व्योहारिक ज्ञान -------- (१)मन में दुःख होने पर शरीर भी संतपत होने लगता है जैसे तपाया हुआ लोहे का गोला घड़े में डाल देने से शीतल जल भी गरम हो जाता है ! इसीलिए विद्वान पुरुषों को मानसिक दुखों से ग्रस्त मनुष्य को प्रिय वचन बोल कर तथा हितकर भोगों की सामग्री प्राप्त कराकर सर्वप्रथम मानसिक दुःखों का ही निवारण करना चाहिए !
(२)जिस पर जल से अग्नि शांत की जाती है उसी प्रकार ज्ञान से मानसिक दुःख को शांत करना चाहिए मन का दुःख मिटजाने पर मनुष्य के शरीर का दुःख भी दूर हो जाता !
(३)मन के दुःख का मूल कारण विषय भोगों में आसक्ति है ! इसीके कारण मनुष्य कहीं आसक्ति के कारण दुखी हो जाता है ! आसक्ति से ही भय होता है ! शोक ,हर्ष ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति के ही कारण होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में प्राप्ति की कामनाऔर राग द्वेष होते हैं ! ये दोनों ही अमंगलकारी हैं ! इसमें भी विषय भोगों की प्राप्ति की कामना महान अनर्थ और अशांति पैदा करने वाली होती है ! जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है उसी प्रकार बिषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और धन दोनों का नाश कर देती है !
(४)विषय भोगों के प्राप्त न होने पर जो उनका त्याग करताहै वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमे दोष देख कर उनका परित्याग करता है वास्तव में वही सच्चा त्यागी है ------वही वैराग्य को प्राप्त करता है ! उसके मन में किसीके प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर और बंधन मुक्त होता है !
(२)जिस पर जल से अग्नि शांत की जाती है उसी प्रकार ज्ञान से मानसिक दुःख को शांत करना चाहिए मन का दुःख मिटजाने पर मनुष्य के शरीर का दुःख भी दूर हो जाता !
(३)मन के दुःख का मूल कारण विषय भोगों में आसक्ति है ! इसीके कारण मनुष्य कहीं आसक्ति के कारण दुखी हो जाता है ! आसक्ति से ही भय होता है ! शोक ,हर्ष ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति के ही कारण होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में प्राप्ति की कामनाऔर राग द्वेष होते हैं ! ये दोनों ही अमंगलकारी हैं ! इसमें भी विषय भोगों की प्राप्ति की कामना महान अनर्थ और अशांति पैदा करने वाली होती है ! जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है उसी प्रकार बिषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और धन दोनों का नाश कर देती है !
(४)विषय भोगों के प्राप्त न होने पर जो उनका त्याग करताहै वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमे दोष देख कर उनका परित्याग करता है वास्तव में वही सच्चा त्यागी है ------वही वैराग्य को प्राप्त करता है ! उसके मन में किसीके प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर और बंधन मुक्त होता है !
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