लोभ ,मोह ,क्रोध,अहंकार ,अतिशय प्रेम ,लालच ! इन सातों दुर्गुणों के नाश का प्रयत्न संसार के सभी धर्मग्रंथों में किया गया है !इसके अतिरक्त संसार के सभी विधान और संविधान मानव समाज को व्यबस्थित जीवन जीने के लिए इन दुर्गणों को समाप्त करने के लिए दंड विधान का भी प्रावधान करते हैं !किन्तु इस सबके बाबजूद भी मानव समाज कम और अधिक मात्रा में इन दुर्गुणों से प्रभावित दीखता है !और इन्ही दुर्गुणों के पोषण .संरक्छण ,और सम्वर्धन के लिए अनेकों प्रकार के नामों से इनको क्रियात्मक स्वरुप प्रदान किया जाता है और किया भी जा रहा है !राष्ट्र अपनी रक्छा के नाम पर अहंकार और अतिशय प्रेम को राष्ट्रीयता का नाम देकर संघारक अणुबम आदि का निर्माण कर संपूर्ण प्राणी समुदाय के जीवन को संकटयुक्त बना देते हैं !लालच का तो कोई अंत ही दिखाई नहीं देता है !जीवन के सभी छेत्रों में लालच का साम्राज्य स्थापित है !संसार के राष्ट्र के राष्ट्र भ्रष्टाचारियों की श्रेणी में नामित किये गए हैं !भारत को भी भ्रष्ट देशों की सूची में महत्त्व पूर्ण स्थान प्राप्त है !संसार में और विशेष तौर पर भारत में वह शुभ दिन कब आएगा जब भारतीय समाज इन सभी दुर्गुणों से मुक्ति पायेगा !श्री मद भगवद गीता में जिज्ञासु अर्जुन भगवान श्री कृष्णा से पूंछता है कि आप हमें बताईये कि मनुष्य स्वयं ना चाहता हुआ भी जबरदस्ती लगाए हुए की तरह किस से प्रेरित होकर इन दुर्गुणों से युक्त पाप का आचरण करता है ! श्री कृष्ण उत्तर देते हुए कहते हैं ! कि रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह लालच ही जिसे काम ,वासना ,लोभ ,आदि भी कहते हैं.पाप आदि का मूल कारण है ! जब इसकी पूर्ति के मार्ग में वाधायें उत्पन्न होती हैं तो ये ही क्रोध का रूप धारण कर लेती हैं ! यही काम ,लालच ,वासनाएं मनुष्य को सभी प्रकार अनर्थ और पाप पूर्ण कार्यों में नियोजित कर देती हैं ! और ये लालच आदि ऐसे दुर्गुण हैं कि इनकी प्राप्ति के साथ ही इनको प्राप्त करने की भूख लगातार बढ़ती ही जाती है ! इनकी पूर्ति कभी होती ही नहीं है और होना समभव भी नहीं है, ये ही समस्त दुर्गुण बड़े पापी हैं, और यही मनुष्यों के सबसे बड़े शत्रु हैं !इसी तथ्य को महाभारत में व्यासदेव ने प्रगट करते हुए कहा है !कि प्रकृति न सभी प्राणियों के जीवन धारण करने के लिए पूर्ण व्यबस्था की है !किन्तु लालची व्यक्ति की तृप्ति सम्पूर्ण संसार की वस्तुओं से भी नहीं की सकती है ! अच्छा है यदि सुखद और व्यबस्थित जीवन जीने के लिए इन दुर्गुणों से मनुष्य को मुक्ति कीप्राप्ति हो जाय !
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