Friday, 5 February 2016

२(२)कुतस्त्वा कश्मलमिदम् विषमे सम्पुपस्थिम् ----------------भगवान ने कहा हे अर्जुन इस विषम अवसर पर तुम में यह कायरता कहाँ से प्रवेश कर गयी है  इस प्रकार की कायरता का प्रदर्शन  श्रेष्ठ पुरुषों ने कभी नहीं किया है ! यह कायरता न तो स्वर्ग प्रदान कराने वाली है  !और ना ही श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण करने योग्य है ! और ना ही इस से कीर्ति की प्राप्ति होगी ! अर्थात इस कायरता से  श्रेष्ठता का नाश हो जायेगा ! तुम्हारी कीर्ति भी नष्ट हो जायेगी  !और युद्ध भूमि में लड़ते हुए जो वीर प्राणो का त्याग करते हैं जिनसे उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है उस स्वर्ग की प्राप्ति भी तुम्हे इस कायरता  से नहीं होगी ! भगवान श्री कृष्ण यहाँ अर्जुन को उसके शौर्य पूर्ण कथनों की उसके वीरता के स्वभाव की और उसके द्वारा दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का स्मरण करा रहे हैं !!जब अर्जुन का जन्म हुआ था ! तब आकाश वाणी हुई थी कि यह बालक कार्तवीर्य अर्जुन के समान तेजस्वी ,भगवान शिव के समान पराक्रमी ,और देवराज इंद्र के सामान अजेय होकर पांडवों के यश का विस्तार करेगा ! यह वीर पुत्र मद्र ,कुरु ,सोमक ,चेदि काशी तथा करूष आदि देशों को बस में करके कुरुबंश की शक्ति की बृद्धि करेगा ! यह महाबली श्रेष्ठ वीर बालक समस्त छत्रियों का नायक होगा और युद्ध में भूमि  में शत्रुओं को जीत कर भाईयों के साथ तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा ! समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ यह अर्जुन सम्पूर्ण दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी  प्राप्त करेगा और अपनी खोयी हुई संपत्ति और राज्य को पुनः प्राप्त करेगा ! आकाशवाणी के अनुसार  भगवान शंकर ने अर्जुन को पशुपति अस्त्र प्रदान किया था ! जिसको देवराज इंद्र ,यम ,कुबेर  वरुण अथवा वायु देवता भी नहीं जानते थे ! भगवान शंकर ने अर्जुन को यह अश्त्र प्रदान करते हुए कहा था कि तुम सहसा इसका प्रयोग किसी अल्पशक्ति प्राप्त योद्धा पर नहीं करना इसका प्रयोग उसी योद्धा पर करना जो दिव्य शक्ति धारण करने वाला हो ! चराचर प्राणियों सहित तीनो लोकों में ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इस अश्त्र द्वारा मारा न जा सके ! इसका प्रयोग करने वाला पुरुष अपने मानसिक संकल्प से दृष्टि से वाणी से तथा धनुष वाण द्वारा भी शत्रुओं को नष्ट कर सकता है ! इसके अलावा जल के देवता वरुणदेव ने अर्जुन को वरुण पास प्रदान किया था ! वरुण देव ने इसी शस्त्र से  महान असुर तारकामय को बाँध लिया था ! वरुण देव ने कहा इस अस्त्र के द्वारा जब तुम संग्राम भूमि में विचरण करोगे उस समय सारी वसुंधरा छत्रियों से शून्य हो जायेगी ! कुवेर ने अर्जुन को अंतरधान नामक अश्त्र प्रदान किया था ! यह अश्त्र ओज ,तेज और कान्ति प्रदान करने वाला है ! शत्रु सेना को सुला देने वाला और समस्त वैरियों का विनाश करने वाला है ! यम ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी 1 तत्पश्चात देवराज इंद्र आये उन्होंने अर्जुन से कहा तुम्हें देवताओं का बड़ा भारी कार्य सिद्ध करना है !तैयार हो जाओ और मेरे साथ स्वर्ग लोक चलो ! अर्जुन स्वर्ग लोक में ५ सालों तक रहे ! और उन्होंने वहां रह कर अश्त्र शस्त्र विद्या के साथ दिव्य संगीत की भी शिक्छा प्राप्त की थी ! इन सभी देवताओ ने अर्जुन को दिव्यास्त्र देते समय कहा था कि तुम भगवान श्री कृष्ण की सहायता से पृथ्वी का भार हल्का करोगे और युद्ध में भीष्म द्रोण कर्ण आदि को पराजित करोगे और पृथ्वी से असुरों और अधर्म परायण मानवता और धर्म का नाश करने वाले लोगों का संघार करोगे !स्वर्ग की प्राप्ति या तो समरभूमि में युद्ध करते हुए वीर को प्राप्त होती है या परिव्राट सन्यासी को !अर्जुन ने अनेक बार यहकहा था कि वह दुष्ट दुर्योधन और उसकी अनीति और अधर्म का समर्थन और साथ देने वालों का समूल विनाश करेगा !उसी का स्मरण कराते हुए परमात्मा श्री कृष्ण  अर्जुन से कह रहे हैं कि तेरी यह कायरतास  तेरे बचनो और जिस विस्वास के साथ तुझे दिव्य शक्तियां देवताओं ने दी हैं !उनका उल्लंघन हो रहा है
1  इसलिए  इस विषम अवसर पर  तेरी यह विश्वास और वचन भंग करने वाली कायरता  उचित नहीं है !

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