पुराणो में बहुत कुछ ऐसा भी लिखा है जो सिर्फ उस काल परिस्थिति आवश्यकता
और स्थान के लिए उपयुक्त था उसको आप सब समय सब स्थानो और सब परिश्थितिओं
के लिए विधि वाक्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते पवित्र अन्न का सम्बन्ध
ईमानदारी की कमाई से भी है जो अन्न शोषण से हुई कमाई से प्राप्त होता है
वह कितनी भी पवित्रता से और विधि तथा श्रद्धा से बनाया जाय और खिलाया जाय
उस से खाने वाले के मन बुद्धि शरीर पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ सकता है नानक
देओ ने जमींदार का शुद्धता पवित्रता से किन्तु शोषण करके
करके कमाए धन को जब निचोड़ा था तब उसमे खून निकला था और गरीब केभोजन से दूध
जिसे उन्होंने ग्रहण किया था इसलिए आज के समय में भोजन में अशुद्धि का
कारण शोषण छल कपट धोखा धडी रिश्वत कमीसन आदि से कमाया हुआ धन भी है इसको भी
ध्यान में रखना चाहिए भगवान श्री कृष्णा ने १७(१०)में बासी भोजन को
तमोगुणी कहा है किन्तु कड़वे खट्टे नमकीन गरम तीखे रूखे और डाह उत्पन्न
करने वाले भोजन को दुःख शोक और रोगों तथा सभी प्रकार की परेशानियाँ उत्पन्न
करने वाला कहा है और यह वह भोजन है जो अशुद्ध कमाई से बनाया जाता है १७(९)
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