व्योहारिक ज्ञान ================= (१)जैसे काष्ठ अपने से ही उत्पन्न आग से जलकर भष्म हो जाता है उसी प्रकार जिसका मन बश में नहीं है वह मनुष्य अपने शरीर के साथ उत्पन्न हुए लोभ के द्वारा स्वयं नष्ट हो जाता है !
(२)धनवान मनुष्यों को सरकार ,जल ,अग्नि ,चोर तथा स्वजनों से भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है जैसे सभी प्राणियों को मृत्यु से
(३)कितने ही मनुष्यों के लिए धन ही अधर्म और अनीति का कारण बन जाता है ! क्योंकि धन द्वारा सिद्ध होने वाले सांसारिक भोगों में आसक्त मनुष्य बास्तविक धर्म यानी अध्यात्म को प्राप्त नहीं हो पाता है !
(४)धन प्राप्ति के सभी उपाय मन में मोह बढ़ाने वाले हैं ! कंजूसी ,घमंड ,अभिमान ,भय और चिंता इन्हे विद्वानो ने मनुष्यों के लिए धन से उत्पन्न होने वाले दुःख माना है ! धन के उपार्जन ,संरक्छण ,तथा खर्च में मनुष्य महान दुःख सहन करते हैं ! और धन के ही कारण मनुष्य एक दूसरे को मार तक डालते हैं ! धन के त्यागने में भी महान दुःख होता है ! और यदि उसकी रक्छा की जाय तो वो शत्रु कैसा काम करताहै ! क्योंकि धन के लोभ के कारण मनुष्य धन की रक्छा करने वाले की हत्या तक कर देते हैं !
(५)धन की प्राप्ति भी दुःख से ही होती है ! इसीलिए उसका चिंतन ना करे क्योंकि धन का चिंत्तन करना अपना नाश करना है ! मुर्ख मनुष्य हमेशा असंतुस्ट रहते हैं और विद्वान पुरुष संतुष्ट !.धन की प्यास कभी बुझती नहीं है अतः संतोष ही परम सुख है ! इसीलिए ज्ञानीजन संतोष को ही सबसे उत्तम समझते हैं !
(२)धनवान मनुष्यों को सरकार ,जल ,अग्नि ,चोर तथा स्वजनों से भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है जैसे सभी प्राणियों को मृत्यु से
(३)कितने ही मनुष्यों के लिए धन ही अधर्म और अनीति का कारण बन जाता है ! क्योंकि धन द्वारा सिद्ध होने वाले सांसारिक भोगों में आसक्त मनुष्य बास्तविक धर्म यानी अध्यात्म को प्राप्त नहीं हो पाता है !
(४)धन प्राप्ति के सभी उपाय मन में मोह बढ़ाने वाले हैं ! कंजूसी ,घमंड ,अभिमान ,भय और चिंता इन्हे विद्वानो ने मनुष्यों के लिए धन से उत्पन्न होने वाले दुःख माना है ! धन के उपार्जन ,संरक्छण ,तथा खर्च में मनुष्य महान दुःख सहन करते हैं ! और धन के ही कारण मनुष्य एक दूसरे को मार तक डालते हैं ! धन के त्यागने में भी महान दुःख होता है ! और यदि उसकी रक्छा की जाय तो वो शत्रु कैसा काम करताहै ! क्योंकि धन के लोभ के कारण मनुष्य धन की रक्छा करने वाले की हत्या तक कर देते हैं !
(५)धन की प्राप्ति भी दुःख से ही होती है ! इसीलिए उसका चिंतन ना करे क्योंकि धन का चिंत्तन करना अपना नाश करना है ! मुर्ख मनुष्य हमेशा असंतुस्ट रहते हैं और विद्वान पुरुष संतुष्ट !.धन की प्यास कभी बुझती नहीं है अतः संतोष ही परम सुख है ! इसीलिए ज्ञानीजन संतोष को ही सबसे उत्तम समझते हैं !
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