके अंदाज में किया था !मसूद का संपूर्ण साक्छात कार भारत के विरुद्ध है !उसमे पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह पर भी प्रहार किया गया है! !पाकिस्तान षड़यंत्र के तहत खालिस्तान आदि समस्यायों को उभाड़ता रहता है !और पाकिस्तान के कट्टरपंथियों द्वारा प्रोत्साहित और प्रायोजित आत्तंकवाद को नकारने की चेस्टा करता है !भारत पाकिस्तान के बीच मैत्री स्थापित हो इसका गंभीर प्रयत्न करते हुए ना तो पाकिस्तानी सरकार दिखाई देती है ! और ना वहां के कट्टरपंथी मुसलमान ये चाहते हैं, कि दोनों देशों के बीच सौहाद्र स्थापित हो !पाकिस्तानी कट्टरपंथी और सेना एककाल्पनिक विश्वास पाले हुए है कि एक दिन भारत में आतंरिक मतभेदों के कारण और भारत सरकार की पाकिस्तान के प्रति मैत्री भाव के कारण फिर से मुसलिम हुकूमत कायम हो जायेगी !और उनको इस विचार पर दृढ रहकर भारत के विरुद्ध अत्तंकवादी गतिविधिया जारी रखने की अनुमति भारत की सरकारें देती रही हैं ! और आज भी दे रही हैं ! पाकिस्तान समर्थक बहुत से लोग पृथ्वी राज चौहान और महाराणाप्रताप के इतिहास का विस्मरण कर पाकिस्तान के साथ मित्रता स्थापित करने के प्रयत्न में पाकिस्तान को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की शक्ति प्रदान कर रहे हैं !पाकिस्तान विभाजन के बाद कई हमले भारत पर कर चूका है ! और पराजित भी हुआ है !किन्तु भारत ने हमेशा उसको माफ़ी प्रदान कर उसको शक्ति शाली होने में अप्रत्यक्छ रूप से प्रोत्साहित किया है ! !पाकिस्तान लगातार भारत के विरुद्ध घृणा और दुश्मनी का विस्तार करता जा रहा है !पाकिस्तान में हिन्दुओं केविरुद्ध झूठे मनगढंत पाठ प्राइमरी स्कूलों से लेकर विश्व विद्यालयों तक पढ़ाये जा रहे हैं ! हिन्दुस्तान में होने वाली प्रत्येक घटना को पाकिस्तान साम्प्रदायिक रंग देकर मुस्लिम विरोधी बताकर जोर शोर से आवाज उठाता है !भारत के आत्तंकी दाऊद आदि का शरण दाता पाकिस्तान है !कश्मीर में अत्तंकवाद और भारत विरोधी मुहिम का संचालन भी पाकिस्तान से हो रहा है !याकूब की मौत की सजा भी मुसलमानो के विरद्ध अत्याचार के रूप में प्रसारित की जा रही है !भारतीय समाचार पत्र और चैनल्स भी उसको पब्लिसिटी आवशकता से अधिक दे रहे हैं! !देश में भी याकूव के बारे में पाकिस्तानी आवाज को बुलंद करने वाले बहुत से लोग हैं !उसके अंतिम संस्कार में जो भीड़ उमड़ी इस से यह बात साफ़ जाहिर होती है !कि जिस मुम्बई ब्लास्ट का वह अपराधी था ! और जिसमे लगभग ३०० लोगों की मौत हुई थी और ७०० लोग घायल हुए थे !उनकी दर्दनाक मौत का गम इन याकूब के जनाजे में शामिल होने वालों को नहीं है !याकूब जिसको अत्तंकवादी हमले में सुप्रीम कोर्ट से मृत्युदंड मिला ! और जिसकी दया याचिकाएं अनेकों बार राज्यपाल, राष्ट्रपति के द्वारा निरस्त की गयी ! उसको बचाने के लिए रात्रि में ३.५० सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई इसके बाद भी जिसकी फांसी की सजा माफ़ नहीं की जा सकी ! उस याकूब की मौत का गम इन जनाजे में शामिल होने वालों को अधिक था !भारत की सरकारों को, बुद्धिजीवियों को भारत के भविष्य को देख कर पाकिस्तान के दुश्मनी और द्वेषपूर्ण आचरण को ध्यान में रख कर नीतियों का निर्माण करना चाहिए ! और किसी भी प्रकार से इन भारत विरोधी शक्तियों के पक्छ में खड़ा नहीं होना चाहिए !यह हम सभी देशबासियों का सामूहिक कर्तव्य है !कि भारतीय संविधान का पालन अवश्य करें ! किन्तु न्याय के नाम पर पाकिस्तान समर्थक अत्तंकवादियों के समर्थन में खड़े होकर देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले और राष्ट्रपति के निर्णय पर भी प्रश्न चिन्ह ना लगा दें ?!
Friday, 31 July 2015
ज्ञान चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक उसकी प्राप्ति बिना गुरु के मार्गदर्शन के नहीं होती है !भौतिक शिक्छण प्रदान करने वाले गुरु को तो कुछ आवश्यक शिक्छण कार्य के लिए आहर्ताएँ प्राप्त करनी पड़ती हैं !किन्तु धार्मिक गुरुओं को तो आस्था श्रद्धा और परंपरा से ही स्वीकार किया जाता है !श्रद्धा और आस्था किसी तर्क से सिद्ध नहीं की जा सकती है !उसको तो अंधविश्वास की हद तक सिर्फ विश्वाससे ही प्राप्त करना पड़ता है !इस आस्था विश्वास और श्रद्धा का लाभ आजकल सभी छेत्रो में और सभी प्रकार के लोगों में दाम्भिक लोग उठा रहे हैं ! ऐसे कपटी और कुटिल गुरुओं से बचपाना बहुत कठिन है !साधु, महात्मा, ज्ञानी, भक्त ,आदि सभी वेशों में बदमाश लोग घुस गए हैं ! और अपने बुरे आचरणों से इन पवित्र रूपों और नामों को कलंकित कररहे हैं ! इसीलिए बहुत सोच समझ कर परिणाम पर ध्यान देकर ही किसी को गुरु बनाना चाहिए ! गुरु बनाने के पहले शिष्य बनने की योग्यता पैदा करनीचाहिए ! भगवान श्रीकृष्ण ने गीता ४ (३४)में कहा है कि आत्मज्ञान को तत्त्व ग्यानी महापुरुषों के पास जाकर उनके समक्छ बाह्य रूप से आदर प्रदान करने के प्रतीक शाष्टांग दंडबात प्रणाम करना चाहिए ! और अपना संपूर्ण व्यक्तित्त्व मनसा ,वाचा, कर्मणा गुरु चरणो में अर्पित कर देना चाहिए ! और फिर उनकी आज्ञा को शिरोधार्य कर सरलता पूर्वक अज्ञानी की तरह निष्कपट और निराभिमानी होकर उनसे आत्मज्ञान की प्राप्ति की लिए प्रश्न करना चाहिए ! फिर बे तत्त्व दर्शी गुरु शिष्य की समस्त आध्यात्मिक शंकाओ का निबारण कर उसको आत्मज्ञान प्रदान करेंगे !आत्मा के ज्ञान में ही संसार का भौतिक ज्ञान भी समाहित है !इस प्रकार कोई तत्त्व ग्यानी गुरु ही शिष्य को अज्ञान अन्धकार से निकालकर सत पथ की और अग्रेसित कर सकता है !गुरु को सिर्फ शास्त्रों का शब्द ग्यानी ही नहीं होना चाहिए ! बल्कि उसे शाश्त्रों में निहित आत्मज्ञान का अनुभवी भी होना चाहिए !जो गुरु शाश्त्र ज्ञानी के साथ तत्त्व ग्यानी भी है !वही सच्चा और वास्तविक गुरु है !यदि ऐसा गुरु प्राप्त ना हो सके तो बो गीता रामायण उपनिषद आदि को ही अपना गुरु बनाकर अपने जीवन में भुक्ति ,मुक्ति और भोग की प्राप्तिकर अपना जीवन सफल बना सकता है !
संसार के सभी महान गुरु आत्मशक्ति से मुक्ति ,भगवद भक्ति ,या भगवद धाम की प्राप्ति कराने का उपदेश अनादि कल से करते रहे है !ओशो एक ऐसे गुरु थे जिन्होंने आत्मशक्ति का उपयोग भौतिक शक्ति प्राप्ति के लिए किया !परिणाम स्वरुप उनके पास भौतिक भोग सामग्री प्रचुर मात्रा में उपस्थित हो गयी !तथा इसके साथ ही भोगियों की लम्बी शिष्य श्रंखला भी खड़ी हो गयी !उन्होंने अध्यात्म साधना में वैराग्य के स्थान पर भोग को स्थान और महत्ता प्रदान की ! सम्भोग से समाधि की नयी चर्चा को जन्म दिया !उनका यह विचार उनके शिष्योँ को बहुत पसंद आया था !संन्यास का भी अजीबो गरीब स्वरुप उन्होंने प्रस्तुत किया! उनके सन्यासी और सन्यासिने मुक्त माव भाव से काम सम्बन्ध एक दूसरे के साथ स्थापित करते थे !उन्होंने माँ की भी पूर्व प्रचिलित आस्था और मान्यता पर कुठारा घात किया था !उनके शिष्य और सन्यासी सन्यासिनो को माँ कहते है ! औरउनके साथ कामजनित सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं ! अभी भी ओशो के विचार को मानने वाली शिष्य मण्डली उनके नाम से आश्रम चलाती हैं! !और बहुत से लोग उनके विचारों के प्रसंशक भीहैं ! और उनको बहुत ध्यान से रूचि पूर्वक पढ़ते भी हैं !ओशो का जीवन दर्शन उनके विदेशी भक्तों को बहुत पसंद आता है !क्योँकि बे अमर्यादित काम जनित संबंधों को कायम रखते हुए ही ध्यान साधना से आत्मशांति और अत्मिकशक्ति चाहते हैं !भारत में भी कुछ ओशो की आत्मसाधना के प्रशंसक है !औरउनके ध्यान आदिके साधना शिवरों का आयोजन करते रहते हैं !ओशो को आत्मसाधना से प्राप्त आत्मशक्ति का भौतिक सुख भोग प्राप्त करने के कारण लम्बे जीवन की प्राप्ति नहीं हुई !और ६० साल की आयु प्राप्तहोने केपहले ही ओशोकी मृत्यु हो गयी !और इस प्रकार इस अमीरों के गुरु और ९० रोल्स रॉयस कारें रखने वाले आत्मसाधना से भौतिक भोग सामग्री प्राप्त करने और कराने वाले ओशो का नवीन अध्यात्म का प्रचार प्रसार और उपदेश करने वाले दर्शन की गति भी लगभग समाप्त होगयी !
Thursday, 30 July 2015
प्रत्येक प्रकरण के तथ्य अलग अलग होते हैं !आजकल एक विचित्र अवधारणा न्यायायों के बारे में बन रहीहै ! कि न्यायालय का काम अपराध नियंत्रण का है !और जब जघन्य अपराधों में लिप्त अपराधी तुरत जमानत पा जाते हैं !या रिहा हो जाते हैं !तो अपराधों में बृद्धि होने लगती है !और अपराधी और अधिक निरंकुश हो जाते हैं !!इस प्रचार का असर न्यायाधीशों पर भी दिखाई देता है !परिणाम स्वरुप मामूली और जघन्य आरोपित व्यक्ति भी न्यायालयों से जमानत नहीं पा पाते हैं !इसिलए आज देश केजेलों में सजा प्राप्त अपराधियों से ज्यादा अंडर ट्रायल प्रिजनर्स बंद है ! न्यायलय का काम अभियोजन द्वारा अपराधिक प्रकरण पर लिखित और मौखिक सक्छ्य के आधार पर विधि विधान के अनुसार निर्णय देना है !अपराध नियंत्रण का काम पुलिस और प्रसाशन का हैं !न्यालय के सामने अभियोजन और अपराधी समान होते हैं !इसीलिए यदि अभियोजन ने अपना मामला विधि विधान के अंतर्गत प्रस्तुत नहीं किया है ! और आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्छ्या प्रस्तुत नहीं किया है !तो न्यायालय के सामने अभियुक्त को रिहा करने के अलावा कोई अन्य उपाय शेष नहीं रहता है ! यहां मगनलाल की मौत की सजा माफ़ करने का जो प्रकरण है ! उसमे जरूर कोई ऐसी कानूनी खामी रही होगी !जिसके कारण मुख्य न्यायाधीश को उसकी फांसी की सजा उम्र कैद में बदलना पड़ी !वैसे जो तथ्य यहाँ बताये गए हैं ! उसमे उस पर आरोप था ! शराब के नशे में अपनी ही पुत्रियों की हत्या करने का और बाद में उसने खुद अपनी आत्महत्या करने की कोशिश भी की !इसीलिए उसको वैसे भी फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए थी ! क्योँकि उसकाअपराध पूर्व नियोजित नहीं था !क्रोध के आवेश में उसने और शराब के नशे में यह जघन्य कृत्य कर दिया ! और पश्चाताप की अग्नि में उसने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला भी समाप्त करने की कोशिश की थी !अपनी पुत्रियों की हत्या कर वह खुद सारे जीवन पश्चाताप की आग में झुलसता रहा होगा !
Wednesday, 29 July 2015
याक़ूब को फांसी न हो इसकी जोरदार पैरवी की गयी ! सुप्रीम कोर्ट में भी रात्रि में सुनवाई हुई !तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा याक़ूब की याचिका खरिज हो जाने के बाद भी ! राष्ट्रपति द्वारा उसकी याचिका खारिज करदिये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट को रात्रि में याकूब के वकीलों की दलील सुननी पड़ी !यद्द्पि यह सब कानून के अंतर्गत हुआ !किन्तु कानून के अंतर्गत नागरिक अधिकारों का यह दर्शन अन्य मुकदद्मों में देखने को नहीं मिलता है !देश की जेलों में भूसे की तरह जिनपर मुकदद्मे चल रहे हैं बे अपराधों में आरोपित लोग जमानत न मिलने के कारण बंद हैं !जमानत के मामले पूरे मुकदद्मे की सुनवाई से भी अधिक खर्चीले हो गए हैं !सामान्य अपराधी तो जमानत का खर्च बर्दास्त ही नहीं कर सकता है !जमानत भी अधिकांश में उन्ही लोगों को प्राप्त होती है जो वकीलों की भारी फीस और न्यायलय पुलिस आदि का खर्चा उठाने में सक्छम होते हैं !जेल में प्रभावशाली लोग बंद होते हैं उनको सभी अच्छी से अच्छी सुविधाएँ प्रदान कराईजाती हैं !जब राजनेता बंद होते हैं तब तो जेल अधिकारीभी उनकी सेवा में लगे रहते हैं !और जो सामान्य कैदी होते हैं उनको तो सरकार द्वारा कानूनी तौर पर दिया गया भोजन और दबाएं भी नहीं दी जाती है ! उनका राशन पानी और दाबाएँ जेल के अधिकारी कर्मचारी और डॉक्टर खा जाते हैं !ये सारी बातें सरकार और न्यायाधीशों के संज्ञान में भी हैं !किन्तु इनका समाधान अभी तक नहीं हो पाया है !जेलों में जिला जज जिलाधीश आदि के निरीखछन भी होते हैं !कभी कभी छापे भी लगाए जाते हैं !उच्च न्यायल्लय के निर्देश भी होते हैं !किन्तु जेल व्यबस्था में फिर भी सुधार नहीं हो पाता है !याकूब को फांसी न हो इसके लिए देश के कुछ स्वनाम धन्य बुद्धिजीवियों ने अपील भी की थी ! जिसमे फिल्म अभिनेता राजनेता लेखक समाज सेवी ,प्रख्यात अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश भी शामिल थे !सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश भी प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे !और प्रश्नचिन्ह लगाने वालों में विख्यात अधिवक्ता जेठमलानी आदि भी थे जिन्होंने सारे जीवन तस्करों हत्यारों और इसी प्रकार के सबसे खतरनाक अपराधियों की पैरवी कर कानून के चुंगल से कानून के माध्यम से ही छुड़ाया था ! इनका सारा कानूनी ज्ञान सिर्फ उन्ही खतरनाक अपराधियों की मदद करता है जो इनको मोटी फीस देता है !इन लोगों का ध्यान कभी सामान्य कैदियों की समस्यायों के निराकरण की और नहीं गया !जो उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश हैं कि बे यह दाबा करसकते हैं कि उनके दिए गए सभी निर्णय सही थे ? और उन निर्णयों में दोषी व्यक्ति छोड़े ना गए हों!? और निर्दोष व्यक्ति दण्डित ना हुए हों ? क्या इनको भी यह बताने की आवश्यकता है !की न्यायाधीशों को निर्णय पत्रावली पर उपलब्ध साक्छ्य के आधार पर देना होता है !और याकूब के फांसी के मामले में भी निर्णय गबाहान के व्यानो और उपलब्ध साक्छ्या के आधार पर ही दिया गया था !उसकी सभी प्रकार की याचिकाएं राज्यपाल से लेकर उच्चतम न्यायलय के जजों द्वारा तथा राष्ट्रपति के द्वारा भी अनेक बार ख़ारिज की जा चुकी थीं !फिर भी वकीलों की फौज रात्रि में भी सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश करती रही ! और देश के तथाकथित गण्यमान व्यक्ति भी उसकी पैरवी अंतिम समय तक करते रहे !इसके पीछे धन शक्ति थी ?या धन शक्ति के साथ कोई अन्य शक्ति भी काम कर रही थी ?
Tuesday, 28 July 2015
डॉ कलाम की मृत्यु पर राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्री और देश के अन्य सभी गैर राजनैतिक संगठन , शिक्छण संस्थाओं ,चैनलों , सोशल मीडिया आदि में उनको भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है !और उनके प्रेरणास्पद जीवन के आदर्शों को भी विस्तार से समाचार पत्रों और चैनल्स के माध्यमों से प्रस्तुत किया जा रहा है !मृत्यु के बाद डॉ कलाम अधिक जीवित हो गए हैं ! !किन्तु जब बे जिन्दा थे !तब उनकी चर्चा नहीं के बराबर थी !यहाँ तक की कुछ दिन पूर्व जब बे अस्पताल में भर्ती थे ! तब इस समाचार का प्रकाशन भी कहीं नहीं हुआ था !और ना ही कोई नेता उनके स्वास्थ्य की जानकारी करने गया था ! हमारे देश में बोलने वाले शव्दों की महत्ता को महत्त्व नहीं देते हैं !इसीलिए शब्दों की भव्यता के अनुरूप जीवन को खड़ा नहीं करते हैं !कोई भी महापुरुष संसार में प्रथम या अंतिम नहीं होता है !महापुरुषों के जीवन का निर्माण पूर्व बर्ती महापुरुषों द्वारा आचरित आदर्श जीवन के अनुसरण करने से होता है !शाब्दिक प्रसंसा से नहीं !इसीलिए बे जीबन की यात्रा के कठिन प्रसंगों मान, अपमान ,हानि .लाभ आदि की चिंता ना करते हुए अपने आदर्श जीवन को जीते हैं !उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने का एक मात्र तरीका यह है कि उनको शाब्दिक श्रद्धांजलि के साथ उनके श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को भी जीवन की सभी स्थतियों और परिस्थितियों में जिया जाय ! महापुरुष अपने जीबन में पूर्व महापुरुषों के जीवन को ही जिन्दा करते हैं !जिस तरह से धनवान व्यक्ति अपने धन की सुरक्छा के लिए धन को सार्वजानिक नहीं करता है ! उसको तिजोड़ी में छिपा के रखता है !उसी प्रकार श्रेष्ठ गुणवान पुरुष बनने की जीवन यात्रा पर चलने वाले पुरष अपने पूर्वबर्ती महापुरुषों के गुणों के बखान में समय व्यर्थ न कर उनको जीवन के साथ लेकर जीता है! !जिस प्रकार गर्भिणी स्त्री को मातृ सुख प्राप्त करने के लिए ९ माह गर्भ धारण कर पेट में पल रहे गर्भ की सुरक्षा करनी पड़ती है !तब उसे माँ बन ने का अवसर प्राप्त होता है !उसी प्रकार डॉ कलाम जैसे महापुरुषों को बास्तविक श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए व्यक्तियों को अपने ईमान, सदाचार, देशभक्ति और कर्त्तव्य निष्ठा की सुरक्षा करनी पड़ती है !और इस कहाबत को सिद्ध करना पड़ता है की महापुरुषों की मृत्यु नहीं होती है !इसलिए डॉ कलाम जब जीवित थे तो एक शरीर में थे ! अब उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों के शरीरों में कर्त्तव्य निष्ठा के रूप में दिखाई देना चाहिए
भारतीय लोकतंत्र के प्रारम्भिक बर्षों में प्रधान मंत्री गैर राजनैतिक व्यक्तियों को उनकी देशभक्ति ,कर्त्तव्य निष्ठा आदि को देखकर केंद्रीय मंत्री मंडल में शामिल होने की प्रार्थना करते थे !कुछ लोग राजनीति में आने से मना कर देते थे !और कुछ लोग प्रधान मंत्री के आग्रह को स्वीकार कर केंद्र में मंत्री बन जाते थे !गोपाल स्वरुप पाठक, .हिदायतुल्ला आदि ऐसे व्यक्ति थे !जो कानून के छेत्र से आये थे ! और देश के उप राष्ट्र पति बने !महान शिक्छाविद और दार्शनिक डॉ राधा कृष्णन भी राजनैतिक व्यक्ति नहीं थे !जो देश के राष्ट्रपति बनाये गए थे !केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी अब्दुल करीम छागला डॉ वीके आर बी राओ भी राजनेता नहीं थे ! होमी भाभा को भी मंत्री मंडल के लिए आमंत्रित किया गया था ! किन्तु उन्होंने मंत्री बनने से माना कर दिया था ! डॉ एपीजे अब्दुल कलाम भी राजनेता नहीं थे !किन्तु उनमे राजनीति के बे सभी गुण थे जिसकी कल्पना गांधी जी ने स्वतंत्र भारत में की थी !गांधीजी ने कहा था की वाइसराय भवन जो अब राष्ट्र पति भवन है जब देश आजाद हो जायेगा तो उसमे अस्पताल खोला जायेगा ! राष्ट्रपति, मंत्री, प्रधान मंत्री जनता के सेवक होंगे ! भले ही कलाम राष्ट्र पति भवन में रहे ! किन्तु उन्होंने भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की तरह राष्ट्रपति भवन का उपयोग अत्यंत सादगी से किया !उनका दिल दिमाग भारत की आमजनता के साथ जीवन पर्यन्त जुड़ा रहा !उनके कर्त्तव्य छेत्र का रूप स्वरुप कुछ भी रहा हो ! उनकी त्याग तपस्या ब्रतनिष्ठा और सादगी को उनके जीवन काल में तत्कालीन केंद्र सरकार ने पहचाना और विपक्छी कांग्रेस ने भी उनका समर्थन किया !और बे भारत केराष्ट्रपति पद पर आसीन हुए !अब बे हमारे बीच नहीं है !किन्तु उनका जिया गया प्रेरणास्पद जीवन हमारे सामने हैं !इसीलिए शाब्दिक श्रद्धांजलि के साथ उनके जीवन केआदर्षों को अपने स्वयं के लिए और समाज राष्ट्र और विश्व हित के लिए हम सबको धारण करना चाहिए !
Monday, 27 July 2015
आज प्रकृति संरक्छण दिवस है !यह दिवस बनबिभाग के अतिरिक्त कुछ भासण विशारद लोग भी मनाते हैं !किन्तु ये दोनों ही प्रकृति संरक्छण का काम ठीक से नहीं करते हैं !बनविभाग तो जंगल का विनाश अपने संरक्छण में कराता है !और ब्रक्छा रोपण के लिए जो सरकारी बजट आता है ! उसका भी नाममात्र का उपयोग ब्रक्छा रोपण के लिए किया जाता है !और जो ब्रक्छा रोपण किया भी जाता है ! उन पोधोँ की भी देख भाल नहीं की जाती है !अगर प्रतिवर्ष ब्रक्छा रोपित किये गए सरकारी आंकड़ों को देखा जाय ! तो अबतक सरकारी आंकड़ों के अनुसार अबतक इतने ब्रक्छ अब तक रोपित कर दिए गए हैं ! कि भारत में तिल भर भी भूमि बिना ब्रक्छों के नहीं बचती !जितने भी फलदार और सागौन शीशम आदि के ब्रक्छ थे उनका सर्व बिनाश बन विभाग के द्ववारा रिश्वत खोरी और राजनेताओं के हितार्थ किया गया है !जो भासण विशारद नेता हैं ! और जिनमे अधिकाँश चुने हुए प्रतिनिधि और मंत्री आदि भी है ! बे भी प्रकृति के विनाश में संलग्न है !प्रकृति का विनाश अनेक रूपों और स्वरूपों में इन तथाकथित बन रक्छको के द्वारा किया जा रहा है !पृथवी से खनिज पदार्थ और नदियों से बालू और नदियों में शीवर लाइन और कारखानो का गन्दा पानी छोड़ कर उनको प्रदूषित करने का काम भी ये अधिकारी और राजनेता ही कर रहे हैं ! और करवा रहे हैं ! !इन प्रकृति विध्वंसक लोगों के प्रभाव से मुक्त और प्रकृति संरक्छण के भाव से युक्त और प्रकृति संरक्छण जीव मात्र के असित्तत्त्व के लिए आवश्यक समझ कर कुछ समाज सेवी व्यक्ति निश्वार्थ भाव से प्रकृति संरक्छण में लगे हुए हैं !कुछ समाज सेवायिओं ने बृक्छ काटने के विरोध में चिपको आंदोलन चलाया ! और इसके लिए अपने जीवन को भी दाव पर लगा दिया !कुछ लोग ब्रक्छा रोपण के कार्य में लगे हुए हैं !कुछ व्यक्ति पृथ्वी के संरक्छण के लिए लगातार काम कर रहे हैं ! और कुछ लोग नदियों को पुनर जीवन देने तथा गंदगी मुक्त कार्यों में लग कर काम कर रहे हैं !जिन पर प्रकृति संरक्छण का वैधानिक दायित्त्व है ! बे अपने कर्त्तव्य का अगर निष्ठां पूर्वक निर्वहन करें ! और इन समाज सेवायिओं से तालमेल कर इनके कार्यों को बढ़ावा दें !तो प्रकृति संरक्छण का कार्य तेजी से और व्यबस्थित रूप से हो सकता है !यह शर्रीर भी एक ब्रक्छ के समान है !ज्ञान इसकी जड़ है ! बुद्धि इसका तना है ! अहंकार इसकी शाखाएं है ! इन्द्रियां इसके खोखले हैं ! और यह पृथ्वी आकाश जल अग्नि और वायु पांच तत्त्वों से निर्मित है ! शरीरों के अनगिनित भेद ही इसकी टहनियां हैं ! इसमें सदा ही कामनाओं और वासनाओं केसंकलप रूपी पत्ते उगते रहते हैं ! और कर्म रूपी फूल खिलते रहते हैं ! इस शरीर से पाप पुण्य रूपी कर्मों से इसको सुख दुःखादि इसमें सदा लगे रहने वाले फल हैं ! इसका बीज परमात्मा है ! यह शरीर ही समस्त प्राणियों का आधार है ! जो इसके तत्त्व को भली प्रकार जान कर ज्ञान रूपी उत्तम तलवार से इस में होने वाले स्वार्थों और वासनाजनित संकल्पों और कार्यों को काट डालता है ! वह प्रकृति का संरक्छण प्राणिमात्र के समस्त शरीरों के प्राणो के लिए निश्वार्थ भाव से करता है ! क्योँकि प्रकृति के संरक्छण के अधीन ही समस्त प्राणियों का जीवन है !प्राकृतिक संसाधनो का विनाश पृथ्वी से समस्त प्राणियों का असितत्त्व समाप्त कर देगा !इसलिए प्रकृति के विनाश का कार्य प्राणियों से समस्त प्राणियों केविनाश का कार्य है यह समझ कर प्रकृति विनाश का कार्य बंद कर देता है
Saturday, 25 July 2015
जब व्यक्ति की बुद्धि राग और द्वेष से युक्त हो जाती है !तब वह व्यक्ति मोहग्रस्त होकर सही और गलत का निर्णय ठीक से नहीं करपाता है !मोहग्रस्त मनुष्य जिस से द्वेष करता है, उस व्यक्ति में उसे अच्छे गुण नहीं दिखाई देते हैं !और जिस से राग करता है उसमे उसे दुर्गुण नहीं दिखाई देते हैं! !महाभारत में मोहग्रस्त पांडवों और कौरवों तथा अन्य सहयोगियों के कारण महाभारत का युद्ध हुआ जिसमे महाविनाश हुआ !इसी मोह निरसन का ज्ञान गीता में भगवान श्री कृष्णा ने दिया है !!महाभारत काल से भी ज्यादा मोहग्रस्त आज के भारत में तथाकथित बुद्धिजीवी और धार्मिक लोग मौजूद है !जो पहले तो महाभारत को ध्यान और ज्ञान पूर्वक पड़ते ही नहीं है !और अगर जिज्ञासा बस या आलतू फालतू समय बिताने के लिए पढ़ भी लें ! तो ग्रन्थ के सही तत्त्व को हृदयंगम ना कर मनमाने अर्थ निकालते हैं !कर्ण का प्रसंग महाभारत में दिव्य शक्तियों से युक्त है !उसका जन्म और कर्म भी दिव्य है !उसको सामान्य लौकिक दृष्टि से समझ कर उसको उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा !तो जो महाभारत का मुख्य उद्देश्य जीवन से मोह आसक्ति और राग द्वेष के निरसन का है ! वह समझ में नहीं आएगा है ! महाभारत कोई उपन्यास या मात्र ऐतहासिक घटनाओं का संग्रह मात्र नहीं है !इसमें भागवती और देवशक्तियों के द्ववारा मनुष्यों के मोह निरसन के लिए लौकिक शक्तियों के माध्यम से दुष्ट शक्तियों के विनाश और सत शक्तियों के सम्बर्धन, पोषण और संरक्छण के कथानक हैं !युधिस्ठर ने जो कुंती को श्राप दिया था ! कि कोई भी औरत किसी रहस्य को दीर्घ काल तक छुपा नहीं सकेगी !वह क्रोध में भरे हुए मोह ग्रस्त युधिस्ठर के द्वारा दिया गया श्राप था ! जिसमे न्याय और विवेक का अभाव था ! इसीलिए उस श्राप में सत्यनिष्ठा का अभाव था! !और जिस श्राप और बरदान में सत्यनिष्ठा का अभाव होता है ! वह ना श्राप होता है ! और ना बरदान होता है !वह मात्र राग द्वेष मोह और आसक्ति ग्रस्त मूढ़ व्यक्ति का प्रलाप होता है ! जब तक पांडवों को यह पता नहीं था की कर्ण उनका भाई है !तब तक पांडवो के लिए बो सबसे बड़ा शत्रु था !और पांडवों को कर्ण के सारे गुण दुर्गुण दिखाई देते थे !कर्ण ने एक बार युद्ध में युधिस्ठर को बहुत अधिक घायल कर दिया था !और मूर्छित अवस्था में उनका सारथि उनको सुरक्छित युद्ध भूमि से भगा ले गया था !युधिस्ठर कर्ण का तत्काल बध चाहते थे !जब एक बार अर्जुन घायल युधिस्ठर को देखने गए !युधिस्ठर ने भ्रम बस यह समझ लिया कि कर्ण अर्जुन के द्वारा मार डाला गया है !इसीलिए उन्होंने अर्जुन की प्रसंशा करनी शुरू कर दी !किन्तु अर्जुन ने जब यह कह दिया कि अभी कर्ण जिन्दा है !तो युधिस्ठर ने अर्जुन की और उनके गांडीव धनुष की तीब्र भर्त्सना कर दी ! परिणाम स्वरुप अर्जुन ने अपने भाई युधिस्ठर का बध करने के लिए तलबार निकाल ली !भगवान कृष्णा ने अर्जुन को युधिस्ठर का बध करने से रोका था !जिस कर्ण के जीवित रहने के कारण युधिस्ठर अर्जुन की निंदा करने लगा था ! उसी कर्ण की मृत्यु पर वह कुंती को श्राप दे रहा है !ये दोनों ही स्थितियां मोह राग और द्वेष तथा आसक्ति से उत्पन्न हुई हैं ! महाभारत के सभी पात्र मोह आसक्ति और मूढ़ता से ग्रस्त है !मात्र भगवान श्री कृष्णा मोह मूढ़ता और आसक्ति से पूरी तरह से मुक्त हैं !और बो मार्ग दर्शन कर पहले तो यह प्रयत्न करते हैं कि युद्ध ही ना हो !और जब वह अपने प्रयत्न में दैव बस सफल नहीं होते हैं !तब उनका प्रयत्न यह होता है ! कि युद्ध में सत सक्तियों की विजय हो ! और दुष्ट शक्तियां पराजित हों ! मोह ग्रस्त लोगों के युद्ध प्रसंग जसे जो महा विनाश महाभारत में कहा गया है ! उसी मोह आसक्ति मूढ़ता और रागद्वेष के निरसन के लिए गीता में सूत्र रूप से उपदेश दिया गया है !ताकि संसार में तटस्थ .न्याय युक्ति बुद्धि से निष्काम कर्म से कर्त्तव्य पालन की बुद्धि विकसित हो ताकि भविष्य में मानव समूहों में मोह के कारण दूसरा महाभारत न हो !
Friday, 24 July 2015
आजकल देश और समाज में कर्मशंकर लोगों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ रही है !कर्मशंकर वे व्यक्ति होते हैं जो अपने कर्त्तव्य का पालन तो करते नहीं हैं !किन्तु अन्य कर्त्तव्य छेत्रों में व्याप्त गलतियों की चर्चा और आलोचना मै मशगूल रहते हैं ! प्राचीन भारत में जिन शव्दों का प्रयोग जिस व्यक्ति के लिये किया जाता था वह कर्मछेत्र में वैसा ही होता था !शव्दों का अवमूल्यन नहीं हुआ था! !कर्मशंकरता भी समाज में नहीं थी !इसलिए शब्द यथार्थ बोध कराते थे !जैसे ५००० बर्ष पहले कुलपति उसको कहा जाता था जो विद्वान ब्राह्मण अकेला ही १००००हजार जिज्ञासु व्यक्तियों का अन्न दानादि के द्वारा भरण पोषण कर उनकी जिज्ञासा की शांति ज्ञान और शिक्छण प्रदान कर करता था !और स्वयं उच्चकोटि का ज्ञानी और संपूर्ण भौतिक कामनाओ से बिरक्त होता था !उसके द्वारा दिया गया ज्ञान उसके स्वाध्याय के साथ उसके जीवन के अनुभव से जुड़ा और निकला हुआ होता था !इसीलिए बो समाज में भी और विद्यार्थियों में भी आदर और प्रतिष्ठा का पात्र होता था !तथा समाज में सदाचारी ज्ञानियो का बाहुल्य था !किन्तु वर्तमान समय में कुलपति शव्द में कर्मशंकरता का प्रवेश होने से इस शव्द का अवमूल्यन हो गया है !कुलपति वर्तमान समय में अधिकांश में राज्य का राज्यपाल होता है !जो केंद्रीय सरकार द्वारा उसी दल का कोई अवकाश प्राप्त राजनेता होता है !या फिर सत्ता धारी दल की पसंद का कोई तिकड़मी अवकाश प्राप्त अधिकारी होता है !फिर इसी कुलपति के द्वारा विश्विद्यालयों में उप कुलपति नियुक्त किये जाते हैं !जो कभी कभी पूर्व मंत्री या अवकाश प्राप्त प्रशाशनिक अधिकारी या फिर ऐसे डिग्री धारी विश्व विद्यालयों के प्रोफेसर्स होते हैं ! जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध सत्ता धारी नेताओं से या राज्यपाल से होते हैं ! इसलिए इस कर्मशंकरता के कारण शिक्छा में सदाचार और ज्ञान लुप्त हो जाता है !नैतिकता कुलपति और उपकुलपति के शव्दों में होती है ! किन्तु आचरण में अवसरवादिता और धनकमाने की प्रवृत्ति होती है !परिणाम स्वरुप विश्विद्यालय ज्ञान के केंद्र ना होकर चांसलर और उपकुलपति प्रोफेस्सोर्स कर्मचारियों आदि के भोग के केंद्र बन गए हैं !जहाँ से राजनेताओं, फिल्म अभिनेताओं ओर अवसरवादियों को मानद उपाधियाँ दी जाती हैं ! फर्जी डिग्री भी प्राप्त हो जाती हैं !और ये सभी न तो विद्यार्थियों के आदर के पात्र होते हैं !न विद्यार्थियों को इनसे सदाचरण की प्राप्ति होती है !और इन विश्वविद्यालयों से फर्जी और असली डिग्री प्राप्त युवक जब कर्त्तव्य छेत्र में उत्तरदायित्त्व ग्रहण करते हैं !तब इनमे से अधिकाँश युवक जिस पद पर आसीन होते हैं !इनमे भी कर्त्तव्य निष्ठा नहीं होती है !नैतिकता और सदाचार सिर्फ इनकी जबान पर होता है !किन्तु इनके आचरण में बेईमानी घूसखोरी ,आलास, प्रमाद आदि का बाहुल्य होता है !समाज में इस कर्मशंकरता के कारण प्रमाणिकता का नाश हो गया है !इसको बदलने की आवश्यकता है ! बदलाव बेईमानी से लाभ प्राप्त करने वाले समाज बिगाडक लोग नहीं करेंगे !बदलाव की व्यार की शुरुआत तो वहां से शुरू होगी जो ज्ञानी के साथ साथ सदाचारी भी होंगे !जैसे प्राचीन भारत में थे !और जिनके पदनाम के साथ उनकी आचरण निष्ठा की भी अभिव्यक्ति होती थी !
महाभारत में शुलभा शाण्डिली सुवर्चला जैसी महान योगिनियों का भी वर्णन आया है !और पतिब्रत धर्म का पालन करने वाली महान पतिब्रताओं के वर्णन में उनकी दिव्य शक्तियों का वर्णन भी हुआ है !! कौशिक मुनि और पतिब्रता के सम्बाद में पतिब्रता ग्रहणी के पतिब्रत धर्म के पालन से दिव्य शक्तियां प्राप्त करने का आख्यान भी है !और पत्नी के प्रति अत्यंत आदरभाव से समर्पित पतियों के चरित्र भी चित्रित हुए है !वास्तव में उस घर को घर नहीं कहते हैं ! जिसमे घरवाली न हो घरवाली का नाम ही घर है ! घरवाली के बिना घर जंगल केसमान होता है ! पुत्र पौत्र पतोहू तथा अन्य भरण पोषण के योग्य कुटुम्बी जनो से भरा होने पर भी गृहस्थ का घर उसकी पत्नी के बिना सूना ही रहता है ! पुरुष के धर्म अर्थ काम के अवसरों पर उसकी पत्नी ही उसकी मुख्य सहायिका होती है ! परदेश जाने पर भी वही उसके लिए विश्वसनीय मित्र का काम करतीहै ! संसार में जो अशहाय हैं उसे भी लोकयात्रा में सहायता देने वाली उसकी पत्नी ही है ! संसार में स्त्री के समान कोई बन्धु नहीं है ! स्त्री के समान कोई आश्रय नहीं है ! और स्त्री के समान धर्म संग्रह में सहायक भी दूसरा कोई नहीं है ! जिसके घर में साध्वी और प्रिय बचन बोलने वाली भार्या नहीं नही है ! ,उसे तो बन में चले जाना चाहिए क्योँकि उसके लिए जैसा घर है ! वैसा ही बन है !पुरुष की रति, प्रीति और संतति की प्राप्ति स्त्री के ही अधीन है ! ये भी और अन्य बहुत सी महत्त्व पूर्ण बातें भीष्म पितामह द्वारा युधिस्ठर को स्त्री के सम्बन्ध में महाभारत में बतायीगयी हैं !
अभी ध्येयम परम साम्यम -----भारत की धर्म संस्कृति में, आचरण में, हमेशा समता का निबास रहा है !इस समता का आधार आत्मा की समता रहा है !किन्तु समय के दुष्चक्र ने भारत को गुलाम बना दिया !और १०००साल से अधिक गुलामी भारत को भुगतना पड़ी !इस गुलामी के कारण भारत की संस्कृति की आचरण पद्धति विकृत हो गयी !और कर्म व्यबस्था जो आत्मा के एकता पर आधारित थी ! उसमे दोष आने के कारण बिषमता उत्पन्न हो गयी !और भारतीय समाज उंच नीच की आत्मविरोधी क्रिया कलापों में फंस गया !परिणाम स्वरुप वैदिक सनातन धर्म आचरण और गुण बिहीन जड़वय्बस्था में बदल गया !परिणाम स्वरुप हिन्दू धर्म को त्यागकर बहुत से हिन्दू नवोदित धर्मों ईसाई और इस्लाम धर्म में प्रवेश कर गए ! ओर अपने मूल सनातन धर्म के कट्टर विरोधी हो गए !जिस तरह से धर्म का छेत्र दूषित होने के कारण धर्म में बिघटन हुआ !उसी प्रकार से आर्थिक विषमता के कारण विदेशी भूमि में जन्मे सामाजिक समता लानेवाले साम्यवादी और समाजवादी अवैज्ञानिक मतों का प्रवेश भारत भूमि में हुआ !और इन मतों के मान ने वाले बहुत से लोग देश में पैदा हुए !यद्द्पि जिस भूमि में इन मतों का जन्म हुआ वहां तो ये समाप्त प्राय है !किन्तु भारत में अभी भी ये विद्यमान हैं !और इनका स्वरुप पूंजी वादी व्यबस्था से भी अधिक प्रिय इन तथाकथित साम्यवादियों और समाजवादियों में संपत्ति के प्रति समर्पण और आकर्षण के रूप में दिखाई देता हैं !ये दोनों विचार वाह्य विषमता मिटाने के नाम पर बाह्य विषमता बढाते हैं ! सनातन धर्म बाह्य विषमता को उँगलियों की विषमता के समान स्वीकार करता है !किन्तु आत्मिक समता को स्वीकार करता है !क्योँकि आत्मिक समता यथार्थ है !जो आत्मा मनुष्य में है ! वही आत्मा हाथी और चींटी में भी है !इसलिए आत्मिक दृष्टि से सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और सद्भाव तथा संरक्छण का भाव जन्मता है !यह देहगत विषमता के रहते हुए भी आत्मगत एकता के कारण परम साम्य है !ओर यही अभिध्येय वैदिक संस्कृति का रहा है j परम साम्य की प्राप्ति के लिए लिए इन्द्रियों और मन तथा चित्त की समस्त क्रियायों को लक्छ्य प्राप्ति के लिए संयमित प्रशिक्छित और संस्कारित करना पड़ता है ! परम साम्य में परम शब्द महत्त्व का है ! जहाँ परम साम्य का रूप क्रियायों को दिया जाता है! वहां आर्थिक और सामाजिक, मन का संतुलन या मानसिक साम्य है! उसकी भी प्राप्ति स्वतः होती है! आर्थिक साम्य हरेक कार्य में मदद गार होता है ! सामाजिक साम्य के आधार पर समाज में व्यबस्था रहती है ! मानशिक साम्य से मनुष्य के मन का नियंत्रण होता है ! जो कि बहुत आवश्यक है ! नहीं तो भूला भटका मनुष्य सुख की चाह में इधर उधर भटकता रहता है ! और बहुत से अवांछनीय कार्य सुख प्राप्ति के लिए करता है ! इसिलए मनोयोग की बहुत आवश्यकता है ! आर्थिक सामाजिक और मानसिक साम्य से भी श्रेष्ठ परम साम्य है ! यह वह बस्तु है जो वैज्ञानिक और नैतिक छेत्र से भी ऊँची जाती है ! यानी परम साम्य आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कराता है !यही वैदिक धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है !जिसका बिस्मरण भारतीय समाज ने कर दिया है !जिसके कारण प्रकार प्रकार के दुष्चक्र में फंस कर हर नए दिन सुधार के नाम पर बिगाड़ को जन्म दे रहा है !
Wednesday, 22 July 2015
किसी भी मनुष्य की क्रियात्मक, भावनात्मक और चिंतन की गतिविधियाँ एक ही रूप में हमेशा नहीं रहती हैं !बे समयानुसार बदलती रहती है !विदुर धृतराष्ट्र के सबसे छोटे भाई और मंत्री भी थे !बे अपने समय के सबसे बड़े नीतिविशारद और आध्यात्मिक पुरुष थे !उनको महाभारत में धर्म के अंश से उत्पन्न बताया गया है !भगवान श्री कृष्णा जब कौरवों पांडवों के मध्य शांति स्थापना के लिए हस्तानुपुर गए थे ! तब बे धृतराष्ट्र द्वारा सभी सुविधाओं और भोग विलास युक्त दुशाशन के महल में रहने के बजाय विदुर के यहाँ ही ठहरे थे !तथा उन्होंने दुर्योधन के यहाँ भोजन करने से मना कर दिया था ! और विदुर के यहाँ ही भोजन किया था !धृतराष्ट्र स्वयं भी बहुत बड़ा ज्ञानी और धार्मिक व्यक्ति था !किन्तु अपने पुत्र दुर्योधन में आसक्ति के कारण वह सही निर्णय नहीं ले पाता था !और उसका पुत्र में आसक्ति के कारण कर्त्तव्य अकर्तव्य का बोध नष्ट हो गया था !तथा वह अधर्म को ही धर्म मानने लगा था !विदुर ने उसको उपदेश कर धर्म के वास्तविक तत्त्व अध्यात्म को समझाने के लिए जो उपदेश दिया है !उसी उपदेश के अंगरूप में कामी, क्रोधी, प्रमादी, थके, आलसी, जल्दबाज आदि लोगों से दूर रहने की बातें कही गयी हैं !इन्तु इस नीति गत उपदेश का मुख्य उद्देशय शाब्दिक ज्ञान को अनुभव जन्य ज्ञान में बदलने का है !इसलिए इसी उपदेश में विदुर कहते है !की राजन संसार में पांच तरह के लोग जहाँ कहीं भी आप जाएंगे आपको अवश्य मिलेंगे --(१)आश्रय मांगने वाले (२)आश्रय देने वाले (३)प्रसंसा करने वाले (४)निंदा करने वाले (५)और उदासीन, तथा तटस्थ ! इसलिए विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि मनुष्यों के बाह्य आचरण को ध्यान में रख कर व्योहार तो करो किन्तु अंदर से अनासक्त भाव से राज धर्म का पालन लोकहित में निष्पक्छ और न्याय दृष्टि से करो !!
Tuesday, 21 July 2015
वैदिक धर्म के जो अत्यंत चमत्कारिक रहस्य हैं !उनको बुद्धि से नहीं जाना समझा जा सकता है !शरीरों के अंदर रहने वाले आत्मा में जो अनंत और चमत्कारिक शक्ति है ! इसकी खोज ऋषियों ने तदनुसार जीवनचर्या को धारण और अपनाकर की थी !और इसी आत्मशक्ति से भारत ने बिना ईंधन से चलने वाले बायुयान परमाणु बम्ब से भी अधिक शक्तिशाली अग्निवाण और ब्रह्मशिर जैसे बिध्वंसक अश्त्र शास्त्र !और युद्ध में घायल होने वाले सैनिको को तुरत स्वस्थ कर देने वाली और घाँवो को भर देने वाली विशालयकारिणी जैसी औषधियां भी तैयार की थी !और आत्मशक्ति से ही भारत के ऋषि संकल्प मात्र से ही अन्तरिक्छ के लोकों के भ्रमण आधुनिक यानो से भी अधिक तीब्रगति से कर आते थे !इसलिए प्राचीन भारत सभी प्रकार से समृद्ध भारत था !किन्तु इस भौतिक समृद्धि में भौतिक पदार्थों के स्थान पर आत्मशक्ति का ही उपयोग होता था !इसलिए भारत में कभी भी पर्यावरण की समस्या उत्पन्न नहीं हुई !धार्मिक दृष्टि से जो दूसरा बहुत बड़ा योग दान भारत का रहा वह है ! अजन्मा अविनाशी परमात्मा की शक्ति को मन्त्रों के द्वारा मूर्ति में स्थापित कर देना !जिसे नासमझ और भारतीय अध्यात्म शक्ति से अपरिचित अज्ञानी लोग मूर्तिपूजा कहते हैं !वह मूर्ति पूजा नहीं है ! बल्कि मंत्र शक्ति और विधिविधान से स्थापित मूर्ति में परम शक्ति परमात्मा की उपासना है !निर्गुण, निरकार ,अजन्मा, अविनाशी परमात्मा को मूर्ति में स्थापित कर उसकी साधना उपासना और भक्ति को साधकों , आराधकों और भक्तो को सर्व सुलभ बना देने की विधि और प्रक्रिया है !उसी परमात्म शक्ति को दर्शित करने के लिए देश माँ अद्भुत मंदिरों का निर्माण हुआ है ! जिसमे तत्कालीन इंजीनियरों की प्रतिभा के दर्शन के साथ परमात्मा की अलौकिक शक्ति के दर्शन भी होते हैं ! भास्कर इसके लिए धन्यबाद का पात्र है ! कि वह देश की अध्यात्म शक्ति कापरिचय लोगों को करा रहा है !किन्तु ऐसे मंदिरों का टाइटल मिस्टीरियस मंदिरों के स्थान पर चमत्कारिक मंदिर होना चाहिए !
Monday, 20 July 2015
भोजन की शुद्धि और पवित्रता के अनेक उपाय वैदिक धर्म में बताये गए हैं !भोजन करते समय भोजन करने वाले का आसन ,दिशा, दशा तथा मानसिक स्थिति आदि के स्थूल उपायों में बताया गया है ! कि भोजन उत्तर पूर्व दिशा में मुहँ करके करना चाहिए !शुद्ध स्थान पर लकड़ी के पटा पर बैठ कर जो ना अधिक ऊँचा हो ना अधिक नीचा हो भोजन करना चाहिए ! भोजन करते समय बात चीत नहीं करनी चाहिए ! खड़े होकर नहीं करना चाहिए यह सभी बाह्य नियम भोजन करते समय अत्यंत उपयोगी हैं ! और जहाँ तक संभव हो इनके पालन का प्रयत्न करना चाहिए ! किन्तु काल, देश और परिस्थिति के अनुसार और प्रचिलित व्यबस्था में इनका पालन कर पाना संभव ना हो तब भी भोजन के सर्वकालिक ,मानसिक ,शारीरिक और सामजिक स्वास्थ्य के जो सर्वकालिक नियम और उपाय वैदिक धर्म में प्रस्तुत किये गए हैं !जिनका पालन सभी देशों में सभी परिस्थितियों में और सभी धर्मों के मानने वालों द्वारा किया जा सकता है उनका पालन लोकहित और स्वास्थ्य हित में अवश्य करना चाहिए ! (!)हित भोजन---- भोजन शरीर के लिए स्वास्थ्य बर्धक होना चाहिए !(२)मित भोजन ---भोजन अधिक मात्रा में नहीं किया जाना चाहिए !(३)ऋत भोजन ----भोजन की सामग्री न्याय युक्त आमदनी से खरीदी हुई होनी चाहिए !इसके अतिरिक्त गीता में १७(८,९,१०)में भोजन की उत्तम मध्यम और निम्नस्तरीय सामग्री का स्वरुप भी बताया गया है !उत्तम भोजन सामग्री वह होती है जिस से आयु ,उत्तम मानसिक स्थिति, बल, आरोग्य ,सुख ,और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है !जो भोजन अधिक समय तक शरीर को स्वस्थ रखता है ! जिस से ह्रदय को शक्ति प्राप्त होती है ! ऐसे रसीले चिकने (फल ,गाय का दूध घी दही तथा हरी सब्जियां सूखे मेबे आदि )पदार्थ जिनसे आपस में सद्भाव प्रीति आदि की बृद्धि होती है ! वह उत्तम भोजन सामग्री होती है !!भोजन के जो पदार्थ अत्यंत कड़वे ,अत्यंत खट्टे, अत्यंत नमकीन, अत्यंत गरम, अत्यंत तीखे, अत्यंत रूखे, और अत्यंत दाहकारक होते हैं,! जिनसे दुःख शोक और रोगों की प्राप्ति होती है ! और जो सिर्फ स्वाद की दृष्टि से ही किये जाते हैं ! ये मध्यम भोज्य पदार्थ कहे गए हैं ! जो भोजन सड़ा हुआ, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी, और जूठा तथा जो महान अपवत्रित (हिंसा जीव हत्या से प्राप्त मांस आदि )है वह अत्यंत निम्न कोटि का भोजन होता है ! इस प्रकार से वैदिक धर्म के बाह्य और आतंरिक नियमों के पालन करने से उत्तम स्वास्थ्य और सदाचारी समाज का निर्माण होता है !
Saturday, 18 July 2015
गांधी जी १९३१ में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में लंदन में तत्कालीन ब्रिटश सरकार के आमंत्रण पर गोलमेज परिषद में शामिल होने के लिए गए थे !ब्रिटिश सरकार ने उसमे शामिल होने के लिए ३१२ प्रतिनिधि नामजद किये थे !जिसमे भारतीय राजाओं के ,दलितों के ,मुसलमानो के ,आदिवासियों के ,तथा सरकार और अन्य समूहों आदि के प्रतिनिधि भी थे !ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय प्रितिनिधियों के आंतरिक मतभेदों के कारण भारत के लिए स्वतंत्र संविधान बनाने से मना कर दिया था !तब गांधीजी ने अपने भासण में कहा था, ki भारत में अंग्रेजी शाशन शैतानी हुकूमत है !उन्होंने ब्रिटिश प्रधान मंत्री मैकडोनाल्ड को सम्बोधित करते हुए कहा था ! कि आपने हमें ६००० मील से भारत को स्वंत्रता का संविधान बनाने के लिए बुलाया था !भारत के अंदरूनी मामले भारत की जनता सुलझा लेगी !आप भारत को स्वतंत्रता दे दीजिये !राउंड टेबल कांफ्रेंस के बाद गांधीजी ने १९४२ में अंग्रेजो भारत छोडो आंदोलन के के लिए करो या मरो का नारा दिया था !किन्तु आजादी के इन मन्त्रों के साथ गांधी जी ने देश की जनता को स्वाबलंबन का मंत्र भी दिया था !और देश को स्वाबलंबी बनाने के लिए उन्होंने जनता के सामने रचनात्मक कार्यक्रम रखे थे !जिनमे खादी का कार्यक्रम मूख्य था !सभी कांग्रेसी खादी बुनते थे !और अपने द्वारा बुनी हुई खादी से ही बने हुए बस्त्रों को पहन ते थे !गांधी वादियों ने नारा दिया था जो बीज बोये सो खाए ! और जो काते सो पहिने ! गांधीजी के इसी रचनात्मक कार्यक्रम का पालन और अनुसरण आज भी ८४ साल की सुभाष बोस की बहु कर रही हैं !आज भी गांधी आश्रमों में ! और गांधी वादियों में ऐसे बहुत से गांधीवादी मिल जाएंगे जो गांधीजी के स्वाबलम्बी जीवन को खुद भी जी रहे हैं !और लोगों को प्रेरित भी कर रहे हैं !और लोगों के सामने गांधीजी के ग्रामस्वराज्य का स्वरुप भी प्रस्तुत कर रहे हैं !इस प्रयत्न में लगे हुए गांधी वादी प्रचार तंत्र से दूर रहकर रचनात्मक कार्यक्रमों में लगे हुए हैं !और इन कार्यक्रमों के सार्थक परिणाम भी सामने आरहे हैं !देश को जैविक कृषि आदिका क्रांतिकारी कार्यक्रम गांधी वादियों की ही देन है !तथा भूमि का मालिकाना हक़ किसानो के पास ही रहे इसकी प्रेरणा और प्रोग्राम देश के सामने प्रस्तुत करने वाले एकता परिषद जैसे अनेक गांधीवादी रचनात्मक संगठन ही है !
करिस्ये बचनम् तब १८(७३) अक्छर ज्ञान जब अनुभव जन्य ज्ञान में परिणित हो जाता है !तभी पूर्ण ज्ञान कहलाता है !सत्य बोलना चाहिए ,अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए ,बेईमानी ,छल कपट आदि नहीं करना चाहिए ,संसार के सभी पदार्थ धन दौलत आदि यहीं धरे रह जाएंगे ,आदि ज्ञान ,धर्म की बातें करने वाले शव्द ज्ञानी बहुत मिलते हैं !किन्तु इनको आचरण में उतारकर जीवन जीने वाले बिरले होते हैं !भौतिक पदार्थों का आकर्षण जब दुष्ट पुरुषों में बढ़ जाता है !तब बे अपने निकृष्ट स्वार्थों की प्राप्ति के लिए संपूर्ण संसार और समाज की व्यबस्था बिगड़ देते हैं !और समाज में सज्जन पुरुषों का जीना मुश्किल कर देते हैं!और !जब ऐसे दुष्ट पुरुष अजेय हो जाते हैं !तब सज्जन पुरुषों की रक्षा और सामाजिक व्यबस्था को न्याययुक्त बनाने के लिए परम शक्ति स्वयं मानव के रूप में अवतरित होती है !और किसी श्रेष्ठ मानव का चयन कर उसको दिव्य शक्तियां प्रदान कर उसको निमित्त बनाकर समाज की व्यबस्था कायम कर दुष्टों का विनाश करती है !दुष्टता का विनाश ह्रदय परिवर्तन से भी होता है !इसीलिए पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पाप पंक में दुबे हुए दुर्योधन और उसके सहयोगी कर्ण, दुशासन शकुनि आदि को समझाने की भरपूर चेस्टा की !उनको युद्ध के भयानक परिणामों के बारे में भी समझाया !दुर्योधन के अन्याय से पीड़ित पांडव अपने आधे राज्य का अधिकार त्याग कर मात्र ५ गाओं की मांग तक सीमित हो गए !किन्तु पापियों में प्रधान दुर्योधन ने कहा कि बिना युद्ध के पांडवों को उतनी भी भूमि नहीं दूंगा, जितनी सुई की नौक पर आती है !इसीलिए युद्ध कर्त्तव्य रूप में धर्म और न्याय तथा समाज व्यबस्था को दुष्टों से मुक्त कराने के लिए आवश्यक हो गया था !परमशक्ति द्वारा अधर्म के विनाश के लिए निमित्त बनाया गया अर्जुन भी मोह ग्रस्त होकर अपनी कर्तव्य निष्ठा से उपराम होकर युद्धछेत्र में धनुष बाण रख कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया था ! इसिलए भगवान को उसका कर्त्तव्य बोध कराने के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग, और कर्म योग का उपदेश देना पड़ा ! मोह और राग का नाश ज्ञान से ही होता है !इसलिए भगवान कृष्ण ने उपदेश के अंत में अर्जुन से पूंछा कि क्या तुमने एकाग्र चित्त से उपदेश को सुना? क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ? १८(७२) अर्जुन कहता है कि भगवान आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट होगया है ! और मेने स्मृति प्राप्त कर ली है ! में संदेह रहित होकर स्थित हूँ !अब में आपकी आज्ञा का पालन करूँगा ! कुटुंब और गुरुजनो को युद्ध छेत्र में देख कर अर्जुन यकायक मोह ग्रस्त हो गया था !उसको यद्द्पि यह पूर्व जानकारी थी की युद्ध में उसका मुकाबला गुरुजन और परिवार जन से ही होना है !और उसे यह भी भली प्रकार ज्ञात था कि यह धर्म युद्ध है ! और दुष्टों के विनाश के लिए उसे दिव्य शक्तियां प्रदान करायी गयी हैं !फिर भी वह मोहग्रस्त होकर कर्त्तव्य निष्ठा को भूल गया !भगवान के उपदेश से उसे आत्मस्मृति का बोध हुआ ! और उसके सांसारिक मोह और राग कि निबृत्ति हो गयी !और संदेह रहित होकर वह कर्तव्य पालन के लिए तैयार हो गया !भगवान श्री कृष्ण कि कृपा से उसके अज्ञान का नाश हुआ आत्मस्मृति की प्राप्ति हुई ! इसके लिए उसने भगवान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरे मोह और राग तथा अज्ञान कि निबृत्ति मेरे पुरुषार्थ और प्रयत्न से नहीं हुई आपकी कृपा से हुई है ! गीता का उपदेश मोह रहित होकर कर्तव्य पालन कराने के लिए है !युद्ध कराने के लिए नहीं है !मोह का निरसन ज्ञान से होता है! और ज्ञान भगवान की कृपा से प्राप्त होता है !इसीलिए गीता में ज्ञानप्रधान भक्ति युक्त कर्मयोग का उपदेश अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानव जाति को दिया गया है !जीवन के सभी कर्त्तव्य छेत्रों में मोह और राग ने अपना डेरा जमाकर मनुष्य को पशु की कोटि में खड़ा कर दिया है !और मनुष्य ने अपने निम्नस्तरीय स्वार्थों की तुष्टि के लिए अपनी शिक्छा, पद, प्रतिष्ठा, शक्ति और सामर्थ्य को पूरी शक्ति के साथ दाव पर लगा दिया है !परिणाम स्वरुप जीवन के सभी छेत्रों से निष्काम कर्मयोग लुप्त होता जा रहा है !मोह और राग के कारण युद्ध होते है !मानवता का हनन होता है !और ऐसा कोई भी दुष्कृत्य नहीं है जो मोह और राग से ग्रस्त व्यक्ति ना करता हो !ऐसे सभी मोहग्रस्त समाज के कर्णधारों के लिए गीता का उपदेश मोह के असाध्य बीमारी से मुक्त करने के लिए अमृत रूप औषधि है !
Wednesday, 15 July 2015
मोहर सिंह डाकू नहीं थे !बागी थे !पुलिस और प्रसाशनिक व्यबस्था जब भ्रष्ट हो कर अपराधियों ,शोषकों और शक्तिशाली लोगों के हित में काम करने लगाती है !और लोकतंत्र में जिम्मेदार पदों पर जब स्वार्थनिष्ठ नेता काबिज हो कर समाज के न्यायिक हितों कीउपेक्छा कर ने लगते हैं !तब इस लोकविनाशक मण्डली के विरुद्ध मोहर सिंह ऐसे साहसी लोग बगावत कर देते हैं !और पुलिस भी उन पर सभी जुर्म जरायम लगाती रहती है! !बोरिंग में जल वहीं से प्राप्तनहोता है ! जहां जमीन के अंदर जलस्रोत होता है !अगर जमीन के अंदर जलस्रोत नहीं है ! तो बोरिंग से जल की प्राप्ति नहीं होती है !उसी प्रकार से अगर मनुष्य के अंदर अच्छाई ना हो तो सदाचरण नहीं निकल सकता है !मोहर सिंह ऐसे लोग अपराधी प्रवृत्ति के नहीं होते हैं ! किन्तु बे समाज में व्याप्त अत्याचार अनाचार को सहन नहीं कर पाते है !इसलिए बागी हो जाते हैं ! और फिर बे ही उच्च पदस्थ लोग जो अपने सामाजिक और प्रसाशनिक उत्तर्दायित्त्वों का निष्ठा पूर्वक निर्वहन नहीं करते हैं ! ऐसे बागियों को डाँकू और अपराधी की संज्ञा प्रदान कर देते हैं !इन बागियों को विनोबा भावे के प्रति श्रद्धा जगी और लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्वव में गांधीवादियों के सहयोग से इन बागियों को नवजीवन प्राप्तहुआ ! और अब बे समाज हित में संलग्न हो कर समाज निर्माण के कामों में लगे हुए हैं !मोहर सिंह मूरत सिंह मानसिंघ आदि सरकार की नज़रों में डाकूँ रहे ! किन्तु समाज में तो बे बागी ही माने जाते रहे हैं !आजभी बहुत से न्याय प्राप्ति के लिए संघर्श रत संगठन कानून अपने हाथ में लेकर और कानून तोड़ कर हिंसक गतिविधियों में संलग्न है !और सरकार उनको अन्याय निबारण के लिए रचनात्मक भूमिका प्रदान नहीं करा पा रही है ! फिर से एक बार गांधीवादियों और रचनात्मक बुद्धिजीवियों का सहयोग लेकर सरकार को नक्सल समस्या आदि अनेक उग्रवादी संगठनो को रचनात्मक कार्यों में लगाने का प्रयत्न करना चाहिए ! देश में बहुत से ऐसे रचनात्मक गांधीवादियों के संगठन है जो हिंसात्मक गतिविधियों को अहिंसात्मक ढंग से समाधान कराने के लिए प्रयास रत हैं !अगर सरकारें उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करें ! और उनको सहयोग और समर्थन दें !तो देश में हिंसात्मक गतिविधियों की दिशा और दशा अहिंसात्मक और रचनात्मक गतिविधियों में परिवर्तित होसकती है !
Tuesday, 14 July 2015
मनुष्यों के संपूर्ण कर्म इन्द्रियों और भौतिक पदार्थों के संयोग से होते है !किन्तु जो मन बुद्धि चित्त और अहंकार मनुष्य के बाहर दिखने वाले कर्मो को नियंत्रित, प्रेरित और संचालित करते हैं ! वह अंतःकरण दृष्टिगोचर नहीं होता है !इसीलिए स्थूल कर्मों को सुखमय आनंद मय बनाने के लिए अंतःकरण को शुद्ध कर उस पर नियंत्रण करना पड़ता है !धैर्य बुद्धि का गुण है !बुद्धि का काम निश्चय करना होता है !और उस निश्चय को धारण धृति के द्वारा धारण किया जाता है ! अगर किसी ने निस्चय किया है ! की वह हर हालत में अपनी पत्नी को संतुष्ट रखेगा ! मान अपमान को चित्त की शांति को भंग नहीं करने देगा !हानि लाभ में चित्त की समता कायम रखेगा !इसी प्रकार के अन्य भौतिक कार्य जो चित्त और मन बुद्धि को अशांत करते हैं !इन सभी बाह्य अशांति और दुःख तथा मन चित्त और बुद्धि की समचित्तता को यथाबत कायम रखने के लिए जिस धैर्य की आवश्यकता है !उस धैर्य को कायम रखने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता २(१४)में कहा है1 कि सर्दी, गर्मी, सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ संयोग वियोग आदि देने वाले इन्द्रियों और विषयों के संयोग तो उतपत्ति, विनाश शील और आने जाने वाले हैं ! ना सुख स्थायी है ! और ना दुःख सदा रहने वाला है ! इसलिए मनुष्य को इन सभी स्थितियों और परिश्थितियों में धैर्य धारण करना चाहिए !अगर इस तरह से बुद्धि को शिक्छित और संस्कारित किया जाएगा तो सभी परिश्थितियों में धैर्य बना रहेगा !धैर्य के अभाव में मनुष्य का जीवन बिना मल्लाह के नाव के समान है !
Monday, 13 July 2015
यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः !तत्र श्री विजयो भूतिः नीतिः मतिः मम !१८(७८) अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान प्रत्येक युग में अवतार लेते हैं !महाभारत में उत्तंक ऋषि को अपने अवतरण का रहस्य और उद्देश्य बताते हुए श्री कृष्णा कहते हैं! कि मै धर्म की रक्षा और स्थापना के लिए तीनो लोकों में बहुत सी योनियों में अवतार धारण करके उन उन रूपों और वेशों द्वारा तदनरूप वर्ताव करता हूँ ! अधर्म में लगे हुए सभी मनुष्यों को दंड देने वाला और अपनी मर्यादा से कभी च्युत ना होने वाला ईश्वर में ही हूँ !जब जब युग का परिवर्तन होता है ! तब तब में लोगों की भलाई के लिए भिन्न भिन्न योनियों में प्रविष्ट हो कर धर्म मर्यादा की स्थापना करता हूँ !जब में देवयोनि में अवतार लेता हूँ ! तब देवताओं की ही भांति सारे आचार विचार का पालन करता हूँ !जब में गन्धर्व योनि में प्रगट होता हूँ तब मेरे सारे आचार विचार गन्धर्वों के ही समान होते हैं !जिस योनि में मेरा अवतार होता है !उसी योनि के अनुसार मेरा आचार विचार और व्योहार होता है ! इस समय में मनुष्य योनि में अवतीर्ण हुआ हूँ! इसलिए दुर्योधन आदि कौरवों पर अपनी ईश्वरीय शक्ति का प्रयोग ना करके मेने दीनता पूर्वक ही धर्म मार्ग पर चलने वाले पांडवों और अधर्मी कौरवों में संधि स्थापना के लिए प्रार्थना की थी ! परन्तु कौरवों ने मोह और लोभ ग्रस्त होने के कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी ! इसके बाद मेने कौरवों को बड़े बड़े भय दिखाए और उन्हें डराया धमकाया भी ! तथा यथार्थ रूप से युद्ध का भयानक परिणाम भी उन्हें बताया ! परन्तु बे अधर्म और काल से ग्रस्त थे ! अतः मेरी बात मानने को राजी नहीं हुए ! इसिलए छत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए !जब अधर्म और अधर्मी ,लोभी ,दुराचारी ,पापियों का विनाश हो जाता है ! और धर्म की स्थापना हो जाती है ! और लोक व्यबस्था सदाचार परायण न्याय प्रिय आत्मनिष्ठ शाशन प्रसाशन में प्रजा के साथ भेद भाव ना कर प्रजा की भलाई करने वाले लोगों के हाथो में आजाती है ! तभी समाज में श्री अर्थात लक्ष्मी शोभा संपत्ति आदि के दर्शन होते हैं !रुपया पैसा लक्ष्मी नहीं है !रुपया तो नासिक के रुपया छापने के कारखाने में छपता है !किन्तु लक्ष्मी तो कृषि, गाय की रक्षा और वाणिज्य से उत्पन्न होती है !आज समाज के सभी बर्ग नेता अभिनेता कर्मचारी व्योपारी ,तथाकथित साधु सन्यासी आदि सभी रुपया कमाने में लगे हुए हैं !और रुपयों के संग्रह के लिए घोर अनैतिक, धोखा धडी, बेईमानी, गोवध, पाखंड, छल कपट, आदि अधार्मिक कार्य करने में संलग्न है !परिणाम स्वरुप समाज में कही प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति दिखाई देती है !और कही भयानक गरीबी के दर्शन होते हैं! !संपूर्ण देश में गो पालन के अभाव के कारण पशुओं की चर्वी से बना घी और केमिकल से निर्मित दूध और सभी खाद्य पदार्थ मिलाबटी प्राप्त हो रहे हैं !देश में पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दुर्लभ हो गए हैं ! जहाँ अधर्म का विनाश और धर्म की विजय होगी !वही वास्तविक विजय कही जायेगी !आज जिस विजय का दर्शन होता है !उस विजय की प्राप्ति में लगे हुए सभी पक्ष लोभ मोह पद प्रतिष्ठा प्राप्ति की होड़ में सभी प्रकार के अनैतिक छलकपट युक्त अधार्मिक साधनो का प्रयोग करते हैं !इसीलिए व्यक्ति जीतते ,और हारते रहते हैं ! किन्तु समाज को कष्ट देने वाली व्यबस्था नष्ट नहीं होती है !जैसे नाग नाथ वैसे सांपनाथ वाली युक्ति चरितार्थ होती है !ऐश्वर्य महत्ता, प्रभाव सामर्थ्य आदि सभी स्वार्थनिष्ठ अनैतिक अधार्मिक व्यक्तियों के हाथ में चलीगयी है ! और उनके हाथ की काठ पुतली बन गयी है !अटल न्याय, धर्म नीति के दर्शन देश और समाज के संचालन करने वालों में दिखाई नहीं देते हैं !स्वार्थों का पोषण करना ही सभी छेत्रों में काम करने वाले जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की अटल ना बदलने वाली नीति होगयी है !देश में वास्तविक श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति का दर्शन जभी होगा जब श्री कृष्ण ऐसे नीति निर्माता और अर्जुन जैसे न्याय, नीति , सदाचार ,आत्मनिष्ठ, स्वार्थ रहित ,धर्मपरायण लोग सत्ता व्यबस्था संभाल कर तदनुसार सदाचरण करेंगे !
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ७(१९) !सभी धर्मों के मुख्य विषय भगवान हैं !किन्ही धर्मों में ईश्वर को श्रष्टि का निर्माता पालन पोषण कर्ता आदि के रूप में स्वीकार किया गया है !कुछ धर्म ईश्वर को तो मानते है किन्तु उसे श्रष्टि का कर्ता भोक्ता आदि नहीं मानते हैं !परमात्मा के असितत्त्व को आस्ति और नास्ति के विविध रूपों में सभी धर्म स्वीकार करते हैं !ईश्वर के स्वरुप आदि का वर्णन विवेचन अनेक प्रकार से साधु, सन्यासी, महात्मा ,प्रवचन कर्ता, कथावाचक आदि करते रहते हैं !सामान्य जन भी पाप पुण्य , लाभ हानि, जन्म मरण के देने वाले के रूप में ईश्वर को मानते हैं !किन्तु उस ईश्वर का वास सब में हैं !इस बोध को प्राप्त कर तदनुसार ईश्वर समपित जीवन जीने वाले महात्मा मुश्किल से प्राप्त होते हैं ! भगवान समस्त प्राणियों के निवास स्थान हैं ! तथा वे सब भूतो में वास करते हैं ! इसलिए बे बासु कहलाते हैं ! तथा बे ही देवताओं की उत्पत्ति के स्थान होने के कारण और समस्त देवता उनमे वास करते हैं ! इसलिए उन्हें देव कहा जाता है ! अतएव भगवान का नाम बासुदेव है !बासुदेवः सर्वं यह गीता का सर्वोत्कृष्ट उपदेश है ! क्योँकि यही वास्तविकता भी है ! संपूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में अपरा और परा ---इन दोनों प्रकृतियों का संयोग ही कारण है ! पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पांच महाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकार की परमात्मा की अपरा प्रकृति है ! और इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीव रूप बनी हुई भगवान की परा प्रकृति है ! इन्ही दो शक्तियों से भगवान जगत के प्रभव और प्रलय हैं ! अर्थात संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाले और जगत रूप में उत्पन्न होने वाले हैं !और भगवान ही जगत का नाश करने वाले, और बे ही जगत रूप में नाश होने वाले हैं ! क्योँकि जगत के उपादान कारण भी भगवान है ! और निमित्त कारण भी वही है ! इसलिए इस जगत का कोई दूसरा कारण तथा कार्य नहीं है ! जैसे सूत की मणिया और सूत के धागा के रूप भिन्न भिन्न होते हैं ! किन्तु उनमे सूत के सिवाय और कुछ नहीं होता है इसी प्रकार मणि रूप अपरा (जड़ )प्रकृति और धागा रूप परा (जीव )प्रकृति दोनों में एक भगवान ही परिपूर्ण है ! अर्थात एक भगवान के सिवा अन्य कुछ नहीं है ! बास्तविक दृष्टि से देखें तो ना धागा है ! और ना मणिया है केवल सूत ही है ! इसी तरह न परा है न अपरा है सिर्फ एक परमात्मा ही है !इस ज्ञान को धारण करने के लिए संसार की सत्ता महत्ता को त्याग कर सिर्फ एक परमात्मा की ही सत्ता महत्ता को समझ कर तदनुसार आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियों शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि के लिए ही समस्त जीवन के कर्म करने पड़ते हैं ! ममता का सर्वथा नाश होना ही अन्तः करण की शुद्धि है ! इस प्रकार कर्म करते करते जब ममता का संपूर्ण नाश हो जाता है ! तब अन्तः करण पवित्र हो जाता है ! और साधक की दृष्टि में संसार सर्वम् के स्थान पर बासुदेव सर्वम की स्थापना होजाती है !यह साधक भक्त ,कर्मयोगी ,ज्ञानयोगी आदि की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है !भगवन कहते हैं इस मंजिल तक पहुंचे महात्मा अत्यंत दुर्लभ हैं !भगवान सुलभ है ! किन्तु भगवान को प्राप्त करने के लिए तदनुसार अपनी जीवनचर्या का निर्माण कर जीवन जीने वाले बिरले हैं
Friday, 10 July 2015
कर्मयोगो विशिष्य्ते !५(२)---कर्मयोग और सन्यास दोनों ही आत्मशांति आत्मकल्याण और मोक्ष प्रदान कराने वाले हैं !परन्तु सन्यास की अपेक्छा कर्मयोग श्रेष्ठ माना गया है ! गृहस्थ आश्रम और सन्यास दोनों का विधान शाश्त्रों में है ! तथापि सन्यास आश्रम में प्राप्त होने वाली स्थिति तो गृहस्थ जीवन में भी हो सकती ! परन्तु गृहस्थ के श्रष्टि परम्परा के लिए आवश्यक संयम प्रधान काम भोग और नए नए भौतिक अविष्कारों आदि का अवसर सन्यास आश्रम में संभव नहीं है ! अतः संपूर्ण धर्मों की सिद्धि का स्थान गृहस्थ आश्रम ही है ! जैसे गृहत्यागी सन्यासी घर के प्रति अनासक्त होता है !उसी प्रकार यदि गृहस्थ भी गृहस्थ जीवन में ममता आसक्ति त्याग कर परिवार में रहता है !और सदाचार और संयम का पालन करता हुआ अपनी प्रिय पत्नी बच्चों और सम्बन्धियों के साथ निवास करता है ! तो उसे वही परमगति प्राप्त होती है ! जो सन्यासी को प्राप्त होती है ! लोक दृस्टि से कर्मयोग अधिक उपयोगी सिद्ध होता है !जो विद्याएँ कर्म का सम्पादन कराती हैं उन्ही का फल दृष्टिगोचर होता है !दूसरी विद्याओं का नहीं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म के परिणाम ही प्रत्यक्छ दिखाई देते हैं ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पी कर ही शांत होता है उसे जानकार नहीं ! अतः गृहस्थ आश्रम में रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है ! ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सन्यासी भी संसार में भक्छ्या भोक्छ्या पदार्थों का भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता है ! अतएव सन्यासी के लिए भी भूख की निबृत्ति के लिए भोजन का विधान है !पुण्यात्मा स्त्री पुरुष पुण्य कार्यों से स्वर्ग और पाप पूर्ण कार्यों से ही अधोगति और नरक आदि की प्राप्ति करते है ! देवता भी कर्म से ही स्वर्ग लोक में प्रकाशित होते हैं ! वायु कर्म को ही अपना कर संपूर्ण जगत में विचरण करता है ! सूर्य देव भी कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित और अस्त होते हुए दिखाई देते हैं ! नदियां भी कर्म परायण हो सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करती हुई प्रवाहित होती हैं ! कर्म योग के बिना संन्यास के लिए आवश्यक चित्त शुद्धि की प्राप्ति होना कठिन है ! किन्तु कर्म योगी आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियां शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि करके शीघ्र ही आत्मानंद और परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है ! सांख्य योग में तो कर्मयोग की आवश्यकता है ! किन्तु कर्मयोग में सांख्य योग की आवश्यकता नहीं है ! प्राप्त परिस्थति का सदुपयोग कर अन्तः करण की समस्त वृत्तियों प्रवृत्तियों को आत्मनिष्ठ बनाना ही कर्मयोग है ! युद्ध जैसी घोर परिस्थिति में भी कर्मयोग का पालन किया जा सकता है ! तीव्र वैराग्य और तीक्छण बुद्धि के द्वारा सन्यासी अहंकार और ममता को नष्ट करता है ! तथा कर्मयोगी निश्वार्थ भाव से लोक मर्यादा की कर्म परम्परा को सुरक्छित रखने के लिए लोकहित के कर्म करता है ! जिस कर्म में व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख प्राप्ति की इक्छा नहीं है ! वह क्रिया मात्र है कर्म नहीं है ! जैसे यंत्र में कर्तत्त्व नहीं होता है ! ऐसे ही कर्मयोगी में भी क्रिया मात्र रहती है कर्तात्त्व नहीं रहता ! संन्यास या ज्ञान योग में तो संसार के मिथ्यात्त्व का बोध होता है ! तथा सन्यासी आत्मनिष्ठ होकर कर्म से उदासीन हो जाता है !तथा कर्मों का त्याग कर देता है ! इसलिए सन्यासी आत्म लाभ प्राप्त कर अपने लिए उपयोगी होता है ! किन्तु कर्म योगी संसार मात्र के लिए उपयोगी होता है ! जो संसार के लिए उपयोगी होता है ! वह अपने लिए भी उपयोगी होता है ! इसलिए संन्यास और कर्मयोग दोनों साधन कल्याणकारक होने पर भी कर्म योग श्रेष्ठ है !
Thursday, 9 July 2015
महाभारत वैदिक धर्म का ग्रन्थ रत्न है !इसमें मोक्ष शाश्त्र ,राजनीति ,अर्थ और काम तथा धर्म के सभी सामान्य और गूढ़ प्रकरण भरे हुए हैं !वेद व्यास ने कहा है किजो ई ग्रन्थ में है वही अन्यत्र भी है ! और जो इसमें नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है !कर्ण की मृत्यु के अनेक कारण थे !कर्ण से इन्द्र ने उसके कवच कुण्डल ब्राह्मण का वेश धारण कर दान में ले लिए थे !भगवान सूर्य ने उसको स्वप्न में इन्द्र को कवच कुण्डल न देने के लिए कहा था !क्योँकि उनके रहते उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी !किन्तु कर्ण ने सूर्य की सलाह न मानते हुए इन्द्र को अपने कवच कुण्डल दे दिए थे !इन्द्र से उसने कवच कुण्डल के बदले वैजन्ती शक्ति प्राप्त की थी ! जिसको वह अपने प्रमुख प्रतिद्वन्दी अर्जुन को मारने के लिए सुरक्छित रखे था !किन्तु उस शक्ति का प्रयोग भी उसे अपनी प्राणरक्षा के लिए घटोत्कच को मारने के लिए करना पड़ा था ! भगवान परशुराम ने भी उसे शाप दिया था कि जीवन संकट के समय वह परशराम जी द्वारा दिए गए अश्त्र सश्त्र संचालन के ज्ञान को भूल जाएगा !ब्राह्मण की भी श्राप थी कि युद्ध भूमि में उसका पहिया पृथ्वी निगल लेगी !और तभी असहाय दसा में उसकी मृत्यु हो जायेगी !किन्तु इन सब कारणों से बड़ा कारण यह था कि वह दुराचारी अन्यायी दुर्योधन का साथ दे रहा था ! और अधर्म का समर्थन और क्रियात्मक शक्ति से सहयोग कर रहा था !उसको पांडवों के पक्छ में जिनका वह बड़ा भाई था करने का प्रयत्न कुंती ने भी किया ! श्री कृष्ण ने भी किया !और सर सैया पर पढ़े हुए भीष्म ने भी किया !किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं मानी !अगर कर्ण दुर्योधन के अन्याय अत्याचार में शामिल होकर दुर्योधन का साथ नहीं देता तो !महाभारत का यदुध नहीं होता और १८ अक्छोहनि सेना महाविनाश से बच जाती !क्योँकि दुर्योधन को कर्ण के बल और शक्ति से युद्ध जीतने का पूरा भरोसा था !अन्याय अत्याचार कभी भी अधिक समय तक कायम नहीं रहता !और अन्याय अत्याचार का साथ और सहयोग देने वाले कितने भी शक्तिशाली हों बे एक दिन काल के कराल गाल में समा ही जाते हैं !कर्ण की मृत्यु का एक यह भी कारण था !
Wednesday, 8 July 2015
जन्म ,कर्म , च ,मे ,दिव्यम ! ४(९)गीता में भगवान श्री कृष्णा को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है !परमशक्ति के ईश्वर के रूप में अवतार का रहस्य जो धर्म को सिर्फ तर्क और अपनी सिमित बुद्धि से जानना समझना चाहते है ! उन पर प्रगट नहीं होता है !इस रहस्य को जान ने के लिए भक्ति की आवश्यकता होती है !क्योंकि अवतार के कर्म और जन्म दिव्या होते हैं !अर्थात परमशक्ति का अवतरण और कर्म मनुष्यों की तरह लोभ लालच मोह और सुख भोग आदि की प्राप्ति के लिए नहीं होते है ! !भगवान श्री कृष्णा ने युधिस्ठर के प्रश्न करने पर अवतार के रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया ! कि मेरे परम गोपनीय आत्म तत्त्व को सुनो और समझ कर धारण करो !में इस समय धर्म की स्थापना और दुष्टों का विनाश करने के लिए अपनी माया से मानव शरीर में अवतरित हुआ हूँ ! जो लोग मुझे केवल मनुष्य शरीर में ही समझ कर मेरी अवहेलना करते हैं बे मुर्ख हैं ! और संसार में ८४ लाख योनियों में भटकते रहते हैं ! लाखों योनियों में भटकने के बाद भी मनुष्य योनि मिलना कठिन होता है !जो ज्ञान दृष्टि से मुझे संपूर्ण प्राणियों में स्थित देखते हैं ! बे सदा मुझमे मन लगाए रहने वाले मेरे भक्त हैं ! ऐसे भक्तों को में परम धाम में अपने पास बुला लेता हूँ ! मेरे भक्तों का नाश नहीं होता है ! बे निष्पाप होते हैं ! मनुष्यों में उन्ही का जन्म सफल है ! जो मेरे भक्त हैं ! हजारों जन्मो तक तपस्या करने के बाद जब मनुष्यों का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है ! तब उसमे भक्ति का उदय होता है ! मेरा जो गोपनीय कूटस्थ, अचल ,अविनाशी ,पर स्वरुप है ,उसका मेरे भक्तों को जैसा अनुभव होता है ! वैसा तर्क करने वालों को नहीं होता है ! जो मेरा अपर स्वरुप है ! वह अवतार लेने पर दृष्टिगोचर होता है ! संसार के समस्त भक्त सब प्रकार के पदार्थों से उस स्वरुप की पूजा अर्चा करते हैं ! जो मनुष्य मुझे जगत की उत्पत्ति स्थिति ओरसंघार का कारण समझ कर मेरी शरण लेता है ! उसके ऊपर कृपा करके में उसे संसार बंधन से मुक्त कर अपने पास बुला लेता हूँ ! मैं अव्यक्त परमेश्वर ही ब्रह्मा से लेकर छोटे से कीड़े तक में विद्यमान हूँ !मेरे हजारों मस्तक हजारों मुख हजारों नेत्र हजारों भुजाएं हजारों पेट हजारों जांघे और हजारों पैर हैं ! में पृथ्वी को सब और से धारण करके नाभि से दस अंगुल ऊँचे सबके ह्रदय में बिराजमान हूँ ! सम्पूर्ण प्राणियों में आत्म रूप से स्थित हूँ ! इसीलिए सर्व व्यापी कहलाता हूँ ! में अचिन्त्य, अनंत, अजर, अमर, अजन्मा ,अनादि, अवध्य, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वंद, निर्मम, निष्कल, निर्विकार, और मोक्ष का आदि कारण हूँ ! मेने ही अपने तेज से चार प्रकार के प्राणी समुदाय को स्नेह्पाश से बांधकर अपनी माया शक्ति से धारण कर रखा है ! भगवान ने कहा बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ! में तुम्हे यह दिव्य ज्ञान दे रहा हूँ ! कि भूत और भविष्य जो कुछ है वह सब में ही हूँ !जैसे भौतिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपनी बुद्धि को तदनुसार शिक्छित प्रशिक्छित करना पड़ता हैं ! !चाहे जलेबी बनाने का काम हो ! या कमीज बनाने का काम हो ! या परमाणु बम बनाने का काम हो !ये सभी और इसी प्रकार के सभी अन्य भौतिक कर्म बे ही व्यक्ति संपन्न कर सकते है ! जिन्होंने उन कर्मो को करने की शिक्छा प्राप्त की है ! उसी प्रकार परमसत्ता का अवतरण होता है ! और परमात्मा श्रीकृष्ण मनुष्य शरीर में परमशक्ति के अवतार हैं ! इस ज्ञान को धारण करने के लिए अपने मन बुद्धि चित्त अहंकार को संसार के लोभ मोह छल कपट पाखण्ड आदि से मुक्त कर शुद्ध पवित्र करना पड़ता है !फिर भक्ति के संस्कार को स्थापित करने के लिए उस परमशक्ति की पूजा आराधना उपासना शास्त्र विधि से करनी पड़ती है ! तब ईश्वर के जन्म कर्म की दिव्यता का अनुभव होता है !और मनुष्य इसीजीवन में परमानंद की प्राप्ति कर अंत में परमात्मा की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर परम गति या परम धाम को प्राप्त कर लेता है !
Tuesday, 7 July 2015
यः तु इन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन !कर्मेंद्रियः कर्मयोगम असक्तः स विशिष्यते !३(७) जो मनुस्य मन से इन्द्रियों पर नियंत्रण करके आसक्ति रहित होकर समस्त इन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है !वही श्रेष्ठ है !जो मनुष्य सार्वजानिक जीवन में महत्त्व पूर्ण पदों पर बैठे हुए है !और जो सामाजिक जीवन को संचालित करते हैं !उसकी व्यबस्था करते है ! गति प्रदान करते है ! और समाज पर जिनका प्रभाव भी होता है !यदि ऐसे लोग अपनी अवांछनीय शरीर पोषण और शरीर को पद प्रतिष्ठा धन संपत्ति प्रदान कराने की कुत्सित चेस्टाओं को निष्काम कर्मयोग और अनाशक्ति भाव से जोड़ कर सामाजिक पदों का कर्त्तव्य निर्वहन करें तो समाज को स्वर्गिक आनंद इसी पृथ्वी पर प्राप्त करने में विलम्ब नहीं लगेगा !अपने शरीर और परिवार की रक्षा सुरक्षा तो पशु पक्छी भी करते हैं !इसीलिए मनुष्य की विशेषता सिर्फ अपने शरीर और परिवार के पोषण में ही नहीं है !उसकी विशेषता तो सभी प्राणियों के लिए कल्याण कारी काम करने में हैं !मनुष्यों द्वारा किये गए कुछ काम काल और परिस्थिति के कारण अन्य सार्वजानिक सेवा के कार्यों से अधिक महत्त्व पूर्ण हो जाते हैं !आज के समय में मीडिया का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है !मीडिया जनता के विचारों का निर्माण भी करती है ! और देश समाज में होने वाली घटनाओ का प्रकाशन भी करती हैं !और कुछ घटनाओं को महत्त्व देती है ! और कुछ की उपेक्छा कर देती है !इस समय मीडिया लोकहित के दृष्टि कोण से हट कर अपने स्वार्थ पोषण में लगी हुई है ! मीडिया राजनेताओं फिल्म अभिनेताओं प्रभाव शाली भ्रष्ट लोगों क्रिकेट खिलाडियों हत्या लूट बलात्कार और नेताओं की स्तुति और निंदा आदि की चर्चा प्रमुखता से करता है !धर्म के छेत्र में राशिफल आदि को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है !मीडिया का काम सिर्फ पाठकों की रूचि के अनुसार समाचार आदि का ही प्रकाशन करना नहीं है !बल्कि पाठकों की रूचि को प्रसाक्छित कर परिमार्जित करना भी है !पर तंत्र भारत के समाचार पत्र सदाचार पात्र थे ! जिस से देश में स्वतंत्रता की भावना जगी थी !आज भी मीडिया को अपना पुराना रूप, स्वरुप जाग्रत करना चाहिए ! ताकि समाज सदाचार की और उन्मुख हो !जैसे समाचार पत्र खोज कर अपराधिक घटनाओं का प्रकाशन करते हैं !उसी प्रकार से उसको समाज के हर छेत्र के ईमानदार निष्काम कर्मयोगिओं के समाचार भी प्रकाशित करना चाहिए ! मनुष्य की श्रेष्ठता इस में हैं ! कि वह मन से अपनी अवांछनीय अनैतिक भोग वासनाओ पर नियंत्रण करे ! फिर शुद्ध भाव से लोक हित में समर्पित होकर अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कर्तव्य का निर्वहन करे ! और अपना जीवन भी आनंद मय बनाये और देश और समाज को भी अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व के अनुसार सुखी और संपन्न बनाये
Monday, 6 July 2015
बर्तमान काल में सम्भ्रान्त शव्द अब धनबान या पद प्रतिष्ठा का सूचक नहीं रह गया है !क्योँकि अब तो नेता मंत्री बड़े बड़े अधिकारी भी घोटालों, रिश्वत और कमीशन, हत्या, बलात्कार आय से अधिक संपत्ति के मामलों में जेल जा रहे हैं ! और सजा भी खा रहे हैं !अब पद पैसा या प्रतिष्ठा सम्भ्रान्त होने के लिए पर्याप्त नहीं है !जो लड़के लड़कियां ऊँचे होटलों में सेक्स रैकेट या नशाखोरी या रेव पार्टियों में पकडे जाते हैं !बे इन्ही तथाकथित सम्भ्रान्त लोगों की संताने होते हैं !आज सही मायने में संभ्रांत वह व्यक्ति है !जो अपने कर्त्तव्य कर्मों का निर्बहन बिना किसी लोभ लालच के कर रहा है ! !बाकी के संभ्रांत कहलाने वाले लोग सिर्फ गलत अर्थों में सम्भ्रान्त है !बे वास्तव में उद्भ्रान्त है सम्भ्रान्त नहीं हैं !
Sunday, 5 July 2015
महाभारत का युद्ध द्वापर के संध्याकाळ में हुआ था ! अर्थात द्वापर का अंत होने वाला था और कलियुग का प्रारम्भ होने वाला था !भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के साथ ही कलियुग आगया था ! महाभारत काल आज जे युग से अधिक शक्ति संपन्न था !किन्तु वह शक्ति भौतिक पदार्थों के उपयोग और प्रयोग से निर्मित नहीं थी !वह शक्ति आत्मसाधना की शक्ति से प्राप्त थी !युधिस्ठर जब अपने भाईओं के साथ बनवास में थे तो उनके गुरु धौम्य ने सूर्य उपासना से उन्हें ताम्बे की बटलोई प्रदान करायी थी !जिसका पका हुआ भोजन तब तक ख़त्म नहीं होता था ! जब तक अंतिम भोजन करने वाले के रूप में द्रौपदी भोजन नहीं कर लेती थी !इसी प्रकार जब युधिस्ठर काम्यक बन में निवास कर रहे थे !तब उनको लोमश ऋषि का दर्शन हुआ था !और लोमश ऋषि ने उनको अनुस्मृति विद्या प्रदान की थी उस अनुस्मृति विद्या के प्रभाव से बे भूत भविष्य की सभी घटनाओं को प्रत्यक्छ देख लेते थे ! जब धृत राष्ट्र ने युधिस्ठर से युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या पुंछी तो युधिस्ठर ने धृतराष्ट्र को संपूर्ण मृत सैनिको की संख्या और गायब हुए सैनिकों की संख्या भी बता दी थी ! धृतराष्ट्र के प्रश्न के उत्तत में उन्होंने यह भी बता दिया था ! कि मृत्यु के बाद किस सैनिक को कौन सी गति प्राप्त हुई थी !यह आत्मशक्ति से प्राप्त अनुस्मृति विद्या का प्रताप था !महाभारत ग्रन्थ इस तरह की आत्मसाधना से प्राप्त शक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है !यह सिर्फ महाभारत युद्ध का वर्णन करने वाला मात्र कथानक ही नहीं है !इसमें अत्यंत गूढ आध्यात्मिक रहस्यों का भी वर्णन हुआ है !और इस ग्रन्थ में ८८०० ऐसे गूढ श्लोक हैं जिनका अर्थ सिर्फ व्यासदेव या सुखदेव ही जानते है !आत्मशक्ति के लिए जिस सत्त्व संशुद्धि की आवश्यकता है उसका ज्ञान कराने वाला गीता शाश्त्र भी महाभारत में ही है !
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन !इन्द्रियराथान बिमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते !---अंदर मन से भौतिक भोग की वस्तुओं का चिंतन स्मरण करना और बाहर से उनका त्याग करना !ये ढोंग पाखंड और मिथ्याचार को जन्म देता है !और ऐसे लोगों के द्वारा समाज का बहुत अधिक नुक्सान होता है !जो लोग समाज सेवा का लबादा ओढ़ कर शाशन और समाज सेवा के लिए निर्मित संस्थाओं में प्रवेश कर जाते हैं बे संस्थाओं को अपने छुद्र स्वार्थों की पूर्ति का साधन बनाकर संस्थाओं का मूल उद्देश्य ही नष्ट कर देते हैं !इसके स्पष्ट उदाहरण समाज में हमें हर कदम पर दिखाई देते हैं !इन छुद्र स्वार्थी सफ़ेद और रंग बिरंगे बस्त्रों में सजे संबरे चेहरों में ! मीठी दम्भ पाखण्ड युक्त वाणी में ! और इसी रूप स्वरुप में राजनीति में समाज सेवा की बिभिन्न संस्थाओं में छलकपट पूर्वक किये गए भूतकाल में उत्पन्न हुए महापुरुषों की जीवन गाथाओं के लेखन समरण आदि सभी कार्यों में स्वार्थ की असहनीय दुर्गन्ध छिपी रहती है !भगवान श्री कृष्णा कहते हैं1 कि इनका यह समाज सेवा का बाह्य भौतिक भोगों का त्याग मिथ्याचार और ढोंग है !ये तथाकथित समाज सेवी अक्छर ज्ञान के ज्ञाता होते है !प्रभावशाली ढंग से अपनी बात भी युक्ति युक्त ढंग से रखने की कला के विशेषज्ञ होते हैं !इनकी उपमा उस गीध से दी जा सकती है जो आकाश में अन्य पक्छियों की अपेक्छा उचाई पर उड़ता है ! किन्तु उसकी नजर नीचे पड़े हुए मांश के लोथड़े पर होती है !इन लोगों की सामर्थ्य और शक्ति का मुकाबला सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता है !क्योंकि ये जीवन के सभी महत्त्व पूर्ण छेत्रों में प्रभावी होते हैं !इनके सुधरने के दो ही उपाय हैं !इन स्वार्थनिष्ठ व्यक्तियों के द्ववारा अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए सार्वजानिक हित के कुछ अच्छे काम भी होते हैं !और इनके साथ स्वार्थ पूर्ति के लिए जनता के कुछ महत्त्व पूर्ण लोग भी जुड़े रहते हैं !इनका धार्मिक आयोजन कराने में भी महत्त्व पूर्ण योगदान होता है !और ये महापुरुषों के नाम से संस्थाएं भी खोलते और चलाते हैं !अगर इन सबके साथ इनके दिल दिमाग में महापुरुषों की जीवन चर्या सदाचरण त्याग आदि प्रवेश कर जाय ! तो यह अपनी प्रतिभा और प्रयत्न तथा कर्मनिष्ठा से सामाजिक संस्थाओं को उनका वास्तविक जन हित कारी स्वरुप भी प्रदान करा सकते हैं !इनको सुधारने का यह महामंत्र इन्ही के पास है !दूसरा सुधार का उपाय काल करता है !और इनको जड़ मूल से नष्ट कर देता है !शक्तिशाली राजतन्त्र भी राजाओं की असीमित भोगलिप्सा और स्वार्थ निष्ठां के कारण जड़मूल से समाप्त हो गया !उसके स्थान पर यह लोकतान्त्रिक व्यबस्था का जन्म हुआ !यदि यह भी जनहित के कार्य लोकतान्त्रिक पद्धति से नहीं करेगी तो काल इसको भी नष्ट कर देगा !इसीलिए जिम्मेदार लोगों को बाहर का संयम्य और अंदर से अनुचित अवैधानिक अन्याय से उपार्जित भोगों का त्याग कर देश और समाज के लिए अपनी स्वार्थ निष्ठ शक्ति और प्रतिभा तथा सामर्थ्य का उपयोग लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत और देश के लिए उपयोगी बनाने के लिए करना चाहिए !बुद्धि शक्ति सामर्थ्य प्रतिभा इन मिथ्याचारियों के पास है बस इनको इनसब शक्तियों को लोकहित कारी बनाकर मिथ्याचार से मुक्त करना है !
नियतं कुरु कर्म त्वम् ३(८)----नियत कर्त्तव्य कर्म मनुष्यों को स्वेक्छा ,परिस्थति या विरासत में प्राप्त होते हैं !अगर कोई व्यक्ति राजनीति में प्रवेश करना चाहता है !तो उसका राजनीति में प्रवेश स्वेक्छिक कर्म होगा !इसीलिए राजनैतिक कर्म ही उसका नियत कर्त्तव्य कर्म होजायेगा !अब उसकी यह जिम्मेदारी हो जायेगी की वह राजनैतिक कर्तव्य कर्म पूरी निष्ठा नियम कानूनो का पालन करते हुए राजनैतिक पद का उपयोग देश और समाज सेवा में लगाए !राजनीति में उसकी ईमानदारी का श्री गणेश किसी निर्वाचित पद की उम्मेदबारी से शुरू होता है !चुनाव लड़ने वाले के लिए यह वैधानिक रोक होती है !कि वह मतदाताओं को लोभ लालच ना दे , लोगों को अपनी स्वेच्छा से मत देने दे !झूठे वायदे ना करे और जातिबाद का सहारा न ले !किन्तु कोई भी नेता इस प्रथम शर्त का पालन नहीं करता है !मतदाताओं को शराब वस्त्र रूपया भोजन आदि खुले आम दिया जाता है !दबंग उम्मीदवार मतदाताओं को मत नहीं डालने देते हैं !खुद ही अपने गुंडों से अपने पक्छ में मत डलवा लेते हैं !जाति और झूठ का सहारा लेकर चुनाव जीत जाते है !चुने जाने के बाद देश सेवा और समाज सेवा लुप्त रहती है !रुपया कमाना ही मुख्य उद्देश्य हो जाता हैं !इसीलिए नेता लोग या उनके समर्थक ही जल जंगल जमीन और खनिज आदि के साथ सड़क पुल भवन निर्माण आदि के ठेके ले लेते है और स्वीकृत मानदंडो के अनुसार कार्य नहीं करते हैं !इन अवैधानिक कामों में भ्रष्ट अधिकारी उनके सहयोगी बनकर खुद भी रुपया कमाते हैं ! इस बेईमानी से उपार्जित धन से बे बार बार चुनाव लड़ते और जीतते हारते रहते हैं!इस प्रकार राजनीति समाज और देश के हित में ना रहकर बेईमान लोगों के अनैतिक कार्यों की स्वार्थ पोषक हो जाती है !इस प्रकार की राजनीति ग्राम पंचायत से लेकर स्वेक्छिक संगठन तक में प्रवेश कर जाती है !और देश और समाज का स्वस्थ ताना बाना नष्ट कर देती है !और जागरूक लोग इस राजनीति का विकल्प खोजना शुरू कर देते हैं !विकल्प स्वरुप का नहीं ऐसे व्यक्तियों का खोजना चाहिए जो अपने नियत कर्त्तव्य का निष्ठा पूर्वक पालन करें !दोष स्वरुप का नहीं है ! दोष उन मनुष्यों में है ! जो स्वरुप के अनुरूप कर्तव्य कर्म नहीं करते हैं !कोई भी कर्तव्य कर्म छोटा बढ़ा, महत्त्व पूर्ण या कम महत्त्व का नहीं होता है !सभी नियत कर्तव्य कर्म करना जरुरी होते हैं !समाज का गठन पारस्परिक सहयोग और समझौते से होता है !और उसका संचालन कर्त्तव्य रूप नियत कर्मों से होता है !न्यायाधीश अपराधी को मृत्युदंड देता है ! यह न्यायाधीश का नियत कर्म है !और जल्लाद उसको सूली पर चढाता है !यह जल्लाद का नियत कर्त्तव्य कर्म है !अगर जल्लाद अपने नियत कर्त्तव्य का पालन न करे तो न्यायाधीश का आदेश निरर्थक हो जाएगा !गीता कहती है प्रत्येक व्यक्ति को अपने नियत कर्त्तव्य का पालन अवश्य करना चाहिए !समाज में ओरदेश के अधिकांश छेत्रों में जो अव्यवस्था और भ्रष्टाचार अनैतिकता अधर्म हिंसा आदि के जो घनीभूत आक्रमण हो रहे है और स्वार्थ का घटाटोप अन्धकार छाया हुआ है ! !उसका एकमात्र कारण यह है कि जिम्मेदार लोग अपने नियत कर्तव्यों का निष्ठा पूर्वक पालन नहीं कर रहे हैं !
Friday, 3 July 2015
दो पक्छों के मध्य वाद विवाद में समचित्त रहना तटस्थस्ता कहलाती है! काम जय वासनाछीन होने से सधता है !स्वामी विवेकानंद का नाम विदिविशाननद था ! जिसका अर्थ होता है जो अभी मार्ग में है ! और मंजिल पर नहीं पहुंचा है !विवेकानंद नाम उनको खेत्री के राजा ने दिया था ! जो उनका परमभक्त था ! काम वासना को जीतने के लिए उसका प्रतिरोधी भाव विकसित करना पड़ता है !और उसको शत्रु के सद्र्स्य समझना पड़ता है !अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया था ! कि मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती पकडे हुए की तरह किस से प्रेरित होकर पाप कर्म करता है ३(३६) !भगवान श्री कृष्णा ने कहा था काम ही पाप का कारण है ! इसकी कभी तृप्ति नहीं होती है ! यही महापापी है ! इसको ही तू अपना दुश्मन समझ ३(३७) ! यह काम इन्द्रियों मन बुद्धि में रहता है ! और यह काम इन्ही के द्वारा विवेक बुद्धि को ढक कर मोहित कर विवेक बुद्धि अर्थात अच्छी बुरे के भेद को समझने की शक्ति का नाश कर देता है ३(४०) इसीलिए सन्यासियों, संतो को इन्द्रियों को बस में करके इस ज्ञान और विज्ञानं के नाश करने वाले महान पापी काम को ज्ञान पूर्वक की गयी साधना और सावधानी से मारना पड़ता है !सभी श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वालों को इस साधना से गुजरना पड़ता है !स्वामी विवेकानंद को भी इस कामजय की साधना से गुजरना पड़ा था !
यज्ञार्थ कर्मणो अन्यत्र लोकोअयम् कर्मबन्धनः ! तदर्थम कर्म कौन्तेय मुक्त संगह समाचर !३(९)यज्ञ को भ्रम वश कुछ लोगों ने सिर्फ घी , हवन सामग्री आदि को प्रज्वलित अग्नि में मन्त्रों के द्वारा आहुति देने तक ही सीमित कर दिया है !और यज्ञ को मात्र भौतिक मनोवांछित बस्तुओं की प्राप्ति का स्वार्थ युक्त साधन बना दिया है !महाभारत में व्यासदेव ने कहा है कि शराब आसव मछली तथा तिल चावल की खिचड़ी इन सब वस्तुओं को धूर्तों ने यज्ञ में प्रचलित किया है! वेदों में इनका विधान नहीं है !जो यज्ञ कर्ता यज्ञ के वास्तविक अर्थ को जानते हैं बे यज्ञों में परम शक्ति का ही विधि विधान से आवाहन करते हैं !शुद्ध आचार विचार वाले महान सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध वासना से फल खीर आदि ही प्रसाद रूप में परमात्मा को अर्पित करते हैं !आजकल भी यज्ञ का विकृत स्वरुप देखने में आता है !इन तथाकथित यज्ञों के माध्यम से स्वार्थनिष्ठ यज्ञ करने वाले अनेक प्रकार से परमशक्ति का अनादर करते देखे जाते हैं !इसीलिए यज्ञ के अनुष्ठान में विपरीत फल भी देखने को मिलते हैं !कई यज्ञों में विधि विधान का यथोचित पालन न करने से श्रद्धालुओं की मौत भी हो जाती है !यज्ञ करने वालों ने यज्ञ को मजाक बना दिया है ! और यज्ञ का लोकहितकारी स्वरुप नष्ट कर दिया है ! यहाँ योग का वास्तविक अर्थ और मर्म बताया गया है !यज्ञ से अत्यंत उदात्त लोकहित कारी बृत्ति का उदय होता है ! और स्वार्थ निष्ठा नष्ट होती है !यज्ञ का वास्तविक अर्थ कर्तव्य कर्मों का अनासक्त भाव से निर्बहन करना है !कर्तव्य कर्मों के करने से लोकव्यबस्था सुचार रूप से चलती है !किन्तु कर्तव्य कर्म जब निष्काम भाव से फलेक्छा के त्याग के साथ किये जाते हैं ! तब कर्त्तव्य पालन करने वाले व्यक्ति को अद्भुत आंतरिक आत्मशांति की प्राप्ति होती है ! और उसकी कार्य छमता में भी आश्चर्यजनक विकास होता है !और उसको जन्म मरण से मुक्ति का उपाय भी सुलभता से प्राप्त हो जाता है !संसार में कुछ भी स्थिर स्थायी नहीं है ! सब कुछ विनाश की और जा रहा है !जिस शरीर से कर्तव्य कर्मों का निर्वहन किया जा रहा है वह भी हर दिन मृत्यु की और जा रहा है !यह बात उसके चित्त में स्थान लेने लगती है !इसीलिए निष्कर्ष रूप में यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि --(१)संसार में शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है !(२)मुझे कुछ भी नहीं चाहिए !(३)मुझे सिर्फ अपने ही शरीर के पोषण के लिए कुछ भी नहीं करना है !मेरे प्रत्येक कर्म का अधिष्ठान संपूर्ण प्राणियों का हित और कल्याण है !यज्ञ (कर्त्तव्य पालन )के लिए किये जाने वाले कर्मो से अन्यत्र (अपने स्वार्थ के लिए किये जाने वाले )कर्मों में लगा हुआ मनुष्य समुदाय कर्मो से आसक्ति मोह स्वार्थ आदि बंधनो से बंधकर अपनी आत्मशांति को नष्ट करता है ! लोकव्यबस्था को बिगाड़ता है !और समाज के लिया महान हानिकर सिद्ध होता है !इसिलए कहा गया है कि मनुष्य समुदाय को आसक्ति रहित होका यज्ञ अर्थात कर्तव्य पालन करना चाहिए !जिस से भोग और योग दोनों की प्राप्ति होतीहै !
यह एक दुर्घटना है !जो दो कारों के मध्य हुई है !दुर्घटना में लापरबाही हेमा के ड्राइवर की है या आल्टो कार के चालक की है या दोनों चालकों की है यह न्यायलय तय करेगा !सलमान खान के प्रकरण में और इस प्रकरण में बहुत फर्क है !सलमान के पास ड्राइविंग लायसेंस नहीं था !उन पर शराब पीकर गाड़ी चलाने का आरोप था !इस प्रकरण में ड्राइवर पर ये आरोप नहीं है !सिर्फ लापरबाही और तेज गति से बाहन चलाने का आरोप है !इसीलिए उसके विरुद्ध ३०४अ २७९ ३३७ ३३८ के अंतर्गत प्रकरण दर्ज हुआ है !और ये सभी धाराएं जमानती है !हो सकता है !हेमा के ड्राइवर की तरफ से भी आल्टो चालक के विरुद्ध ऍफ़ आई आर दर्ज करायी जाय !हेमामालिनी पर जो उपेक्छा के आरोप लगाए जा रहे हैं !उनकी चोटों को देखते हुए ये आरोप ठीक प्रतीत नहीं होते हैं !चित्रों में उनकी चोटों से खून निकलता दिखाई दे रहा है !अगर खून निकलना बंद तत्काल नहीं किया जाता तो हेमा मालिनी की जान को भी खतरा हो सकता था !इसके अतिरिक्त हेमा अपनी चोटों के कारण कितनी चोटिल थी ! और उनको कितना गंभीर समझ रही थी !इसका अनुमान उन पर उपेक्छा करने बाले नहीं लगा सकते हैं !उस समय की परिश्थिति में हेमा मालिनी की मनः स्थिति क्या थी ?उन्हें घायल बच्ची की गंभीर चोटों की जानकारी थी या नहीं ?यह बात तो सिर्फ वही बता सकती हैं !यह एक दुर्घटना थी !इसके दूसरे तीसरे अर्थ निकालना ठीक नहीं है !अगर हमारी सहानभूति घायलों और मृत बच्ची के साथ है ! तो हम सबको हेमा मालिनी और खण्डेलवाल परिवार के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना परमात्मा से करनी चाहिए
कोई भी घोटाला हो उसमे सत्ताधारी ताकतबर नेताओं की अहम भमिका और भ्रष्ट अधिकारियों का सहयोग और ईमानदार अधिकारीयों की चुप्पी होती है !इसिलए जब जाँच शुरू होती है !तो उसमे भी ऐसे अधिकारीयों को शामिल किया जाता है जो घोटालेबाजों को क्लीन चिट देने की कोशिश करने वाले होते हैं !किन्तु जाँच में कुछ ऐसे तथ्य उजागर हो जाते हैं ! जिनको जाँच अधिकारी घोटाला करने वालों के पक्ष में नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं !इसीलिए व्यापम घोटाले में अबतक बहुत से लोगों की हत्या हो चुकी है !और अब जांच अधिकारीयों को भी जान से मारने की धमकी दी जारही है !राज्य सरकार पर पक्ष पात के गंभीर आरोप लगाये जा रहे है !स्वयं मुख्यमंत्री की भी संलिप्तता बतायी जा रही है !ऐसे में न्यायय हित में अच्छा तो यह होता की जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी को सौंप दी जाती !व्यापम घोटाला बड़ी मात्रा में हुआ है !इस घोटाले में राज्य सरकार क मंत्री और बड़े अधिकारी शामिल रहे हैं !यह भी कुछ हद तक जाँच से सिद्ध हो चूका है !अब जो जाँच चल रही है !इसमें मुख्यमंत्री सहित अन्य बरिष्ठ अधिकारी जांच के घेरे में है !इसीलिए अब जांच एजेंसी पर सभी प्रकार के दबाव डाले जाएंगे
Wednesday, 1 July 2015
स एवायं मया ते अद्द्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोअसि में सखा चेति रहस्यम हि एतत उत्तमम् !४(३) भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्मयोग की अनादि परम्परा बता रहे हैं ! जो विद्यायें कर्म का सम्पादन करती हैं ! उन्ही के फल दिखाई देते हैं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म का फल हीं प्रत्यक्छ देखने में आता है ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पीकर हीं शांत होता है ! उसे जानकार नहीं ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो कर्म से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सूर्य देव आलस्य त्याग कर कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं ! इसीलिए जीवन के सभी छेत्रों में मनुष्यों के लिए कर्म करने की प्रधानता है ! यदि कोई व्यक्ति सन्यासी हो गया है तो उसे भी अपने जीवन में भोग वासनाएं और कामनाओं को नष्ट करने के लिए साधनाएं करनी पड़ती हैं ! और ये साधनाएं ही उसका जीवन का प्रधान कर्म बन जाती हैं ! यदि सन्यासी वासनाओं और कामनाओं का नाश नहीं करता है ! और सिर्फ सन्यासी का वेश धारण कर लेता है तो वह बस्तवीक सन्यासी नहीं है ! उसी प्रकार कर्म की आवश्यकता आत्मज्ञानी को भी है ! कर्मके बिना कोई भी व्यक्ति एक छन भी नहीं रह सकता है ! और ना हीं उस व्यक्ति का जीवन चल सकता है ! इसीलिए किसी भी स्थिति में कर्मका त्याग संभव नहीं है ! हाँ कर्म को मोक्ष के लिए भी !और संसार में रहने के लिए भी ! और संसार को व्यबस्थित रूप से चलाने के लिए भी कर्म को तदनुसार आचरणमे सतत उतारने की आवश्यकता है ! और कर्म को सतत आचरण में उतारने की विधि गीता बताती है ! कि सभी कर्म अनासक्त भाव से राग द्वेष से मुक्त होकर सुख दुःख से ऊपर उठकर हानि लाभ की चिंता न कर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन की दृष्टि से किये जाते हैं ! वही कर्म समाज को व्यबस्थित करते हैं ! और मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं ! और कर्म बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष प्रद हो जाते हैं ! इसी अनादि कर्म परंपरा का उपदेश गीता में दिया गया है !
इमं विवस्ते योगम प्रोक्तवान् अहम अव्ययम् ,विवस्वान मनुबे प्राह ,मनुः इकछाब बे ब्रबीत ४(१) आजकल जिस योग का प्रचार बहुत जोर शोर से किया जा रहा है! वह वास्तव में पूर्ण योग नहीं है !आसन प्राणायाम आदि बहिरंग योग है ! इनके करने से रोगों की निवृत्ति होती है ,शरीर स्वस्थ होता है !किन्तु चित्त की शुद्धि और भोग बृत्ति का नाश नहीं होता है !जब तक व्यक्ति की जीवनचर्या और आचरण में अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का प्रवेश नहीं होता है ! तब तक उसकी जीवन यात्रा पूर्ण योग की और प्रस्थान नहीं करती है !जब तक मनुष्य के अंतःकरण में भोगों की कामना और भौतिक पदार्थों की सत्ता महत्ता है! और अपने कर्मों से अपने यश कीर्ति मान आदि प्राप्त करने की इक्छा आकांछा है तब तक वह कामना जनित संकल्पों का त्याग नहीं कर सकता है ! और कामना जनित संकल्पो का त्याग किये बिना वह ज्ञान योगी, ध्यानयोगी, हठयोगी ,कर्मयोगी ,भक्ति योगी ,आदि कोई सा भी योगी नहीं हो सकता है ! वह वास्तव में योगी के भेष में भोगी ही होता है !इसलिए वर्तमान समय में योग भी भौतिक भोगों की प्राप्ति का बहुत बड़ा साधन बन गया है !लोगों ने योग की दुकाने खोल ली है !और १०, ५ योगासन प्राणायाम कराकर अकूत धन संपत्ति प्रतिष्ठा आदि प्राप्त कर रहे हैं !इन तथाकथित योग के व्योपरियों में सत्य अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का नाम निशान भी नहीं दिखाई देता है !ये तथाकथित योगी बड़ी बड़ी कारों में घूमते हैं !बहुत विलासता युक्त जीवन जीते हैं !इनके अधिकाँश चेले चपाटे अनियमित कामजनित भोगविलास युक्त जीवन जीने के कारणरुग्ण और अनैतिक उपायों से धन संग्रह के कारण व्यथित चित्त होते हैं ! ये ही इनके चेले इनको अनीति से उपार्जित धन आदि देते हैं ! यहाँ भगवान श्री कृष्ण जिस अविनाशी योग का उपदेश कर रहे हैं !वह निष्काम कर्मयोग है !निष्काम कर्म योग का साक्छात उदहारण सूर्य है !जिसके उदय होते ही अन्धकार का नाश हो जाता है !और प्राणिमात्र में जीवन का संचार होजाता है !किन्तु सूर्यसब कुछ देता है किन्तु अपनी सेवाओं के बदले कुछ भी नहीं लेता है !निर्लिप्त भाव से बिना किसी भेद भाव के सभी को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करता है !सर्वप्रथम निश्वार्थ सेवा का ज्ञान परमात्मा से सूर्य को प्राप्त हुआ !फिर सूर्य से मनु को प्राप्त हुआ !और मनु से इकछाबाकु आदि राजऋषिओं को प्राप्त हुआ !!इस प्रकार यह निश्वार्थ निष्काम कर्मयोग की परम्परा प्रारम्भ हुई ! जैसे धूल का एक कण भी पृथ्वी का ही अंश होता है !उसीप्रकार श्रष्टि का प्रत्येक प्राणी इस विशाल ब्रह्माण्ड का ही एक अंग है !इसी भाव से जो लोग अपना जीवन यापन करते हैं !और प्राणिमात्र की सेवा में अपनी संपूर्ण सामर्थ्य और साधन सामग्री तथा शरीर को लगा देते हैं बे ही सच्चे योगी होते हैं !उनकि दृष्टि मेँ सब मेँ बे और सब उनमे होते हैं !इसीलिए उनके जीवन में भोग को भोगने की अवांछित कामना का नाश हो जाता है अनैतिक भौतिक पदार्थों केसंग्रह की इक्छा का भी अभाव हो जाता है !उनकी मन बुद्धि चित्त की संपूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्र की सेवा में अर्पित हो जाती हैं !यह अविनाशी योग है जिसकी सिद्धि निष्काम कर्म से होती है !इसी को निष्काम कर्मयोग कहते हैं !और सूर्य इसका ज्वलंत उदाहरण है !
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