Thursday, 4 February 2016

गीतज्ञान २(१) संजय ने कहा --------------   स्वजनशक्ति ,मोह और मूढ़ता के कारण अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष और अक्छय तरकश को छोड़ दिया  !और वह रथ में बैठ गया ! उस समय आंसुओं के कारण उसके नेत्रों की देखने की शक्ति भी अवरुद्ध हो गयी थी ! और उसके वीरता से भरे हुए स्वभाव को भी कायरता ने दबा दिया था !  अर्जुन जैसे महान शूरवीर, जिसके सारथी भगवान श्री कृष्ण है, स्वजनाशक्ति और  मोह के कारण  आँखो में इतने  आंसू आजाते हैं  कि उसकी देखने की दृष्टि भी बाधित हो जाती है  !तब अत्यंत जिम्मेदारी के पदों पर वर्तमान समय में आसीन   राजनेता ,अधिकारी ,और धार्मिक चर्चा और अर्चा तथा त्याग वैराग्य  और अपरिग्रह शांति और सद्भाव का उपदेश देने वाले  धर्माचारी और  सामान्य व्यक्ति यदि अपने कर्तव्य से भ्रष्ट हो रहे हैं तथा  होते देखे जाते हैं ! तब इस गीतोक्त उपदेश को जो कर्तव्य पालन के लिए सभी को अनुप्रेरित करता है ! ध्यान और प्रयत्न पूर्वक समाज ,देश ,ओए विश्व तथा स्वयं के हित में धारण करने कि महती आवश्यकता है ! ! अर्जुन में धर्म के नाम से जो कर्तव्य त्याग रूप बुराई आगयी है  ! उस पर भगवान गीता के उपदेश से प्रहार करेंगे और अर्जुन को उसके कोटम्बिक मोह    के कारण उत्पन्न कायरता का निवारण करके उसे स्वधर्म का पालन  करने के लिए प्रेरित करेंगे  !और उपदेश के अंत में अर्जुन अपने अज्ञान से उत्पान्न आसक्ति कात्याग कर कर्तव्य का पालन करेगा !अर्जुन को कर्तव्य पालन  करने के लिए दिया गया यह अमूल्य उपदेश सभी  व्यक्तियों  को कोटम्बिक आसक्ति  लालच .प्रमाद  और मोह, मूढ़ता  से उतपन्न  कर्तव्य त्याग  के स्वभाव  को समाप्त करने कि प्रेरणा प्रदान करेगा ! !

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