Thursday, 30 July 2015

प्रत्येक प्रकरण के तथ्य अलग अलग होते हैं !आजकल एक विचित्र अवधारणा न्यायायों के बारे में बन रहीहै ! कि न्यायालय का काम अपराध नियंत्रण का है !और जब जघन्य   अपराधों में लिप्त अपराधी  तुरत जमानत पा जाते हैं  !या रिहा हो जाते हैं  !तो अपराधों में बृद्धि होने लगती है !और अपराधी और अधिक निरंकुश हो जाते हैं !!इस प्रचार का असर न्यायाधीशों पर भी  दिखाई देता है !परिणाम स्वरुप मामूली और जघन्य आरोपित व्यक्ति भी न्यायालयों से जमानत नहीं पा पाते हैं !इसिलए आज देश केजेलों में सजा प्राप्त अपराधियों से ज्यादा अंडर ट्रायल प्रिजनर्स  बंद है ! न्यायलय का काम अभियोजन द्वारा अपराधिक प्रकरण पर लिखित और मौखिक सक्छ्य के आधार पर विधि विधान के अनुसार निर्णय देना है !अपराध नियंत्रण का काम पुलिस और प्रसाशन का हैं !न्यालय के सामने अभियोजन और अपराधी समान होते हैं !इसीलिए यदि अभियोजन ने अपना मामला विधि विधान के अंतर्गत प्रस्तुत नहीं किया है ! और आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्छ्या प्रस्तुत नहीं किया है !तो न्यायालय के सामने अभियुक्त को रिहा करने के अलावा कोई अन्य उपाय शेष नहीं रहता है ! यहां मगनलाल की मौत की सजा माफ़ करने का जो प्रकरण है ! उसमे जरूर कोई ऐसी कानूनी  खामी रही होगी !जिसके कारण मुख्य न्यायाधीश को उसकी फांसी की सजा उम्र कैद में बदलना पड़ी !वैसे जो तथ्य यहाँ बताये गए हैं ! उसमे उस पर आरोप था ! शराब के नशे में अपनी ही पुत्रियों की हत्या करने का और बाद में उसने खुद अपनी आत्महत्या करने की कोशिश भी की !इसीलिए उसको वैसे भी फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए  थी ! क्योँकि उसकाअपराध पूर्व नियोजित नहीं था !क्रोध के आवेश में उसने और  शराब के नशे में यह जघन्य कृत्य कर दिया ! और पश्चाताप की अग्नि में उसने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला भी समाप्त करने की कोशिश की थी !अपनी पुत्रियों की हत्या कर वह खुद सारे जीवन पश्चाताप की आग में झुलसता रहा होगा !

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