गाय का बध जरूर कत्लखानों में होता है जिसको अधिकांशतः मुसलमान कसाई चलाते
हैं बहुत सी गायें चोरी छिपे भी क़त्ल खानो में ले जाई जाती हैं किन्तु
इनमे सबसे बड़े कसाई तो बे किसान है जिन्होंने गोचर भूमि को समाप्त कर दिया
है और गायों को मरने केलिए सड़कों पर छोड़ दिया है दूसरी कसाई सरकारें हैं जो
मांश निर्यात के लिए नए नए कत्लखाने खोलती है फिर तीसरे नंबर पर मुसलमान
कसाई आता है वह किसी के घर से जबरदस्ती गाय छुड़ाने नहीं जाता है इसलीए अगर
गाय को मरने के लिए सड़कों पर किसान लोग न छोड़ें और गोचर
भूमि से अपना कब्ज़ा हटाकर गाय को चरने के लिए चारा आदि प्राप्त कराएं तो
गाय कसाई खानो तक पहुंचेगी नहीं किन्तु लोग गो माता की जय बोलते है गाय के
बध के लिए कसाइयों को दोष देते हैं और गाय बध बंद हो इसके लिए नारेबाजी
करते हैं किन्तु गाय को पालते नहीं है आज गाय की कोई कीमत नहीं है सड़क पर
फिरती हुई गाय कोई भी पकड़ कर बांध सकता है प्राचीन काल में गोपालन बड़े
पैमानें पर होता था और इसको व्योपारी समाज भी पालता था गीता में कहा है
कृषि कार्य गाय का पालन और व्यापर ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म है १८(४४)आज
भी व्योपारी समाज गाय पालन का काम अपने हाथ में लेकर गाय के पालन के साथ
आर्थिक लाभ भी कमा सकता है क्योँकि गाय की हड्डी दूध दही मूत्र गोबर मूत्र
आदि सभी कीमती है
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