Geeta The Spirit

Sunday, 28 February 2016

व्योहारिक ज्ञान ================= (१)जैसे काष्ठ  अपने से ही उत्पन्न आग से जलकर भष्म हो जाता है उसी प्रकार जिसका मन बश में नहीं है वह मनुष्य अपने शरीर के साथ उत्पन्न हुए लोभ के द्वारा स्वयं नष्ट हो जाता है  !
(२)धनवान मनुष्यों को सरकार ,जल ,अग्नि ,चोर तथा स्वजनों से भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है जैसे सभी प्राणियों को मृत्यु से
(३)कितने ही मनुष्यों के लिए धन ही अधर्म और अनीति का कारण बन जाता है ! क्योंकि धन द्वारा सिद्ध होने वाले सांसारिक भोगों में आसक्त मनुष्य बास्तविक धर्म यानी अध्यात्म को प्राप्त नहीं हो पाता है !
(४)धन प्राप्ति के सभी उपाय मन में मोह बढ़ाने वाले हैं ! कंजूसी ,घमंड ,अभिमान ,भय और  चिंता इन्हे विद्वानो ने मनुष्यों के लिए धन से उत्पन्न होने वाले दुःख माना है ! धन के उपार्जन ,संरक्छण ,तथा खर्च में मनुष्य महान दुःख सहन करते हैं ! और धन के ही कारण मनुष्य  एक दूसरे को मार तक डालते हैं  ! धन के त्यागने में भी महान दुःख होता है ! और यदि उसकी रक्छा की जाय तो वो शत्रु कैसा काम करताहै ! क्योंकि धन के लोभ के कारण मनुष्य धन की रक्छा करने वाले की हत्या तक कर देते हैं !
(५)धन की प्राप्ति भी दुःख से ही होती है ! इसीलिए उसका चिंतन ना करे क्योंकि धन का चिंत्तन  करना अपना नाश करना है ! मुर्ख मनुष्य हमेशा असंतुस्ट  रहते हैं और विद्वान पुरुष संतुष्ट !.धन की प्यास कभी बुझती नहीं है अतः संतोष ही परम सुख है ! इसीलिए ज्ञानीजन संतोष को ही सबसे उत्तम समझते हैं !
Posted by Unknown at 19:48 No comments:
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Saturday, 27 February 2016

व्योहारिक ज्ञान ----------(१)ज्ञानियों ,(शब्द ज्ञानियों नहीं अनुभवी तत्तवग ज्ञानियों )योगियों ,शाश्त्रयागों तथा मन को बस में करने वालों पर आसक्ति का प्रभाव उसीप्रकार नहीं पड़ता जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता है !
(२)जो व्यक्ति राग और द्वेष के बशीभूत होता है ! उसको काम अपनी और आकृष्ट कर लेता है ! फिर उसके मन में काम भोग की इक्छा जाग उठती है तत्पश्चात तृष्णा बढ़ने लगाती है ! तृष्णा सबसे बड़ी पापिन है और पाप कर्मों में  प्रबृत्त कराने वाली है ! तृष्णा के द्वारा प्रायः सभी अधर्म और पाप कर्म होते हैं ! वह अत्यंत भयंकर पाप बंधन में डालने वाली है !
(३)खोटी बुद्धि वाले मनुष्यों के लिए जिसे त्यागना अत्यंत कठिन है  !जो शरीर के जरा जीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती है ! तथा जिसे प्राण नाशक रोग बताया गया है ! उस तृष्णा को जो त्याग देता है उसी को सुख मिलता है  !
(४)यह तृष्णा यद्द्पि मनुष्य के शरीर के भीतर ही रहती है ! तो भी इसका कहीं आदि अंत नहीं है ! लोहे के पिंड की अग्नि के सामान यह तृष्णा प्राणियों का विनाश कर देती है !
Posted by Unknown at 20:04 No comments:
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Friday, 26 February 2016

पुत्र कुपुत्र होता है माता कुमाता नहीं होती है -------===  वैदिक धर्म में आदिशक्ति का स्मरण अनेक नामों से किया जाता है !और भक्त लोग उनकी उपासना अनेक रूपों में करते हैं ! इन्ही आदिशक्ति का एक नाम महिसासुर मर्दिनी है ~महिसासुर नामक आततायी असुर  का बध करने के कारण इनका नाम महिसासुर मर्दिनी हो गया था !इसीलिए वैदिक धर्म में इन आदिशक्ति की उपासना दुष्टों और धर्म द्रोहियों  के विनाश और उन पर विजय प्राप्त करने के ;लिए की जाती है ! ५००० हजार साल पूर्व जब कुरुछेत्र में दुष्ट कौरवों के विरुद्ध और उनको नष्ट करने के लिए पांडवों ने युद्ध किया था !तब भगवान श्री कृष्ण ने  अर्जुन से इन्ही महिसासुर मर्दिनी आदि शक्ति की उपासना करायी थी ! वैदिक धर्म अत्यंत उदार धर्म हैं !इसमें धर्म का विरोध करने वालों की हत्या नहीं की जाती है !दक्छिण भारत के केरल में जन्मे शंकराचार्य ने इन्ही महिसासुर मर्दिनी आदिशक्ति की उपासना में एक स्त्रोत लिखा है !जिसमे उन्होंने  आदि शक्ति की वंदना करते हुए कहा है !कुपुत्रो जायते क्वचदपि कुमाता न भवति  (पुत्र कुपुत्र होता है !माता कुमाता नहीं होती है ) ऐसे हे कुपुत्रो ने भष्मापुर की जयंती मनाई और महिसासुर मर्दिनी आदिशक्ति को वैश्या कहा और भस्मासुर को महिमा मंडित किया था !और उन कुपुत्रो के इस घिनौने कृत्य को बहुत से कुपुत्र महिमा मंडित कर रहे हैं !और इसे अभिव्यक्ति की आजादी बता रहे हैं !तथा जो इन कुपुत्रो की भर्त्सना कर रहे हैं !उन्हें ये कुपुत्र फासीवादी बता रहे हैं !इन कुपुत्रो का साहस कभी उन धर्मों की आलोचना करने का नहीं होता है !जिनका थोड़ा सा विरोध भी इन कुपुत्रो को जिन्दा नहीं रहने देगा !ये कुपुत्र तो अपनी ही माँ को वैश्या  बता सकते हैं !क्योंकि ये जानते हैं !कि इन कुपुत्रो की माँ कुमाता नहीं हो सकती है !ये कुपुत्र अपनी माँ को वैश्या  बताने के लिए ऐसे उदहारण भी पेश करते है !जिनको समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया !इन कुपुत्रो को दक्छिण भारत में उत्पन्न हुए रामास्वामी पेर्रियार तो दिखाई देते हैं !किन्तु दक्छिण में पैदा हुए अलौकिक ज्ञानी शंकराचार्य ,रामनुजा चार्य ,निम्बार्काचार्य ,श्रीधर ,,और तमिलनाडु के शैव वैष्णव संत और कर्णाटक के और आन्ध्रा  तथा केरल और मलाबार के संत नहीं दिखाई देते हैं  !तमिलनाडु की महान महिला संत अरुण्डाल ,का तिररूपाबैयि ग्रन्थ  और ,जिनका  स्थान भारत भर की पांच महिला संतों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ! लोग उनको दक्छिण की मीरा कहते हैं ! वह महान कृष्ण भक्त थी ! अप्पा स्वामी उन्होंने जैन गुरु से दीक्छा ली थी ! उन्होंने शिव महिमा के भी अनेक स्त्रोत लिखे हैं 1 मणिवाचक्कर की तमिलनाडु के प्रमुख चार शैव संतो में  गड़ना की जाती है संत तिरुवल्लबार ,नम्मालबार ,कम्बन ,कुरताल्बार रामलिंग स्वामी सुब्रमनियम भारती कर्णाटक के महान संत पुरंदर दास बास्वेस्वर तेलगु भक्त त्यागराज महाकवि पोतना और केरल  मलाबार के संत एलुत्तच्छन  आदि के नामों और कार्यों का स्मरण नहीं होता है ! ये बोलोग है !जो अपनी ही माता को अपमानित कर सकते हैं !भारत में बौद्ध  धर्म अहिंसा ,प्रेम ,करुणा आदि का उपदेश देते हैं !बुद्ध ने बताया है कि बैर से बैर का अंत नही होता है !वैर का अंत प्रेम से और अहिंसा से होता है !वैदिक धर्म को त्यागकर जिन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है  बे बुद्ध की इस सीख को स्वीकार नहीं करके वैदिक धर्म का अनर्गल और असत्य , मनगढंत    प्रचार उसी प्रकार करते रहते है ! जैसे चीन के बौद्ध तिब्बत   के बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा को रंगा सियार और धर्म के वेश में खूँख्वार भेड़िया कहते हैं !अब इन कुपुत्रो को यह समझ लेना चाहिए कि माता के भक्त जो सुपुत्र हैं और माता की गरिमा ,महिमा  और महत्ता को समझते और स्वीकार करते हैं !बे इन कुपुत्रो द्वारा किया गया माता का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे !और न ही भारत माता या महिसासुरमर्दिनी आदिशक्ति को पिशाचिनी और वैश्या  कहने की  अनुमति देंगे !
Posted by Unknown at 19:57 No comments:
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Thursday, 25 February 2016

व्योहारिक ज्ञान -------- (१)मन में दुःख होने पर शरीर भी संतपत होने लगता है जैसे  तपाया हुआ लोहे का गोला  घड़े में डाल देने से शीतल जल भी गरम हो जाता है ! इसीलिए विद्वान पुरुषों को मानसिक दुखों से ग्रस्त मनुष्य  को प्रिय वचन बोल कर तथा हितकर भोगों  की सामग्री प्राप्त कराकर सर्वप्रथम मानसिक दुःखों का ही निवारण करना चाहिए  !
(२)जिस पर जल से अग्नि शांत की जाती है उसी प्रकार ज्ञान से मानसिक दुःख को शांत करना चाहिए मन का दुःख मिटजाने पर मनुष्य के शरीर का दुःख भी दूर हो जाता  !
(३)मन के दुःख का मूल कारण विषय भोगों में  आसक्ति है ! इसीके कारण मनुष्य कहीं आसक्ति के कारण दुखी हो जाता है ! आसक्ति से ही भय होता है ! शोक ,हर्ष ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति के ही कारण होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में प्राप्ति की कामनाऔर राग द्वेष होते हैं ! ये दोनों ही अमंगलकारी हैं ! इसमें भी विषय भोगों  की प्राप्ति की कामना महान अनर्थ और अशांति पैदा करने वाली होती है ! जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर  भस्म  कर देती है उसी प्रकार बिषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और धन दोनों का नाश कर देती है !
(४)विषय भोगों के प्राप्त न होने पर जो उनका त्याग करताहै वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमे दोष देख कर उनका परित्याग करता है वास्तव में वही सच्चा त्यागी है ------वही वैराग्य को प्राप्त करता है ! उसके मन में किसीके प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर और बंधन मुक्त होता है !
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Wednesday, 24 February 2016

व्योहारिक ज्ञान ------- (१)-कष्टों और भय के अनेकों अवसर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में समय समय पर आते हैं किन्तु ये मूढ  और मुर्ख तथा विषयों के भोगी और विषयासक्त मनुष्यों पर ही अपना प्रभाव डालते हैं ! परन्तु ज्ञानी भगवान के भक्त उनसे प्रभावित नहीं होते हैं ! बे इन अत्यंत कष्ट युक्त और भय प्रदान करने वाली स्थितियों में भी सहज रूप से इनको सहन करते हैं ! और प्रसन्न रहते हैं !
(२)अर्थसंकट, ,दुस्तर दुःख ,तथा स्वजनों पर आयी विपत्तियों में भी ग्यानी व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दुखों से विचलित नहीं होते हैं !
(३)रोग ,अप्रिय घटनाओं की प्राप्ति ,,अधिक परिश्रम ,तथा प्रिय वस्तुओं के वियोग ----- इन चार कारणों से शारीरिक दुःख प्राप्त होता है !
(४)समय पर इन चारों कारणों का प्रतिकार करना एवं कभी उनका चिंतन ना करना -----ये दो क्रिया योग (दुःख निवारण के उपाय हैं ) इन्ही से आधि (मानसिक कष्टों )और व्याधियों (शारीरिक कष्टों )की शांति होती है !
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गाय का बध जरूर कत्लखानों में होता है जिसको अधिकांशतः मुसलमान कसाई चलाते हैं बहुत सी गायें चोरी छिपे भी क़त्ल खानो में ले जाई जाती हैं किन्तु इनमे सबसे बड़े कसाई तो बे किसान है जिन्होंने गोचर भूमि को समाप्त कर दिया है और गायों को मरने केलिए सड़कों पर छोड़ दिया है दूसरी कसाई सरकारें हैं जो मांश निर्यात के लिए नए नए कत्लखाने खोलती है फिर तीसरे नंबर पर मुसलमान कसाई आता है वह किसी के घर से जबरदस्ती गाय छुड़ाने नहीं जाता है इसलीए अगर गाय को मरने के लिए सड़कों पर किसान लोग न छोड़ें और गोचर भूमि से अपना कब्ज़ा हटाकर गाय को चरने के लिए चारा आदि प्राप्त कराएं तो गाय कसाई खानो तक पहुंचेगी नहीं किन्तु लोग गो माता की जय बोलते है गाय के बध के लिए कसाइयों को दोष देते हैं और गाय बध बंद हो इसके लिए नारेबाजी करते हैं किन्तु गाय को पालते नहीं है आज गाय की कोई कीमत नहीं है सड़क पर फिरती हुई गाय कोई भी पकड़ कर बांध सकता है प्राचीन काल में गोपालन बड़े पैमानें पर होता था और इसको व्योपारी समाज भी पालता था गीता में कहा है कृषि कार्य गाय का पालन और व्यापर ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म है १८(४४)आज भी व्योपारी समाज गाय पालन का काम अपने हाथ में लेकर गाय के पालन के साथ आर्थिक लाभ भी कमा सकता है क्योँकि गाय की हड्डी दूध दही मूत्र गोबर मूत्र आदि सभी कीमती है
Posted by Unknown at 08:38 No comments:
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Tuesday, 23 February 2016

असत्य के साये में उलझ गया  जे एन यू  विवाद  ----------------------- लोकतंत्र के सफल सञ्चालन के लिए प्रमाणिकता की आवश्यकता है !भारत ने लोकतंत्र का ढांचा तो खड़ा कर दिया !किन्तु अब तक देश में लोकतांत्रिक मन, बुद्धि और चित्त का निर्माण नहीं हो पाया है !इसीलिए लोकतंत्र की मूलभूत आवश्यकता प्रामाणिकता  का जन्म अभी तक नहीं हुआ है !बल्कि जिस प्रमाणिकता ,ईमानदारी  त्याग और तपस्य की भारतीय धरोहर को १००० साल की गुलामी भी समाप्त नहीं कर पायी थी !i
उस प्रमाणिकता का  स्वतंत्र भारत  में तेजी से नाश हो रहा है ! !प्रमुख रूप से लोकतंत्र की व्यबस्था को विधान बनाकर संचालित करने वाले राजनेता और राजनैतिक दल ,कानूनो को पालन कराने वाला प्रशासनिक  तंत्र और कानून के उल्लंघन करने वालों को न्याय के द्वारा दण्डित करने वाला न्याय तंत्र !इन तीन में प्रमाणिकता अभाव क्रमशः बढ़ता  जा रहा है !इन तीनो में प्रमाणिकता के दोष के कारण लोकतांत्रिक  जीवन पद्धति को गति देना वाले  शिक्छण तंत्र ,स्वास्थ्य ,विकास ,व्योपार आदि भी प्रमाणिकता से शून्य हो गए हैं !चूँकि इन सभी व्यबस्थाओं का संचालन नागरिकों के द्वारा ही किया जाता है !इसीलिए इन सभी ब्यवस्थाओं के पतन के कारण नागरिक भी भ्रष्ट और पतित हो गए हैं !
----------------------------------------------शिक्छक ,शिक्छण और शिक्छा प्रदान करने वाले विश्वविद्यालय i भी लक्छ्य भ्रस्ट होकर शिक्छण कार्य से विरक्त होका राजनीति में रूचि ले रहे हैं !और उस राजनीति का अनुशीलन कर रहे हैं !जिस से देश में अराजकता और संविधान की मर्यादाओं का उल्लंघन होता है !इस छिछली संविधान विरुद्ध तथाकथित राजनीति को प्रोत्साहन राजनैतिक लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर रहे हैं !इनमे एक तपका उन तथाकथित बुद्धिजीवियों का भी है !जिनमे व्योहारिक ज्ञान का पूर्ण अभाव है  किन्तु किताबी ज्ञान भारवाही गधों की तरह अपने दिल दिमाग पर लादे हुए हैं !और उस किताबी ज्ञान का उपयोग भी अपने निहित स्वार्थों के लिए कर रहे हैं !जे एन यू में ९ फरबरी कोजो कुछ हुआ !उसकी सही जानकारी ना तो दृश्य और श्रव्य मीडिया ने दी  है  और न ही समाचार पत्रों ने ही दी ! और अभी भी उस दिन विश्वविद्यालय में क्या हुआ था !उसकी वास्तविकता के बारे में भ्रम फैलाने वाले समाचार छापे और दिखाए जा रहे हैं !एक समाचार यह दिखाया गया है !कि जिस वीडियो में छात्रों के पाकिस्तान जिंदाबाद ,हमें चाहिए कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी ,कितने अफजल मारोगे घर घर में अफजल पैदा होंगे !आदि राष्ट्र विरोधी नारे सब सत्ताधारी राजनैतिक दल का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए फर्जी तैयार  किया गया था !विश्वविद्यालय में ऐसे नारे लगाए ही नहींगये थे ! एक बात निश्चित तौर  पर कही जा सकती है ! !जे एन यू छात्र संघ के अध्यक्छ कन्हैया की गिरफ्तारी निश्चित ही राज द्रोह के आरोप में गलत थी !दिल्ली पुलिस ने हड़बड़ी में बिना पूरी जानकारी के यह गिरफ्तारी की जिसके परिणाम स्वरुप  यह एक राजनैतिक मुद्दा बनगया !और साम्यबादी दल  विचार के लोग तथा अन्य प्रमुख राजनैतिक दल भी इस गिरफ्तारी के विरोध में सक्रीय हो गए !और छात्रों ने भी जगह जगह विरोध में प्रदर्शन किये  ! इस एक गिरफ्तारी के कारण यह सारा मामला देश और विदेश में भी सुर्ख़ियों में चर्चा में आगया  !जिन्होंने भी कन्हैया का भाषण टेलीविज़न पर सुना उन सभी की यही राय थी कि कन्हैया ने कोई भी देश विरोधी नारा नहीं लगाया था !बल्कि इन नारों का विरोध किया था !कन्हैया साम्यबादी विचार का समर्थक और भाजपा तथा संघ का घोर विरोधी है !इसिलए उसके भाषण में संघ और भाजपा की नीतियों का विरोध तो था किन्तु उसकी   देश के संविधान में पूर्ण आस्था भी थी !उसने अपने भाषण के अंत में लालसलाम और भीमराओ आंबेडकर की जिंदाबाद के नारे भी लगाए थे ! सभी राजनैतिक दल इस पर एकमत थे कि जिन लोगों ने देशविरोधी नारे लगाए थे उन के  विरुद्ध कठोर कार्यबाही की जाय किन्तु निर्दोष छात्रों का उत्पीड़न ना किया जाय !गृहमंत्री ने यह आश्वासन भी दिया था कि निर्दोष छात्रों को परेशान नहीं किया जाएगा किन्तु दोषी छात्रों को बख्सा भी नहीं जाएगा !किन्तु हुआ इसके विपरीत !कार्यवाही का प्रारम्भ ही निर्दोष छात्र की गिरफ्तारी से हुआ !भारत सरकार की जाँच एजेंसियों ने भी यह कहा कि कन्हैया के विरुद्ध देश विभाजक नारे लगाने का कोई सबूत नहीं है !और अब तो पुलिस ने भी यह घोषणा  की है की यदि कन्हैया जमानत के लिए प्रार्थना  पत्र देगा तो पुलिस उसकी बेल का विरोधनही करेगी !जिस उमरखालिद ने विश्वविद्यालय में आत्तंकवादी अफजलगुरू की बरसी का आयोजन ९ फरबरी को विश्वविद्यालय में कराया था !और जो अपने साथियों के साथ फरार हो गया था !अब बो भी जे एन यू में खुले आम घूम रहा है !और अपनी निर्दोषता सिद्ध कर रहा है !अब दिल्ली पुलिस उसको भी गिरफ्तार नहीं कर रही है !
 इस सारे प्रकरण में जो एक प्रशन  उभरकर आया है !वह यह है !कि राष्ट्रबाद और राष्ट्र द्रोह वास्तव में क्या है ? इस सम्बन्ध में अधिकाँश बुद्धिजीवियों का यह मत है !कि भारतीय दंडविधान की राजद्रोह के  धारा १२४ अ  ब्रिटिश हुकूमत ने अपने साम्राज्य को सुरक्छित करने के लिए बनायी थी !इसीलिए बास्तव में यह राष्ट्र की रक्छा के लिए न  होकर अंग्रेजों के शैतानी शासन  के विरुद्ध आवाज उठाने वालों के विरुद्ध प्रयुक्त होती थी !इसीलिए यह राष्ट्र द्रोह ना होकर स्थापित सत्ता का न्यायपूर्ण विरोध करने वालों का राज्य द्रोह था !जिसके कारण ब्रिटिश शासन  का विरोध करने वाले तिलक और गांधीजी को भी कठोर सजाएं दी गयी थी !और भगत सिंह सुखदेव ,रामप्रसाद बिस्मिल राजगुरु ,असफाक उल्ला आदि को शूली पर लटकाया गया था !इसीलिए स्वतंत्र भारत में साम्राज्य बाद की रक्छा करने वाली इस धारा को अब कानून से समाप्त कर देना चाहिए !लोकतंत्र में राज्य सत्ता की जनविरोधी  नीतियों का विरोध करने का मौलिक अधिकार नागरिकों को है ! इस धारा से नागरिकों के सत्ता का विरोध करने के अधिकार का हनन होता है !
इस समय देश में एक विचित्र प्रकार की राष्ट्र भक्ति दिखाई दे रही है !गांधीजी के हत्यारे  गोडसे को महिमा मंडित किया जा रहा है !खुले आम उसके नाम पर चौराहों पर उसकी मुर्तिया और मंदिर बनाने के निर्माण की बात हो रही है !उसकी जन्म जयंती भी मनाई गयी !उसके द्वारा  गांधी जी की हत्या को  देश हित में बताया जा रहा है !गांधी जी को देश द्रोही और गोडसे को देश भक्त बताया जा रहा है !गांधी जी का नाम भारतीय मुद्रा से हटाने की बात जोर शोर से की जा रही है !कांग्रेस को जडमूल से समाप्त करने की घोषणाएं की जा रही है !कांग्रेसी शासन को अब तक  का सबसे बड़ा कुशाशन बताया जा रहा है ! !अगर कोई व्यक्ति मोदीजी के विरोध में एक शब्द भी बोलता है !तो उसका  स्वागत अत्यंत भद्दे शब्दों में किया जा रहा है !कुछ लोग मोदी के लिए भी अपशव्दों का प्रयोग कर रहे हैं !सारा देश मोदी विरोध और मोदी के समर्थन में बिभाजित दिखाई देता है ! ऐसा दृश्य देश में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था !श्री अटलबिहारी  बाजपेयी भी देश के ४ बार प्रधान मंत्री रहे किन्तु उनके कार्य काल में भी देश का बातावरण कभी भी विषाक्तनहीं हुआ !इन सारी घटनाओं और गतिविधियों को देख कर बहुत से बुद्धिजीवी नक्सल  बादियों  का समर्थन करते हैं !और बे कहते हैं !सामाजिक अन्याय के कारण यह नक्सलबाद उत्पन्नहुआ है !सरकार पूंजीपतियों  के हित में काम कर रही है !देश के किसानो की जमीने छीनी जा रहीं हैं !बे आत्महत्या कर रहे हैं !एक लाख गाओं नष्ट हो चुके हैं !बड़े पूंजीपतियों के हजारों करोड़ों  के ऋण माफ़ कर दिया गए हैं !और सूखा से ग्रस्त किसानो के घरों और जमीन जायदाद की कुड़की कर ली जाती है !जल जंगल और जमीन पर पूंजी पतियों के  कब्ज़ा हो रहे !अब यदि लोग ऐसे आमजनविरोधी सरकार की अगर जान विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं !तो यह राष्ट्र द्रोह है या राष्ट्र प्रेम ?और अगर सरकार ऐसे लोगों को पकड़ कर राज्य द्रोह के कानून का दुरपयोग कर उनको गिरफ्तार करतीहै !तो यह सरकार के द्वारा किया गया राष्ट्रद्रोह है या राष्ट्र प्रेम ?बहुत से बुद्धिजीवी और राजनैतिक दल जे एन यू की घटना को सरकार की गलत नीतियों के विरोध में उठी हुई शशक्त आवाज मान रहे हैं !और सरकार के कार्यवाही को छात्रों की अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार मान रहे हैं !और मीडिया की मदद से झूठे और फर्जी  आरोप छात्रों पर लगाने का आरोपलगा रहे हैं !इसिलए लोकतंत्र की सफलता के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि सभी राजनेता अपने राजनैतिक स्वार्थों से मुक्त होकर और तथाकथितबुद्धिजीवी भी निश्वार्थ भाव से इस प्रश्न पर विचार कर राष्ट्र को सही दिशा  दें जिस से अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का भी हनन  ना हो और देश की संवैधानिक व्यबस्था भी नष्ट ना हो !
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Friday, 19 February 2016

उलझे मुद्दे से उभरे सबाल ======== मुद्दा तो स्पष्ट था कि जिन छात्रों या लोगों ने अफजल गुरु को शहीद बताकर कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी के नारे लगाये थे और पाकिस्तान जिंदाबाद आदि के देश विरोधी नारे लगाकर और भारत की न्यायिक और संवेधानिक व्यबस्था पर प्रहार किया था !उनके विरुद्ध राजद्रोह के अंतर्गत कार्यवाही की जानी चाहिए थी !किन्तु पोलिस  ने जल्दबाजी में जे एन यु छात्र संघ के अध्यक्छ कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर प्रकरण को उलझा मामला बना दिया !कन्हैया कुमार की कोई भूमिका इन देश विरोधी नारों में नहीं थी !उनके संपूर्ण भाषण को गिरफ्तारी के पूर्व ना तो पुलिस ने जरूरी समझा और ना ही उस पर ध्यान दिया गया था !इसीलिए यह देश विभाजक नारे बाजी करने वाला प्रकरण राजनैतिक प्रहार का साधन बन गया !और जो वास्तविक अपराधी थे !उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई !जिन लोगों ने यह राष्ट्र विरोधी नारेबाजी की थी उनकी गिरफ्तारी की सहमति सभी राजनैतक दलों ने दी थी !केंद्रीय गृह मंत्री ने भी राजनैतिक दलों को यह आश्वासन दिया था !की किसी भी निर्दोष व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं की जायेगी !इसके बाद भी पूरी तरह से निर्दोष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया !दुर्भाग्य से पुलिस पूरी तरह से सत्ताधारी राजनैतिक दलों को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार के फर्जी और झूठे मुकदमे सत्ताधारी दल की खिलाफत करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध लगाकर उनको गिरफ्तार कर लेती है !इसी कारण से कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया !क्योंकि वह संघ और भाजपा का विरोधी है !और सम्यबादी विचार का है !इस गिरफ्तारी के कारण सारे देश में छात्रों और बुद्धिजीवियों तथा राजनैतिक दलों में उबाल गया !और अब स्थिति यह हो गयी है की पुलिस उसकी जमानत का भी विरोध नहीं कर पा रही है
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Monday, 15 February 2016

लोकतंत्र कानून से चलता है गुंडा गर्दी से नहीं वैसे भी इस देश में कानून की अवहेलना सभी लोग करते हैं अब हिन्दू संगठनो ने गुंडागर्दी का नया सिलसिला धर्म के नाम पर शुरू कर दिया है वैलेंटाइन दिन पर जिस तरह युवाओं और युवतिओं को भारतीय संस्कृति के नाम पर दौड़ा दौड़ा कर पीटा गया इस प्रकार संस्कृति की रक्षा करने की सूझ इनको कहाँ से प्राप्त हुई? क्योँकि मनमर्जी से गंडागर्दी के द्वारा संस्कृति की रक्षा करने का विधान किसी हिन्दू धर्म ग्रन्थ में तो नहीं है जो लोग वैलेंटाइन डे ऐसे कार्यक्रमों को भारतीय संस्कृति के लिए खराब मानते हैं उन्हें इसकी जड़ पर प्रहार करना चाहिए जिन युवाओं युवतिओं का लालन पालन रिश्वत कमीशन चोरबाजारी हरामखोरी आदि की कमाई से हो रहाहै उन्ही परिवारों के युवा युवतिओं के पास इस तरह के कार्य कर्मों को मनाने के लिए पैसा है और स्वतंत्रता है इसलिए हिन्दू संगठनो को कालाबाजारियों रिश्वत खोरों हराम की कमाई करने वालों को निशाना बनाना चाहिए क्योँकि भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े नाश करने वाले यही लोग है जो धर्म और संस्कृति का नाश कर रहे हैं अगर जड़ कट जाएगी तो वैलेंटाइन जैसे कार्यक्रमों के ब्रिक्छ अपने आप उखड जायेंगे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कानून द्वारा मर्यादित किया गया है यदि इसका उल्लंघन किसी कार्यक्रम में हो रहा है तो उसके विरद्ध क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए मनमानी नहीं वैसे भी आजकल गुंडा गर्दी से आम आदमी पीड़ित है संस्कृति के नाम पर यह गुंडा गर्दी की शुरुआत ठीक नहीं है
Posted by Unknown at 09:11 No comments:
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Saturday, 13 February 2016

२(४)कथं भीष्मम अहम संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ------अर्जुन ने कहा ----हे कृष्ण मैं युद्ध भूमि में भीष्म और आचार्य द्रोण के साथ बाणो से युद्ध कैसे कर सकता हूँ ?क्योंकि हे भगवान ये दोनों तो मेरे लिए पूज्यनीय  हैं !ये आसक्ति युक्त मोह और मूढ़ता से ग्रसित  चित्त से बोले गए श्रद्धा प्रदर्शित करने वाले शव्द हैं ! जो अर्जुन यहाँ बोल रहा है !कर्तव्य मार्ग से भ्रष्ट होने वाले लोग हमेशा शव्दों में नीति और धर्म की ही बातें करते हैं !अर्जुन को यह भली प्रकार विदित था कि युद्ध भूमि में उसे युद्ध तो भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य  आदि से ही करना है !जब अर्जुन द्रोणाचार्य से अश्त्र शस्त्र की शिक्छा प्राप्त कर चूका !तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा  कि तुम अब मुझे गुरु दक्छिणा दो !तो अर्जुन ने कहा कि आप जो मांगे वह गुरु दक्छिणा में अवश्य आपके चरणो में अर्पित करूँगा !तब आचार्य द्रोण ने कहा कि अगर मैं भी तुम्हारे सामने कभी युद्ध करने आऊं  तो तुम अपने छत्र धर्म का निर्वहन करते हुए युद्ध भूमि में मुझसे अवश्य युद्ध करना !अर्जुन ने उत्तर दिया कि ऐसा अवसर आने पर मैं अवश्य आपसे युद्ध करूँगा !अर्जुन  ने भगवान शंकर की आराधना कर उनको प्रसन्न किया था  ! भगवान शंकर ने अर्जुन के पुरुषार्थ की प्रशंसा करते हुए कहा तुम मुझ से मनोबांछित बरदान प्राप्त करो ! अर्जुन ने कहा भगवान मेरा करण भीष्म कृपाचार्य ,द्रोणाचार्य आदि के साथ महान युद्ध होने वाला है ! उस युद्ध में आपकी कृपा से उन सब पर मैं विजय पा सकूँ इसी के लिए आपसे दिव्यास्त्र चाहता हूँ  !मुझे वह अश्त्र प्रदान कीजिये जिस अश्त्र को अभिमंत्रित करते ही उसमें सहस्त्रों शूल भयंकर गदाएँ और विषैले सर्पों  के समान वाण प्रकट हों उस अश्त्र को पा कर में भीष्म ,द्रोण .,कृपाचार्य तथा करण के साथ युद्ध में लड़ सकूँ ! आप ऐसा अश्त्र मुझे प्रदान करें जिस से में इन शत्रुओ को युद्ध में परास्त कर सकूँ ! तब भगवान शंकर ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया और कहा कि इसे देवराज इंद्र ,कुवेर ,वरुण और वायु देवता भी नहीं जानते हैं ! चराचर प्राणियों सहित ऐसा कोई पुरुष नहीं हैं जो इस अश्त्र द्वारा ना मारा  जा सके ! दुर्योधन के दूत को अर्जुन ने उत्तर देते हुए कहा था  कि खोटी बुद्धि वाले कुलांगार दुर्योधन यदि  तू यह  समझता है कि पांडव लोग दयाबस भीष्म का बध नहीं करेंगे ! तो  उन पितामह भीष्म को ही मेंसबसे पहले तेरे समस्त धनुर्धरों के देखते दखते मार डालूँगा ! जिस समय अर्जुन को यह समाचार प्राप्त हुआ था कि उसके प्रिय पुत्र अभिमन्यु का बध हो गया है ! तो उसने जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा करते हुए कहा था कि उसकी रक्छा करते हुए जो कोई मेरे साथ युद्ध करेंगे बे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ही क्यों ना हों में उन्हें भी अपने बाणो से आच्छादित कर दूंगा !इसके पहले भी अज्ञातबास में जब पांडव राजा विराट के यहाँ रह रहे थे !तब अर्जुन भीष्म ,द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य ,अश्वत्थामा ,करण,दुर्योधन और उसके १०० भाईयों  से युद्ध कर उनको पराजित कर चुका था !इसीलिए यहाँ अर्जुन मोह और मूढ़ता से ग्रसित होकर द्रोणचार्य और भीष्म को पूज्यनीय  बताकर उनसे ना लड़ने की बातें कह रहा है ! मनुष्य को किसी भी स्थिति परिस्थिति  में कर्तव्य का त्याग नहीं करना चाहिए !
Posted by Unknown at 08:36 No comments:
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देश में सभी स्थानो में राजनीति है इसलिए सभी जगह भृष्टाचार है रावण के देश मुख थे इसलिए उसकी लंका सोने की थी किन्तु उसका साम्राज्य सिर्फ लंका तक ही सीमित था इसीलिए भगवान राम को दसमुखी भृष्टाचार को मारकर भृष्टाचार रहित आदर्श राम राज्य स्थापित करने में सफलता मिल गयी थी किन्तु वर्तमान समय के भृष्टाचार के करोड़ों मुख हैइसकी लंका हीरों जवाहरातों और राजनैतिक शक्ति की है और इसका विस्तार विश्व व्यापी है और विश्व के अधिकांश विकास शील इसकी चपेट में हैं भारत भी विकाश शील देश है इसलिए यहाँ भी करोड़ों मुख के भृष्टा चार का प्रभाव है वास्तिक स्थिति यह है कि विकास जनहित के लिए नहीं बल्कि नेताओं अधिकारिओं के हित के लिए किया जाता है क्योँकि विकास की अधिकांश धन राशि कमीशन और रिश्वत के रूप में बंट जाती है राजीव गांधी ने कहा था विकास के लिए दिए गए रुपयों में से मात्र २५ पैसे का कार्य होता है और अब बिहार के मुख्य मंत्री ने कहा है की करोड़ों रूपए की लागत से बनने वाले पल अरबों रूपए में बनते है मुझे भी कमीशन मिलता है इस करोड़ों मुख वाले भृष्ट चार को समाप्त करने के लिए अरबों संगठित हाथों की आवश्यकता है तब इस राक्छस राज भृष्टाचार का अंत हो पायेगा क्योँकि इस भृष्टाचार का सर नेता है ह्रदय अधिकारी है शरीर कर्मचारी और बिचौलिये है और इसको प्राण देशवासिओं के कमाया हुआ टैक्स रूप में दियागया धन है इसकी मृत्यु प्राण रूप में दिए गए धन का सही उपयोग करने पर होगी लेकिन ऐसी भृष्टाचारविरोधी शक्ति का निर्माण कब और कैसे हो पयेगा ?इसकी खोजभी भृष्टाचार से पीड़ित लोगों को करनी होगी
Posted by Unknown at 04:13 No comments:
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Gita enumerates Sarvbhuteshu yenekam Bhavam avyam ekchhite avibhiktam vibhakteshu Tajgyanam vidhi sattwkam18(20)Theknowledge through which the one imperishable soul is seen in entire world (that is in entitre creation from animals trees mountains rivers men and women insects etc)and existences in all these different entities undivided(Soul is one it never transforms it self al though it seems divided in different body shapes and forms)i that knowledge is the real and best knowledge.This MUslim youth probably has caught up this tenet of Gita hence he has began to understand that entire creation is one though bodies countries religion dogmas are different hence real purpose of religion is to unite and not to create disharmony and religious frenzy in the name of religion
Posted by Unknown at 04:10 No comments:
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हम लोगों ने पश्चिमी संस्कृति को बिना जाने समझे उसकी फूहड़ नक़ल करना शुरू कर दिया है जैसे पश्चिमी देशों के बफे सिस्टम की नक़ल हमने बहुत फूहड़ और गलत ढंग से अपना ली है पहली बात तो जिस तरह से शादियों में आमंत्रित लोगों की भीड़ यहाँ होती है वैसी भीड़ वहां नहीं होती है दूसरी बात इस प्रकार के भोजन की ब्यवस्था अल्पाहार के लिए की जाती है न की मुख्य भोजन में! खड़े होकर भोजन करना स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है इसलिए इसे तत्काल बंद कर अपनी भारतीय परम्परा को भोजन विधि के रूप में स्वीकार करना चाहिए इसी प्रकार दूसरी भौंडी नक़ल वैलेंटाइन डे की हो रही है स्त्री पुरष सम्बन्धो का ढंग पाश्चात्य सम्बन्धो की तरह भारत में प्रिचलित नहीं है न ही युवक युवती जिस प्रकार से प्रेम का इजहार पाश्चात्य देशों में करते है उस प्रकार से भारत में नहीं होता है भारत में अगर किसी युवती से विवाह पूर्व सम्बन्ध किसी युवक से हो चके हों तो युवक उस युवती से विवाह करने के लिए शायद ही राजी हो किन्तु पाश्चात्य देशों में विवाह पूर्व सम्बन्ध विवाह में बाधक नहीं होते हैं इसलिए वैलेंटाइन डे भारतीय परम्पराओं के अनुरूप नहीं है यूरोप में भी वैलेंटाइन डे अब समाप्ति की ओर है किन्तु भारत में जोर पकड़ रहा है युवाओं को इस पर विचार कर वैलेंटाइन डे की इस कुप्रथा को समाप्त करना चाहिए
Posted by Unknown at 04:04 No comments:
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Friday, 12 February 2016

गीता ५(२) जीवन मन्त्र -वर्तमान समय में शरीरों को सजाने धन पद आदि से विभूषित करने के प्रयत्न सर्वत्र दृष्टिगत होते है राजनैतिक सामाजिक जीवन में तो यह विपुलता से दिखाई देता ही है किन्तु इसका प्रवेश धर्म में भी व्यापक और विस्तृत रूप में दिखाई देता है इसलिए धार्मिक क्रियाओं कथा वार्ता प्रवचनों की तो बृद्धि हो रही है किन्तु धर्म का लोप हो रहा है धार्मिक संगठन व्यापारिक संगठनो की तरह काम कर रहे हैं किन्तु इस सबके बाद भी मोक्ष के अभिलाषी भी विद्यमान है जो संसार शरीर और आत्मा के स्वरुप को समझ कर परमात्मा की प्राप्ति ही अपने जीवन का परम लक्ष्य मान कर जीवन जीते हैं ऐसे मोक्ष कामी साधकों के लिए निष्काम कर्म योग और कर्मसन्यास दो प्रकार की जीवन पद्धतियाँ गीता में बताई गयी है ये दोनों ही समान रूप से मोक्ष प्रदान करने वाली हैं ज्ञान योग और कर्म योग दोनों ही एक दूसरे की अपेक्छा न रखते हुए मनुष्य का कल्याण करने वाले हैं तथापि कर्म सन्यास की अपेक्छा कर्म योग श्रेष्ठ है इन दोनों मार्गों में कर्म छोड़ देने की अपेक्छा कर्म करने का पक्छ ही अधिक प्रशस्त है जो मन से इन्द्रियोँ का संयम करके केवल कर्मेन्द्रियों द्वारा अनासक्त बुद्धि से कर्म करता है उसकी योग्यता श्रेष्ठ है प्रत्येक मनुष्य को अपना कर्तव्य कर्म अवश्य करना चाहिए कर्म न करने से तो शरीर का भी पालन नहीं हो सकता है कर्म तो सन्यासी भी करता है किन्तु उसके कर्म सुक्छम और आंतरिक होते है जो दिखाई नहीं देते हैं कर्मो का सूत्रपात अंतःकरण में अर्थात मन बुद्धि चित्त और अहंकार में ही प्रथम होता है और अंतःकरण की बृत्ति का ही प्रकाशन स्थूल कर्मों में होता है अगर अन्तः करण शुद्ध है तो कर्म शुद्ध होंगे और अगर अन्तः करण काम क्रोध राग द्वेष आदि से युक्त है तो कर्म भी इन दोषों से युक्त होंगे इसीलिए कर्मसन्यासी अपने अन्तः करण की शुद्धि पहले करता है और उस शुद्धि से जो आत्मसुख उसे प्राप्त होता है वह समस्त भौतिक सुखों से श्रेष्ठ होने के कारण वह स्थूल कर्मों से उपराम हो जाता है जबकि कर्मयोगी अपनी कर्म सामग्री और प्रतिभा बुद्धि सामर्थ्य का उपयोग लोकहित के लिए अनासक्ति और राग द्वेष फलाकांछा रहित बुद्धि से युक्त हो कर समाज के कल्याण के लिए जीवन पर्यन्त्र करता है वह अन्तः करण की शुद्धि होने पर भी आत्मसुख से युक्त होकर कर्म करता रहता है कर्मयोगी यदि भक्ति मार्गी होता है तो वह सभी कर्मों को परमात्मा की सेवा पूजा समझ कर परमात्मा को समर्पण करता है इस प्रकार कर्म योगी के कर्म कर्मयोगी के लिए तो मोक्ष दायकहोते ही हैं बे समाज के लिए भीउपयोगीहो जाते हैं इसीलिए कर्मसन्यास और कर्मयोग दोनों ही मोक्ष प्रद होने के बाद भी कर्मयोग श्रेष्ठ है
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Narottam Swami commented on an article.
12 फ़रवरी 2015 को 06:07 पूर्वाह्न बजे ·
Unfortunately tenets of Islam are not practiced by fundamentalists intolerant muslims through out the world .Most of the persons have not read Ouaran they do not know that ItIslam is the religion of brotherhood compassion peace etc but they see with naked eyes and mind the most brutal acts of Is and the treatment of muslims with religious minorities in muslim dominated areas and muslim countries wich is awesome cruel and most intolerant and frequent terrorist attacks and ki...
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#ChapelHillShooting - When Hate Wins, We All Lose
The anti-Muslim sentiment in the United States isn't just rising, it's really high. An unwillingness and indifference on the part of individuals and institutions to put it in check is a large part of the problem.
www.huffingtonpost.com
आज के लिए बस इतना ही.
Posted by Unknown at 04:18 No comments:
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Tuesday, 9 February 2016

२(३)क्लैव्यं मा इसगमः पार्थ  ना एतत त्वेयी  उपपद्यते ----------हे अर्जुन तू नंपुसकता को मत प्राप्त हो क्योँकि तुम्हारे में यह नपुंसकता उचित नहीं है  !हे परन्तप ह्रदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग करके युद्ध के लिए खड़ा हो जा अर्जुन के सामने युद्ध रूप कर्तव्य कर्म है ! इसीलिए  भगवान श्री कृष्णा कहते हैं ह्रदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जावो !अर्जुन के बारे में यह प्रिसिद्ध था कि उसमे दीनता और संग्राम में पीठ दिखाने की प्रवृत्ति नहीं है (ना दैन्यं ना पलायनम )भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उसके शौर्य का स्मरण उसको करा रहे हैं ! जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही श्री कृष्णा से युद्ध में सहायता मांगने गए थे ! तब भगवन ने कहा था कि मेरे पास एक अक्छोहनी नारायणी सेना है जो अजेय है ! और दूसरी और अकेला में हूँ किन्तु में युद्ध नहीं करूँगा ! तब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की नारायणी सेना ना मांगकर युद्ध ना करने वाले श्री कृष्ण को ही स्वीकार किया था !दुर्योधन प्रसन्नता पूर्वक भगवान श्री कृष्ण की एक अक्छोहनी सेना लेकर अर्जुन को ठगा हुआ मान कर प्रसन्नता पूर्वक चला गया था ! श्री कृष्ण ने एकांत में अर्जुन से पूंछा था कि
 मै तो युद्ध करूँगा नहीं फिर तुमने मुझे क्यों माँगा ! अर्जुन ने उत्तर दिया था कि भगवान  आप अकेले ही उन सबको नष्ट करने में समर्थ हैं और आपकी कृपा से मै भी अकेला ही उन सब शत्रुओं का संघार करने में समर्थ हूँ  ! जब पांडव १२ साल का वनबास बिताकर १३मा   बरस अज्ञात बास में मत्स्यदेश में विराट के यहाँ छद्म वेश में रह कर बिता रहे थे ! तब दुर्योधन ने अपने गुप्त चारों से कहा कि पांडवों के अज्ञात वास का तेरहबें बर्ष का अधिकांश समय बीत गया है ! और अब थोड़े ही दिन शेष रह गए हैं ! यदि यह अज्ञात बास का समय भी उनका व्यतीत हो गया तो बे प्रतिज्ञा पालन के भार से मुक्त हो जाएंगे फिर तो बे हमारे लिए विषधर सर्पों के सामान क्रोध में भरकर निश्चय ही हमारा विनाश कर देंगे ! इस पर करण ने कहा कि ऐसे कार्य कुशल गुप्तचर भेजे जाएँ जो धूर्त होने के साथ ही छिपे रहकर अपना कार्य कुशलता पूर्वक कर सकें  !  दुर्योधन को गुप्तचरों से जब यह ज्ञात हुआ कि पांडवों का राजा विराट के यहाँ होने की सम्भावना है तब उसने करण  आदि से सलाह  कर विराट की गायों के अपहरण करने के लिए मत्स्यदेश पर आक्रमण कर दिया ! भीष्म पितामह ने कहा कि पांडवों के तरह बर्ष पूर्ण होने के पश्चात भी पांडवों के पांच महीने बारह दिन और अधिक बीत चुके हैं ! इन पांडवों ने जो जो प्रतज्ञाएँ की थी उन सभी का यथाबत पालन उन्होंने  किया है ! इस सबके बाद भी पांडवों के अज्ञातबास की जानकारी के लिए दुर्योधन ने भीष्म ,द्रोणाचार्य ,करण ,कृपाचार्य ,अश्वत्थामा ,शकुनि ,दुःशाशन ,विकर्ण ,चित्रसेन ,दुर्मुख ,तथा अन्य बहुत से महारथियों के साथ विराट पर आक्रमण कर दिया ! अर्जुन ने अपना वास्तविक रूप विराट के पुत्र को बताकर स्वयं संग्राम भूमि में उतरने की तैयारी की  !और कौरव सेना पर आक्रमण कर विराट की गायें कौरवों से वापिस लौटा  लीं  !अर्जुन का करण से युद्ध हुआ और करण अर्जुन से युद्ध में हार कर भाग गया ! अर्जुन ने  कौरव सेना का संघार करना शुरूकिया  !कृपाचार्य और अर्जुन का युद्ध हुआ जब कृपाचार्य भी युद्ध में घायल हो गए तो उनका सारथि कृपाचार्य को  बड़े वेग से युद्ध भूमि  से भगा लगाया ! इसके  बाद अर्जुन का युद्ध द्रोणा चार्य से हुआ किन्तु बे भी अर्जुन के सामने नहीं टिक सके और युद्ध से पलायन कर गए ! अर्जुन अश्वत्थामा का युद्ध हुआ और अश्वार्त्थामा भी हार कर पलायन कर गया !जब एक एक  करके सभी रथी महारथी अर्जुन से पराजित हो गए ! तब दुर्योधन की सेना के सभी महारथियों ने अर्जुन पर भीष्म पितामह सहित एक साथ आक्रमण किया  !भीष्म पितामह और अर्जुन के मध्य अदभुद  युद्ध हुआ और युद्ध में भीष्म पितामह अर्जुन के तीखे वाणो से घायल होकर मूर्छित हो गए और उनका सारथि उनको युद्ध भूमि के बाहर भगा लेगया  !इस प्रकार अर्जुन ने अकेले ही कौरव पक्छ के सभी महरथियों को पराजित कर दिया था !इन्ही बातों का स्मरण भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को करा रहे हैं कि तेरे ऐसे महाबीर को यह कायरता शोभा नहीं देती है !तू अपनी स्वजनाशक्ति से उत्पन छुद्र हृदय की दुर्बलता के कारण कर्त्तव्य का त्याग कर रहा है ! यह तेरे लिए उचित नहीं है !तू अपनी इस छुद्र हृदय की दुर्बलता को त्याग कर अपने कर्त्तव्य रूपी युद्ध का पालन करने के लिए उठ कर खड़ा होजा !
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Monday, 8 February 2016

लोभ ,मोह ,क्रोध,अहंकार ,अतिशय प्रेम ,लालच ! इन सातों दुर्गुणों के नाश का प्रयत्न संसार के सभी धर्मग्रंथों में किया गया है !इसके अतिरक्त संसार के सभी विधान और संविधान मानव समाज को व्यबस्थित जीवन जीने के लिए इन दुर्गणों को समाप्त करने के लिए दंड विधान का भी प्रावधान करते हैं !किन्तु इस सबके बाबजूद  भी मानव समाज कम और अधिक मात्रा में  इन दुर्गुणों से प्रभावित दीखता है !और इन्ही दुर्गुणों के पोषण .संरक्छण ,और सम्वर्धन के लिए अनेकों प्रकार के नामों से इनको क्रियात्मक स्वरुप प्रदान किया जाता है और किया भी जा रहा है !राष्ट्र अपनी रक्छा के नाम पर अहंकार और अतिशय प्रेम को राष्ट्रीयता का नाम देकर संघारक अणुबम  आदि का निर्माण कर संपूर्ण प्राणी समुदाय के जीवन को संकटयुक्त बना देते हैं !लालच का तो कोई अंत ही दिखाई नहीं देता है !जीवन के सभी छेत्रों में लालच का साम्राज्य स्थापित है !संसार के राष्ट्र के राष्ट्र भ्रष्टाचारियों  की श्रेणी में नामित किये गए हैं !भारत को भी भ्रष्ट देशों की सूची में महत्त्व पूर्ण स्थान प्राप्त है !संसार में और विशेष तौर पर भारत में वह शुभ दिन कब आएगा जब भारतीय समाज  इन सभी दुर्गुणों से मुक्ति पायेगा !श्री मद भगवद गीता में जिज्ञासु अर्जुन भगवान श्री कृष्णा से पूंछता है कि आप हमें बताईये  कि मनुष्य स्वयं ना चाहता हुआ भी जबरदस्ती लगाए हुए की तरह किस से प्रेरित होकर इन दुर्गुणों से युक्त पाप का आचरण करता है ! श्री कृष्ण उत्तर देते हुए कहते हैं ! कि रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह लालच ही जिसे काम ,वासना ,लोभ ,आदि भी कहते हैं.पाप आदि का मूल कारण है ! जब इसकी पूर्ति के मार्ग में वाधायें  उत्पन्न होती हैं तो ये ही  क्रोध का रूप धारण कर लेती हैं ! यही काम ,लालच ,वासनाएं मनुष्य को सभी प्रकार अनर्थ और पाप पूर्ण कार्यों में नियोजित कर देती हैं ! और ये लालच आदि ऐसे दुर्गुण हैं कि इनकी प्राप्ति के साथ ही इनको प्राप्त करने की भूख लगातार बढ़ती ही जाती है !  इनकी पूर्ति कभी होती ही नहीं है और होना समभव भी नहीं है, ये ही समस्त दुर्गुण बड़े पापी हैं, और यही मनुष्यों के सबसे बड़े शत्रु हैं !इसी तथ्य को महाभारत में व्यासदेव ने प्रगट करते हुए कहा है !कि प्रकृति न सभी प्राणियों के जीवन धारण करने के लिए पूर्ण व्यबस्था की है !किन्तु लालची व्यक्ति की तृप्ति सम्पूर्ण संसार की वस्तुओं से भी नहीं की सकती है ! अच्छा है यदि सुखद और व्यबस्थित जीवन जीने के लिए इन दुर्गुणों से मनुष्य को मुक्ति कीप्राप्ति हो जाय !
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गीता ५(१९) जीवन मन्त्र -जिनका मन मष्तिष्क ह्रदय समता में स्थित हो गया है उन्होंने जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है अर्थात बे मनुष्य को प्राप्त होने वाली दुर्लभ जीवन मुक्ति अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं ब्रह्म सम और निर्दोष है इसलिए जीवन मुक्त जीवित अवस्था में ही ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं सभी मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति कर सकते हैं और सम्पूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात जीवन मुक्त हो सकते हैं मनुष्य अपने जीवन काल में ही संसार से मुक्त हो सकता है संसार को जीतने का मतलब है संसार के बंधन में डालने वाले माया मोह राग द्वेष से मुक्त होना जिसने राग द्वेष को जीत लिया है ऐसे समदर्शी महापुरुष को संसार का बड़े से बड़ा प्रलोभन भी आकर्षित नहीं कर सकता और बड़े से बड़ा दुःख भी विचलित नहीं कर सकता जिसने संसार से मुक्त होने की कला अपने में विकसित करली है समता की प्राप्ति होने पर उस से अधिक कोई दूसरा लाभ उसके ह्रदय मन मस्तिष्क में नहीं आता है सभी मनुष्यों को एक ही ब्रह्म की समता की प्राप्ति होती है क्योँकि ब्रह्म अनेक नहीं एक है और धर्म तथा साधक और ईश्वर प्राप्ति की साधनाएं अनेक हैं जिस ईश्वर की प्राप्ति शंकराचार्य रामनुजा चार्य अरविंदो आदि महापुरुषों को हुई उसी परमात्म तत्त्व की प्राप्ति सभी साधकों को होती है समत्त्व का आदर्श सामने रखकर व्योहार करने पर समता का छेत्र धीरे धीरे गहरा और व्यापक होता जाता है और अन्ततः इसी जीवन में ब्रह्म साम्य का अनुभव प्राप्त हो जाता है मुक्ति का अनुभव लेने के लिए मरने की जरुरत नहीं है जिन्होंने समता आधारित अपना जीवन निर्माण किया है बे ब्रह्म में ही स्थित हो गए हैं क्योँकि समता की परिपूर्णता ही ब्रह्म है पाप और पुण्य ब्रह्म की समता प्राप्त व्यक्ति से नहीं होते हैं क्योँकि समता प्राप्त व्यक्ति संसार के राग द्वेष मोह माया से मुक्त होकर सम दृष्टि से न्याय युक्त व्योहार करता है ब्रह्म सम और निर्दोष है शुभ अशुभ से अतीत है और समता प्राप्त व्यक्ति भी शुभ अशुभ से अतीत होता है इसलिए वह ब्रह्म में ही स्थापित रहता है
Posted by Unknown at 08:16 No comments:
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Sunday, 7 February 2016

गीता २(२४)जीवनमंत्र- आत्मा काटा नहीं जा सकता जलाया नहीं जा सकता गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया भी नहीं जा सकता यह हमेशा रहने वाला सब में परिपूर्ण स्थिर स्वाभाव बाला और अनादि अजर अविनाशी है सभी प्राणिओं में आत्मा का निवास है किन्तु शरीरों और आत्मा के धर्म एक दूसरे से भिन्न और विरुद्ध है आत्मा अमर है और शरीरों की मृत्यु होती है भौतिकबादी शरीर को ही आत्मा मानते हैं बे तर्क प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि शरीर रूपी आत्मा का विनाश प्रत्यक्छ देखने में आता है सम्पूर्ण संसार इसका साक्षी है फिर भी यदि कोई शाश्त्र प्रमाण की ओट लेकर शरीर से अलग आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन करता है तो वह प्रत्यक्ष प्रमाण के विरुद्ध है शरीर की मृत्यु के साथ ही आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है किन्तु आत्मा को अविनाशी मानने वाले इस मत को सही नहीं मानते हैं उनका कथन है की मृत्यु होने के बाद भी शरीर जैसा का तैसा पड़ा रहता है किंतु उसमे से चेतना या आत्मा निकल जाती है यदि आत्मा ही शरीर होती तो मृत्यु के साथ आत्मा की तरह शरीर को भी लुप्त हो जाना चाहिए था किन्तु ऐसा नहीं होता है इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने सनातन सत्य का उद्घाटन करते हुए कहा है कि आत्मा परिपूर्ण स्थिर स्वाभाव बाला अनादि और अविनाशी है जबकि सभी शरीर परिवर्तन शील जन्म मरण से युक्त हैं शरीरों और आत्मा की पृथकता और भिन्न स्वाभाओं का ज्ञान होने से कठोर से कठोर कर्तव्य पालन में भी कठिनाई नहीं होती है अर्जुन मोहग्रस्त होकर कर्तव्य पालन से विमुख हो रहा था वह शरीरों में उलझ कर अपने युद्ध रूप कर्तव्य से विरत हो गया था उसको शरीर और आत्मा का भेद बता कर कर्तव्य में प्रवृत्त करने के लिए शरीर और आत्मा की पृथकता का यतार्थ ज्ञान कराया गया है समाज और संसार में शरीर की रक्षा सुरक्षा पुष्टि इत्यादि के लिए अनेक साधन निर्मित किये जाते हैं किन्तु प्राणिमात्र के लिए निर्मित इन सभी साधनों का न्याय युक्त उपयोग हो इसके लिए जीवन तो आत्मदृष्टि से ही जिन पड़ता है सभी शरीरों में अजर अमर एक ही आत्मा का वास है जब यह बोध हो जाता है तब कर्म में निष्पक्छता अपने आप आ जाती है कर्तव्य पालन के लिए निष्पक्छता होना आवश्यक है आत्मा की सर्व व्यापकता के बोध ने ही भारत भूमि में उद्घोष हुआ था कि सभी प्राणी सुखी हों सभी प्राणी रोग मुक्त हों सभी प्राणी शुभ दर्शन करे और किसी को भी कभी भी दुःख की प्राप्ति ना हो
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आज के लिए बस इतना ही.
Posted by Unknown at 08:12 No comments:
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जनता बेईमानी घूस खोरी कमीशन खोरी और नेताओं अधिकारिओं कर्मचारिओं की उपेक्छा से तंग आचुकी है इसलिए प्रत्येक चुनाव में वह राजनेताओं पर भरोसा कर नेताओं को चुनाव में विजयी बनाती है किन्तु चुनाव जीतने के बाद नेताओं की सम्पत्ति कई गुना बढ़ जाती है और भृष्ट अधिकारी भी इनसे सांठ गांठ कर अकूत धन सम्पत्ति बटोरते है ईमानदार अधिकारी प्रशासनिक कार्य से हटा दिए जाते हैं इस बार जैसा की सभी सर्वे बता रहे हैं की दिल्ली में आप पार्टी की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ बन ने जा रही है यदि यह सर्वे परिणाम सही निकलते है तो दिल्ली के प्रबुद्ध मत दाताओं ने केजरीवाल की पार्टी को ईमानदारी के आधार पर वोट दिया है आने वाला समय बताएगा की आप जनता के विश्वास पर खरी उतरती है या नहीं ?
Posted by Unknown at 08:06 No comments:
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Saturday, 6 February 2016

ओबामा ने जो वक्तव्य प्रार्थना सभा में दिया है कि भारत में जो धार्मिक असहनशीलता की हवा बह रही है यदि गांधीजी आज होते तो उसको देख कर स्तब्ध रह जाते इस वक्तव्य पर वर्तमान युग की सर्वधर्म समभाव की आवश्यकता की दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है इस सर्वधर्म समभाव विचार के आधुनिक प्रणेता आचरण में उतारकर विश्व्पटल पर रखने वाले गांधीजी ही हुए हैं और इसी लक्छ्य की प्राप्ति में जीवन भर संलग्न रहने वाले गांधी जी को प्राणो की आहुति भी इसीलिए देनी पड़ी और आज देश में इसी के कारण उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्र भक्त कह कर महिमा मंडित किया जा रहा है और गांधी जी को हिन्दू धर्म का दुश्मन धार्मिक कट्टरता कभी भी भारत भूमि में अनादि काल से नहीं रही किन्तु धर्म में जब प्रचलन में जीवन को श्रेष्ठ गति देने वाले सनातन सिद्धांत सत्य अहिंसा अपरिग्रह अस्तेय ब्रह्मचर्य का अभाव और अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगा तब सुधार के लिए जैन धर्म और आधुनिक काल में बौद्ध धर्म का इन सनातन सिधान्तो पर आधारित धर्म का भारत भूमि में जन्म हुआ मुस्लिम काल में जब जब भारत में बाहर से प्रवेश करने वाले ईसाई और मुस्लिम धर्म का प्रवेश हुआ और इन्होने भारत के आदि धर्मो की सर्ब धर्म समावेशिक की नीति का नाजायज लाभ उठाकर हिन्दुओं का लालच और तलवार के बल पर भारी मात्र में धर्म परिवर्तन कराया और हिन्दुओं पर असयहनीय अत्याचार किये मंदिर तोड़े हिन्दू संस्कृति को अपमानित किया तब उसकी रक्षा करने का कार्य शांति प्रिय आध्यात्मिक ढंग से तुलसीदास नामदेव आदि महान संतो ने किया और छात्र शक्ति से महाराणा प्रताप ने और कूटनीति तथा युद्ध कौशल से महान संत समर्थ रामदास से शक्ति प्राप्त कर शिवाजी ने किया और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए साधु संतों ने भी संतो में ही से कुछ अस्त्र शस्त्र युक्त संगठन निर्माण किये जो गुसाईं नागा साधुओं आदि के रूप में विख्यात हुए और पंजाब में धर्म की रक्षा में अनेक सिख गुरुओं ने जीवन बलिदान किया और गुरु गोविन्द सिंह ने धर्म रक्षा के लिए ही सिख धर्म को जन्म दिया किन्तु आज की मांग धार्मिक कट्टरता नहीं धार्मिक उदारता है जिसका उद्घोष वर्तमान भारत में गांधीजी ने किया और इसकी रक्षा में अपने प्राणो की आहुति दी इस सर्वधर्म समवेशिक धर्म की सफलता के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा इस्लामिक संगठन जैसे कट्टरपन्थी समूह है जो मुस्लिम देशों में सक्रिय है और आत्तंक और अमानवीय अत्त्याचारों के प्रतीक बन गए हैं किन्तु इस कारण से हम भारत भूमि में सर्वसमावेशिक धर्म के भाव को नष्ट नहीं कर सकते हैं किन्तु आज यह होता दिखाई दे रहा है हिन्दू राष्ट्र की मांग घर वापिसी ऐसे प्रोग्राम आदि तथा गांधीजी को हिन्दुओं का दुश्मन और गोडसे को राष्ट्र भक्त बताकर उसका मंदिर और चौराहों पर मूर्तियां आदि लगाने के प्रयत्न इस धार्मिक असहनशीलता की ओर इशारा कर रहे हैं यही सब जानकर और देख कर ओबामा ने कहा है कि आज गांधीजी होते तो स्तब्ध रह जाते हम सब को भारत की मूल धार्मिक अबधारणा धार्मिक उदारता की ओर मुड़ना चाहिए और शांति सद्भाव और सर्व धर्म समावेशिक धर्म के आधुनिक प्रणेता गांधी जी के आचरण का अनुसरण करना चाहिए हमारा जीवन आदर्श धार्मिक कट्टरता नहीं धार्मिक उदारता है
Posted by Unknown at 08:51 No comments:
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Narottam Swami
6 फ़रवरी 2015 को 10:06 अपराह्न बजे ·
गीता २(३८) जीवन मन्त्र -जय पराजय लाभ हानि और सुख दुःख को समान समझ कर युद्ध कर अर्थात कर्तव्य कर्म कर इस प्रकार युद्ध करनेसे अर्थात कर्तव्य कर्म करने से पाप की प्राप्ति नहीं होगी बल्कि यश की प्राप्ति होगी भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य निष्ठा का बोध कराते हुए कहते हैं की यह जो युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म तुझे प्राप्त हुआ है यह तू ने नहीं बुलाया है मेरे सहित तू ने युद्ध ना हो इसकी पूरी कोशिश की किन्तु अधर्म परायण और अनीति का अनुशरण करने लोभ ग्रस्त तेरे कुटुम्बिओं ने लोभ मोह अधर्म अनीति अन्याय का परित्याग नहीं किया इसलिए छत्री होने के नाते अधर्मिओं के विनाश के लिए यह युद्ध तुझे स्वधर्म पालन के लिए प्राप्त हुआ है परिणाम में चाहे जीत हो या हार लाभ हो या हानि सुख हो या दुःख ये फल किसी न किसी रूप में किसी भी कर्तव्य पालन में अवश्य प्राप्त होते हैं किन्तु जहाँ प्रश्न कर्तव्य पालन का होता है वहां परिणाम को गौड़ता प्रदान कर कर्तव्य कर्म को अनासक्ति और फलाकांछा रहित होकर तत्परता योग्यता और निष्ठा पूर्वक करना पड़ता है जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं उनके कन्धों पर यह उत्तरदायित्व होता है की वह सदाचरण की ऐसी परम्परा समाज में स्थापित करें जिस से वर्तमान और भविष्य में भी समाज सदमार्ग पर चलता रहे युद्ध यद्द्पि पाप रूप ही है किन्तु राष्ट्र रक्षा के लिए यह स्वधर्म है जब अनीति अधर्म की प्रवृतियां राष्ट्र की अस्मिता को संकट में डाल देती हैं तब राष्ट्र और प्रजा की रक्षा के लिए स्वधर्म रूप युद्ध का आश्रय लेना पड़ता है स्वधर्म का यह सिद्धांत सभी कर्तव्यों पर लागू होता है न्याय युक्त समबुद्धि की भावना से कामनाओं की प्राप्ति अप्राप्ति और अधीरता के समक्ष झुके बिना व्यक्ति को स्वतः प्राप्त कर्तव्य कर्मों को उन परिश्थितिओं के रहते हुए ही करना पड़ता है जो उसे चाहे या अनचाहे
प्राप्त हो गयीं है गीता व्योहार में परमार्थ की कला बताती है कर्तव्य कर्म का त्याग किसी भी स्थिति में उचित नहीं है किसी भी परिश्थिति में कर्तव्य रूप स्वधर्म टाला नहीं जा सकता है जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है तो अच्छे बुरे वही परिणामों के बारे में तटस्थ रहने का कर्तव्य प्रबाह पतित न्याय से स्वतः प्राप्त हो जाता है फल मिलना ही चाहिए ऐसी कुशलता से कर्म करना चाहिए किन्तु ना मिलने पर चित्त की समता को नहीं खोना चाहिए और फल मिलने पर ख़ुशी से फूल नहीं जाना चाहिए यही आंतरिक आनंद और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है
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Friday, 5 February 2016

२(२)कुतस्त्वा कश्मलमिदम् विषमे सम्पुपस्थिम् ----------------भगवान ने कहा हे अर्जुन इस विषम अवसर पर तुम में यह कायरता कहाँ से प्रवेश कर गयी है  इस प्रकार की कायरता का प्रदर्शन  श्रेष्ठ पुरुषों ने कभी नहीं किया है ! यह कायरता न तो स्वर्ग प्रदान कराने वाली है  !और ना ही श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण करने योग्य है ! और ना ही इस से कीर्ति की प्राप्ति होगी ! अर्थात इस कायरता से  श्रेष्ठता का नाश हो जायेगा ! तुम्हारी कीर्ति भी नष्ट हो जायेगी  !और युद्ध भूमि में लड़ते हुए जो वीर प्राणो का त्याग करते हैं जिनसे उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है उस स्वर्ग की प्राप्ति भी तुम्हे इस कायरता  से नहीं होगी ! भगवान श्री कृष्ण यहाँ अर्जुन को उसके शौर्य पूर्ण कथनों की उसके वीरता के स्वभाव की और उसके द्वारा दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का स्मरण करा रहे हैं !!जब अर्जुन का जन्म हुआ था ! तब आकाश वाणी हुई थी कि यह बालक कार्तवीर्य अर्जुन के समान तेजस्वी ,भगवान शिव के समान पराक्रमी ,और देवराज इंद्र के सामान अजेय होकर पांडवों के यश का विस्तार करेगा ! यह वीर पुत्र मद्र ,कुरु ,सोमक ,चेदि काशी तथा करूष आदि देशों को बस में करके कुरुबंश की शक्ति की बृद्धि करेगा ! यह महाबली श्रेष्ठ वीर बालक समस्त छत्रियों का नायक होगा और युद्ध में भूमि  में शत्रुओं को जीत कर भाईयों के साथ तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा ! समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ यह अर्जुन सम्पूर्ण दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी  प्राप्त करेगा और अपनी खोयी हुई संपत्ति और राज्य को पुनः प्राप्त करेगा ! आकाशवाणी के अनुसार  भगवान शंकर ने अर्जुन को पशुपति अस्त्र प्रदान किया था ! जिसको देवराज इंद्र ,यम ,कुबेर  वरुण अथवा वायु देवता भी नहीं जानते थे ! भगवान शंकर ने अर्जुन को यह अश्त्र प्रदान करते हुए कहा था कि तुम सहसा इसका प्रयोग किसी अल्पशक्ति प्राप्त योद्धा पर नहीं करना इसका प्रयोग उसी योद्धा पर करना जो दिव्य शक्ति धारण करने वाला हो ! चराचर प्राणियों सहित तीनो लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इस अश्त्र द्वारा मारा न जा सके ! इसका प्रयोग करने वाला पुरुष अपने मानसिक संकल्प से दृष्टि से वाणी से तथा धनुष वाण द्वारा भी शत्रुओं को नष्ट कर सकता है ! इसके अलावा जल के देवता वरुणदेव ने अर्जुन को वरुण पास प्रदान किया था ! वरुण देव ने इसी शस्त्र से  महान असुर तारकामय को बाँध लिया था ! वरुण देव ने कहा इस अस्त्र के द्वारा जब तुम संग्राम भूमि में विचरण करोगे उस समय सारी वसुंधरा छत्रियों से शून्य हो जायेगी ! कुवेर ने अर्जुन को अंतरधान नामक अश्त्र प्रदान किया था ! यह अश्त्र ओज ,तेज और कान्ति प्रदान करने वाला है ! शत्रु सेना को सुला देने वाला और समस्त वैरियों का विनाश करने वाला है ! यम ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी 1 तत्पश्चात देवराज इंद्र आये उन्होंने अर्जुन से कहा तुम्हें देवताओं का बड़ा भारी कार्य सिद्ध करना है !तैयार हो जाओ और मेरे साथ स्वर्ग लोक चलो ! अर्जुन स्वर्ग लोक में ५ सालों तक रहे ! और उन्होंने वहां रह कर अश्त्र शस्त्र विद्या के साथ दिव्य संगीत की भी शिक्छा प्राप्त की थी ! इन सभी देवताओ ने अर्जुन को दिव्यास्त्र देते समय कहा था कि तुम भगवान श्री कृष्ण की सहायता से पृथ्वी का भार हल्का करोगे और युद्ध में भीष्म द्रोण कर्ण आदि को पराजित करोगे और पृथ्वी से असुरों और अधर्म परायण मानवता और धर्म का नाश करने वाले लोगों का संघार करोगे !स्वर्ग की प्राप्ति या तो समरभूमि में युद्ध करते हुए वीर को प्राप्त होती है या परिव्राट सन्यासी को !अर्जुन ने अनेक बार यहकहा था कि वह दुष्ट दुर्योधन और उसकी अनीति और अधर्म का समर्थन और साथ देने वालों का समूल विनाश करेगा !उसी का स्मरण कराते हुए परमात्मा श्री कृष्ण  अर्जुन से कह रहे हैं कि तेरी यह कायरतास  तेरे बचनो और जिस विस्वास के साथ तुझे दिव्य शक्तियां देवताओं ने दी हैं !उनका उल्लंघन हो रहा है
1  इसलिए  इस विषम अवसर पर  तेरी यह विश्वास और वचन भंग करने वाली कायरता  उचित नहीं है !
Posted by Unknown at 09:15 No comments:
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जीवन मन्त्र -महापुरुषों के बचन आचरणीय होते है क्योँकि बे उनके आचरण से निकल कर सिद्धांत बन जाते हैं सिद्धांत का अर्थ होता है जो सिद्ध किये जा सकते है और सिद्ध किये जा चके हैं इसलिए शाब्दिक ज्ञान प्रकाशन से इन सिद्धांतों का कोई भी उपयोग व्यक्ति या समाज के लिए नहीं हो सकता है इनका उपयोग तो सिर्फ आचरण से ही सिद्ध हो सकता है इसलिए इन सिद्धांतो को आचरण में उतारने के लिए तदनुसार मनःस्थिति का निर्माण करना होता है गीता २(४०)में कहा गया है की समत्त्व बुद्धि से जिन कर्मों का प्रारम्भ किया जाता है बे ही कर्म व्यक्ति और समाज के लिए लाभकारी होते है क्योँकि वे कर्तव्य बुद्धि से किये जाते हैं इसलिए उनका अनर्थ करी परिणाम भी नहीं होता है समता की दृष्टि से किये गए कर्तव्य कर्म मनुष्यों संसार की अशांति के आघातों से बचाकर आत्मशांति में स्थापित कर देते हैं और थोड़ा सा भी साम्या बुद्धि से किया गया कर्तव्य कर्म उस व्यक्ति और समाज बा संसार के लिए बहुत उपयोगी हो जाता है संसार में सर्वत्र कर्म के आकार को ही महत्त्व दिया जाता है अगर कोई व्यक्ति बड़ा दान देता है या महत्त्व के पद पर बैठा हुआ है तो उसके द्वारा किये गए कार्यों की प्रसंसा होती है किन्तु समत्व बुद्धि से युक्त कर्तव्य कर्मों में कर्म के आकार का महत्त्व नहीं है भावना का महत्त्व है ह्रदय मष्तिष्क आचार विचार और व्योहार यदि समता से युक्त है तो कर्म के आकार का महत्त्व नहीं है समत्त्व युक्त बुद्धि का महत्त्व है समत्त्व युक्ति बुद्धि व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण आशक्ति युक्त दम्भ युक्त और अहंकार युक्त कर्मों की मुक्ति के लिए एक महान औषधि है इस समत्व्व बुद्धि से युक्त होकर कर्म करने वाले व्यक्ति समाज के लिए अपने लिए और अपनी आत्मा तथा सम्पूर्ण सृष्टि के लिए उपयोगी होते हैं और भगवान के भक्त भगवद बुद्धि से युक्त सम्पूर्ण कर्तव्य कर्म भगवान को अर्पित कर भगवान की आराधना उपासना भक्ति का फल पाते हैं भले ही कर्म का स्थूल आकार कितना ही छोटा हो किन्तु उनका भाव महान होता है इसलिए उनका छोटा कर्म भी महान हो जाता है आचरित कर्मों से ही कथित प्रेरणादायक शब्दों की सार्थकता सिद्ध होती है
Posted by Unknown at 04:42 No comments:
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गांधीजी की निष्ठां सत्य अहिंसा में थी इन्ही दो साधनो से उन्होंने विश्व का मार्गदर्शन भारत के माध्यम से किया और भारत के आज़ादी के संघर्ष के द्वारा विश्व को दास्ता मुक्ति का सन्देश दिया परिणाम स्वरुप गांधी का अंग्रेज़ो भारत छोडो का नारा अँगरेज़ एशिया छोडो के नारे में तब्दील हो गया और भारत की आज़ादी के बाद १३७ देश आज़ाद हुए जिन्होंने गांधीजी को आज़ादी प्राप्ति की जंग में गांधीजी को अपना प्रेरणा श्रोत बताया इसलिए गांधीजी को हमें सगुण रूप में ही स्वीकार करना होगा गांधी जैसे थे उसी रूप में आज विश्व उन्हें स्वीकार कर रहा है अगर हमें गांधी जिस रूप में थे उस रूप में स्वीकार नहीं है तो हमें उनको अस्वीकार करने का पूरा हक़ है किन्तु उनको निर्गुण या किसी अन्य रूप में अपनी कल्पना का विकृत गांधी प्रस्तुत करने का अधिकार हमें नहीं है गांधीजी अपनी आलोचना से न तो भयभीत होते थे और न ही विचलित फिर हमको भी उसी गांधी के बारे में बताना चाहिए जैसे गांधी जी थे वह कहते थे मेरा बचाव करने की आवश्यकता नहीं है गांधी जी कहते थे की कोई भी गांधी को मार सकता है किन्तु सत्य अहिंसा को नहीं मार सकता जिस पर गांधी का संपूर्ण जीवन खड़ा हुआ था इसलिए योगेन्द्र यादव ऐसे लेखक अपना मार्ग निश्चित करने के लये स्वतंत्र है किन्तु गांधी जी द्वारा आचरित मार्ग को बदलने की राय उनकी मान्य नहीं की जा सकती है (योगेन्द्र यादव के गांधी और गोडसे नामक लेख पर टिप्पड़ी )
Posted by Unknown at 04:37 No comments:
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Thursday, 4 February 2016

संत रविदास की जन्म जयंती के जुलुस में सहारनपुर में हिन्दू मुस्लिम विवाद इतना उग्र हो गया की दंगा होने की स्थिति बन ने लगी परिणाम स्वरुप भारी मात्रा में पुलिस बुलानी पड़ी आज कल धार्मिक आयोजनो की बृद्धि आकाश छूती दिखाई देती है किन्तु धार्मिकता का दर्शन लुप्त होता दिखाई देता है संत का जीवन त्याग तपस्या ईश्वर भक्ति पर आधारित होता है उसमे एकान्त साधना और सामान्य कामासक्त पद प्रितिष्ठा और पैसे के उपार्जन में संलग्न व्यक्तिओ से मेल मिलाप नहीं होता है क्योँकि ऐसे व्यक्ति संत की साधना में सबसे बड़े बाधक होते है संत का घर परिवार से भी विछोह हो जाता है उसका सर्वस्व सिर्फ परमात्मा की आराधना और उपासना ही होती है इसलिए संत की जन्म तिथि मनाने का एक ही उपाय है ईश्वर भक्ति के लिए अपने आपको तैयार कर संत से अपने आप को ईश्वर की आराधना करने के लिए जोड़ना किन्तु वर्तमान समय में संत वोट प्राप्ति का माध्यम बन गए हैं और उन पद प्रितिष्ठा खोजी नेताओं की श्रद्धा और आस्था के केंद्र बन गए हैं जिनके काम के ये त्यागी तपस्वी संत कभी भी नहीं रहे इसके अलावा अब संत लोग जात पांत से भी सम्बद्ध हो गए हैं इसलिए संतों के जुलुस में वह लोग भारी मात्र में शामिल होते हैं जिनका आचरण अत्यंत अशुद्ध होता है और ऐसे लोग भासण देने वाले होते हैं जो सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ प्रितिष्ठा की तलाश में ही घूमते रहते हैं और मनमानी व्याख्या कर संत का आध्यात्मिक सन्देश ना देकरलोगों को गुमराह करते हैं सहारनपुर में जो विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई उसका कारण जो दैनिक जागरण में बताया गया है कि जुलुस में एक लड़का शराब पिए हुए था जब जुलुस मस्जिद के पास से निकला तो अजान का समय होने के कारण मुसलमानो ने युवक की मारपीट कर दी जिस से विवाद हो गया हिन्दू मुसलमान तो झगडे के लिए तैयार ही रहते हैं छोटी सी घटना भी हिन्दू मुस्लिम दन्गे का रूप ले लेती है युवाओं को अपने भविष्य के निर्माण को दृष्टिगत रख इन मजहबी पागलों से अपने को मुक्त रखना चाहिए और संत के जीवन से सार्वभौम आत्मनिष्ठ ज्ञान की सीख ग्रहण करनी चाहिए
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  • Sameer Choudhary
    • NoWhere में कार्यरत हैं
  • Utkal Gandhi Smarak Nidhi
    • Cuttack, Orissa
  • आज के लिए बस इतना ही.
    Posted by Unknown at 08:07 No comments:
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    महाभारत -१४ साल तक के बालकों को नहीं किया जाता था अपराध करने पर दण्डित -मांडव्य नाम के एक योगी थे बे अपने आश्रम के द्धार पर ब्रिक्छ के नीचे दोनों हाथ ऊपर उठकर मौन ब्रत धारण किये हुऐ तपस्या करते थे एक दिन उनके आश्रम पर लूट का माल लिए हुए कुछ लुटेरे आये राज्य के सैनिक उन लुटेरों का पीछा कर रहे थे उन लुटेरों ने लूट का माल ऋषि के आश्रम में रख दिया और वहीं पास में छिप गए सैनिको ने ऋषि से पूंछा लुटेरे किस रस्ते से भागे हैं मौन के कारण ऋषि ने कोई जबाब नहीं दिया सैनिकों ने छिपे हुए लुटेरों को पकड़ लिया तथा आश्रम से लूट का माल भी बरामद कर लिया अब तो उनका ऋषि पर भी संदेह हो गया इसलिए उन्होंने ऋषि को भी लुटेरों के साथ पकड़ कर राजा के सामने खड़ा कर दिया राजा ने लुटेरो के साथ ऋषि को भी अपराधी मान कर मृत्यु दंड दे दिया और उनको शूली पर चढ़ा दिया किन्तु शूली पर चढ़ाये जाने के बाद भी ऋषि की मृत्यु नहीं हुई सैनकों ने घबड़ा कर यह सुचना राजा को सुनाई राजा ने मंत्रिओं सहित आकर ऋषि से छमा मांगी ऋषि ने राजा को छमा कर दिया किन्तु उनको इस बात का कारण जानने की उत्कंठा बानी रही की निर्दोष होते हुए भी उन्हें यह दंड किसलिए मिला एक बार उनकी भेंट धर्म राज से हुई उन्होंने धर्म से प्रश्न किया की निर्दोष होने पर भी उन्हें शूली पर क्योँ चढ़ाया गया इस पर धर्म राज ने कहा कि आपने पूर्व जन्म में बालपन में खेल खेल में एक कीड़े में सीक घुसा दी थी उसके फल रूप में यह दंड तुम्हे प्राप्त हुआ है तब मांडव्य ऋषि ने आज्ञा दी कि धर्मशास्त्र के अनुसार जन्म से लेकर १४ वर्ष तक की आयु का बालक जो भी अपराध करेगा उसमे अधर्म नहीं होगा क्योँकि उस आयु तक बालक को धर्म शास्त्र के आदेश का ज्ञान नहीं होता है यही नियम भारत सहित विश्व के तमाम देशों में थोड़े बहुत संशोधनों के साथ आज भी लागू है
    Posted by Unknown at 08:00 No comments:
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    गीतज्ञान २(१) संजय ने कहा --------------   स्वजनशक्ति ,मोह और मूढ़ता के कारण अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष और अक्छय तरकश को छोड़ दिया  !और वह रथ में बैठ गया ! उस समय आंसुओं के कारण उसके नेत्रों की देखने की शक्ति भी अवरुद्ध हो गयी थी ! और उसके वीरता से भरे हुए स्वभाव को भी कायरता ने दबा दिया था !  अर्जुन जैसे महान शूरवीर, जिसके सारथी भगवान श्री कृष्ण है, स्वजनाशक्ति और  मोह के कारण  आँखो में इतने  आंसू आजाते हैं  कि उसकी देखने की दृष्टि भी बाधित हो जाती है  !तब अत्यंत जिम्मेदारी के पदों पर वर्तमान समय में आसीन   राजनेता ,अधिकारी ,और धार्मिक चर्चा और अर्चा तथा त्याग वैराग्य  और अपरिग्रह शांति और सद्भाव का उपदेश देने वाले  धर्माचारी और  सामान्य व्यक्ति यदि अपने कर्तव्य से भ्रष्ट हो रहे हैं तथा  होते देखे जाते हैं ! तब इस गीतोक्त उपदेश को जो कर्तव्य पालन के लिए सभी को अनुप्रेरित करता है ! ध्यान और प्रयत्न पूर्वक समाज ,देश ,ओए विश्व तथा स्वयं के हित में धारण करने कि महती आवश्यकता है ! ! अर्जुन में धर्म के नाम से जो कर्तव्य त्याग रूप बुराई आगयी है  ! उस पर भगवान गीता के उपदेश से प्रहार करेंगे और अर्जुन को उसके कोटम्बिक मोह    के कारण उत्पन्न कायरता का निवारण करके उसे स्वधर्म का पालन  करने के लिए प्रेरित करेंगे  !और उपदेश के अंत में अर्जुन अपने अज्ञान से उत्पान्न आसक्ति कात्याग कर कर्तव्य का पालन करेगा !अर्जुन को कर्तव्य पालन  करने के लिए दिया गया यह अमूल्य उपदेश सभी  व्यक्तियों  को कोटम्बिक आसक्ति  लालच .प्रमाद  और मोह, मूढ़ता  से उतपन्न  कर्तव्य त्याग  के स्वभाव  को समाप्त करने कि प्रेरणा प्रदान करेगा ! !
    Posted by Unknown at 01:04 No comments:
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    Wednesday, 3 February 2016

     युवकों को इसी मूल मन्त्र  के द्वारा आत्तंकवादी बनाया जाता है !कि हिन्दू काफ़िर हैं और उनको मारने से जन्नत प्राप्त होती है !यह विष बीज निकालना संभव नहीं है !मुस्लिम मौलवी और खलीफाओं के व्यान प्रायः सोशल मीडिया में पोस्ट होते रहते हैं !कुछ इस्लाम के पैरोकार यह कहते दिखाई देते हैं कि अल्लाह का हुक्म है कि काफ़िर हिन्दुओं को मौत के घाट उतार  दो और उनकी औरतों को ग़ुलाम बनाकर उनके साथ बलात्कार करो !कुछ पैरोकार यह पोस्ट करते हैं कि ये बुत परस्त हिन्दू काबिले क़त्ल हैं इनके सर कलम करो तो जन्नत की प्राप्ति होगी !इस पठानकोट में प्रवेश  कर दो हिन्दुओं को क़त्ल करके  इस आत्तंकवादी युवा ने अपने चाचा और माँ से यही कहा कि उसने दो काफिरों का क़त्ल कर दिया है !उत्तर में उसकी माँ कह रही है कि तुमको जन्नत नसीब होगी !यह हिन्दुओं के लिए अत्यंत खतरनाक सन्देश है !शायद इसीलिए पाकिस्तान के आत्तंकवादी संगठन बार बार  हिंदुस्तान पर ही हमला करते हैं !और पाकिस्तान की सरकार इन हिन्दुओं को काफ़िर कहने  वाले हाफिज सईद ऐसे लोगों पर लगाम नहीं कस पाती है !यह एक गंभीर प्रश्न भारत के सामने खड़ा हुआ है !कि हिन्दुओं को काफ़िर समझ कर उनके क़त्ल करने से जन्नत की प्राप्ति होती है कि उद्घोसणा करने वाले पाकिस्तानियों से मित्रता और सौहाद्र कैसे स्थापित किया जाय ?!एक और भारत सरकार है जो दिल से पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध कायम करना चाहती है !और दूसरी पाकिस्तान के चरमबादी आत्तंकवादी संगठनो के प्रभाव से ग्रस्त पाकिस्तान की सरकार है  जिनके  कारण पाकिस्तान की सरकार भारत से मैत्री पूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयत्नो में इन चरम पंथियों के कारण सफलनहीहो पा रही है !इन चरम पंथी संगठनो का सफाया जब तक पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार नहीं कर पाती है !तब तक भारत के आम नागरिक की  सुरक्छा और भारत की सीमाओं की सुरक्छा भारत सरकार को मुस्तैदी से करना चाहिए !पाकिस्तान की सरकार को भी वहां के विद्यालयों में कुरान के उन प्रसंगो को प्रमुखता से पढ़ाया जाना चाहिए जो सभी धर्मों में प्रेम और सद्भाव का शिक्छण देते हों !आचार्य विनोबा भावे ने कुरान के ऐसे सभी ज्ञान को जो शांति और सद्भाव का सन्देश देते हैं !रूहल कुरान के नाम से लिखा है !विनोबा जी ने सारे जीवन दिलों को जोड़ना का काम किया है !उन्होंने सभी धर्मों में मत बाद समाप्त अपनी लेखनी से किया है !भारत के स्कूलों और पाकिस्तान के विद्यालयों में भी रूहल कुरान को पढ़ाया जाना चाहिए !ताकि पाकिस्तान में अहिंसक इसलाम का चित्र और चरित्र मुसलिम युवाओं के सामने रखा जा सके !ताकि वहां के ये चरम पंथी संगठन युवाओं को धर्म के नाम पर कट्टरपंथी आत्तंक वादी न बना सकें !और भारत के युवा भी इस्लाम का अहिंसक स्वरुप धारण कर भविष्य में होने वाले हिन्दू मुसलिम फसादों और दंगों को विदा कर सकें !यदि पाकिस्तान अपने युवाओं को इन चरमपंथी संगठनों के कट्टरपंथी प्रभाव से मुक्त करने में सफलता प्राप्त  करने में सफल हो जाता है !तो भारत जैसे  उत्तम शांति प्रिय देश से उसकी कायमी मित्रता हो सकती है !भारत से अधिक पाकिस्तान के लिए भला सोचने वाला देश पाकिस्तान के लिए इस पृथ्वीपर दूसरा नहीं हो सकता है !भारत में सरकार किसी की भी हो भारत अपना मूल करुणा प्रधान निश्वार्थ भाव से मदद करने के भाव को नहीं त्याग सकता है !भारत की भूमि वह भूमि है जिसकी पवित्रता का निर्माण ऋषियों ने अपनी तपस्या से किया है !उसी पवित्र भारत की भूमि  पर पाकिस्तान और बांग्ला देश बसे हुए हैं !इसीलिए उनकोभी ऋषियों की तपस्या स्वतः प्राप्त है !अगर ये दोनों  मुसलिम देश भी अपने देशों में भारत के प्रति सद्भाव और मैत्री भाव का सृजन करने की चेस्टा करें तो इन देशों में भी  शांति, सद भाव और अहिंसा का विशाल ब्रक्छ खड़ा हो सकता है !क्योंकि ऋषियों की तपस्या का बीज तो उन देशों में भी है !उस बीज को बस विकसित करने के लिए सिर्फ हवा पानी और रोशनी देने की जरुरत है !
    Posted by Unknown at 01:51 No comments:
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    Tuesday, 2 February 2016

    अर्जुन विषाद योग -------------श्री मदभगवद्  गीता का प्रथम  अध्याय अर्जुन विषाद योग कहलाता है !विषाद से चित्त में अशांति और हलचल उत्पन्न हो जाती है !और चित्त सभी प्रयत्नो के बाद शांत नहीं होता है !जबकि योग में एकाग्रता और चंचलता रहित चित्त की आवश्यकता होती है !जैसे दिन और रात कभी एक नहीं हो सकते हैं ! ऐसे ही विषाद युक्त चित्त और योग भी कभी एक साथ नहीं हो सकते हैं !फिर भी अर्जुन का विषाद युक्त चित्त योग युक्त  कैसे हो गया ? योग का अर्थ है जोड़ना !अर्जुन यद्द्पि विषाद युक्त हो गया है !किन्तु वह परमात्मा श्री कृष्ण से जुड़ा हुआ है !उसका विषाद भी उसको परमात्मा से बिलग नहीं करता है ! वह विषाद का समाधान परमात्मा श्री कृष्ण से ही चाहता है !महाभारत में सभी पात्रों को अनेक अवसरों पर विषाद होता है !किन्तु उनका विषाद योग नही बनता है !किन्तु जब युधिस्ठर को विषाद होता है ! तो उसका समाधान भी अर्जुन परमात्मा श्रीकृष्ण के योग से ही करता है ! युधिस्ठर ने जब यह जान लिया कि युद्ध अब किसी भी स्थिति में रोका नहीं जा सकता है ! तब वह विषाद युक्त होकर कहने लगे कि युद्ध छिड़ने पर अवध्य पुरुषों का भी वध करना पड़ेगा ! तब उन्होंने लम्बी स्वांशे खींचते हुए भीमसेन और अर्जुन से कहा कि जिस युद्ध से बचने के लिए हमने बनवास का कष्ट स्वीकार किया और अनेक प्रकार के भीषण कष्ट सहन किये वही अनर्थ कारी महान युद्ध हमारे प्रयत्न से टल नहीं सका ! यद्द्पि उसे टालने का हमारी और से पूरा प्रयत्न किया गया  किन्तु हमारे प्रयास से उसका निवारण नहीं हो सका  ! और जिस युद्ध के लिए हमने कोई प्रयास नहीं किया था वह महान युद्ध अपने आप हम लोगों के सर पर आगया ! जो लोग मारने योग्य नहीं हैं उनके साथ युद्ध करना कैसे उचित होगा ? युधिस्ठर की यह बात सुनकर शत्रुओं को संताप देने वाले अर्जुन ने कहा कि भगवान श्री कृष्णा और माता कुंती ने भी तथा ज्ञानी विदुर ने भी जो कुछ कहा है वह सब आपको ज्ञात है ! ये सभी लोग कोई भीे अधर्म की बात नहीं कहेंगे ! इसीलिए हम लोगों को युद्ध से निब्रत्त हो जाना उचित नहीं है ! कौरवों की युद्ध भूमि में विशाल सेना देख कर युधित्ठार  को फिर संताप होता है ! और बे विषाद युक्त बचन बोलते हुए कहते हैं -----अर्जुन जिनके प्रधान योद्धा भीष्म हैं उन कौरवों के साथ हम युद्ध भूमि में कैसे युद्ध कर सकते हैं ? हमलोग अपनी सेना के साथ प्राणसंकट की स्थित में पुहंच गए हैं  !तब शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन ने कहा विजय की इक्छा रखने वाले शूरवीर अपने बल और पराक्रम से वैसी विजय नहीं पाते हैं  जैसी की सत्य ,सज्जनता , धर्म तथा उत्साह से प्राप्त कर लेते हैं ! अधर्म, लोभ और मोह त्यागकर उद्द्यम का सहारा ले कर अहंकार शून्य होकर युद्ध करने वाला कभी पराजित नहीं होता है !

    1 जहाँ धर्म है उसी पक्छ की विजय होती है ! हमारी विजय निश्चितहोगी क्योँकि जहाँ श्री कृष्णा है वहीं विजय है ! विजय तो श्री कृष्ण का एक गुण है ! अतः वह उनके पीछे पीछे चलता है ! जैसे विजय गुण है उसी प्रकार विनयभी उनके द्वितीय गुण है !अर्जुन सभी प्रकार के सभी विषादों का समाधान परमात्मा श्री कृष्णा के आश्रय में ही खोजता है !इसीलिए उसका विषाद भी परमात्मा से जुड़ कर योग हो गया है !और इस विषाद का भी समाधान परमात्मा श्री कृष्णा ने गीता के अविनाशी उपदेश से किया है !इस गीतोक्त उपदेश को समझकर  और ग्रहण कर कोई भी व्यक्ति  विषाद मुक्त हो सकता है !
    Posted by Unknown at 09:33 No comments:
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    Monday, 1 February 2016

    पुराणो में बहुत कुछ ऐसा भी लिखा है जो सिर्फ उस काल परिस्थिति आवश्यकता और स्थान के लिए उपयुक्त था उसको आप सब समय सब स्थानो और सब परिश्थितिओं के लिए विधि वाक्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते पवित्र अन्न का सम्बन्ध ईमानदारी की कमाई से भी है जो अन्न शोषण से हुई कमाई से प्राप्त होता है वह कितनी भी पवित्रता से और विधि तथा श्रद्धा से बनाया जाय और खिलाया जाय उस से खाने वाले के मन बुद्धि शरीर पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ सकता है नानक देओ ने जमींदार का शुद्धता पवित्रता से किन्तु शोषण करके करके कमाए धन को जब निचोड़ा था तब उसमे खून निकला था और गरीब केभोजन से दूध जिसे उन्होंने ग्रहण किया था इसलिए आज के समय में भोजन में अशुद्धि का कारण शोषण छल कपट धोखा धडी रिश्वत कमीसन आदि से कमाया हुआ धन भी है इसको भी ध्यान में रखना चाहिए भगवान श्री कृष्णा ने १७(१०)में बासी भोजन को तमोगुणी कहा है किन्तु कड़वे खट्टे नमकीन गरम तीखे रूखे और डाह उत्पन्न करने वाले भोजन को दुःख शोक और रोगों तथा सभी प्रकार की परेशानियाँ उत्पन्न करने वाला कहा है और यह वह भोजन है जो अशुद्ध कमाई से बनाया जाता है १७(९)
    Posted by Unknown at 09:08 No comments:
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