Tuesday, 9 February 2016

२(३)क्लैव्यं मा इसगमः पार्थ  ना एतत त्वेयी  उपपद्यते ----------हे अर्जुन तू नंपुसकता को मत प्राप्त हो क्योँकि तुम्हारे में यह नपुंसकता उचित नहीं है  !हे परन्तप ह्रदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग करके युद्ध के लिए खड़ा हो जा अर्जुन के सामने युद्ध रूप कर्तव्य कर्म है ! इसीलिए  भगवान श्री कृष्णा कहते हैं ह्रदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जावो !अर्जुन के बारे में यह प्रिसिद्ध था कि उसमे दीनता और संग्राम में पीठ दिखाने की प्रवृत्ति नहीं है (ना दैन्यं ना पलायनम )भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उसके शौर्य का स्मरण उसको करा रहे हैं ! जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही श्री कृष्णा से युद्ध में सहायता मांगने गए थे ! तब भगवन ने कहा था कि मेरे पास एक अक्छोहनी नारायणी सेना है जो अजेय है ! और दूसरी और अकेला में हूँ किन्तु में युद्ध नहीं करूँगा ! तब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण की नारायणी सेना ना मांगकर युद्ध ना करने वाले श्री कृष्ण को ही स्वीकार किया था !दुर्योधन प्रसन्नता पूर्वक भगवान श्री कृष्ण की एक अक्छोहनी सेना लेकर अर्जुन को ठगा हुआ मान कर प्रसन्नता पूर्वक चला गया था ! श्री कृष्ण ने एकांत में अर्जुन से पूंछा था कि
 मै तो युद्ध करूँगा नहीं फिर तुमने मुझे क्यों माँगा ! अर्जुन ने उत्तर दिया था कि भगवान  आप अकेले ही उन सबको नष्ट करने में समर्थ हैं और आपकी कृपा से मै भी अकेला ही उन सब शत्रुओं का संघार करने में समर्थ हूँ  ! जब पांडव १२ साल का वनबास बिताकर १३मा   बरस अज्ञात बास में मत्स्यदेश में विराट के यहाँ छद्म वेश में रह कर बिता रहे थे ! तब दुर्योधन ने अपने गुप्त चारों से कहा कि पांडवों के अज्ञात वास का तेरहबें बर्ष का अधिकांश समय बीत गया है ! और अब थोड़े ही दिन शेष रह गए हैं ! यदि यह अज्ञात बास का समय भी उनका व्यतीत हो गया तो बे प्रतिज्ञा पालन के भार से मुक्त हो जाएंगे फिर तो बे हमारे लिए विषधर सर्पों के सामान क्रोध में भरकर निश्चय ही हमारा विनाश कर देंगे ! इस पर करण ने कहा कि ऐसे कार्य कुशल गुप्तचर भेजे जाएँ जो धूर्त होने के साथ ही छिपे रहकर अपना कार्य कुशलता पूर्वक कर सकें  !  दुर्योधन को गुप्तचरों से जब यह ज्ञात हुआ कि पांडवों का राजा विराट के यहाँ होने की सम्भावना है तब उसने करण  आदि से सलाह  कर विराट की गायों के अपहरण करने के लिए मत्स्यदेश पर आक्रमण कर दिया ! भीष्म पितामह ने कहा कि पांडवों के तरह बर्ष पूर्ण होने के पश्चात भी पांडवों के पांच महीने बारह दिन और अधिक बीत चुके हैं ! इन पांडवों ने जो जो प्रतज्ञाएँ की थी उन सभी का यथाबत पालन उन्होंने  किया है ! इस सबके बाद भी पांडवों के अज्ञातबास की जानकारी के लिए दुर्योधन ने भीष्म ,द्रोणाचार्य ,करण ,कृपाचार्य ,अश्वत्थामा ,शकुनि ,दुःशाशन ,विकर्ण ,चित्रसेन ,दुर्मुख ,तथा अन्य बहुत से महारथियों के साथ विराट पर आक्रमण कर दिया ! अर्जुन ने अपना वास्तविक रूप विराट के पुत्र को बताकर स्वयं संग्राम भूमि में उतरने की तैयारी की  !और कौरव सेना पर आक्रमण कर विराट की गायें कौरवों से वापिस लौटा  लीं  !अर्जुन का करण से युद्ध हुआ और करण अर्जुन से युद्ध में हार कर भाग गया ! अर्जुन ने  कौरव सेना का संघार करना शुरूकिया  !कृपाचार्य और अर्जुन का युद्ध हुआ जब कृपाचार्य भी युद्ध में घायल हो गए तो उनका सारथि कृपाचार्य को  बड़े वेग से युद्ध भूमि  से भगा लगाया ! इसके  बाद अर्जुन का युद्ध द्रोणा चार्य से हुआ किन्तु बे भी अर्जुन के सामने नहीं टिक सके और युद्ध से पलायन कर गए ! अर्जुन अश्वत्थामा का युद्ध हुआ और अश्वार्त्थामा भी हार कर पलायन कर गया !जब एक एक  करके सभी रथी महारथी अर्जुन से पराजित हो गए ! तब दुर्योधन की सेना के सभी महारथियों ने अर्जुन पर भीष्म पितामह सहित एक साथ आक्रमण किया  !भीष्म पितामह और अर्जुन के मध्य अदभुद  युद्ध हुआ और युद्ध में भीष्म पितामह अर्जुन के तीखे वाणो से घायल होकर मूर्छित हो गए और उनका सारथि उनको युद्ध भूमि के बाहर भगा लेगया  !इस प्रकार अर्जुन ने अकेले ही कौरव पक्छ के सभी महरथियों को पराजित कर दिया था !इन्ही बातों का स्मरण भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को करा रहे हैं कि तेरे ऐसे महाबीर को यह कायरता शोभा नहीं देती है !तू अपनी स्वजनाशक्ति से उत्पन छुद्र हृदय की दुर्बलता के कारण कर्त्तव्य का त्याग कर रहा है ! यह तेरे लिए उचित नहीं है !तू अपनी इस छुद्र हृदय की दुर्बलता को त्याग कर अपने कर्त्तव्य रूपी युद्ध का पालन करने के लिए उठ कर खड़ा होजा !

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