महाभारत -१४ साल तक के बालकों को नहीं किया जाता था अपराध करने पर दण्डित
-मांडव्य नाम के एक योगी थे बे अपने आश्रम के द्धार पर ब्रिक्छ के नीचे
दोनों हाथ ऊपर उठकर मौन ब्रत धारण किये हुऐ तपस्या करते थे एक दिन उनके
आश्रम पर लूट का माल लिए हुए कुछ लुटेरे आये राज्य के सैनिक उन लुटेरों का
पीछा कर रहे थे उन लुटेरों ने लूट का माल ऋषि के आश्रम में रख दिया और
वहीं पास में छिप गए सैनिको ने ऋषि से पूंछा लुटेरे किस रस्ते से भागे हैं
मौन के कारण ऋषि ने कोई जबाब नहीं दिया सैनिकों ने छिपे हुए
लुटेरों को पकड़ लिया तथा आश्रम से लूट का माल भी बरामद कर लिया अब तो उनका
ऋषि पर भी संदेह हो गया इसलिए उन्होंने ऋषि को भी लुटेरों के साथ पकड़ कर
राजा के सामने खड़ा कर दिया राजा ने लुटेरो के साथ ऋषि को भी अपराधी मान कर
मृत्यु दंड दे दिया और उनको शूली पर चढ़ा दिया किन्तु शूली पर चढ़ाये जाने के
बाद भी ऋषि की मृत्यु नहीं हुई सैनकों ने घबड़ा कर यह सुचना राजा को सुनाई
राजा ने मंत्रिओं सहित आकर ऋषि से छमा मांगी ऋषि ने राजा को छमा कर दिया
किन्तु उनको इस बात का कारण जानने की उत्कंठा बानी रही की निर्दोष होते हुए
भी उन्हें यह दंड किसलिए मिला एक बार उनकी भेंट धर्म राज से हुई उन्होंने
धर्म से प्रश्न किया की निर्दोष होने पर भी उन्हें शूली पर क्योँ चढ़ाया गया
इस पर धर्म राज ने कहा कि आपने पूर्व जन्म में बालपन में खेल खेल में एक
कीड़े में सीक घुसा दी थी उसके फल रूप में यह दंड तुम्हे प्राप्त हुआ है तब
मांडव्य ऋषि ने आज्ञा दी कि धर्मशास्त्र के अनुसार जन्म से लेकर १४ वर्ष
तक की आयु का बालक जो भी अपराध करेगा उसमे अधर्म नहीं होगा क्योँकि उस आयु
तक बालक को धर्म शास्त्र के आदेश का ज्ञान नहीं होता है यही नियम भारत सहित
विश्व के तमाम देशों में थोड़े बहुत संशोधनों के साथ आज भी लागू है
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