Saturday, 18 July 2015

करिस्ये बचनम् तब १८(७३) अक्छर ज्ञान जब अनुभव जन्य ज्ञान में परिणित हो जाता है !तभी पूर्ण ज्ञान कहलाता है !सत्य बोलना चाहिए ,अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए ,बेईमानी ,छल कपट आदि नहीं करना चाहिए ,संसार के सभी पदार्थ धन दौलत आदि यहीं धरे रह जाएंगे ,आदि ज्ञान ,धर्म की बातें करने वाले शव्द ज्ञानी बहुत मिलते हैं !किन्तु इनको आचरण में उतारकर जीवन जीने वाले बिरले होते हैं !भौतिक पदार्थों का आकर्षण जब दुष्ट पुरुषों में  बढ़ जाता है !तब बे अपने निकृष्ट स्वार्थों की प्राप्ति के लिए संपूर्ण संसार और समाज की व्यबस्था बिगड़ देते हैं !और समाज में सज्जन पुरुषों का जीना मुश्किल कर देते हैं!और !जब ऐसे दुष्ट पुरुष अजेय हो जाते हैं !तब सज्जन पुरुषों की रक्षा और सामाजिक व्यबस्था को न्याययुक्त बनाने के लिए परम शक्ति स्वयं मानव के रूप में अवतरित होती है !और  किसी श्रेष्ठ मानव का चयन कर उसको दिव्य शक्तियां प्रदान कर उसको निमित्त  बनाकर समाज की व्यबस्था कायम कर  दुष्टों का विनाश करती है !दुष्टता का विनाश ह्रदय परिवर्तन से भी होता है !इसीलिए पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पाप पंक में दुबे हुए दुर्योधन और उसके सहयोगी कर्ण,  दुशासन शकुनि आदि को समझाने की भरपूर चेस्टा की !उनको युद्ध के भयानक परिणामों के बारे में भी समझाया !दुर्योधन के अन्याय से पीड़ित पांडव अपने आधे राज्य का अधिकार त्याग कर मात्र ५ गाओं की मांग तक सीमित हो गए !किन्तु पापियों में प्रधान दुर्योधन ने कहा कि बिना युद्ध के पांडवों को उतनी भी भूमि नहीं दूंगा, जितनी सुई की नौक पर आती है !इसीलिए युद्ध कर्त्तव्य रूप में धर्म और न्याय तथा समाज व्यबस्था को दुष्टों से मुक्त कराने के लिए आवश्यक हो गया था !परमशक्ति द्वारा अधर्म के विनाश के लिए निमित्त बनाया गया अर्जुन भी मोह ग्रस्त होकर अपनी कर्तव्य निष्ठा से उपराम होकर  युद्धछेत्र में धनुष बाण रख कर रथ के पिछले भाग में बैठ गया था ! इसिलए भगवान को उसका कर्त्तव्य बोध कराने के लिए ज्ञान योग, भक्ति योग, और कर्म योग का उपदेश देना पड़ा ! मोह और राग का नाश ज्ञान से ही होता है !इसलिए भगवान कृष्ण ने उपदेश के अंत में अर्जुन से पूंछा कि क्या तुमने एकाग्र चित्त से उपदेश को सुना? क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ ? १८(७२) अर्जुन कहता है कि भगवान आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट होगया है ! और मेने स्मृति प्राप्त कर ली है ! में संदेह रहित होकर स्थित हूँ  !अब में आपकी आज्ञा का पालन करूँगा ! कुटुंब और गुरुजनो को युद्ध छेत्र में देख कर अर्जुन यकायक मोह ग्रस्त हो गया था !उसको यद्द्पि यह पूर्व जानकारी थी की युद्ध में उसका मुकाबला गुरुजन और परिवार जन से ही होना है !और उसे यह भी भली प्रकार ज्ञात था कि यह धर्म युद्ध है ! और दुष्टों के विनाश के लिए उसे दिव्य शक्तियां प्रदान करायी गयी हैं !फिर भी वह मोहग्रस्त होकर कर्त्तव्य निष्ठा को भूल गया !भगवान के उपदेश से  उसे आत्मस्मृति का बोध हुआ ! और उसके  सांसारिक मोह और राग कि निबृत्ति हो गयी !और संदेह रहित होकर वह कर्तव्य पालन के लिए तैयार हो गया !भगवान श्री कृष्ण कि कृपा से उसके अज्ञान का नाश हुआ आत्मस्मृति की प्राप्ति हुई !  इसके लिए उसने भगवान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरे मोह और राग तथा अज्ञान कि निबृत्ति मेरे पुरुषार्थ और प्रयत्न से नहीं हुई आपकी कृपा से हुई है ! गीता का उपदेश मोह रहित होकर  कर्तव्य पालन कराने के लिए है !युद्ध कराने के लिए नहीं है !मोह का निरसन ज्ञान से होता है! और ज्ञान भगवान की कृपा से प्राप्त होता है !इसीलिए गीता में  ज्ञानप्रधान  भक्ति युक्त कर्मयोग का उपदेश अर्जुन को माध्यम बनाकर संपूर्ण मानव जाति को दिया गया है !जीवन के सभी कर्त्तव्य छेत्रों में मोह और राग ने अपना डेरा जमाकर मनुष्य को पशु की कोटि में खड़ा कर दिया है !और मनुष्य  ने अपने निम्नस्तरीय स्वार्थों की तुष्टि के लिए अपनी शिक्छा, पद, प्रतिष्ठा,  शक्ति और सामर्थ्य को पूरी शक्ति के साथ दाव पर लगा दिया है !परिणाम स्वरुप जीवन के सभी छेत्रों से निष्काम कर्मयोग लुप्त होता जा रहा है !मोह और राग के कारण युद्ध होते है !मानवता का हनन होता है !और ऐसा कोई भी दुष्कृत्य नहीं है जो मोह और राग से ग्रस्त व्यक्ति ना करता हो !ऐसे सभी मोहग्रस्त समाज के कर्णधारों के लिए गीता का उपदेश मोह के असाध्य बीमारी से मुक्त करने  के लिए अमृत रूप औषधि है ! 

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