Saturday, 13 February 2016

२(४)कथं भीष्मम अहम संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ------अर्जुन ने कहा ----हे कृष्ण मैं युद्ध भूमि में भीष्म और आचार्य द्रोण के साथ बाणो से युद्ध कैसे कर सकता हूँ ?क्योंकि हे भगवान ये दोनों तो मेरे लिए पूज्यनीय  हैं !ये आसक्ति युक्त मोह और मूढ़ता से ग्रसित  चित्त से बोले गए श्रद्धा प्रदर्शित करने वाले शव्द हैं ! जो अर्जुन यहाँ बोल रहा है !कर्तव्य मार्ग से भ्रष्ट होने वाले लोग हमेशा शव्दों में नीति और धर्म की ही बातें करते हैं !अर्जुन को यह भली प्रकार विदित था कि युद्ध भूमि में उसे युद्ध तो भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य  आदि से ही करना है !जब अर्जुन द्रोणाचार्य से अश्त्र शस्त्र की शिक्छा प्राप्त कर चूका !तो द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा  कि तुम अब मुझे गुरु दक्छिणा दो !तो अर्जुन ने कहा कि आप जो मांगे वह गुरु दक्छिणा में अवश्य आपके चरणो में अर्पित करूँगा !तब आचार्य द्रोण ने कहा कि अगर मैं भी तुम्हारे सामने कभी युद्ध करने आऊं  तो तुम अपने छत्र धर्म का निर्वहन करते हुए युद्ध भूमि में मुझसे अवश्य युद्ध करना !अर्जुन ने उत्तर दिया कि ऐसा अवसर आने पर मैं अवश्य आपसे युद्ध करूँगा !अर्जुन  ने भगवान शंकर की आराधना कर उनको प्रसन्न किया था  ! भगवान शंकर ने अर्जुन के पुरुषार्थ की प्रशंसा करते हुए कहा तुम मुझ से मनोबांछित बरदान प्राप्त करो ! अर्जुन ने कहा भगवान मेरा करण भीष्म कृपाचार्य ,द्रोणाचार्य आदि के साथ महान युद्ध होने वाला है ! उस युद्ध में आपकी कृपा से उन सब पर मैं विजय पा सकूँ इसी के लिए आपसे दिव्यास्त्र चाहता हूँ  !मुझे वह अश्त्र प्रदान कीजिये जिस अश्त्र को अभिमंत्रित करते ही उसमें सहस्त्रों शूल भयंकर गदाएँ और विषैले सर्पों  के समान वाण प्रकट हों उस अश्त्र को पा कर में भीष्म ,द्रोण .,कृपाचार्य तथा करण के साथ युद्ध में लड़ सकूँ ! आप ऐसा अश्त्र मुझे प्रदान करें जिस से में इन शत्रुओ को युद्ध में परास्त कर सकूँ ! तब भगवान शंकर ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया और कहा कि इसे देवराज इंद्र ,कुवेर ,वरुण और वायु देवता भी नहीं जानते हैं ! चराचर प्राणियों सहित ऐसा कोई पुरुष नहीं हैं जो इस अश्त्र द्वारा ना मारा  जा सके ! दुर्योधन के दूत को अर्जुन ने उत्तर देते हुए कहा था  कि खोटी बुद्धि वाले कुलांगार दुर्योधन यदि  तू यह  समझता है कि पांडव लोग दयाबस भीष्म का बध नहीं करेंगे ! तो  उन पितामह भीष्म को ही मेंसबसे पहले तेरे समस्त धनुर्धरों के देखते दखते मार डालूँगा ! जिस समय अर्जुन को यह समाचार प्राप्त हुआ था कि उसके प्रिय पुत्र अभिमन्यु का बध हो गया है ! तो उसने जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा करते हुए कहा था कि उसकी रक्छा करते हुए जो कोई मेरे साथ युद्ध करेंगे बे द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ही क्यों ना हों में उन्हें भी अपने बाणो से आच्छादित कर दूंगा !इसके पहले भी अज्ञातबास में जब पांडव राजा विराट के यहाँ रह रहे थे !तब अर्जुन भीष्म ,द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य ,अश्वत्थामा ,करण,दुर्योधन और उसके १०० भाईयों  से युद्ध कर उनको पराजित कर चुका था !इसीलिए यहाँ अर्जुन मोह और मूढ़ता से ग्रसित होकर द्रोणचार्य और भीष्म को पूज्यनीय  बताकर उनसे ना लड़ने की बातें कह रहा है ! मनुष्य को किसी भी स्थिति परिस्थिति  में कर्तव्य का त्याग नहीं करना चाहिए !

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