ज्ञान चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक उसकी प्राप्ति बिना गुरु के मार्गदर्शन के नहीं होती है !भौतिक शिक्छण प्रदान करने वाले गुरु को तो कुछ आवश्यक शिक्छण कार्य के लिए आहर्ताएँ प्राप्त करनी पड़ती हैं !किन्तु धार्मिक गुरुओं को तो आस्था श्रद्धा और परंपरा से ही स्वीकार किया जाता है !श्रद्धा और आस्था किसी तर्क से सिद्ध नहीं की जा सकती है !उसको तो अंधविश्वास की हद तक सिर्फ विश्वाससे ही प्राप्त करना पड़ता है !इस आस्था विश्वास और श्रद्धा का लाभ आजकल सभी छेत्रो में और सभी प्रकार के लोगों में दाम्भिक लोग उठा रहे हैं ! ऐसे कपटी और कुटिल गुरुओं से बचपाना बहुत कठिन है !साधु, महात्मा, ज्ञानी, भक्त ,आदि सभी वेशों में बदमाश लोग घुस गए हैं ! और अपने बुरे आचरणों से इन पवित्र रूपों और नामों को कलंकित कररहे हैं ! इसीलिए बहुत सोच समझ कर परिणाम पर ध्यान देकर ही किसी को गुरु बनाना चाहिए ! गुरु बनाने के पहले शिष्य बनने की योग्यता पैदा करनीचाहिए ! भगवान श्रीकृष्ण ने गीता ४ (३४)में कहा है कि आत्मज्ञान को तत्त्व ग्यानी महापुरुषों के पास जाकर उनके समक्छ बाह्य रूप से आदर प्रदान करने के प्रतीक शाष्टांग दंडबात प्रणाम करना चाहिए ! और अपना संपूर्ण व्यक्तित्त्व मनसा ,वाचा, कर्मणा गुरु चरणो में अर्पित कर देना चाहिए ! और फिर उनकी आज्ञा को शिरोधार्य कर सरलता पूर्वक अज्ञानी की तरह निष्कपट और निराभिमानी होकर उनसे आत्मज्ञान की प्राप्ति की लिए प्रश्न करना चाहिए ! फिर बे तत्त्व दर्शी गुरु शिष्य की समस्त आध्यात्मिक शंकाओ का निबारण कर उसको आत्मज्ञान प्रदान करेंगे !आत्मा के ज्ञान में ही संसार का भौतिक ज्ञान भी समाहित है !इस प्रकार कोई तत्त्व ग्यानी गुरु ही शिष्य को अज्ञान अन्धकार से निकालकर सत पथ की और अग्रेसित कर सकता है !गुरु को सिर्फ शास्त्रों का शब्द ग्यानी ही नहीं होना चाहिए ! बल्कि उसे शाश्त्रों में निहित आत्मज्ञान का अनुभवी भी होना चाहिए !जो गुरु शाश्त्र ज्ञानी के साथ तत्त्व ग्यानी भी है !वही सच्चा और वास्तविक गुरु है !यदि ऐसा गुरु प्राप्त ना हो सके तो बो गीता रामायण उपनिषद आदि को ही अपना गुरु बनाकर अपने जीवन में भुक्ति ,मुक्ति और भोग की प्राप्तिकर अपना जीवन सफल बना सकता है !
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