Monday, 13 July 2015

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ७(१९) !सभी धर्मों के मुख्य विषय भगवान हैं !किन्ही धर्मों में ईश्वर को श्रष्टि का निर्माता पालन पोषण कर्ता आदि के रूप में स्वीकार किया गया है !कुछ धर्म ईश्वर को तो मानते है किन्तु उसे श्रष्टि का कर्ता भोक्ता आदि नहीं मानते हैं !परमात्मा के असितत्त्व को आस्ति और नास्ति के विविध रूपों में सभी धर्म स्वीकार करते हैं !ईश्वर के स्वरुप आदि का वर्णन विवेचन अनेक प्रकार से साधु, सन्यासी, महात्मा ,प्रवचन कर्ता, कथावाचक आदि करते रहते हैं !सामान्य जन भी पाप पुण्य , लाभ हानि, जन्म मरण के देने वाले के रूप में ईश्वर को मानते हैं !किन्तु उस ईश्वर का वास सब में हैं !इस बोध को प्राप्त कर तदनुसार ईश्वर समपित जीवन जीने वाले महात्मा मुश्किल से प्राप्त होते हैं ! भगवान समस्त प्राणियों के निवास स्थान हैं ! तथा वे सब भूतो में वास करते हैं ! इसलिए बे बासु कहलाते हैं ! तथा बे ही देवताओं की उत्पत्ति के स्थान होने के कारण और समस्त देवता उनमे वास करते हैं ! इसलिए उन्हें देव कहा जाता है ! अतएव भगवान का नाम बासुदेव है !बासुदेवः सर्वं यह गीता का सर्वोत्कृष्ट उपदेश है ! क्योँकि यही वास्तविकता भी है ! संपूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में अपरा और परा ---इन दोनों प्रकृतियों का संयोग ही कारण है ! पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पांच महाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार यह आठ प्रकार की परमात्मा की अपरा प्रकृति है ! और इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीव रूप बनी हुई भगवान की परा प्रकृति है ! इन्ही दो शक्तियों से भगवान जगत के प्रभव और प्रलय हैं ! अर्थात संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाले और जगत रूप में उत्पन्न होने वाले  हैं !और भगवान ही जगत का नाश करने वाले, और बे ही जगत रूप में नाश होने वाले हैं ! क्योँकि जगत के उपादान कारण भी भगवान है ! और निमित्त कारण भी वही है ! इसलिए इस जगत का कोई दूसरा कारण तथा कार्य नहीं है ! जैसे सूत की  मणिया और सूत के  धागा के रूप भिन्न भिन्न होते हैं ! किन्तु उनमे सूत के सिवाय और कुछ नहीं होता  है इसी प्रकार मणि रूप अपरा (जड़ )प्रकृति और धागा रूप परा (जीव )प्रकृति दोनों में एक भगवान ही परिपूर्ण है ! अर्थात एक भगवान के सिवा  अन्य कुछ नहीं है ! बास्तविक दृष्टि से देखें तो ना धागा है ! और ना मणिया है केवल सूत ही है ! इसी तरह न परा है न अपरा है सिर्फ एक परमात्मा ही है !इस ज्ञान को धारण करने के लिए संसार की सत्ता महत्ता को त्याग कर सिर्फ एक परमात्मा की ही सत्ता महत्ता को समझ कर तदनुसार आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियों शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि के लिए ही समस्त जीवन के कर्म करने पड़ते हैं ! ममता का सर्वथा नाश होना ही अन्तः करण की शुद्धि है ! इस प्रकार कर्म करते करते जब ममता का संपूर्ण नाश हो जाता है ! तब अन्तः करण पवित्र हो जाता है ! और साधक की दृष्टि में संसार सर्वम् के स्थान पर बासुदेव सर्वम की स्थापना होजाती है !यह साधक भक्त ,कर्मयोगी ,ज्ञानयोगी आदि की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है !भगवन कहते हैं इस मंजिल तक पहुंचे महात्मा अत्यंत दुर्लभ हैं !भगवान सुलभ है ! किन्तु भगवान को प्राप्त करने के लिए तदनुसार अपनी जीवनचर्या का निर्माण कर जीवन जीने वाले बिरले हैं

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