गांधीजी की निष्ठां सत्य अहिंसा में थी इन्ही दो साधनो से उन्होंने विश्व
का मार्गदर्शन भारत के माध्यम से किया और भारत के आज़ादी के संघर्ष के
द्वारा विश्व को दास्ता मुक्ति का सन्देश दिया परिणाम स्वरुप गांधी का
अंग्रेज़ो भारत छोडो का नारा अँगरेज़ एशिया छोडो के नारे में तब्दील हो गया
और भारत की आज़ादी के बाद १३७ देश आज़ाद हुए जिन्होंने गांधीजी को आज़ादी
प्राप्ति की जंग में गांधीजी को अपना प्रेरणा श्रोत बताया इसलिए गांधीजी को
हमें सगुण रूप में ही स्वीकार करना होगा गांधी जैसे थे उसी रूप
में आज विश्व उन्हें स्वीकार कर रहा है अगर हमें गांधी जिस रूप में थे उस
रूप में स्वीकार नहीं है तो हमें उनको अस्वीकार करने का पूरा हक़ है किन्तु
उनको निर्गुण या किसी अन्य रूप में अपनी कल्पना का विकृत गांधी प्रस्तुत
करने का अधिकार हमें नहीं है गांधीजी अपनी आलोचना से न तो भयभीत होते थे
और न ही विचलित फिर हमको भी उसी गांधी के बारे में बताना चाहिए जैसे गांधी
जी थे वह कहते थे मेरा बचाव करने की आवश्यकता नहीं है गांधी जी कहते थे की
कोई भी गांधी को मार सकता है किन्तु सत्य अहिंसा को नहीं मार सकता जिस पर
गांधी का संपूर्ण जीवन खड़ा हुआ था इसलिए योगेन्द्र यादव ऐसे लेखक अपना
मार्ग निश्चित करने के लये स्वतंत्र है किन्तु गांधी जी द्वारा आचरित मार्ग
को बदलने की राय उनकी मान्य नहीं की जा सकती है (योगेन्द्र यादव के गांधी
और गोडसे नामक लेख पर टिप्पड़ी )
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