Friday, 5 February 2016

जीवन मन्त्र -महापुरुषों के बचन आचरणीय होते है क्योँकि बे उनके आचरण से निकल कर सिद्धांत बन जाते हैं सिद्धांत का अर्थ होता है जो सिद्ध किये जा सकते है और सिद्ध किये जा चके हैं इसलिए शाब्दिक ज्ञान प्रकाशन से इन सिद्धांतों का कोई भी उपयोग व्यक्ति या समाज के लिए नहीं हो सकता है इनका उपयोग तो सिर्फ आचरण से ही सिद्ध हो सकता है इसलिए इन सिद्धांतो को आचरण में उतारने के लिए तदनुसार मनःस्थिति का निर्माण करना होता है गीता २(४०)में कहा गया है की समत्त्व बुद्धि से जिन कर्मों का प्रारम्भ किया जाता है बे ही कर्म व्यक्ति और समाज के लिए लाभकारी होते है क्योँकि वे कर्तव्य बुद्धि से किये जाते हैं इसलिए उनका अनर्थ करी परिणाम भी नहीं होता है समता की दृष्टि से किये गए कर्तव्य कर्म मनुष्यों संसार की अशांति के आघातों से बचाकर आत्मशांति में स्थापित कर देते हैं और थोड़ा सा भी साम्या बुद्धि से किया गया कर्तव्य कर्म उस व्यक्ति और समाज बा संसार के लिए बहुत उपयोगी हो जाता है संसार में सर्वत्र कर्म के आकार को ही महत्त्व दिया जाता है अगर कोई व्यक्ति बड़ा दान देता है या महत्त्व के पद पर बैठा हुआ है तो उसके द्वारा किये गए कार्यों की प्रसंसा होती है किन्तु समत्व बुद्धि से युक्त कर्तव्य कर्मों में कर्म के आकार का महत्त्व नहीं है भावना का महत्त्व है ह्रदय मष्तिष्क आचार विचार और व्योहार यदि समता से युक्त है तो कर्म के आकार का महत्त्व नहीं है समत्त्व युक्त बुद्धि का महत्त्व है समत्त्व युक्ति बुद्धि व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण आशक्ति युक्त दम्भ युक्त और अहंकार युक्त कर्मों की मुक्ति के लिए एक महान औषधि है इस समत्व्व बुद्धि से युक्त होकर कर्म करने वाले व्यक्ति समाज के लिए अपने लिए और अपनी आत्मा तथा सम्पूर्ण सृष्टि के लिए उपयोगी होते हैं और भगवान के भक्त भगवद बुद्धि से युक्त सम्पूर्ण कर्तव्य कर्म भगवान को अर्पित कर भगवान की आराधना उपासना भक्ति का फल पाते हैं भले ही कर्म का स्थूल आकार कितना ही छोटा हो किन्तु उनका भाव महान होता है इसलिए उनका छोटा कर्म भी महान हो जाता है आचरित कर्मों से ही कथित प्रेरणादायक शब्दों की सार्थकता सिद्ध होती है

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