Monday, 20 July 2015

भोजन की शुद्धि और पवित्रता के अनेक उपाय वैदिक धर्म में बताये गए हैं !भोजन करते समय भोजन करने वाले का आसन ,दिशा, दशा तथा मानसिक स्थिति आदि के स्थूल उपायों में बताया गया है ! कि भोजन उत्तर पूर्व दिशा में मुहँ करके करना चाहिए !शुद्ध स्थान पर लकड़ी के पटा पर बैठ कर जो ना अधिक ऊँचा हो ना  अधिक नीचा हो भोजन करना चाहिए  ! भोजन करते समय बात चीत नहीं करनी चाहिए ! खड़े होकर नहीं करना चाहिए  यह सभी बाह्य नियम भोजन करते समय अत्यंत उपयोगी हैं ! और जहाँ तक संभव हो इनके पालन का प्रयत्न करना चाहिए ! किन्तु काल, देश और परिस्थिति के अनुसार और प्रचिलित व्यबस्था में इनका पालन कर पाना संभव ना हो तब भी भोजन के सर्वकालिक ,मानसिक ,शारीरिक और सामजिक स्वास्थ्य के जो सर्वकालिक नियम और उपाय वैदिक धर्म में प्रस्तुत किये गए हैं !जिनका पालन सभी देशों में सभी परिस्थितियों  में और सभी धर्मों के मानने वालों द्वारा किया जा सकता है उनका पालन लोकहित और स्वास्थ्य हित में अवश्य करना चाहिए  ! (!)हित भोजन---- भोजन शरीर के लिए स्वास्थ्य बर्धक होना चाहिए !(२)मित भोजन ---भोजन अधिक मात्रा में नहीं किया जाना चाहिए !(३)ऋत भोजन ----भोजन की सामग्री न्याय युक्त आमदनी से खरीदी हुई होनी चाहिए !इसके अतिरिक्त गीता में १७(८,९,१०)में भोजन की उत्तम मध्यम और निम्नस्तरीय सामग्री का स्वरुप भी बताया गया है !उत्तम भोजन सामग्री वह होती है जिस से आयु ,उत्तम मानसिक स्थिति, बल, आरोग्य ,सुख ,और आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है !जो भोजन अधिक समय तक शरीर को स्वस्थ रखता  है  ! जिस से ह्रदय को शक्ति प्राप्त होती है ! ऐसे रसीले चिकने (फल ,गाय का दूध घी दही तथा हरी सब्जियां सूखे मेबे आदि )पदार्थ जिनसे आपस में सद्भाव प्रीति आदि की बृद्धि होती है ! वह उत्तम भोजन सामग्री होती है !!भोजन के जो पदार्थ अत्यंत कड़वे ,अत्यंत खट्टे, अत्यंत नमकीन, अत्यंत गरम, अत्यंत तीखे, अत्यंत रूखे, और अत्यंत दाहकारक होते हैं,! जिनसे दुःख शोक और रोगों की प्राप्ति होती है ! और जो सिर्फ स्वाद की दृष्टि से ही  किये जाते  हैं !  ये  मध्यम भोज्य पदार्थ कहे गए हैं ! जो भोजन सड़ा हुआ, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी, और जूठा तथा जो महान अपवत्रित (हिंसा जीव हत्या से प्राप्त मांस आदि )है वह अत्यंत निम्न कोटि का भोजन होता है ! इस प्रकार से वैदिक धर्म के बाह्य और आतंरिक नियमों के पालन करने से उत्तम स्वास्थ्य और सदाचारी समाज का निर्माण होता है !

 

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