Sunday, 5 July 2015

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन !इन्द्रियराथान  बिमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते !---अंदर मन से भौतिक भोग की वस्तुओं का चिंतन स्मरण करना और बाहर से उनका त्याग करना !ये ढोंग पाखंड और मिथ्याचार को जन्म देता है !और ऐसे लोगों के द्वारा समाज का बहुत अधिक नुक्सान होता है !जो लोग समाज सेवा का लबादा ओढ़ कर शाशन और समाज सेवा के लिए निर्मित संस्थाओं में प्रवेश कर जाते हैं बे संस्थाओं को अपने छुद्र स्वार्थों की पूर्ति का साधन बनाकर संस्थाओं का मूल उद्देश्य ही नष्ट कर देते हैं !इसके स्पष्ट उदाहरण समाज में हमें हर कदम पर दिखाई देते हैं !इन छुद्र स्वार्थी सफ़ेद और रंग बिरंगे बस्त्रों में सजे संबरे चेहरों में ! मीठी दम्भ पाखण्ड युक्त वाणी में ! और इसी रूप स्वरुप में राजनीति में समाज सेवा की बिभिन्न संस्थाओं में छलकपट पूर्वक किये गए भूतकाल में उत्पन्न हुए महापुरुषों की जीवन गाथाओं के लेखन समरण आदि सभी कार्यों में स्वार्थ की असहनीय दुर्गन्ध छिपी रहती है !भगवान श्री कृष्णा कहते हैं1 कि इनका यह समाज सेवा का बाह्य भौतिक भोगों का  त्याग मिथ्याचार और ढोंग है !ये तथाकथित समाज सेवी अक्छर ज्ञान के ज्ञाता होते है !प्रभावशाली ढंग से अपनी बात भी युक्ति युक्त ढंग से रखने की कला के विशेषज्ञ होते हैं !इनकी उपमा उस गीध से दी जा सकती है जो आकाश में अन्य पक्छियों की अपेक्छा उचाई पर उड़ता है ! किन्तु उसकी नजर नीचे पड़े हुए मांश  के लोथड़े पर होती है !इन लोगों की सामर्थ्य और शक्ति का मुकाबला सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता है !क्योंकि ये जीवन के सभी महत्त्व पूर्ण छेत्रों में प्रभावी होते हैं !इनके सुधरने के दो ही उपाय हैं !इन स्वार्थनिष्ठ व्यक्तियों के द्ववारा अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए सार्वजानिक हित के कुछ अच्छे काम भी होते हैं !और इनके साथ स्वार्थ पूर्ति के लिए जनता के कुछ महत्त्व पूर्ण लोग भी जुड़े रहते हैं !इनका धार्मिक आयोजन कराने में भी महत्त्व पूर्ण योगदान होता है !और ये महापुरुषों के नाम से संस्थाएं भी खोलते और चलाते हैं !अगर इन सबके साथ इनके दिल दिमाग में महापुरुषों की जीवन चर्या सदाचरण त्याग आदि प्रवेश कर जाय ! तो यह अपनी प्रतिभा और प्रयत्न तथा कर्मनिष्ठा से सामाजिक संस्थाओं को उनका वास्तविक जन हित कारी स्वरुप भी  प्रदान करा सकते हैं !इनको सुधारने का यह महामंत्र इन्ही के पास है !दूसरा सुधार का उपाय काल करता है !और इनको जड़ मूल से नष्ट कर देता है !शक्तिशाली राजतन्त्र भी राजाओं की असीमित भोगलिप्सा और स्वार्थ निष्ठां के कारण जड़मूल से समाप्त हो गया !उसके स्थान पर यह लोकतान्त्रिक व्यबस्था का जन्म हुआ !यदि यह भी जनहित के कार्य लोकतान्त्रिक पद्धति से नहीं करेगी तो काल इसको भी नष्ट कर देगा !इसीलिए जिम्मेदार लोगों को बाहर का संयम्य और अंदर से अनुचित अवैधानिक अन्याय से उपार्जित भोगों का त्याग कर देश और समाज के लिए अपनी स्वार्थ निष्ठ शक्ति और प्रतिभा तथा सामर्थ्य का उपयोग लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत और देश के लिए उपयोगी बनाने के लिए करना चाहिए !बुद्धि शक्ति सामर्थ्य प्रतिभा इन मिथ्याचारियों के पास है बस इनको इनसब शक्तियों को  लोकहित कारी बनाकर मिथ्याचार से मुक्त करना है !

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