Saturday, 6 February 2016

गीता २(३८) जीवन मन्त्र -जय पराजय लाभ हानि और सुख दुःख को समान समझ कर युद्ध कर अर्थात कर्तव्य कर्म कर इस प्रकार युद्ध करनेसे अर्थात कर्तव्य कर्म करने से पाप की प्राप्ति नहीं होगी बल्कि यश की प्राप्ति होगी भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य निष्ठा का बोध कराते हुए कहते हैं की यह जो युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म तुझे प्राप्त हुआ है यह तू ने नहीं बुलाया है मेरे सहित तू ने युद्ध ना हो इसकी पूरी कोशिश की किन्तु अधर्म परायण और अनीति का अनुशरण करने लोभ ग्रस्त तेरे कुटुम्बिओं ने लोभ मोह अधर्म अनीति अन्याय का परित्याग नहीं किया इसलिए छत्री होने के नाते अधर्मिओं के विनाश के लिए यह युद्ध तुझे स्वधर्म पालन के लिए प्राप्त हुआ है परिणाम में चाहे जीत हो या हार लाभ हो या हानि सुख हो या दुःख ये फल किसी न किसी रूप में किसी भी कर्तव्य पालन में अवश्य प्राप्त होते हैं किन्तु जहाँ प्रश्न कर्तव्य पालन का होता है वहां परिणाम को गौड़ता प्रदान कर कर्तव्य कर्म को अनासक्ति और फलाकांछा रहित होकर तत्परता योग्यता और निष्ठा पूर्वक करना पड़ता है जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं उनके कन्धों पर यह उत्तरदायित्व होता है की वह सदाचरण की ऐसी परम्परा समाज में स्थापित करें जिस से वर्तमान और भविष्य में भी समाज सदमार्ग पर चलता रहे युद्ध यद्द्पि पाप रूप ही है किन्तु राष्ट्र रक्षा के लिए यह स्वधर्म है जब अनीति अधर्म की प्रवृतियां राष्ट्र की अस्मिता को संकट में डाल देती हैं तब राष्ट्र और प्रजा की रक्षा के लिए स्वधर्म रूप युद्ध का आश्रय लेना पड़ता है स्वधर्म का यह सिद्धांत सभी कर्तव्यों पर लागू होता है न्याय युक्त समबुद्धि की भावना से कामनाओं की प्राप्ति अप्राप्ति और अधीरता के समक्ष झुके बिना व्यक्ति को स्वतः प्राप्त कर्तव्य कर्मों को उन परिश्थितिओं के रहते हुए ही करना पड़ता है जो उसे चाहे या अनचाहे
प्राप्त हो गयीं है गीता व्योहार में परमार्थ की कला बताती है कर्तव्य कर्म का त्याग किसी भी स्थिति में उचित नहीं है किसी भी परिश्थिति में कर्तव्य रूप स्वधर्म टाला नहीं जा सकता है जब मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है तो अच्छे बुरे वही परिणामों के बारे में तटस्थ रहने का कर्तव्य प्रबाह पतित न्याय से स्वतः प्राप्त हो जाता है फल मिलना ही चाहिए ऐसी कुशलता से कर्म करना चाहिए किन्तु ना मिलने पर चित्त की समता को नहीं खोना चाहिए और फल मिलने पर ख़ुशी से फूल नहीं जाना चाहिए यही आंतरिक आनंद और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है

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