संत
रविदास की जन्म जयंती के जुलुस में सहारनपुर में हिन्दू मुस्लिम विवाद
इतना उग्र हो गया की दंगा होने की स्थिति बन ने लगी परिणाम स्वरुप भारी
मात्रा में पुलिस बुलानी पड़ी आज कल धार्मिक आयोजनो की बृद्धि आकाश छूती
दिखाई देती है किन्तु धार्मिकता का दर्शन लुप्त होता दिखाई देता है संत का
जीवन त्याग तपस्या ईश्वर भक्ति पर आधारित होता है उसमे एकान्त साधना और
सामान्य कामासक्त पद प्रितिष्ठा और पैसे के उपार्जन में संलग्न व्यक्तिओ से
मेल मिलाप नहीं होता है क्योँकि ऐसे व्यक्ति संत की साधना
में सबसे बड़े बाधक होते है संत का घर परिवार से भी विछोह हो जाता है उसका
सर्वस्व सिर्फ परमात्मा की आराधना और उपासना ही होती है इसलिए संत की जन्म
तिथि मनाने का एक ही उपाय है ईश्वर भक्ति के लिए अपने आपको तैयार कर संत से
अपने आप को ईश्वर की आराधना करने के लिए जोड़ना किन्तु वर्तमान समय में
संत वोट प्राप्ति का माध्यम बन गए हैं और उन पद प्रितिष्ठा खोजी नेताओं की
श्रद्धा और आस्था के केंद्र बन गए हैं जिनके काम के ये त्यागी तपस्वी संत
कभी भी नहीं रहे इसके अलावा अब संत लोग जात पांत से भी सम्बद्ध हो गए हैं
इसलिए संतों के जुलुस में वह लोग भारी मात्र में शामिल होते हैं जिनका आचरण
अत्यंत अशुद्ध होता है और ऐसे लोग भासण देने वाले होते हैं जो सुबह से
लेकर शाम तक सिर्फ प्रितिष्ठा की तलाश में ही घूमते रहते हैं और मनमानी
व्याख्या कर संत का आध्यात्मिक सन्देश ना देकरलोगों को गुमराह करते हैं
सहारनपुर में जो विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई उसका कारण जो दैनिक जागरण में
बताया गया है कि जुलुस में एक लड़का शराब पिए हुए था जब जुलुस मस्जिद के
पास से निकला तो अजान का समय होने के कारण मुसलमानो ने युवक की मारपीट कर
दी जिस से विवाद हो गया हिन्दू मुसलमान तो झगडे के लिए तैयार ही रहते हैं
छोटी सी घटना भी हिन्दू मुस्लिम दन्गे का रूप ले लेती है युवाओं को अपने
भविष्य के निर्माण को दृष्टिगत रख इन मजहबी पागलों से अपने को मुक्त रखना
चाहिए और संत के जीवन से सार्वभौम आत्मनिष्ठ ज्ञान की सीख ग्रहण करनी चाहिए
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- NoWhere में कार्यरत हैं
आज के लिए बस इतना ही.

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