Saturday, 25 July 2015

जब व्यक्ति की बुद्धि राग और द्वेष से युक्त हो जाती है !तब वह व्यक्ति  मोहग्रस्त होकर सही और गलत का निर्णय ठीक से नहीं करपाता है !मोहग्रस्त मनुष्य  जिस से द्वेष करता है, उस व्यक्ति में उसे अच्छे गुण नहीं दिखाई देते हैं !और जिस से राग करता है उसमे उसे दुर्गुण नहीं दिखाई देते हैं! !महाभारत में मोहग्रस्त पांडवों और कौरवों  तथा अन्य सहयोगियों के कारण महाभारत का युद्ध हुआ जिसमे महाविनाश हुआ !इसी मोह निरसन का ज्ञान गीता में भगवान श्री कृष्णा ने दिया है !!महाभारत काल से भी ज्यादा मोहग्रस्त आज के भारत में तथाकथित बुद्धिजीवी और धार्मिक लोग मौजूद है !जो पहले तो महाभारत को ध्यान और ज्ञान पूर्वक पड़ते ही  नहीं है !और अगर जिज्ञासा बस या आलतू फालतू समय बिताने के लिए पढ़ भी लें ! तो ग्रन्थ के सही तत्त्व को हृदयंगम ना कर मनमाने अर्थ निकालते हैं !कर्ण का प्रसंग महाभारत में  दिव्य शक्तियों से युक्त है !उसका जन्म और कर्म भी दिव्य है !उसको सामान्य लौकिक दृष्टि से समझ कर उसको उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा !तो जो महाभारत का मुख्य उद्देश्य जीवन से मोह आसक्ति और राग द्वेष के निरसन का है ! वह समझ में नहीं आएगा  है ! महाभारत कोई उपन्यास या मात्र ऐतहासिक घटनाओं का संग्रह मात्र नहीं है !इसमें भागवती और देवशक्तियों के द्ववारा मनुष्यों के मोह निरसन के लिए लौकिक शक्तियों के माध्यम से दुष्ट शक्तियों के विनाश और सत शक्तियों के सम्बर्धन, पोषण और संरक्छण के कथानक हैं !युधिस्ठर ने जो कुंती को श्राप दिया था ! कि कोई भी औरत किसी रहस्य  को दीर्घ काल तक छुपा नहीं सकेगी !वह क्रोध में भरे हुए मोह ग्रस्त युधिस्ठर के द्वारा दिया गया श्राप था ! जिसमे न्याय और विवेक का अभाव था ! इसीलिए उस श्राप में सत्यनिष्ठा का अभाव था! !और जिस श्राप और बरदान में सत्यनिष्ठा का अभाव होता है ! वह ना श्राप होता है ! और ना बरदान होता है !वह मात्र राग द्वेष मोह और आसक्ति ग्रस्त मूढ़ व्यक्ति का प्रलाप होता है ! जब तक पांडवों को यह पता नहीं था की कर्ण उनका भाई है !तब तक पांडवो के लिए बो सबसे बड़ा शत्रु था !और पांडवों को कर्ण के सारे गुण दुर्गुण दिखाई देते थे !कर्ण ने एक बार युद्ध में युधिस्ठर को बहुत अधिक घायल कर दिया था !और मूर्छित अवस्था में उनका सारथि उनको सुरक्छित युद्ध भूमि से भगा ले गया था !युधिस्ठर कर्ण का तत्काल बध चाहते थे !जब एक बार अर्जुन घायल युधिस्ठर को देखने गए !युधिस्ठर ने भ्रम बस यह समझ लिया कि कर्ण अर्जुन के द्वारा मार डाला गया है !इसीलिए उन्होंने अर्जुन की प्रसंशा करनी शुरू कर दी !किन्तु अर्जुन ने जब यह कह दिया कि अभी कर्ण जिन्दा है !तो युधिस्ठर ने अर्जुन की और उनके गांडीव धनुष की तीब्र भर्त्सना कर दी ! परिणाम स्वरुप अर्जुन ने अपने भाई युधिस्ठर का बध करने के लिए तलबार निकाल ली !भगवान कृष्णा ने अर्जुन को युधिस्ठर का बध करने से रोका था  !जिस कर्ण  के जीवित रहने के कारण युधिस्ठर अर्जुन की निंदा करने लगा था ! उसी  कर्ण की मृत्यु पर वह कुंती को श्राप दे रहा है !ये दोनों ही स्थितियां मोह राग और द्वेष तथा आसक्ति से उत्पन्न हुई हैं ! महाभारत के सभी पात्र मोह आसक्ति और मूढ़ता से ग्रस्त है !मात्र भगवान श्री कृष्णा मोह मूढ़ता और आसक्ति से पूरी तरह से मुक्त हैं !और बो मार्ग दर्शन कर पहले तो यह प्रयत्न करते हैं कि युद्ध ही ना हो !और जब वह अपने प्रयत्न में दैव बस सफल नहीं होते हैं !तब उनका प्रयत्न यह होता है  ! कि युद्ध में सत सक्तियों की विजय हो ! और दुष्ट शक्तियां पराजित हों ! मोह ग्रस्त लोगों  के युद्ध प्रसंग जसे  जो महा  विनाश महाभारत में कहा गया है ! उसी मोह आसक्ति मूढ़ता और रागद्वेष के निरसन के लिए गीता में सूत्र रूप से उपदेश दिया गया है !ताकि  संसार में तटस्थ .न्याय युक्ति बुद्धि से निष्काम कर्म से कर्त्तव्य पालन की बुद्धि विकसित  हो  ताकि भविष्य में मानव समूहों  में मोह के कारण दूसरा महाभारत न हो !

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