लोकतंत्र का धर्म ------- भारत में सनातन ,जैन ,बौद्ध ,सिख धर्मों का जन्म हुआ है !सनातन ,धर्म तथा जैन धर्म ये सर्वाधिक प्राचीन अनादि धर्म है !इस्लाम और ईसाई धर्म ये विदेशी धर्म है !किन्तु अब सभी धर्म स्वदेशी हैं !इसीलिए स्वतंत्र भारत में धार्मिक स्वतंत्रता तो भरपूर है !किन्तु उसको राजनीति से अलग रख गया है !शाशन ,प्रशासन को लिंग ,जाति और धर्म से मुक्त रखा गया है !किन्तु देश की आवश्यकता के अनुसार दलितों ,पिछड़ों ,और अल्पसंख्यकों ,महिलाओं ,विकलांगों ,स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों आदि को शासन ,प्रशासन ,शिकछन ,संस्थाओं ,संसद ,विधान सभाओं से लेकर ग्राम पंचायतों आदि में आरक्छण प्रदान कर लिंग ,धर्म ,जाति ,आदि के फर्क को स्वीकार किया गया है !आरक्छण की मांग अब सभी जातियां कर रही हैं ! सभी धर्म भारत में धार्मिक आयोजन बहुत भव्यतसे करते हैं !और अवकाश की मांग करते हैं !सार्वजानिक अवकाशों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है !देश में एक और भयानक गरीवी और बेरोजगारी है और दूसरी ओर लाल फीता साही ,कर्त्तव्य ना करने की आदत ,रिश्वत खोरी आदि है !शासन करने की भूख और कर्तव्य भ्रष्ट संविधान की धज्जिया उड़ाने वाले बरसाती कीड़ों की तरह उत्पन्न राजनेताओं के द्वारा आम जन को शासित होने की मजबूरी भी है !इस सबके कारण लोकतंत्र का धर्म ऐसा दुबक गया है ,कि उसके दर्शन ही नहीं होते हैं ! वास्तबिक ओर सही रूप में क्रियांबित लोकतंत्र में शाशक और शासित का भेद समाप्त हो जाता है !भारत में लोकतंत्र के रूप में राजतन्त्र और परिवार तंत्र स्थापित हो गया है !यह लोकतंत्र नाशक रोग देश की सभी राजनैतिक और सामजिक संस्थाओं में प्रवेश कर गया है ! इस कारण देश में सत्ता में बैठे राजनेताओं का गुण गान भगवान् की तरह होने लगा है !इन राजनेताओं के चाटुकार समर्थक सत्ता की रोटी के टुकड़े के लिए अपनी जीभ लप लपाते हुए मनुष्य होने की अस्मिता का भी त्याग कर देते हैं !जब राजनीति में अनैतिकता ,अन्याय ,भ्रष्टाचार ,लोकतान्त्रिक स्वरुप का नाश हो जाता है !तब देश की सभी व्यबस्था नष्ट भ्रष्ट हो जाती है !यह देश में स्पष्ट दिखाई दे रहा है !सभी छेत्रों में निकृष्ट स्वार्थों का पालन ,पोषण करने में लोग लगे हुएहैं !लोकतंत्र का धर्म संविधान में सन्निहित कानूनों और नियमों के परि पालन से सिद्ध होता है !संविधान को देश की जरूरतों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है !किन्तु नागरिकों के मूल अधिकारों और कर्तव्यों को जो कि संविधान की आत्मा होते हैं ,को नष्ट नहीं किया जा सकता है !संविधान में सामयिक परिस्थिति को द्रष्टगति रख जो आरक्छण आदि के प्रावधान अल्प समय के लिए किये गए थे !उनके समय में अनावश्यक ,अवांछनीय समय विस्तार ने देश में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है !आरक्छण अब नेताओं और अधिकारीयों की मौज का साधन और देश की ऊर्जा और आत्मविश्वास ,योगयता आदि का नाशक हो गया है !यदि आरक्छण को अनादि काल के लिए लागू कर दिया जाय !तो भी सभी आरक्छण प्राप्त जातियों के सभी लोग राष्ट्रपति प्रधान मंत्री, मंत्री ,सांसद ,विधायक ,कलेक्टर आदि नहीं बन सकते हैं !लोगों को अपनी जीविका की तलाश अपने कामों में ही करनी होगी !यदि देश को सही रूप में लोकतंत्र को स्थापित करना है ! तो देशवासियों को अपने आपको शासन करने की भूख से मुक्त करना होगा !और आमजन को भी लोकतंत्र में आमजन से विशिस्ट जन बने इन लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट करने वाले लोगों से मुक्ति पाने का प्रयत्न करना होगा !अन्यथा रोम जलता रहेगा और नीरो चैन की बंशी बजाता रहेगा !
Thursday, 30 June 2016
Wednesday, 29 June 2016
आत्माओं
के ह्रदयों पर आक्रमण करने लगतातदात्मानं सृज्यामहम्------जब एक प्रकार का
सर्वब्यापी भौतिकबाद मानवीय है तब श्रष्टि में संतुलन कायम करने के लिए
परमसत्ता मनुष्य के रूप में प्रगट होती है ! परमात्मा यद्द्पि अजर अमर है
और उसका ना जन्म होता है और ना मरण होता है ! फिर भी वह दुष्ट शक्तियों को
परास्त करने के लिए प्रगट होता है ! परमात्मा इस विश्व का आधार है ! शाश्वत
धर्म का रक्षक भी है ! और सनातन पुरुष भी है ! अच्छाई और बुराई से पर ऐसा
परमात्मा नहीं है ! जो बहुत दूर से संसार को देखता रहे ! और अधर्म के साथ
चल रहे मनुष्यों के संघर्ष की परवाह ना करे ! अगर कुछ व्यक्ति अधार्मिक हो
जाएँ तो उनको सुधारा जा सकता है !परन्तु जब पूरा का पूरा समाज बिगड़ता है
और निम्नस्तरीय स्वार्थनिष्ठ जीवन पद्धति को अपना लेता है ! तथा समाज को
दिशा देने वाले ऐसा नेतृत्त्व प्रदान करने लगते हैं की सज्जन और साधु
पुरुषों का जीवन कष्टमय हो जाता है ! और उनके असित्तत्व पर खतरा उत्पन्न हो
जाता है ! तब परमसत्ता स्वयं प्रगट होकर धर्म की स्थापना के लिए कार्य
करती है और अधर्म में प्रवृत्त दुष्ट व्यक्तियों का विनाश करती है !अभी
अधर्म का और दुष्ट पुरुषों का इतना विस्तार नहीं हुआ है की सज्जन और साधु
पुरुषों के असित्तत्व पर ही खतरा उत्पन्न हो जाय !धीरे धीरे समाज अधर्म
की और गति कर रहा है !चरित्र निर्माण के केंद्र शिक्छा और धर्म इन दोनों पर
ही स्वार्थनिष्ठ लोगों का प्रभुत्त्व स्थापित हो रहा दिखाई देता है !फिर
भी कुछ शिक्छण संस्थान और आध्यात्मिक पुरुष अपने जीवन सेचरित्र शुद्धि का
उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं !जहाँ धर्म आश्रमों में कैद हो गया है वहां
जरूर धर्म स्वार्थों का पोषक हो गया है ! किन्तु जहाँ धर्म आश्रमों से
मुक्त होकर आध्यात्मिक पुरुषों द्वारा सेवित है वहां धर्म के आध्यात्मिक
स्वरुप का दर्शन अभी भी होता है !इसी प्रकार कुछ शिक्छण संस्थान पैसे के
प्रभाव से मुक्त होकर अपने निजी सदाचरण से उत्तम चरित्र का आदर्श प्रस्तुत
कर रहे हैं !व्यबस्था अभी भी पूरी तरह से बिगड़ी नहीं है !व्यबस्था में
अच्छी बुरे का सम्मिश्रण है !देश में लोकतांत्रिक शासन व्यबस्था है
!किन्तु लोकतंत्र के बुनियादी स्वरुप की स्थापना अभी तक नहीं हो पायी है !
!सिर्फ लोकतंत्र में मतदान के द्ववारा राज सत्ता प्रदान करने की स्थूल
प्रक्रिया का ही टूटे फूटे तरीके से ही पालन होता देखा जाता है ! भारत की
आतंरिक और बाह्य समस्याओं के समाधान के लिए चरित्रवान निष्पक्छ राजनैतिक
नेतृत्त्व का निर्माण अभी नहीं हो पाया है !चारों और ग्रामसभा से लेकर
संसद तक और सभी सामाजिक धार्मिक, व्योपारिक, शैक्छणिक, कर्मचारियों,
अधिकारियों, जातीय संगठनो, और समाज सुधार तथा गैरसरकारी संगठनो आदि में भी
स्वार्थनिष्ठा ही प्रभावी दिखाई देती है ! फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है
की ये सभी संगठन कोई समाज हित का काम नहीं करते हैं !इन संगठनो की
समाजनिष्ठा और सेवा भाव सिमट कर इनके संचालकों के स्वार्थ पोषण में
केंद्रित हो गयी है ! जिसके कारण संस्थाओ के लोककल्याण के मूल उद्देश्य
लुप्त हो गए हैं ! लोकतंत्र का मूल आधार ही संस्थाओं का न्यायुक्त
,निष्पक्छ, निष्काम संचालन से होता है !संस्थाओं का निर्माण तो होगया है !
अब निष्पक्छता और न्याय निष्ठा तथा निष्कामता का निर्माण होना बाकी है
!जिस तरह देश को आजाद कराने के लिए अनेक महापुरुष देश में पैदा हो गए थे 1
उसी प्रकार से लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए भी निष्पक्छ निश्वार्थ
लोकसेवकों का जन्म भी देश में हो जाएगा ! और फिर संसद से लेकर ग्रामसभा तक
तथा सभी शिक्छणिक धार्मिक आदि संस्थाएं लोकहित में काम करेंगी यही परमशक्ति
का अवतरण होगा जो समाज व्यबस्था को स्वार्थनिष्ठ लोगों से मुक्त करेगा !
It is very unfortunate that some persons raise Sloagans of Pakistan
zindabad.Probably they do not know that Pakistan is neither good to the
muslims who migrated from India, nor it is good for Hindus who opted to
stay in Pakistan after partition.At the time of partition the population
of Hindus in Pakistan was 24%Now it has Reduced to1%.. The Nation
which can not give Justice and protection to its Nationals can not
Surbive.
Tuesday, 28 June 2016
Uma bharti has said that she worship sai as GOD.But Jagad guru
Shankaracharya can not term Sai as GOD as he is the acharya of Vedic
dharma, and in Vedic dharma grantha Vishnu puran,God is narrated as Who
has total Virtues and Glory, total Religeon, YASH, FAME
Renunciation,Liberation in HIM, all these and apart from these
qualities, WHOCreates and Disolves the entire Universe and knows and
Regulates the Birth and Death of Living creatures, Gyan and Ignorance,is
GOD and SAIdoes not these qualities. Apart from this 24 incarnations of
God has been acknowledged in Vedic dharma and Sai does not figure.
Those who are Vedic DHARMABLAQMBI should stand with Jagad guru
Power of words is greater than any other instrument. But words become
power only when they are turn into action and are associated with
truth.Words spoken to ful fil ones selfish interests are powerless.In
olden days we hear of Curse given by Rishis and whose effect was
miraculous Thatwas because they practiced what they said
झा की.
अभ्युथानम्धर्मस्य
-----धर्म का पतन होता है ! तब अधर्म का जन्म और उसका विकास होता है
!अधर्म से ही मनुष्यों में मोह ,मूढता और मूर्खता विकसित होती है ! मोह से
ग्रस्त व्यक्ति का विवेक लुप्त हो जाता है ! और वह अधर्म को ही धर्म मानने
लगता है !उसे व्योहार और परमार्थ में सबकुछ उल्टा ही समझ में आने लगता है !
जैसे गाय और अन्य पशुओं की निर्मम हत्या में उसे माश का उत्पादन दिखाई
देता है ! गाय के बध को कानून के माध्यम से रोकने को वह मनुष्य के खाने
पीने के अधिकार पर हमला मानता है ! बहुत से गाय को माता मानने वाले और गाय
के बध का बिरोध करने वाले तथा कथित गो भक्त गो माता की जय का नारा बुलंद
करने वाले गोशालाएं चलाते है ! और गायों के चारा और पालन पोषण के लिए
प्राप्त होने वाले पैसे को खुद खा लेते हैं ! !गोचर भूमि पर कब्ज़ा कर लेते
हैं !और गायों को कसाईओं के लिए खुला छोड़ देते हैं !मोह ग्रस्त लोग समाज और
देश की तमाम संस्थाओं शिक्छा ,स्वास्थ्य, जनकल्याण, मीडिया, राजनैतिक
संस्थाओं, धार्मिक आश्रमों ,आदि में प्रवेश कर उनके चरित्र निर्माण और
लोकहित के कार्यों को नष्ट कर उनको अपने छुद्र स्वार्थों की पूर्ति का साधन
बनाकर देश और समाज का अहित करते हैं !इसी मोह से मूढता का जन्म और विकास
होता है ! मूढ़ ब्यक्ति की बुद्धि यह समझने में असमर्थ और अयोग्य हो जाती है
कि धर्म का पालन श्रेष्ठ आचरण से होता है और उसके लिए कर्त्तव्य निष्ठां
आवश्यक होती है ! वह अपने कर्तव्य का पालन तो करता नहीं है !किन्तु धार्मिक
पूजा पाठ प्रवचन धार्मिक आयोजन आदि अवश्य करता कराता रहता है !प्रवचन
कराने वाले लोग सड़क और पुल बनाने आदि के कार्यों में अत्यंत घटिया सामग्री
के इस्तेमाल कर लोग आम जन जीवन को खतरे में डाल देंगे देते हैं !नेता लोग
अपने पद से सम्बंधित उत्तयदायित्वा का निर्बाह नहीं करते हैं !अधिकारी
कर्मचारी आदि निर्लज्ज हो कर रिश्बत खोरी करते हैं !व्योपारी नकली घटिया
माल बेचते हैं !प्रवचन करने वाले प्रवचनों को अपनी भोग सामग्री और आय का
साधन बना लेते हैं लोग धार्मिक आश्रमों और संस्थाओं का निर्माण कर अपने आप
को गुरु महात्मा ऋषि और अवतार के रूप में स्थापित करते हैं और ईश्वर को
लुप्त कर देते हैं और खुद ही ईश्वर के रूप में अपनी पूजा कराने लगते हैं
!यही मूढता है !और इसी मूढता कि परिणति मूर्खता में होती है ! जब व्यक्ति
अपनी कर्त्तव्य निष्ठा को भुलाकर धार्मिक आयोजनो से ही पुण्यप्राप्ति और
ऐश्वर्या की कामना करने लगता है !तब उसे कभी कभी ऐश्वर्या धन संपत्ति पद
प्रतिष्ठा आदिकी पप्ति तो हो जाती है !किन्तु यह जड़ मूल से नष्ट हो जाती है
! स्थायी नहीं होती है ! इस तरह के कथानक धार्मिक ग्रंथों में भरे पड़े हैं
!किन्तु मोह मूढता से ग्रस्त इन मूर्खों का ध्यान उन बिनाशकारी धर्म के
नाम पर की जाने बाली अधार्मिक क्रियायों पर नहीं जाता है !और ये लोग अपनी
इन अधार्मिक क्रियायों से लोगों के मन मष्तिष्क में गहरी घृणा और अविश्वास
को जन्म दे देता है !और ऐसे लोग भी भी अधर्म को ही धर्म समझने लगते हैं और
धर्म का तिरिष्कार करने लगते हैं ! तथा धर्म के आध्यात्मिक शुद्ध स्वरुप को
ना समझ कर धर्म कि आलोचना करने लगते हैं !आज कल जो धर्म के नाम पर जो
कार्यक्रम आदि होते दिखाई देते हैं उनमे अधिकाँश में धर्म नहीं हैं होता है
! धर्म परिवर्तन करना कराना ! धर्म के नाम पर क्रूर हिंसा करना लोगों के
गले काटना पशु हत्या करना उनका मांश खाकर अपने शरीर को पुष्ट करना !धार्मिक
कर्मकांड को ही धर्म मानना और धर्म समझनाआदि अधर्म ही है !इस से ही समाज
में मोह मूढता और मूर्खता का विकास हो रहा है !यह धर्म की अधार्मिक धारा है
! जिस से धर्म के वास्तविक स्वरुप अध्यात्म का उदय नहीं हो पा रहा है !और
अधर्म की प्रचंड और व्यापक काली धुंद में अध्यात्म दिखाई नहीं दे रहा है
जे ·
भीष्म
पितामह ने युधिस्ठर के प्रश्नो के उत्तर में महिलाओं के आदर सत्कार और
गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए मोक्ष की प्राप्ति में महिलाओं के योग दान के
सम्बन्ध में भी विस्तार से कई आख्यानों में बताया है !युधिस्ठर ने पूंछा
कोई ऐसी पुरुष हो जो गृहस्थ आश्रम में पत्नी सहित संयम नियम के साथ रहता
हो और समस्त सांसारिक बंधनो को जीत चूका हो और संपूर्ण द्वन्दोसे दूर
रह कर उन्हें धैर्य पूर्वक सहन करता हो ! तो उसका मुझे परिचय दीजिये
!क्योँकि ऐसा गृहस्थ दुर्लभ होता है ! भीष्म ने
कहा की महर्षि देवल की सुवर्चला नाम की एक पुत्री थी जो प्रकांड विद्वान
थी ! जब वह विवाह योग्य हो गयी तब उसके पिता को उसके विवाह की चिंता हुई !
सुवर्चला ने अपने पिता से कहा कि मेँ उसी युवक से विवाह करुँगी जो मेरे
प्रश्नो का उत्तर देगा और मेरे अनरूप होगा ! इसीलिए आप ऋषि पुत्रों को
आमंत्रित कीजिये में अपने लिए बर का चयन स्वयं करुँगी ! देवल ने ऋषि
पुत्रों को आमंत्रित किया सुबर्चला ने उनसे कहा की मेरा पति वही हो सकता है
जो अँधा भी हो और आँखवाला भी हो यह प्रश्न सुनकर सभी ऋषि कुमार सुबरचला
को भला बुरा कहते हुए चले गए ! इसके बाद श्वेत केतु नाम के एक ऋषि पुत्र
ने सुबरचला के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि में अँधा हूँ यह यथार्थ है !
जिस परमात्मा की शक्ति से जीवात्मा सदा यह सबकुछ देखता है ! ग्रहण करता है
! स्पर्श करता है ! सूँघता है बोलता है !निरंतर बिभिन्न वस्तुओं का स्वाद
ग्रहण करता है ! तत्त्व का मनन करता है और बुद्धि द्वारा निश्चय करता है !
वह परमात्मा ही आँख कहलाता है !जो इस आँख से रहित है वह प्राणियों में
अँधा कहलाता है ! अर्थात वह आँखवाला भी होकर अज्ञान के कारण कुछ नहीं देखता
है ! जिस परमात्मा के भीतर ही यह संपूर्ण जगत व्योहार में प्रवृत्त होता
है ! यह जगत जिस आँख से देखता है, कान से सुनता है, त्वचा से स्पर्श करता
है, नासिका से सूँघता है, रसना से रस लेता है एवम जिस भौतिक आँख से यह देख
कर सब वर्ताव करता है ! उस से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है इसीलिए में अंध हूँ
! कार्य कारण रूप परमात्मा का चिंतन करता हुआ में सदा शांत भाव से उन्ही
पर निर्भर रहता हूँ !सुबरचला ने अपने प्रश्न का यथार्थ उत्तर सुनकर स्वेत
केतु का वरण किया और अध्यात्म दृष्टि से गृहस्थ जीवन जीते हुए अंत में
मोक्ष की प्राप्ति की ! !इसीलिए प्राचीन भारत में महिलायें पुरष की कृपा और
दया से नहीं अपने गुणों ,विद्वात्ता और शील से आदर और प्रतिष्ठा की पात्र
थी !ऐसी अनेक महिलाओं की श्रेष्ठता के आख्यान महाभारत ग्रन्थ में हैं !
Monday, 27 June 2016
महिलाएं जेबें काटने लगीं हैं !दिल्ली का समाचार है कि मेट्रो ट्रैन में पुलिस ने ३० जेब काटने वाली महिलाओं को गिरफ्तार किया है !यहाँ शराब के नशे में धुत्त अमीर लड़की पुलिस थाने में पुलिस से हाथ पायी कर रही है ,गालियां दे रही है !पुलिस भी अब मार खाती है !एक और महिलाओं की सुरक्छा के उपाय किये जा रहे हैं !दूसरी ओर महिलाओं के अपराधी करण के ये दृश्य भी हैं !भारत को एफ ,डी ,आई और स्मार्ट सिटीज निर्माण की योजना आर्थिक पराधीनता और नैतिक पतन की और ले जाने वाली सिद्ध होगी !खुदरा व्यापारियों की बढ़ती बेरोगजारी और महिलाओं में बढ़ते अपराधों और उच्छृङ्खलताओं के इन दृश्यों से यह बात सिद्ध होने लगी है !शहर भोग के केंद्र ,उत्पादक ओर उत्पादन के नाशक और व्यक्तियों के निकृष्ट स्वार्थ के पोषक होते हैं !प्रकृति से दूरी ,कोलाहल ,अशुद्ध ,जल ,अस्त व्यस्त अत्यन्त अशांति युक्त जीवन चर्या आदि ये शहर वासियों के स्वाभाविक जीवन चर्या के अंग होते हैं !भारत में जब ग्रामों का विनाश हो जाएगा तो देश से शांति ,सद्भाव ,संवेदना ,सदाचार उत्पादकता और नैतिकता भी विदा हो जायेगी !स्वार्थ पूर्ति ही जीवन का आदर्श हो जाएगा !
Saturday, 25 June 2016
भीष्म
ने युधष्ठिर के प्रश्न करने पर उनको जीवन सम्बन्धी विविध प्रश्नो के
उत्तर दिए हैं !युधिस्ठर ने महिलाओं और पुरुषों के सम्बन्ध के अतरिक्त
महिलाओं की विद्वत्ता, आध्यात्मिक उपलब्धियों और अध्यत्मिकज्ञान के सम्बन्ध
में भी अनेक प्रश्न भीष्म पितामह से पूंछे थे !इस सम्बन्ध में एक प्रसंग
महायोगिनी सुलभा और जनक सम्बाद का है ! मिथिलापुरी में प्राचीनकाल में कोई
धर्मध्वज जनक नाम के राजा थे ! उन्हें गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ही
संन्यास का सम्यग ज्ञान रूप फल प्राप्त हो गया था ! बे इन्द्रियों का
निग्रह करके शासन करते थे ! सुलभा नाम की एक योगिनी योग धर्म के अनुष्ठान
द्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही पृथ्वी पर विचरण करती थी !उसने अनेक
त्रिदंडी सन्यासियों से मोक्ष तत्त्व की जानकारी के विषय में राजा जनक की
प्रसंशा सुनी ! ये बातें सत्य है या नहीं ? उसके हृदय में जनक के दर्शन का
संकल्प उदय हुआ ! उसने योग शक्ति से अपना पुराना शरीर त्याग कर परम सुन्दर
रूप धारण कर लिया और पल भर में ही जनक की राजधानी मिथिला पहुँच गयी ! उसने
भिक्छा लेने के बहाने जनक का दर्शन किया ! राजा जनक जीवन मुक्त हैं या नहीं
इसका परीक्छण करने के लिए वह अपनी योग शक्ति से राजा की बुद्धि में
प्रविष्ट हो गयी ! और योग बल से उनके चित्त को बांध कर अपने बश में कर लिया
! फिर एक ही शरीर में सुलभा और जनक का संवाद हुआ ! जनक ने अपने गुरु
पंचशिख का परिचय देते हुए कहा कि मुझे सांख्य ज्ञान, योग ,विद्या ,तथा
राजधर्म इन तीन प्रकार के मोक्ष धर्म में गंतव्य मार्ग गुरु से प्राप्त
हुआ है ! उन्होंने मुझे त्रिविध मोक्ष धर्म श्रवण कराया है !,पर राज्य
त्यागने की आज्ञा नहीं दी है ! इस प्रकार विषय भोगों की आसक्ति से रहित हो
मेँ परमपद में स्थित हूँ ! मेरा मोह दूर हो गया है ! में समस्त संसर्गों
का मानसिक रूप से त्याग कर चुका हूँ !इसलिए मेने गृहस्थ धर्म में रहते हुए
ही बुद्धि की निर्द्वन्द्ता प्राप्त कर ली है ! यम नियम आदि का अभ्यास
करने ,काम दोष ,परिग्रह, मान, दम्भ आदि का त्याग करके गृहस्थ भी मोक्ष लाभ
प्राप्त कर सकता है ! तथा कामना दोष होने पर सन्यासी भी मुक्ति से बंचित
हो सकते हैं ! मेरी तो यह धारणा है की गेरुआ वस्त्र पहनना, मस्तक मुड़ा लेना
, तथा कमंडल और त्रिदण्ड धारण करना ये सब उत्कृष्ट संन्यास मार्ग का परिचय
देने वाले चिन्ह मात्र है ! इनके द्वारा मोक्ष की सिद्धि नहीं होती है !
ना निर्धनता में मोक्ष है ! और ना सम्पन्नता में मोक्ष है ! सम्पन्नता और
निर्धनता दोनों ही अवस्थाओं में ज्ञान से ही जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती
है ! इस लिए धर्म अर्थ काम तथा राज्य आदि परिग्रह के इन स्थानो में रहते
हुए भी मुझे आप बंधन रहित पद पर प्रतिष्ठित समझें ! सुलभा ने कहा मेने सुना
था की आपकी बुद्धि मोक्ष धर्म में लगी हुई है ! अतः आपकी मंगल कांक्छणी हो
कर आपके इस मोक्ष ज्ञान का मर्म जान ने के लिए मेँ यहां आई हूँ !जैसे
नगर के सूने घर में सन्यासी एक रात निवास करता है ! इसी तरह आपके इस शरीर
में, मेँ आज की रात रहूंगी ! आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया ! अपनी वाणी रूप
आतिथ्य के द्वारा मेरा भली भांति सत्कार किया !अब मै आपके शरीर रूपी
सुन्दर गृह में विश्राम कर कल सुबह यहां से चली जाउंगी ! सुलभा के युक्ति
युक्त वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद कुछ भी नहीं बोले !संस्कृत में महिला का
अर्थ महान होता है प्राचीन भारत में महिलएं मात्र ग्रहणी ही नहीं उच्च
कोटि को विदुषी और योगनी भी थी !बे सिर्फ पुरुषों द्वारा ही रक्छित नहीं
थी स्वमेव रक्छित थी !महिलाओं की महानता के ऐसे अनेक प्रसंग महाभारत में
हैं !
अपराह्न बजे ·
महाबीर त्यागी जो नेहरूजी के मंत्रिमंडल तथा शाश्त्रीजी के मंत्रिमंडल में भी कैबिनेट मंत्री रहे , ने एक पुस्तक लिखी है -''-मेरी कौन सुनेगा !''उसमे जिस प्रकार से इस घटना का जिक्र किया गया है !उसमे इस घटना का विवरण भिन्न प्रकार से दिया गया है !राजगोपालाचारी भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे !वह अत्यंत उच्चकोटि के विद्द्वान और देशभक्त थे !तथा स्वतंत्र और निर्भीक व्यक्ति थे !उनकी पुत्री लक्ष्मी गांधी जी के पुत्र देवदास गांधी को व्याही थी !इसके बाद भी जब बे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे उन्होंने गांधीजी के जन्मदिन २ अक्टूबर को सार्वजानिक अवकाश घोसित करने से मना कर दिया था ! इतना ही नहीं उन्होंने १९४२ में गांधीजी के भारत छोडो आंदोलन को भी समयानुकूल न मानकर कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया था !बे नेहरूजी के बुलाने पर भी प्रथम पंचवर्षीय योजना पर नेहरूजी द्वारा सलाह मांगे जाने पर भी ना तो दिल्ली गए थे ! और ना ही उन्होंने नेहरूजी को इस काम के लिए चेन्नई आने की जरुरत समझी थी !भारत का राष्ट्रपति बनने की लालसा ना तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद कि थी और ना ही राजगोपाल चारी की थी !क्योँकि गोपालाचारी भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे !इसलिए यह उचित नहीं था की उनके स्थान पर किसी और को राष्ट्रपति बनाया जाय !जब यह प्रस्ताव नेहरूजी की तरफ से आया कि राजगोपालाचारी को भारत का प्रथम राष्ट्रपति घोषित किया जाय ! तो महाबीर त्यागी ने इसकाविरोध किया !परिणाम स्वरुप मतदान हुआ जिसमे राजा जी केविरोध में सिर्फ त्यागी जी का ही मत पड़ा !बाद में नेहरूजी को राजेन्द्रप्रसाद ने स्वयं राजा जी के पक्ष में अपना समर्थन लिख कर दे दिया !जब सत्येंद्रनारायण सिन्हा जोकि नेहरू मंत्रिमंडल मेमंत्री और बाद में मध्यप्रदेशके राज्यपाल भी रहे ने यह बात सरदार पटेल को बतायी !तब पटेल ने राजेन्द्र बाबू से पूछा की क्या अपने यह लिख कर दिया है ?राजेंद्र बाबू ने कहा राजा जी मुझसे भी अधिक योग्य व्यक्ति हैं !और हम नहीं चाहते कि देश के लोगों में यह सन्देश जाय की हमलोग पद के भूखे हैं !हाई कमांड की मीटिंग में नेहरूजी ने राजेन्द्र बाबू के समर्थन का हवाला देकर पटेल से राजा जी के नाम की घोसणा के सम्बन्ध में बात की !इस पर पटेल ने कहा की आपके प्रभाव के कारण सदस्य राजा जी के नाम पर सहमति व्यक्त कर रहे हैं ! वैसे सभी की इक्छा राजेंद्र प्रसाद के पक्छ में है !नेहरूजी एक मिनट मौन रहे और फिर उन्होंने राजेंद्र प्रसाद के नाम की घोसणा कर दी !नेहरू जी झूठ नहीं बोलते थे इसका जिक्र मोरारजी भाई और आचार्य विनोवा भावे ने भी किया है ! !नेहरूजी के मंत्रिमंडल में लगभग सभी मंत्री अपने पद से बहुत महान थे !इसी प्रकार राजेंद्रप्रसादे डॉ राधा कृष्णनके लिए तष्ट्रपति पद बहुत छोटा था !राजेन्द्रप्रसाद डॉ राधाकृष्णन की महत्ता इसलिए नहीं थी कि बे राष्ट्रपति थे ! बल्कि राष्ट्रपति के पद का गौरव इसलिए था की बे राष्ट्रपति पद पर आसीन थे !इसीप्रकार नेहरू जी की महानता के सामने प्रधानमंत्री पद बहुत छोटा था !नेहरूजी के जीवनकाल में भी यह प्रशन पूंछा जाता था कि नेहरू के बाद कौन ?उनके प्रखर विरोधी भी नेहरू के विकल्प के रूप में उनके जीवन काल में अपने आपको प्रस्तुत नहीं करते थे !
महाबीर त्यागी जो नेहरूजी के मंत्रिमंडल तथा शाश्त्रीजी के मंत्रिमंडल में भी कैबिनेट मंत्री रहे , ने एक पुस्तक लिखी है -''-मेरी कौन सुनेगा !''उसमे जिस प्रकार से इस घटना का जिक्र किया गया है !उसमे इस घटना का विवरण भिन्न प्रकार से दिया गया है !राजगोपालाचारी भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे !वह अत्यंत उच्चकोटि के विद्द्वान और देशभक्त थे !तथा स्वतंत्र और निर्भीक व्यक्ति थे !उनकी पुत्री लक्ष्मी गांधी जी के पुत्र देवदास गांधी को व्याही थी !इसके बाद भी जब बे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थे उन्होंने गांधीजी के जन्मदिन २ अक्टूबर को सार्वजानिक अवकाश घोसित करने से मना कर दिया था ! इतना ही नहीं उन्होंने १९४२ में गांधीजी के भारत छोडो आंदोलन को भी समयानुकूल न मानकर कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया था !बे नेहरूजी के बुलाने पर भी प्रथम पंचवर्षीय योजना पर नेहरूजी द्वारा सलाह मांगे जाने पर भी ना तो दिल्ली गए थे ! और ना ही उन्होंने नेहरूजी को इस काम के लिए चेन्नई आने की जरुरत समझी थी !भारत का राष्ट्रपति बनने की लालसा ना तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद कि थी और ना ही राजगोपाल चारी की थी !क्योँकि गोपालाचारी भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे !इसलिए यह उचित नहीं था की उनके स्थान पर किसी और को राष्ट्रपति बनाया जाय !जब यह प्रस्ताव नेहरूजी की तरफ से आया कि राजगोपालाचारी को भारत का प्रथम राष्ट्रपति घोषित किया जाय ! तो महाबीर त्यागी ने इसकाविरोध किया !परिणाम स्वरुप मतदान हुआ जिसमे राजा जी केविरोध में सिर्फ त्यागी जी का ही मत पड़ा !बाद में नेहरूजी को राजेन्द्रप्रसाद ने स्वयं राजा जी के पक्ष में अपना समर्थन लिख कर दे दिया !जब सत्येंद्रनारायण सिन्हा जोकि नेहरू मंत्रिमंडल मेमंत्री और बाद में मध्यप्रदेशके राज्यपाल भी रहे ने यह बात सरदार पटेल को बतायी !तब पटेल ने राजेन्द्र बाबू से पूछा की क्या अपने यह लिख कर दिया है ?राजेंद्र बाबू ने कहा राजा जी मुझसे भी अधिक योग्य व्यक्ति हैं !और हम नहीं चाहते कि देश के लोगों में यह सन्देश जाय की हमलोग पद के भूखे हैं !हाई कमांड की मीटिंग में नेहरूजी ने राजेन्द्र बाबू के समर्थन का हवाला देकर पटेल से राजा जी के नाम की घोसणा के सम्बन्ध में बात की !इस पर पटेल ने कहा की आपके प्रभाव के कारण सदस्य राजा जी के नाम पर सहमति व्यक्त कर रहे हैं ! वैसे सभी की इक्छा राजेंद्र प्रसाद के पक्छ में है !नेहरूजी एक मिनट मौन रहे और फिर उन्होंने राजेंद्र प्रसाद के नाम की घोसणा कर दी !नेहरू जी झूठ नहीं बोलते थे इसका जिक्र मोरारजी भाई और आचार्य विनोवा भावे ने भी किया है ! !नेहरूजी के मंत्रिमंडल में लगभग सभी मंत्री अपने पद से बहुत महान थे !इसी प्रकार राजेंद्रप्रसादे डॉ राधा कृष्णनके लिए तष्ट्रपति पद बहुत छोटा था !राजेन्द्रप्रसाद डॉ राधाकृष्णन की महत्ता इसलिए नहीं थी कि बे राष्ट्रपति थे ! बल्कि राष्ट्रपति के पद का गौरव इसलिए था की बे राष्ट्रपति पद पर आसीन थे !इसीप्रकार नेहरू जी की महानता के सामने प्रधानमंत्री पद बहुत छोटा था !नेहरूजी के जीवनकाल में भी यह प्रशन पूंछा जाता था कि नेहरू के बाद कौन ?उनके प्रखर विरोधी भी नेहरू के विकल्प के रूप में उनके जीवन काल में अपने आपको प्रस्तुत नहीं करते थे !
Wednesday, 22 June 2016
ह्न बजे ·
सभी मनुष्यों के कर्मो का निश्चय बुद्धि करती है !इसिलए बुद्धि ठीक रहे ! इसकेलिए कछ नियमों का निर्माण हुआ ! जिनमे कुछ नियम कानून कहलाये जिनके पालन करवाने के लिए राज्य व्यबस्था का जन्म हुआ! और कुछ नियमो का पालन स्वेक्छिक था उनको पालन कराने के लिए जिस व्यबस्था का जन्म हुआ उसको धर्म नाम दे दिया गया ! उन्ही नियमों को धर्म नाम दे दिया इन्ही दो व्यबस्थाओं के द्वारा प्राणिमात्र की व्यबस्था आज भी हो रही है ! !सभी मनुष्यों की कर्म करने की रूचि और प्रवृत्ति समान नहीं होती है !किन्तु कर्म करने के साधन हाथ पैर दिल दिमाग और कार्य करने की सामग्री समान होती है ! उस सामग्री का कुछ लोग उतना ही संग्रह और उपयोग करते है जितनी आवश्यकता होती है !और उस पर भी बे अपना अधिकार नहीं मानते है !!जो प्राणिमात्र के जीवन धारण करने के नैसर्गिक संसाधन जल जमीन और जंगल आदि है !उनपर बे प्राणिमात्र का अधिकार मानते हैं !!इन सबको बे सब के लिए और सबकी मानते हैं !प्राणियों के उपभोग और उपयोग आने वाले इन पदार्थों का जन्मदाता कुछ लोग ईश्वर को कुछ लोग प्रकृति को और कुछ लोग इसे अपने आप उत्पन्न होने वाली मानते हैं !जब तक इन पदार्थों को सिर्फ उपयोग और उपभोग बस्तु के रूप में ग्रहण करने की ही बृत्ति रहती है !तब तक इनके उपयोग के लिए किसी भी प्रकार की व्यबस्था के निर्माण का आवश्यकता नहीं होती है ! किन्तु जब कुछ लोगों के दिल दिमाग में इन पदार्थों पर कब्ज़ा करने की नियत पैदा होती है !तब उसको नियंत्रित करने के लिए उनका दिलदिमाग शुद्ध रहे इसको समझाने के लिए ऐसी विधियां नियम बनाये जाते हैं जिन को समझ कर धारण कर बे प्राणिमात्र के उपयोग में आने वाले इन नैसर्गिक संसाधनो को सबके उपयोग में आने वाला मान कर पर सिर्फ अपने ही उपभोग के लिए ही इनका इस्तेमाल न करें !लोगो की बुद्धि में निकृष्ट स्वार्थ के स्थान पर शुद्ध सभी प्राणियों के शरीर भिन्न भिन्न है और आत्मा एक ही है इसका संचरण हो इसके लिए गांधीजी ने गीता और उपनिषदों के ज्ञान को माध्यम में बनाया और स्वयं भी पूर्ण निष्ठां से इसका पालन किया और प्रार्थना को ही अपनी आत्मशुद्धि और आत्मिक शक्ति का साधन माना और मृत्यु पर्यन्त कभी इस नियम का उल्लंघन नहीं किया !बे राम नाम को सभी आधियों व्याधियों के निवारण की अचूक औषधि मानते रहे !उन्होंने गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन के १८ श्लोकों को दैनिक प्रार्थना में शामिल किया !विनोबाजी कहते थे की अगर मेरे जीवन से ईश्वर को निकाल दो तो बाबा मिटटी का सिर्फ लौन्दा है !उन्होंने कहा की बाबा ने जी सर्वोदय का काम हाथ में लिया है वह भी ईश्वर की प्रेरणा और आज्ञा से लिया है !और बाबा जो सर्वोदय का कार्य कर रहा ऊह भी गीता माता की ही सेवा है !सभी लोग गांधी विनोबा की यह बात माने यह जरुरी नहीं है !किन्तु जो अपने आप को गांधी बादी मानते है और गांधी आश्रमों में रहते हैं या सर्वोदय में हैं उनकेलिएयह बात मानना जरुरी है !गांधी और विनोबा जिस गीता को अपनी माता कहते थे !और ईश्वर को अपना एक मात्र रक्षक मानते थे उस गीता और ईश्वर की उपेक्छा करने वाले और उसके असित्तवा पर शंका प्रकट करने वालों को ज्ञान के अनेक छेत्र खुले हुए हैं किन्तु गांधी मार्ग ऐसे सभी महान भावों के लिए उपयोगी नहीं है !
सभी मनुष्यों के कर्मो का निश्चय बुद्धि करती है !इसिलए बुद्धि ठीक रहे ! इसकेलिए कछ नियमों का निर्माण हुआ ! जिनमे कुछ नियम कानून कहलाये जिनके पालन करवाने के लिए राज्य व्यबस्था का जन्म हुआ! और कुछ नियमो का पालन स्वेक्छिक था उनको पालन कराने के लिए जिस व्यबस्था का जन्म हुआ उसको धर्म नाम दे दिया गया ! उन्ही नियमों को धर्म नाम दे दिया इन्ही दो व्यबस्थाओं के द्वारा प्राणिमात्र की व्यबस्था आज भी हो रही है ! !सभी मनुष्यों की कर्म करने की रूचि और प्रवृत्ति समान नहीं होती है !किन्तु कर्म करने के साधन हाथ पैर दिल दिमाग और कार्य करने की सामग्री समान होती है ! उस सामग्री का कुछ लोग उतना ही संग्रह और उपयोग करते है जितनी आवश्यकता होती है !और उस पर भी बे अपना अधिकार नहीं मानते है !!जो प्राणिमात्र के जीवन धारण करने के नैसर्गिक संसाधन जल जमीन और जंगल आदि है !उनपर बे प्राणिमात्र का अधिकार मानते हैं !!इन सबको बे सब के लिए और सबकी मानते हैं !प्राणियों के उपभोग और उपयोग आने वाले इन पदार्थों का जन्मदाता कुछ लोग ईश्वर को कुछ लोग प्रकृति को और कुछ लोग इसे अपने आप उत्पन्न होने वाली मानते हैं !जब तक इन पदार्थों को सिर्फ उपयोग और उपभोग बस्तु के रूप में ग्रहण करने की ही बृत्ति रहती है !तब तक इनके उपयोग के लिए किसी भी प्रकार की व्यबस्था के निर्माण का आवश्यकता नहीं होती है ! किन्तु जब कुछ लोगों के दिल दिमाग में इन पदार्थों पर कब्ज़ा करने की नियत पैदा होती है !तब उसको नियंत्रित करने के लिए उनका दिलदिमाग शुद्ध रहे इसको समझाने के लिए ऐसी विधियां नियम बनाये जाते हैं जिन को समझ कर धारण कर बे प्राणिमात्र के उपयोग में आने वाले इन नैसर्गिक संसाधनो को सबके उपयोग में आने वाला मान कर पर सिर्फ अपने ही उपभोग के लिए ही इनका इस्तेमाल न करें !लोगो की बुद्धि में निकृष्ट स्वार्थ के स्थान पर शुद्ध सभी प्राणियों के शरीर भिन्न भिन्न है और आत्मा एक ही है इसका संचरण हो इसके लिए गांधीजी ने गीता और उपनिषदों के ज्ञान को माध्यम में बनाया और स्वयं भी पूर्ण निष्ठां से इसका पालन किया और प्रार्थना को ही अपनी आत्मशुद्धि और आत्मिक शक्ति का साधन माना और मृत्यु पर्यन्त कभी इस नियम का उल्लंघन नहीं किया !बे राम नाम को सभी आधियों व्याधियों के निवारण की अचूक औषधि मानते रहे !उन्होंने गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन के १८ श्लोकों को दैनिक प्रार्थना में शामिल किया !विनोबाजी कहते थे की अगर मेरे जीवन से ईश्वर को निकाल दो तो बाबा मिटटी का सिर्फ लौन्दा है !उन्होंने कहा की बाबा ने जी सर्वोदय का काम हाथ में लिया है वह भी ईश्वर की प्रेरणा और आज्ञा से लिया है !और बाबा जो सर्वोदय का कार्य कर रहा ऊह भी गीता माता की ही सेवा है !सभी लोग गांधी विनोबा की यह बात माने यह जरुरी नहीं है !किन्तु जो अपने आप को गांधी बादी मानते है और गांधी आश्रमों में रहते हैं या सर्वोदय में हैं उनकेलिएयह बात मानना जरुरी है !गांधी और विनोबा जिस गीता को अपनी माता कहते थे !और ईश्वर को अपना एक मात्र रक्षक मानते थे उस गीता और ईश्वर की उपेक्छा करने वाले और उसके असित्तवा पर शंका प्रकट करने वालों को ज्ञान के अनेक छेत्र खुले हुए हैं किन्तु गांधी मार्ग ऐसे सभी महान भावों के लिए उपयोगी नहीं है !
2015 ·
कर्मफलभोग
------कर्मफल भोग के सम्बन्ध में कई प्रकार के आख्यान महाभारत में दिए गए
हैं !उन्ही आख्यानों में युधिस्ठर और मार्कण्डेय ऋषि का भी कर्मभोग फल के
विषय में आख्यान है !सभी पांडव बड़े कष्ट में अपना बनबास काल काम्यक बन में
बिता रहे थे !वहां पर भगवान श्री कृष्णा नारद जी और मार्कंड़य ऋषि पांडवों
से भेंट करने पहुंचे !युधिस्ठर ने मार्कंड़य ऋषि से कहा कि हमारे मन में
दीघर्काल से यह इक्छा थी कि हमें आपकी सेवा और सत्संग का सुअवसर मिले !
ब्रह्मन हम सब अपने सुख और वैभव से वंचित होकर सब प्रकार के कष्ट जंगल में
भोग रहे हैं !और दुराचारी धृतराष्ट्र पुत्रों को सब प्रकार के सुख
ऐशबर्यऔर समृद्धि प्राप्त है ! इसलिए हमारे मन में यह विचार उठता है कि शुभ
और अशुभ कर्म करने वाले जो मनुष्य हैं बे अपने कर्मों के फल किस प्रकार
भोगते हैं ?कर्मों का फल मनुष्य इसी लोक में इसी शरीर से भोगता है या
मृत्यु के बाद परलोक में भोगता है ?मार्कंड़य ने कहा विवेकी मनुष्य कर्मों
का कुछ फल प्रारब्ध बस प्राप्त करते हैं ! और कुछ कर्मो का फल उन्हें उनके
उद्द्योग और पुरुषार्थ से प्राप्त होता है ! कुछ कर्मो का फल अकस्मात्
प्राप्त होता है ! कोई मनुष्य संसार में ही परम सुख पाता है परलोक में नहीं
प्राप्त करता है ! किसी को परलोक में ही परम कल्याण की पाप्ति होती है !
संसार में नहीं प्राप्त होती है ! किसी को संसार में और परलोक में भी दोनों
स्थानो में भी परम सुख की प्राप्ति होती है ! और किन्ही लोगों को ना तो
परलोक में उत्तमसुख मिलता है और ना संसार में भी सुख कि प्राप्ति होती है !
जिनके पास बहुत संपत्ति समृद्धि पद प्रतिष्ठा आदि होती है ! बे अपने शरीर
को ही बैभव कीर्ति और प्रतिष्ठा प्रदान कराने में तथा प्रकार प्रकार के
इन्द्रियजन्य भोगों की तृप्ति में ही जीवन पर्यन्त लगे रहते हैं ! इसलिए
ऐसे मनुष्यों को सिर्फ संसार में ही सुख मिलता है ! परलोक में उनको सुख की
पप्ति नहीं होती है ! जो लोग संसार में कामनाओ को त्याग कर योग साधना करते
हैं ! तपस्या में संलग्न रहते हैं ! और निष्काम भाव से स्वाध्याय करते हैं !
तथा प्राणियों की हिंसा से दूर रहकर इन्द्रियों को संयम में रखते हुए अपना
जीवन जीते हैं ! उन्हें संसार में सुख की प्राप्ति नहीं होती है ! बे
परलोक में ही परमकल्याण के भागी होते हैं ! जो लोग कर्त्तव्य बुद्धि से
स्वधर्म का पालन करते हैं !और न्याय से ही धन संपत्ति का उपार्जन करते हैं
! और यथा समय विवाह बंधन में बंधकर याग यज्ञ ईश्वर भक्ति तथा सत्कर्मो के
आचरण करते हैं ! उन्हें संसार में भी परम सुख की प्राप्ति होती है ! और
परलोक में भी उन्हें उत्तम सुख प्राप्त होते हैं ! जो मूर्ख मनुष्य ना
ज्ञान के लिए ना तप के लिए और ना दान के लिए ही प्रयत्न करते हैं ! और ना
धर्म पूर्वक गृहस्थ धर्म का ही पालन करते हैं ! बे ना तो सुख पाते हैं और
ना ही उत्तम धर्म युक्त भोग ही भोगते हैं ! उनके लिए ना तो संसार में सुख
है और ना परलोक में ही सुख है ! युधिस्ठर तुम सभी पांडव पराक्रमी और धैर्यं
बान हो ! तुम में अलौकिक ओज भरा है ! तुम सभी शूरवीर तथा तपस्या और
इन्द्रिय संयम और उत्तम आचार व्योहार में सदा तत्पर रहने वाले हो ! इन
सत्कर्मों के फलस्वरूप तुम इस लोक में भी कुछ समय पश्चात राजलक्ष्मी को
प्राप्त करोगे और मृत्यु के बाद तुम सभी को परलोक में भी परम गति की
प्राप्ति होगी ! इसलिए तुम अपने मन में किसीभी प्रकार की शंका को स्थान ना
दो ! तुम्हारा वर्तमान कष्ट तुम्हारे भविष्य के सुख का सूचक है !कभी कभी
अनीति और अधर्म से भी मनुष्यों को ऐशबर्य धन संपत्ति बैभव की प्राप्ति होती
है ! किन्तु वह स्थायी नहीं होती है !और अंत में जड़ मूल से नष्ट हो जाती
है !यही परिणाम अधर्मी धृतराष्ट्र पुत्रों का अंत में होगा ! और तुमको
स्थिर राजलक्ष्मी की प्राप्ति होगी और तुम्हारी कीर्ति इसलोक और परलोक
दोनों स्थान में स्थिर और स्थायी रहेगी !महाभारत युद्ध के बाद यही परिणाम
आया !इसलिए कल्याणकामी मनुष्यों को अधर्म और अनीति से प्राप्त सम्पती वैभव
आदि की प्राप्ति से बचना चाहिए और सदा स्वधर्मनिष्ठा का पालन करते हुए
सत्कर्मो का अनुष्ठान करते रहना चाहिए !
योग
का विरोध नहीं किया जाना चाहिए !किन्तु जिस तरह से राजनैतिक आर्थिक आदि
लाभ प्राप्ति की दृष्टि से योग का उपयोग किया जा रहा है उसका अंधा और
विवेकहीन समर्थन भी नहीं करना चाहिए !भारत गुलाम मानसिकता से ग्रस्त
स्वतंत्र देश है !इसीलिए यहाँ सत्ता पिपासु लोग सत्य का ना तो अनुशीलन
करते हैं ! और ना ही निर्भयता से सत्य का समर्थन करते हैं !ऐसे लोगों के
जीवन के सभी कर्म सिर्फ भोग वैभव सत्ता महत्ता आदि की प्राप्ति के साधन बन
जाते हैं !इसीलिए विवेकवान साहसी सत्यनिष्ठ लोगों को इस विश्व कल्याण कारी
योग विज्ञान को भोगी स्वार्थी अवसर वादी और योग का व्योपार करने वाले योग
गुरुओं से मुक्त कराना होगा !योग की महत्ता विश्व स्तर पर २१ जून के अंतर
राष्ट्रिय योग दिवस ने सिद्ध कर दी है !अब हमें योग के विशुद्ध चित्त
बृत्ति निरोध को विश्व के सामने प्रस्तुत करने का काम करना है !भगवान श्री
कृष्णा ने ६(१,२)में कहा है कि कर्मफल का आश्रय ना लेकर जो कर्तव्य कर्म
करता है वही सन्यासी और योगी है ! जिसने कर्मफल की इक्छा और आश्रय का
त्याग कर दिया है वही सच्चा सन्यासी या योगी है ! कर्म फल की आसक्ति का
त्याग करने से ही परमशान्ति की प्राप्ति होती है ! जिसको सन्यास कहते हैं
वही योग है ! जब तक मनुष्य के ह्रदय में संसार की सत्ता महत्ता और भौतिक
भोगों की प्राप्ति की इक्छा और आकांछा है, और जब तक वह इन कामना प्राप्ति
के संकल्पों का त्याग नहीं कर देता तब तक वह न तो भक्ति योगी ,ज्ञान योगी
,हठयोगी ध्यान योगी कर्मयोगी आदि किसी भी प्रकार का योगि८ नहीं है ! बल्कि
भौतिक सुखों का भोगी है !योग इन भौतिक सुखो के भोगिओं के मध्य समर्थन और
विरोध का मुद्दा बन गया है !ये बो सत्ता महत्ता और भौतिक सुखों की प्राप्ति
के लिए लालायित लोग हैं !जिनके कारण देश की अस्मिता, ईमानदारी त्याग और
तपस्या और कर्तव्यनिष्ठा आज तक स्वार्थ के घने अन्धकार में रो रही है !इस
स्वार्थ के घने अन्धकार से देश को मुक्ति योग दिला सकता है !इन
स्वार्थनिष्ठ व्यक्तियों के जीवन में तो त्याग की गंध भी नहीं मिलेगी !
सिबा भोग की बदबू के अतिरिक्त और कुछ भी दिन के उजाले में भी १००० पावर
के बल्ब की रोशनी में भी दिखाई नहीं देगी !अगर हम योग के महान कल्याण कारी
स्वरूपको देखना, जानना और समझना चाहते हैं !तो हमें बुद्ध ,महाबीर ईशा
मुहम्मद नानक कबीर सिखधर्म के बहुत से गुरुओं अरविंदो महर्शि रमण दयानंद
तिलक महात्मा गांधी आचार्य विनोबा भावे समर्थ रामदास आदि महान आत्मनिष्ठ
कर्मयोगिओं और महाराणा प्रताप शिवाजी आदि राष्ट्र के लिए जीवन उत्सर्ग करने
वाले योद्धाओं और राजस्थान की भूमि में हजारों अपने शील कि रक्षा के लिए
जीवन कि आहुति देने बाली महान महिलाओं और देश सेवा के लिए समर्पित सुभाष
टैगोर आदि आत्मनिष्ठ लोगों के जिए गए जीवनो को अपने आचरणों में उतारने का
प्रयत्न करना होगा !और वर्तमान भारत में भी ईमानदारी से देश हित में
आत्मनिष्ठा से कर्तव्य पालन करने बाले सभी लोगों को जानना और समझना होगा
!किसी भी व्यक्ति राजनैतिक दल या नेता या गेरुवावस्त्र धारी या दाढ़ी
मुसलमानी टोपी लगाए मुला मौलवी के शब्द जाल से मुक्त होकर उसके कथनी पर
ध्यान ना देकर उनकी करनी पर ध्यान देना होगा !सत्य ही हमारे आकलन की कसौटी
होनी चाहिए !राजनीति हमारे जीवन की सभी गतिविधियों को नियंत्रित और संचालित
कराती है !इसीलिए जिन राजनेताओं में कर्त्तव्य निष्ठा राष्ट्रभक्ति और
राष्ट्र प्रेम के दर्शन होते हों उनके इन गुणों की भी हमें मुक्त कंठ से
बिना भेद भाव के प्रसंशा करनी चाहिए !भौतिक भोगों के द्वारा सुख प्राप्ति
की अवांछनीय आकांछाओ से मुक्ति ही योग है !और योग को इसी रूप में स्थापित
किया जाना चाहिए !
Tuesday, 21 June 2016
गांधी कथा ---- गांधी जी पर भारत से लौटने पर हुआ जान लेवा हमला --------- हिन्दुस्तान में साउथ अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों की स्थिति के बारे में गांधीजी ने जो सत्य वर्णन किया था ! ,उसने बड़ा महत्त्व ग्रहण कर लिया था !हिंदुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों ने उस पर टिप्पड़ियाँ लिखी थी !इस पर नेटाल के गोर गांधी जी के विरुद्ध बहुत नाराज हो गए थे !जब गांधी जी अपने परिवार के साथ कुरु लैंड जहाज से नेटाल बन्दर गाह पर पहुंचे और नादरी जहाज से भारत के अन्य ८०० मुसाफिर पहुंचे ! तो गोरों ने चेताबनियां भिजबाईं की यदि गांधी जी और हिन्दुस्तानी मुसाफिर जहाजों से उतरने का प्रयत्न करेंगे तो उनको समुद्र में फेंक दिया जाएगा ! इसिलए जहाजों को २३ दिनों तक बन्दर गाह के अंदर प्रवेश नहीं करने दियागया !जब २३ दिन बाद प्रतिबन्ध हटा तब जहाजों को बन्दर गाह के अंदर आने की इजाजत मिली !गांधी जी से कहा गया की बे जहाज से ना उतरें !शाम को पुलिस सुपरिंडेंट की अभिरकछा में उनको उतारा जाएगा !परन्तु गांधीजी का परिवार उतर सकता है !गांधीजी ने अपने बच्चों और पत्नी को डरबन के प्रसिद्ध व्योपारी पारसी रुस्तम जी के यहाँ भेज दिया !जहाज पर डरबन के प्रसिद्ध वकील लाटन गांधी जी के पास आये !उनके साथ गांधीजी भी जहाज से उतर गए ! !बे जहाज से उतरे ही थे कि कुछ गोरे लड़कों ने उन्हें देख लिया ! लड़कों ने गांधीजी को तुरत पहचान लिया बे गांधी ,गांधी ,कहकर चिल्लाए इसको मारो!कुछ लड़कों ने गांधीजी पर कंकड़ पत्थर फेंके !धीरे धीरे हमला करने वालों की भीड़ बढ़ने लगी ! जैसे ही गांधी जी आगे बढ़ते गए बेसे बेसे गोरों की भीड़ भी बढ़ती गयी !और सेकंडों गोरे इकट्ठे हो गए गांधीजी पर गालियों और पत्थरों की बरसात होने लगी गांधी जी की पगड़ी नीचे गिर गयी ! एक गोरे ने गांधीजी को थप्पड़ मारा,एक लात मारी ! गांधी जी चक्कर खाकर जमीन पर गिर गए ! इतने में पुलिस सुपरिंडेंट की पत्नी गांधी जी के सामने से निकली वह गांधी जी को पहचान गयी उसने गांधी जी को अपनी सुरक्छा में ले लिया !गांधी जी पर हो रहे हमले का पता पुलिस सुपरिंडेंट को भी हो गया ! उन्होंने गांधी जी की रक्छा के लिए पुलिस भेज दी !उसकी रक्छा में गांधी जी सहीसलामत रुस्तम जी के घर पहुँच गए !रुस्तमजी के मकान के सामने हजारों गोरे इकट्ठे हो गए उन गोरों ने रुस्तमजी से कहा गांधी को हमारे हवाले कर दो !अगर गांधी जी को हमारे हवाले नहीं करोगे तो हम गांधी जी के साथ तुम्हें भी मार डालेंगे और तुम्हारी दुकान को भी आग लगा देंगे !पुलिस सुपरिंडेंट रुस्तम जीके घर पहुँच गए और उन्होंने मकान को पुलिस के कब्जे में ले लिया और गांधी जी सेकहा की बे हिन्दुस्तानी व्योपारी का बेश बना लें !गांधी जी बड़ी मुश्किल से रुस्तम जी के घर से सुरक्छित जान बचा कर निकल सके थे !
Monday, 20 June 2016
अन्तर राष्ट्रीय योग दिवस ------ आज भारत सहित कुछ देशों में कुछ लोग आसन ,प्राणायाम आदि को योग समझ और मानकर बही रंग योग को योग दिवस के रूप में मना रहे हैं ! ! भारत में प्रधान मंत्री सहित अनेक केंद्रीय मंत्री तथा ,भाजपा शासित राज्यों में भी यह बहि रंग योग राज्य सरकारों के संरक्छण मैं सामूहिक रूप से मनाया जा रहा है ! इस बहिरंग योग को योग का स्वरुप प्रदान कर राजनैतिक ,आर्थिक और सम्मान प्राप्त करने वाले योग गुरु के नाम से ख्याति प्राप्त कुछ बहिरंग योग में निष्णात तथा कथित साधु संत भी इस बहिरंग योग के माध्यम से आसन प्राणायाम आदि का सार्वजानिक प्रदर्शन कर रहे हैं !बहिरंग योग निश्चित तौर पर अनियमित भोग विलास से युक्त जीवन जीने वाले शोषण और अनीति से धन उपार्जन कर कर्त्तव्य भ्रष्ट ,आराम तलब लोगों को स्वास्थ्य प्रदान करने का बहुत ही लाभ दायक साधन है ! किन्तु मेहनत कस अधभूखे शोषित किसानों ,मजदूरों ,और कर्त्तव्य निष्ठ लोगों और सच्चे तपोनिष्ठ योगियों ,सन्यासियों ,और साधु संतों को यह बिलकुल उपयोगी नहीं है !क्योंकि इस बहि रंग योग से योग के मूल तत्त्व परमात्मा की प्राप्ति नही होती है ! योग से परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग में योगियों ने ५ दोष काम ,क्रोध ,लोभ ,भय और अति निद्रा बताये हैं !योगी क्रोध को मनोनिग्रह के द्वारा काम को संकल्पों के त्याग के द्वारा तथा सतोगुण के आचरण से अति निद्रा ,प्रमाद और आलस्य का नाश करता है !योगी धैर्य का सहारा लेकर लिंग और उदर की रक्छा करता है अर्थात स्त्री संग और भोजन की चिंता दूर कर देता है ! और सत्कर्मों के द्वारा मन और वाणी की रक्छा करता है अर्थात इनको शुद्ध बनाताहै ! सावधानी से भय का और विद्वानों के सत्संग से दम्भ ,पाखण्ड और झूठ का त्याग करताहै !इस प्रकार सदैव सावधानी पूर्वक आलस्य ,और प्रमाद त्याग कर इन योग सम्बन्धी दोषों को जीतने का प्रयत्न करता है !ध्यान ,गीता आदि सत शास्त्रों के अध्यन ,चिंतन ,मनन, दान ,सत्य ,लज्जा ,सरलता ,छमा ,शौच ,आचार शुद्धि तथा इंद्रियों के संयम से तेज की बृद्धि होती है 1 और शोषण ,अनैतिक साधनों से सत्ता ,संपत्ति ,प्राप्त करने की प्रवृत्ति और शोषण करने के दुष्ट आचरण और स्वभाव तथा इन अमानवीय अत्यन्त निकृष्ट कर्मों के से बिरति हो जाने के कारण पाप करने की प्रबृत्ति का नाश हो जाताहै !इस प्रकार आसन प्राणायाम आदि बहिरंग योग से उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है ! और योग के काम ,क्रोध आदि दोषों के निवारण से उत्तम आचरण की प्राप्ति होती है !ये बहिरंग और अंतरंग दोनों योग मिलकर सम्पूर्ण योग का निर्माण करते हैं !
Sunday, 19 June 2016
आसान प्राणायाम आदि योग नहीं है !योग की वास्तविक उपलब्धि कराने के लिए
बहिरंग योग है !!लेकिन लोग इसी को योग समझ बैठे हैं !और इसी का प्रचार
प्रशक्छिण तथा कथित योग गुरुओं और योग केन्द्रों द्वारा दिया जा रहा है
!योग परमशक्ति से जोड़ने का साधन है !जिसके लिए चित्त बृत्ति का निरोध
आवश्यक है ! इसीलिए महर्षि पातंजलि ने चित्तबृत्ति निरोध को योग कहा है !
और योग का परिणाम परमात्मा में चित्त की स्थिरता बताया है !इसीलिए गीता में
पातंजल योग दर्शन में योग का जो परिणाम बताया गया है उसी को योग कहा
है ! गीता चित्तबृत्तियों से सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद पूर्वक स्वतः सिद्ध
सम स्वरुप परमात्मा में स्वाभाविक स्थिति को योग कहती है !आत्मा का
परमात्मा के साथ योग नित्य है जिसका कभी भी किसी भी अवस्था में किसी भी
परिस्थिति में वियोग नहीं होता है ! शरीर संसार के साथ माने हुए संयोग का
वियोग होते ही उस नित्य योग का अनुभव हो जाता है जिस से सम्पूर्ण सांसारिक
दुखों की निबृत्ति हो जाती है ! गीता ने दुखों के साथ संयोग के वियोग को ही
योग कहा है ६(२३) !और योग की इस स्थति को प्राप्त करने के लिए गीता में
निष्काम कर्म योग को जीवन में धारण करने की शिक्छा दी है !आज जो विश्व और
भारत में योग केंद्र चल रहे हैं वे ऋषि परम्परा के योग केंद्र नहीं है
!भौतिक भोग सामग्री से युक्त भोग केंद्र है !और उन केन्द्रों में भौतिक सुख
सुविधा उपार्जन और अतिशय काम भोग और भोजन आदि में अनियमतता बरतने वाले
पैंसा बालों का बड़ी बड़ी लाखों रूपया की फीस लेकर उपचार बहिरंग योग की विधि
आसान प्राणायाम आदि से किया जाता है !जो योग आश्रम चलाने बाले योग गुरु हैं
बे स्वयं भी भौतिक सुखों की प्राप्ति में आकंठ डूबे हुए लोग हैं !और योग
शिक्छण के नाम से अकूत धन संपत्ति कमा रहे हैं !कभी कभी समाचार पत्रों में
इन योग गुरुओं के बिरुद्ध बलात्कार धोखा धडी के मुकदद्मे भी दर्ज होते रहते
हैं !इस सबके बाद भी भारत की इस आदि योग परम्परा का शिक्छण दिया जाना
लोकहित में बहुत आवश्यक है !इसका जितना अधिक प्रचार और प्रसार होगा उतना ही
ज्यादा लोक कल्याण होगा !अतिशय भोग बाद से ग्रस्त और सत्ता संपत्ति बटोरने
के कारण असाध्य बीमारियों से युक्त धनपतियों राजनेताओं अधिकारियों के लिए
रोग मुक्ति के साथ यह चित्तबृत्ति सुधार का भी माध्यम बनेगा और धीरे धीरे
यह अपने वास्तविक स्वरुप में भी स्थापित हो जाएगा !
गांधी कथा ---- गांधी जी कुछ समय के लिए साउथ अफ्रीका से भारत आये ------ १८९६ के मध्य में गांधी जी ने भारत आकर दक्छिन अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति पर प्रकाश डालने के लिए एक पुश्तिका लिखी और हिंदुस्तानी नेताओं के दर्शन भी किये !मुंबई में बे फीरोज शाह मेहता ,बदरुद्दीन तैयबजी ,महादेव गोविन्द रानाडे,अदि से पूना में लोकमान्य तिलक ,प्रोफेसर भण्डार कर ,गोपालकृष्ण गोखले ,आदि से भी मिले 1मुम्बई से आरम्भ करके ,पुणे, और मद्रास में उन्होंने भासण भी दिए !मद्रास में गांधी जी ने जस्टिस सुब्रामणियम ,श्री आनंद चारलु और हिन्दू के सम्पादक श्री परमेश्वरम ,प्रख्यात वकील भाष्यम् आयंगर और श्री मार्टिन अदि से भी मिले !मद्रास से गांधीजी कोलकत्ता गए वहां बे सुरेंद्रनाथ बनर्जी ,महाराजा ज्योतीन्द्र मोहन टैगोर इंग्लिश मैन के सम्पादक सांडस ,आदि से भी मिले !भारत में गांधी जी ने जो सभाएं की उसके समाचार दक्छिन अफ्रीका में भी पहुंचे ! गांधी जी के सभाओं में दिए गए भसणो के अतिश्योकत पूर्ण तोड़े मरोड़े अंश गोरों ने भी पढ़े बे गांधीजी पर आग बबूला हो गए !इसी बीच गांधीजी को नेटाल से तार मिला कि तुरंत आइए !गांधी जी ने समझा कि हिन्दुस्तानियों के विरुद्ध कोई ना कोई नया आंदोलन गोरों ने शुरू कर दिया होगा ! इसीलिए कलकत्ता का कार्य बिना पूरा किये ही गांधी जी अपने परिवार के साथ लौट पड़े और कुरलैंड नामक पानी के जहाज पर सबर हो गए `!इस जहाज से तुरंत रबाना होने के बाद उसी दिन एशियन कंपनी का एक जहाज नादरी भी बम्बई से नेटाल के लिए रबाना हुआ !दोनों जहाज़ों में दक्छिन अफ्रीका जाने वाले लगभग ८०० मुसाफिर सबार थे
फादर डे ------ पश्चिमी देशों की संस्कृति का अंधानुकरण करने का यह उदाहरण है !पश्चिम के देशों में फादर डे ,मदर डे मनाने का विशिस्ट कारण है !वहां शादियां स्थायी नहीं होती हैं !अधिकाँश शादियां पति पत्नी में मतभेद के कारण टूट जाती हैं !अतः माँ तो वही रहती है !किन्तु माँ के दूसरा विवाह कर लेने से पिता बदल जाता है !इसी प्रकार पुरुष के दूसरे विवाह के कारण यदि पूर्व विवाह से जन्मे पुत्र या पुत्री पिता के साथ रह रहे है !तो बे अपनी माँ के लिए मदर डे मनाते हैं !भारत में अभी यह परंपरा बहुत अधिक प्रचिकित नहीं हुई है !अभी भी अधिकाँश शादियां यथाबत रहतीं हैं !हो सकता है भविष्य में यहाँ भी शादियां टूटने लगें और पश्चिमी देशों की तरह यहाँ भी मदर डे और फादर डे मनाना जरूरी हो जाय !अभी तो हालत यह है कि पश्चिमी देश भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं !और भारत बासी पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर रहे है !समय का उलट फेर बड़ा विचित्र होता है !उसकी गति रोक पाना बड़ा कठिन होता है
Saturday, 18 June 2016
कांग्रेस का संगठन कांग्रेस के लम्बे समय तक सत्ता में रहने के कारण जी
हजूरिओं की जमात बनकर रह गया है !और इसका लोकतान्त्रिक ढांचा लगभग नष्ट हो
गया है !देश को कांग्रेस की जरुरत है इसीलिए कांग्रेस को अपना संगठन का
ढांचा चुस्त दुरश्त और मजबूत करना चाहिए !कांग्रेस संगठन का निर्माण
लोकतान्त्रिक पद्धति से ग्राम से लेकर केंद्र तक होना चाहिए !चुने हुए
संगठन के पदाधिकारिओं के द्वारा ही कांग्रेस के विधान सभा लोकसभा के
उम्मीड़बार घोषित किये जाने चाहिए !दलबदलुओं को कम से कम ५ साल टिकट नहीं देना
चाहिए !किसी भी सूरत में ग्राम समिति से लेकर अखिल भारतीय स्तर तक किसी भी
पदाधिकारी को मनोनीत नहीं किया जाना चाहिए !कांग्रेस को कार्यकर्ता प्रधान
संगठन बनाया जाना चाहिए !आज की कांग्रेस की रीढ़ नहीं है !किन्तु शीर्ष के
रूप में सोनिया गांधी जी और राहुल गांधी जी मौजूद हैं !इन दोनों नेताओं के
अलावा कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं है !जिसको सारे देश का समर्थन
प्राप्त हो !इसीलिए राहुल गांधी को कांग्रेस को सही दिशा देने के लिए संगठन
को कार्यकर्त्ता प्रधान बनाना चाहिए !इसके अलावा कांग्रेस को देश की
विरासत वेद उपनिषद गीता आदि को भी यथोचित स्थान देना चाहिए !तथा जिन
शूरबीरों ने देश को मुग़लों से देश की मुक्ति के लिए अपने जीवन को होम दिया
उन राणाप्रताप शिवाजी आदि को गौरव पूर्ण स्थान प्रदान करना चाहिए
!धर्मनिरपेक्छ्ता का अर्थ भारत की आदि संस्कृति और धर्म का नाश करना नहीं
है !राहुल गांधी जी में त्याग और कर्मठता तथा गहरी देश भक्ति मौजूद है !वह
देश में व्याप्त परिवार बाद और जातिबाद से सर्वथा मुक्त है !धन संग्रह और
भोग प्रधान जीवन से भी दूर हैं !और सत्ता लोलुप तो बिक्कुल ही नहीं है !ऐसे
राहुल गांधी के जन्म दिन पर मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं !जिस कांग्रेस का ३०
साल से भी ज्यादा नेतृत्वव गांधी जी ने किया और जिसके संबिधान का निर्माण
भी गांधी जी ने किया था ! और जिस कांग्रेस ने देश को आजादी दिलाई !तथा
जिसकी बिरासत हजारों महा पुरुषों के त्याग और तपस्या की है !उस कांग्रेस का
नेतृत्त्व सबल स्वक्छ त्यागी तपस्वी व्यक्तियों के हाथों में हो !ऐसे
कांग्रेस के स्वरुप का निर्माण राहुल गांधी के द्वारा हो ऐसी शक्ति
सामर्थ्य ईश्वर राहुल गांधी को प्रदान करें !
जब तक मनुष्यों के दिल दिमाग और दिनचर्या में भौतिक सुखों की प्राप्ति की
इक्छा आकांछा महत्ता प्रभावी रहेगी तब तक बे वास्तविक योगी नहीं हो सकते
हैं !फिर भी भारत भूमि में जन्म लेने बाली विश्व कल्याण कारी योग विद्या
को सामान्य मनुष्यों तक पहुंचाने का प्रयत्न किया जा रहा है ! यह अत्यंत
प्रसंसनीय कार्य है !यह सरकार द्वारा किया जा रहा है इसीलिए इसमें राजनैतिक
लाभ लेने का प्रयत्न भी छिपा हुआ है ! !भौतिक सुखों की प्राप्ति की
आकच्छओं ने मनुष्य को दानव बना दिया है !बाजार नकली मिलाबटी
खाद्द्य पदार्थों से भरे पड़े हैं !डॉक्टर वकील अध्यापक अधिकारी कर्मचारी
सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए सामाजिक सेवा का स्वरुप समाप्त करने
में लगे हुए हैं !धर्म से भगवान गायब हो गए हैं !और भगवान के स्थान पर
गुरु कथावाचक साधु तथाकथित सन्यासी और मठा धीस ही भगवान बनकर अपनी पूजा
अर्चा करा रहे हैं! ! कुछ लोग योग का पुरजोर विरोध भी कर रहे हैं !इसमें
बो राजनेता भी शामिल हैं जो स्वयं योग को करते हैं और योग की प्रसंसा भी
करते हैं किन्तु योग को सामान्य जनता तक नहीं पहुँचने देना चाहते हैं
!!अवांछनीय कामनाओं की तृप्ति के लिए भोग प्राप्ति का यह दृश्य दिल्ली से
देहात तक दिखाई देता है !इस भोग प्रधान जीवन ने लोगों की जिंदगी से सुख चैन
कर्तव्य निष्ठा ईमानदारी देशभक्ति आदि के कीमती जीवन में उतारने वाली
जीवन चर्या के मूल्य सिधान्तो को ही छीन लिया है !सामाजिक और पारिवारिक
जीवन नर्क बन गया है !भाई को भाई के साथ धोखा देने और बेईमानी करने में
कोई हिचक नहीं होती है !परिवार बिखर गए हैं !और परिवारों में बेईमानी और
धोखा धडी का तांडव दिखाई देता है !भारत की यह पवित्र भूमि अपने स्वाभाविक
करुणा स्नेह अहिंसा तप त्याग और निष्काम सेवा के मार्ग से बिचलित होकर
स्वार्थ के घटाटोप अन्धकार से ग्रस्त होकर दुःख और कष्ट भोग रही है !मनुष्य
के दिल दिमाग और जीवन चर्या से भौतिक सुख प्राप्ति की अवांछनीय कामवासनाओं
को निकालकर दिल दिमाग और जीवन चर्या को शुद्ध पवित्र काने का काम योग
साधना करेगी !यह योग साधना स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिल दिमाग का निर्माण
करेगी !
जब तक मनुष्यों के दिल दिमाग और दिनचर्या में भौतिक सुखों की प्राप्ति की
इक्छा आकांछा महत्ता प्रभावी रहेगी तब तक बे वास्तविक योगी नहीं हो सकते
हैं !फिर भी भारत भूमि में जन्म लेने बाली विश्व कल्याण कारी योग विद्या
को सामान्य मनुष्यों तक पहुंचाने का प्रयत्न किया जा रहा है ! यह अत्यंत
प्रसंसनीय कार्य है !यह सरकार द्वारा किया जा रहा है इसीलिए इसमें राजनैतिक
लाभ लेने का प्रयत्न भी छिपा हुआ है ! !भौतिक सुखों की प्राप्ति की
आकच्छओं ने मनुष्य को दानव बना दिया है !बाजार नकली मिलाबटी
खाद्द्य पदार्थों से भरे पड़े हैं !डॉक्टर वकील अध्यापक अधिकारी कर्मचारी
सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए सामाजिक सेवा का स्वरुप समाप्त करने
में लगे हुए हैं !धर्म से भगवान गायब हो गए हैं !और भगवान के स्थान पर
गुरु कथावाचक साधु तथाकथित सन्यासी और मठा धीस ही भगवान बनकर अपनी पूजा
अर्चा करा रहे हैं! ! कुछ लोग योग का पुरजोर विरोध भी कर रहे हैं !इसमें
बो राजनेता भी शामिल हैं जो स्वयं योग को करते हैं और योग की प्रसंसा भी
करते हैं किन्तु योग को सामान्य जनता तक नहीं पहुँचने देना चाहते हैं
!!अवांछनीय कामनाओं की तृप्ति के लिए भोग प्राप्ति का यह दृश्य दिल्ली से
देहात तक दिखाई देता है !इस भोग प्रधान जीवन ने लोगों की जिंदगी से सुख चैन
कर्तव्य निष्ठा ईमानदारी देशभक्ति आदि के कीमती जीवन में उतारने वाली
जीवन चर्या के मूल्य सिधान्तो को ही छीन लिया है !सामाजिक और पारिवारिक
जीवन नर्क बन गया है !भाई को भाई के साथ धोखा देने और बेईमानी करने में
कोई हिचक नहीं होती है !परिवार बिखर गए हैं !और परिवारों में बेईमानी और
धोखा धडी का तांडव दिखाई देता है !भारत की यह पवित्र भूमि अपने स्वाभाविक
करुणा स्नेह अहिंसा तप त्याग और निष्काम सेवा के मार्ग से बिचलित होकर
स्वार्थ के घटाटोप अन्धकार से ग्रस्त होकर दुःख और कष्ट भोग रही है !मनुष्य
के दिल दिमाग और जीवन चर्या से भौतिक सुख प्राप्ति की अवांछनीय कामवासनाओं
को निकालकर दिल दिमाग और जीवन चर्या को शुद्ध पवित्र काने का काम योग
साधना करेगी !यह योग साधना स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिल दिमाग का निर्माण
करेगी !
गांधी कथा -----------गांधी जी ने नेटाल के सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के लिए प्रार्थ्रना पत्र दिया था ,!नेटाल की लॉ सोसाइटी ने इस आधार पर गांधीजी के प्रार्थना पत्र का विरोध किया था कि नेटाल के कानून के अनुसार काले या गेहुएं रंग के लोगों वकालत की सनद किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती है !नेटाल लॉ सोसाइटी का विरोध सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर गांधी जी का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर उनको नेटाल के सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने की आज्ञा प्रदान कर दी थी !गांधी जी ने साउथ अफ्रीका के प्रवास के दौरान या इसके पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भी अधिवेसन में भाग नहीं लिया था!कांग्रेस के सम्बन्ध में पड़ा जरूर था !हिंदुस्तान के दादा और उस समय के सर्वाधिक प्रसिद्ध और ब्रिटेन की पार्लियामेंट में भारत के सांसद दादा भाई नौरोजी के दर्शन अवश्य किये थे !साउथ अफ्रीका में रंग भेद का विरोध करने और हिन्दुस्तानियों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जिस संस्था का गठन मई या जून १८९४ में किया गया था उसका नाम नेटाल इंडियन कांग्रेस रख गया था !यह संस्था जहाँ गोरों के नसल भेद और अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष कराती थी वहीं दूसरी और हिन्दुस्तानियों के दोष और खामियां तथा उनमें सुधार का भी काम करती थी 1 दक्छिन अफ्रीका के अखबार हिन्दुस्तानियों के विरुद्ध जो उनके आचरण के संबंध में झूठे और अतिशय युक्त समाचार प्रकाशित करते थे उनका खंडन और सही समाचा अखबारों तक पहुंचाने का काम भी यही संस्था करती थी ! !१८९६ में हिन्दुस्तानियों की इजाजत लेकर गांधीजी ६ महीनों के लिए भारत आये थे 1 परन्तु बे ६ महीने भी नहीं रह पाये कि नेटाल से तार आगया और गांधीजी को तुरत नेटाल लौट जाना पड़ा था !
महारानी लक्ष्मीबाई का स्मरण बहुत उत्साहपूर्वक किया जा रहा है !दीप दान
किया जा रहा है !श्रद्धांजलि सभाएं भी आयोजित की जा रही हैं ! और लेख भी
समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रहे हैं !यह सब भी जरूरी है ! और ठीक हो रहा
है !किन्तु मात्र इतने से ही रानी लक्ष्मीबाई के प्रति श्रद्धा सुमन
अर्पित करने का उत्तर्दायित्वव पूर्ण नहीं होता है !महारानी के शौर्य और
त्याग का प्रयोग हमें बर्तमान जीवन में व्याप्त बुराइओं के विरुद्ध संघर्ष
करने में भी लगाना चाहिए !क्योंकि श्रद्धाजंलि अर्पित करने वाले
आयोजकों और भासण देने वाले लोगों में ऐसे लोगों का बाहुल्य होता है !जिनकी
दिलचस्पी सिर्फ भासण देने में और आयोजन करने में ही होती है ! !दुर्भाग्य
से ऐसे लेख भी समाचार पत्रों में प्रकाशित हो जाते हैं !जिनमे सही तथ्यों
का अभाव होता है !आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है !जो रानी के त्याग बलिदान
और झाँसी के प्रति अपने असीमित प्रेम का उदाहरण अपने कार्यों से प्रस्तुत
करें !झाँसी में जो रिश्वतखोरी है उसके बिरुद्ध कानून का प्रयोग करें !जो
खनिज पदार्थों बालू गिट्टी मिटटी आदि का अवैध कारोबार चल रहा है उसकी तरफ
शासन प्रशाशन का ध्यान आकर्षित करें ब्रकछारोपण करें !सरकारी स्कूलों में
अध्यापक पढ़ाने नहीं जाते हैं इसके लिए अभिभावकों को जागरूक करें और ऐसे
अध्यापकों की शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचाएं ! जो सड़कें बनती है बे बनते
ही टूट जाती हैं !ऐसे सभी रचनात्मक कार्य जिस से महारानी की स्मृति अमर हो
जाए और जब अगली जयंती आये तो झाँसी महारानी के त्याग और बलिदान की जीवित
यादगार बन जाय !और श्रद्धांजलि सभाएं और दीपदान आदि कार्यक्रम यथार्थ रूप
से जन्म दिन पर वास्तविक उत्साह पैदा करने वाले बन जाएँ !
Thursday, 16 June 2016
देश
के विकास में सबसे बड़ी बाधा है स्वार्थ बुद्धि!आजकल इसका विशेष प्रभाव
राजनीति में और धर्म में विशेष रूप में दिखाई दे रहा है !राजनीति की तरह
धर्म भी स्वार्थों की निकृष्ट पूर्ति का अखाड़ा बन गया है !धर्म मनुष्य की
बुद्धि को शुद्ध करने के बजाय अशुद्ध कर रहा है !धर्म की परिपक्वता
अध्यात्म में होती है !किन्तु देश में धर्म सिर्फ बाह्य कर्मकांडों
प्रवचनों और प्रत्येक धर्म अपनी श्रेष्ठता दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताने
में लगा हुआ है !इसिलए धर्म का मूल अध्यात्म निष्ठ स्वरुप स्वार्थ के
घने अन्धकार में लुप्त हो गया है !आचार्य विनोबा ने धर्म को अध्यात्म
निष्ठ बनाने के लिए आध्यात्मिक पंच निष्ठा प्रस्तुत की है ! (!)निरपेक्छ
नैतििक मूल्यों में श्रद्धा ---सम्पूर्ण जीवन के लिए शाश्वत मूल्यों को
आचरण में उतारने के लिए प्रयत्न करना सत्य प्रेम करुणा आदि का तिरस्कार
मानव विकास और मानव धर्म की पाप्ति में सबसे बड़ी बाधा है ! इसिलए मानव धर्म
मानव विकास और स्वार्थ बुद्धि के विनाश के लिए इन नैतिक मूल्यों पर
आधारित जीवन जीने की आवश्यकता है !(२}प्राणिमात्र की एकता और पवित्रता
---जीवन के लिए जंतुओं पशुओं आदि का संघार किया जाता है ! प्रत्यक्छ आचरण
में उंच नीच श्रेष्ठ कनिष्ठ धनबान गरीब का भेद होता है इसीलिए हमारे जीवन
में इसके स्थान पर आचरण में यह आना चाहिए की प्राणी मात्र एक है और पवित्र
है ! लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारे शरीर भिन्न भिन्न है किन्तु सभी
शरीरों में आत्मा एक ही है !हम सभी परमात्मा के अंश है ! इसीलिए कर्त्तव्य
छेत्र में भले ही कार्य व्योहार के कारण प्राणिमात्र में एकता का दर्शन ना
हो किन्तु मूल रूप में तो हमारा सम्बन्ध आत्म दृष्टि से समानता का होना
चाहिए (३)--- मृत्यु के बाद भी जीवन की अखंडता ----मृत्यु के बाद भी जीवन
है इस से कर्म करने में पवित्रता रहेगी !सभी धर्म किसी न किसी रूप में इसको
स्वीकार करते हैं !कि मृत्यु के बाद भी जीवन किसी ना किसी रूप में रहता है
!(३)साक्छात अनुभव ---कुछ लोग जन्म से ही संसारिक भोगों आदि से बिरक्त
जन्म लेते हैं !बुद्ध महावीर चैतन्य महाप्रभु शंकराचार्य आदि संतो और
महापुरुषों के साक्छात अनुभव से यह बातसमझ में आती है कि !इन महापुरुषों के
जीवन में जन्म से ही जिस त्याग वैराग्य का दर्शन हुआ हुआ है !उस से इस बात
का अनुभव होता है !की मृत्यु के साथ जीवन का अंत नहीं हुआ !(४)कर्म
विकापम---- कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है !(५)विश्व में व्यबस्था है
---सूर्य समय से निकलता है आदि यह संपूर्ण व्यबस्था ठीक से चल रही है इस से
अनुभव आता है की कोई रचनाकार या व्यबश्थापक है जिस से श्रष्टि संचालित हो
रही है !इस आध्यात्मिक पंच निष्ठा को आचरण में उतारने से स्वार्थ बुद्धि के
स्थान पर आत्मनिष्ठ बुद्धि का निर्माण हो सकता है !और आम जन को धर्मांध
स्वार्थ पोषक धर्म के नाम अधर्म और हिंसा का विस्तार करने वाले लोगों से
मुक्ति मिल सकती है !और धर्म का लोकनिष्ठ पका हुआ अध्यात्म निष्ठ मानव
धर्म प्राप्त हो सकता है
किसी दूसरे की वस्तु की लेने की इक्छा ना करना ,सदा गम्भीरता और धीरता रखना ,भय को त्याग देना ,तथा मनो रोगों को शांत कर देना यह मन और इंद्रियों के संयम (दम )का लक्छण है ! इसकी प्राप्ति ज्ञान से होती है !देहाभिमानियों और अहंकार ग्रस्त चित्त वालों को इसकी प्राप्ति होना कठिन है !
२---दान और धर्म करते समय मन और वाणी पर संयम रखना ,अर्थात इस विषय में दूसरों से ईर्ष्या ना करना इसे विद्वान लोग मत्सरता का अभाव कहते हैं ! सदा सत्य का सेवन करने और निष्काम भाव से लोकहित के कार्य करने से ही मनुष्य मत्सरता (ईर्ष्या )से रहित हो सकता है !
२---दान और धर्म करते समय मन और वाणी पर संयम रखना ,अर्थात इस विषय में दूसरों से ईर्ष्या ना करना इसे विद्वान लोग मत्सरता का अभाव कहते हैं ! सदा सत्य का सेवन करने और निष्काम भाव से लोकहित के कार्य करने से ही मनुष्य मत्सरता (ईर्ष्या )से रहित हो सकता है !
Wednesday, 15 June 2016
बिना जाने समझे और बिना पढ़े महापुरुषों की निंदा करना ऐसा ही है जैसे बिना तैरना जाने गहरे जल में प्रवेश करना !तैरना ना जानने वाला अपने जीवन को खतरे में डालता है !किन्तु बिना जाने महापुरुषों की अपने अज्ञान और अल्पज्ञान के कारण निंदा करने वाला थोड़ी बहुत मात्रा में सामाजिक जीवन में बिघ्न उत्पन्न करने में सफल हो सकते h हैं !किन्तु यह कुहरा भी सूर्य के प्रकाश से छट जाता है !बहुत से अज्ञानी और ना समझ लोग जो अहिंसा की शक्ति से अपरिचित हैं !और जिन्हे अहिंसा की शस्त्र शक्ति से भी अधिक शक्ति का बोध नहीं है ! बे अहिंसा का अर्थ बुजदिली और कायरता करते हैं !भारत के ऋषियों के आश्रमों के आस पास हिंसक सिंह भी अहिंसक भाव को प्राप्त हो जाता था !और आस पास विचरण करने वाले पशुओं का शिकार नहीं करता था !सारे ऋषि मुनि ,और सत्ता त्यागकर बनवासी जीवन सन्यासी के रूप में रहने वाले सम्राट भी हिंसक जानवरों और जहरीले सर्पों के बीच में इसी अहिंसक शक्ति के बल पर निर्बिघ्न होकर जंगल में आध्यात्मिक साधना करते थे !राजा विश्वा मित्र का महर्षि वशिष्ठ के आश्रम से नंदिनी गाय के अपहरण का शस्त्र और सेना के बल से लेजाने के प्रयत्न की विफलता और महर्षि वसिष्ठ के अहिंसक शक्ति का आख्यान सर्व विदित है !इस प्रकार के सहस्त्रों आख्यान अहिंसक शक्ति की श्रेष्ठता के भारतीय धर्म ग्रंथों में विदयमान है !गांधीजी ने इसी अहिंसक शक्ति का प्रयोग भारत की आजादी के लिए किया था ! अहिंसक व्यक्ति सच्चे शूरमा की तरह अपने शरीर को ध्येय के लिए बलिदान कर देता है !गांधीजी की अहिंसक शक्ति का ही प्रभाव था ! जिसके कारण हिंसक आंदोलनों में शक्रिय क्रांतिकारी भी अपनी हिंसक जीवन पद्धति को त्याग कर अहिंसक हो गए थे !इस प्रकार के अनेक उदाहरण भारत के स्वतंत्रता संग्राम पढ़ने से मिल जाएंगे !एक प्रमुख उदाहरण सावरकर का है जिन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को लिखकर दिया था कि उन्होंने हिंसक गतिविधियों का त्याग कर दिया है !और अब बे मानते हैं कि ब्रिटिश शाशन ही भारत के लिए अच्छा है !इसके बाद भी हुकूमत ने उनको जेल से रिहा नहीं किया था !तब गांधीजी के सहयोग से ही उनकी रिहाई हुई थी !गांधीजी कायरता को सबसे बड़ा पाप मानते थे !और कायरता के स्थान पर बे किसी भी हिंसक कार्यबाही को उचित मानते थे !आजादी की लड़ाई का सारा भार गांधीजी के कन्धों पर था !१९४७ में सत्ता के हस्तांतरण के समय देश में सिर्फ मुसलिम लीग ,कांग्रेस और ब्रिटिश हुकूमत ही थी ! कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाले हो सकता है भारत को कोंग्रेसियों से मुक्त कराने में कुछ समय के लिए सफल हो जाएँ ! किन्तु बे कभी भी कांग्रेस की नीतियों से भारत को मुक्त कराने में सफल नहीं हो सकते हैं !
१--मान और मौन सदा एक साथ नहीं रहते !क्योँकि मान से संसार में सुख मिलता है और मौन से आतंरिक आत्मानन्द की प्राप्ति होती है !जो मान से कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है !इस तथ्य को ग्यानी जन जानते ,और समझते हैं ! इसीलिए बे मान प्राप्ति के लिए ना लालायित होते हैं और न भटकते हैं !
२---कोई काम देखने में छोटा होने पर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान ही है ! ना करने की अपेक्छा कुछ उत्तम कर्म करना ही श्रेष्ठ है ! क्योँकि कर्तव्य कर्म ना करने वाले से बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है !
२---कोई काम देखने में छोटा होने पर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान ही है ! ना करने की अपेक्छा कुछ उत्तम कर्म करना ही श्रेष्ठ है ! क्योँकि कर्तव्य कर्म ना करने वाले से बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है !
Tuesday, 14 June 2016
भगोड़े हिन्दू ------पाकिस्तान और बंगला देश से हिन्दू भागते हैं !कश्मीर से भागकर भारत में ही शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं !अब समाचार आरहे हैं की कैराना और कांधला से भी हिन्दू भाग रहे हैं !संसार में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ भारत से भागे हुए हिन्दुओं को पनाह मिलेगी ! हिन्दुओं को इसीलिए यह भागने की बृत्ति त्यागकर मुकाबला करने की शक्ति अर्जित करनी चाहिए !जहाँ एक ओर समाचार पत्रों में हिन्दू मंदिरों के तोड़ने और हिन्दुओं की हत्या ,उनकी संपत्ति की लूट पाट और उनके भागने के समाचार प्रकाशित होते रहते हैं !वहीं दूसरी और इस्लामिक संगठन के इंग्लैंड ,फ्रांस ,अग्गनिस्तान ,इराक ,सीरिया अमेरिका ,भारत अदि में आतंकवादी हमलों के समाचार भी प्रकाशित होते रहते हैं !अभी हाल में ही मुसलिम आतंकवादी ने अमेरिका में एक क्लब पर हमला कर ५० लोगों को मार् दिया और ५३ लोगों को घायल कर दिया !अभी कुछ दिन पहले चेन्नई के इस्लामिक संगठन में शामिल मुसलिम युवक ने यह वक्तव्य प्रकाशित कियाथा की शिन्दुओ या तो इस्लाम स्वीकार करलो या मरने के लिए तैयार हो जावो !एक और इस्लामिक संगठन अदि ऐसे संगठनों में ताकत का यह जज्बा दिखाई देता है !और दूसरी और हिन्दू है जो घर द्वार छोड़ कर भागते दिखाई देते हैं !नागरिकों की सुरक्छा करने की जिम्मेदारी सरकार की भी है और नागरिकों की भी है !इसीलिए हिन्दुओं को भी अपनी सुरक्छा खुद करनी चाहिए !इस तरह भागने से काम नहीं चलेगा !
गांधी कथा ------साउथ अफ्रीका में हिन्दुस्तानियों पर अत्याचार ------साउथ अफ्रीका की फ्री स्टेट में हिन्दुस्तानियों की लगभग १० या १५ दुकानें ही थी फिर भी गोरों ने हिन्दुस्तानियों के विरुद्ध जबरदस्त आंदोलन छेड़ दिया !वहां की धारा सभा ने हिन्दुस्तानियों की जड़ ही काट दी !उसने कड़ा कानून पास किया और हिन्दुस्तानियों को नाम मात्र का मुआब्जा देकर प्रत्येक हिन्दुस्तानी व्यापारी को स्टेट से निकाल दिया !कानून के अनुसार कोई हिन्दुस्तानी व्यापारी जमीन के मालिक या किसान के नाते फ्री स्टेट में बस ही नहीं सकता था !और मतदाता तो वह कभी हो ही नहीं सकता था !ख़ास इजाजत लेकर महदूर या होटल के बेयरे के रूप में ही कोई हिन्दुस्तानी वहां बस सकता था !ऐसी इजाजत भी प्रत्येक मजदूर या बेयरे को प्राप्त नहीं होती थी !केप कॉलोनी में भी अखबारों में हिन्दुस्तानियों के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था !हिन्दुस्तानी बालकों को स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जाता था !हिन्दुस्तानियों को होटल में ठहरने को जगह नहीं दी जाती थी ! साउथ अफ्रीका के जो द्वार पहले हिन्दुस्तानियों के लिए खुले थे वह अब बिलकुल बंद हो गए थे !
सूर्य की उपासना अग्नि की उपासना और चन्द्रमा की उपासना अनादिकाल से भारत
भमि में की जाती रही है!एक समय था जब संपूर्ण विश्व का एक ही धर्म सनातन
धर्म था !सनातन धर्म की बुनियाद सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य अपरिग्रह और अस्तेय
है !इन्ही ५ धर्म के आधारों पर ही प्राणिमात्र की रक्षा सुरक्षा और सभी
प्रकार की लौकिक और पारलौकिक व्यबस्थाएं की जाती रही हैं !और इन्ही के
क्रियान्वन के लिए विश्व में भिन्न भिन्न धर्म जन्म लेते रहे हैं !श्रष्टि
का निर्माण करने वाली ईश्वरीय शक्ति की या
ईश्वर की उपासना भिन्न भिन्न धर्म बाले अनेक प्रकार से करते हैं !जो लोग
ईश्वर को नहीं मानते है बे सिर्फ प्रकृति को ही श्रष्टि का कर्ता धर्ता
मानते हैं !कुछ धर्म ईश्वर को निराकार कुछ साकार और निर्गुण निराकार और कुछ
सगुण साकार मानते हैं !वैदिक धर्म जिसका मूल सनातन धर्म है !ईश्वर की
उपासना सभी रूपों में करता है !उसमे प्रकृति की उपासना भी ईश्वर की एक
शक्ति के रूप में होती है !इसीलिए सूर्य आदि की उपासना परमात्मा के प्रकाश
को प्रकाशित यंत्र के रूप में की जाती है !आँखों से दिखने वाले गोल चक्र की
नहीं !भगवान श्री कृष्ण ने गीता १५(१२)कहा है सूर्य में प्रकाशित जो तेज
सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चद्रमा में है ! तथा जो तेज
अग्नि में है !उस तेज को तू ईश्वर का ही जान !मनुष्य प्रभाव और महत्त्व से
प्रभावित हो जाता है ! अतः मनुष्य पर प्राकृत पदार्थों के प्रभाव और
महत्त्व को हटाने के लिए ही यह रहस्य प्रगट किया गया है ! कि सूर्य की
उपासना नमस्कार बंदगी आदि सूर्य के प्रकृति निर्मित गोले की नहीं बल्कि
उसके अंदर प्रकाशित परमात्मा के तेज की है !सूर्य की उपासना के लिए अनेक
मंत्र और विधियां हैं !पांडव जब साधन हीन अवस्था में बनबास में थे तब सूर्य
की उपासना से ही उनको ऐसी बटलोई प्राप्त हुई थी ! जिसमे बने भोजन के
पदार्थ हजारों आदमियों के भोजन करने के बाद भी समाप्त नहीं होते थे !सूर्य
उपासना का श्रेष्ठ मन्त्र गायत्री मन्त्र है जिसकी विधि सहित उपासना भगवान
राम कृष्णा आदि भी करते थे !ऋषि विश्वामित्र वशिष्ठ आदि भी गायत्री मन्त्र
की उपासना से ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे !आधुनिक काल में भी महर्षि
दयानंद आचार्य श्रीराम शर्मा आदि ने गायत्री उपासना से ही परम सिद्धि
प्राप्त की और जनसामान्य में इस साधना को पहुचाने का भी प्रयत्न किया
!गांधीजी विनोबा मालवीय टैगोर अरविंदो आदि और लाखों मनुष्यों ने गायत्री
साधना से सुख संपत्ति वैभव विद्द्या बुद्धि ज्ञान आदि कीप्राप्ति की और
संसार में अनेक लोकहित के कार्य किये ! और आज भी संसार में सूर्य की तरह
प्रकाशित हो रहे हैं !वैदिक धर्म परमात्मा की शक्ति को सीमित नहीं करता है !
बल्कि सभी प्राकृतिक पदार्थों में एक परमात्मा की शक्ति का ही दर्शन कर
पेड़ों पौधों समस्त जीव धरियोँ में नित्य परमात्मा के प्रकाश का अनुभव करता
है !इसीलिए ईश्वर की उपासना पूजा अर्चा के रूप में ईश्वर की असीम विलक्छण
शक्ति का अवाधित दर्शन वैदिक धर्म में ही होता है !धार्मिक उदारता जैसी
वैदिक धर्म में है वैसी उदारता का दर्शन अन्य धर्मो की उपासना पद्धति में
दिखाई नहीं देता है !
Monday, 13 June 2016
गांधी कथा ---साउथ अफ्रीका में हिन्दुस्तानियों की मुसीबत (२)-----नेटाल की तरह साउथ अफ्रीका के दूसरे उपनिबेशों में भी हिन्दुस्तानियों के प्रति गोरों की नापसंदगी बढ़ने लगी थी !ट्रांसवाल में हिन्दुस्तानी व्यापारियों का कारोबार बहुत अच्छी तरह चल रहा था !इस कारण गोरे व्यापारियों को उनसे ईर्ष्या होने लगी !समाचार पत्रों में हिन्दुस्तानियों के खिलाफ लेख ,पत्र अदि लिखे जाने लगे !और धारा सभा में यह मांग के गयी कि हिन्दुस्तानियों को ट्रांसवाल से बाहर निकाल दिया जाय और उनका व्यापर बंद कर दिया जाय 1 धारा सभा में जो अर्जियां दी गयी थी उनमें हिन्दुस्तानियों पर मनगढंत झूठे आरोप लगाए जाते थे !उनमें लिखा जाता था----- हिन्दुस्तानी व्यापारी मानवीय सभ्यता को नहीं जानते हैं ! बे बदचलनी से होने वाले रोगों से सड़ रहे हैं ! हर औरत को बे अपना शिकार समझते हैं !उनका विश्वास है की औरतों में आत्मा होती ही नहीं है !गोरों के अखबारों के प्रचार और अर्जियों द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों का असर धारा सभा पर पड़ा और धारा सभा में एक बिल पेश हुआ ! और १८८५ में एक बहुत कड़ा कानून पास हुआ ! इस कानून के अनुसार जो हिन्दुस्तानी ट्रांसवाल में व्यापार करने के लिए आकर बसे उसके लिए २५ पोंड देकर अपना नाम दर्ज कराना आवश्यक था !हिन्दुस्तानी ट्रांसवाल में जमीन नहीं खरीद सकता था !और वह मतदाता भी नहीं बन सकता था ! ब्रिटिश सरकार ने १८८६ में इसमें आंशिक सुधार कर २५ पोंड प्रवेश कर को समाप्तकर ३ पोंड कर दिया ,और जमीन बिलकुल न खरीद सकने की जो कड़ी शर्त थी उसे रद्द करके यह शर्त रखी गयी कि हिन्दुस्तानी लोग ऐसे ही लोकेशन या बाढ़े में जमीन खरीद सकते हैं जिसको ट्रांसवाल सरकार उनके लिए पहले से निर्धारित कर दे !किन्तु ऐसे बाड़ों में भी पूर्ण स्वमित्तव की जमीनें खरीदने के अधिकार सरकार ने हिन्दुस्तानियों को नहीं दिए !ये बाढ़े शहर से बहुत दूर और गन्दी जगहों में सरकार द्वारा निर्धारित किये गए थे जहाँ पानी ,रोशनी और पाखानों की सुविधा नहीं थी !ट्रांसवाल के गोरे हिन्दुस्तानियों को अछूत मानते थे और हिन्दुस्तानियों के स्पर्श से या उनके पड़ोस में रहने से अपवित्र हो जाएंगे इसीलिए बे हिन्दुस्तानियों को न तो छूते थे ! और ना ही उनको पड़ोस में बसने देते थे
Sunday, 12 June 2016
गांधी कथा ------हिनुस्तानियों पर अत्याचार (१) ------ साउथ अप्रीका के नेटाल,सहित दूसरे उपनिवेशों में भी हिन्दुस्तानियों के प्रति गोरों द्वारा लगातार अत्याचार किये जा रहे थे ! गोरे अंग्रेजों को सिर्फ गुलामों की जरुरत थी इसीलिए बे हिन्दुस्तानियों को गुलामों की तरह ही रखना चाहते थे और उनके साथ गुलामों की तरह ही व्योहार करते थे! इसिलए जो गिरमिटिया मजदूर गिरमिट की अवधि पूरी करके स्वतंत्र हो गए थे बे गोर अंग्रेजों को बर्दास्त नहीं होते थे ! इसीलिए बे हिन्दुस्तानियों के खेती या साग सब्जी या छोटा मोटा व्यापार करने या जमीन खरीदने का विरोध करते थे !गोरों के एक वर्ग ने यह मांग की थी ! ,कि गिरमिट से मुक्त होने वाले मजदूरों को वापिस हिन्दुस्तान भेज दिया जाय !दूसरे बर्ग के गोरों का कहना था कि गिरमिट से मुक्त होने वाले मजदूर अगर फिर से गिरमिट में दाखिल होना चाहें तो उनसे भारी प्रवेश कर लिया जाय ! इन दोनों बर्गों का एक ही उद्देश्य था कि किसी भी युकति से गिरमिट से मुक्त हिन्दुस्तानी मजदूरों को साउथ अफ्रीका में स्वतंत्रता से रहना सर्वथा असम्भव कर दिया जाय ! नेटाल की गोरी सरकार गोरों की हिमायती थी !इसिलए उसने भारत सरकार से यह मांग की कि प्रत्येक गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानी से २५ पोंड अर्थात ३७५ रुपया का वार्षिक कर लगाया जाय !कोई भी हिन्दुस्तानी मजदूर इतना भारी कर भर नहीं सकता था इसीलिए वह स्वतंत्र होकर नेटाल में रह नहीं सकता था !भारत सरकार ने ३ पोंड का वार्षिक कर स्वीकार किया गिरमिटिया मजदूर की कमाई के हिसाब से यह तीन पोंड का कर उसकी ६ महीने की कमाई के बराबर होता था यह कर मजदूर पर ही नहीं लगाया गया था उसकी पत्नी और १३ साल या उससे अधिक उम्र की लड़की और १६ साल या उस से अधिक लडके पर भी लगाया गया था ! इस तरह हरेक मजदूर को १२ पोंड का वार्षिक कर भरना था !जो व्योहार गिरमिटिया मजदूरों के साथ किया गया वही स्वतंत्र हिंदुातानियों के साथ भी किया गया था !नेटाल के गोरे व्यापारियों ने हिंदुस्तानी व्यापारियों के खिलाफ आंदोलन शुरू करदीया ! हिन्दुस्तानी व्योपारी नेटाल में अच्छी तरह जम गए थे उन्होंने शहर के अच्छे हिस्सों में में जमीनें खरीद ली थी हिन्दुस्तानी व्योपारी अच्छा मुनाफा कमा रहे थे ! उस समय नेटाल की आबादी का अनुपात लगभग इस प्रकारथा--- 4लाख हब्शी ,४० हजार गोरे,६० हजार गिरमिटिया मजदूर ,१० हजार गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानी और १० हजार स्वतंत्र हिन्दुस्तानी !गोरों ने नेटाल की धारा सभा में कानून पास करा कर हिन्दुस्तानियों के व्यापार पर कड़ा अंकुश लगा दिया ! और दूसरे कानून से हिन्दुस्तानियो के नेटाल में प्रवेश के कानून को और अधिक कड़ा कर दिया गया !इसके अलावा नेटाल में गिरमिटिया हिन्दुस्तानियों तथा स्वतंत्र हिन्दुस्तानियों पर दूसरे भेी कानूनी और अवैधानिक प्रतिबन्ध लगे हुए थे !
१---विषय भोगों की आसक्ति का जो त्याग है ,वही वास्तविक त्याग है !राग द्वेष से रहित होने पर ही त्याग की सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं !
२----जो मनुष्य अपने को प्रगट ना करके प्रयत्न पूर्वक प्राणियों की भलाई का काम करता रहता है ,उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरण कानाम ही आर्यता है ! यह आसक्ति के त्याग से प्राप्त होती है !
२----जो मनुष्य अपने को प्रगट ना करके प्रयत्न पूर्वक प्राणियों की भलाई का काम करता रहता है ,उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरण कानाम ही आर्यता है ! यह आसक्ति के त्याग से प्राप्त होती है !
Saturday, 11 June 2016
गांधी कथा ---साउथ अफ्रीका में हिन्दुस्तानियों का आगमन ----अंग्रेजों को नेटाल में बड़े पैमाने पर गन्ना ,चाय ,और काफी का उत्पादन करने के लिए मजदूरों की जरुरत थी ! इसीलिए उन्होंने भारत की ब्रिटिश सरकार के साथ पत्र व्योहार किया और मजदूरों की पूर्ति के लिए सहायता मांगी भारत सरकार ने नेटाल की मांग स्वीकार की और इसके परिणाम स्वरुप हिंदुस्तानी मजदूरों का पहला जहाज १६ नवम्बर १८६० को नेटाल पहुंचा ! ये हिन्दुस्तानी मजदूर नेटाल में एग्रीमेंट पर गए हुए मजदूरों के नाम से पहचाने जाते थे इस पर से ये मजदूर अपने आपको गिरमिटिया कहने लगे ! और इसी नाम से पुकारे जाने लगे ! जब नेटाल में गिरमिटियों के जाने के समाचार मौरीसस में फैले तो भारत के व्योपारी नेटाल जाने को ललचाये ! मौरीसस भारत और नेटाल के बीच में पड़ता है ! मौरीसस द्वीप में हजारों हिन्दुस्तानी व्योपारी और मजदूर रहते हैं उनमें से एक व्योपारी अबूबकर आमद ने अपना व्यापार खोलने का विचार किया अबूबकर ने नेटाल में व्यापार शुरू किया जमीनें खरीदी उनकी बहुत बड़ी कमाई की ख़बरें हिंदुस्तान में उनके वतन पोरबंदर तथा उसके आस पास के छेत्रों में फैली ! परिणाम स्वरुप दूसरे मुसलमान भी नेटाल पहुंचे ! इन व्यापारियों को मुनीमों की जरुरत थी इसीलिए गुजरात और कठिया बाड़ से हिन्दू मुनीम भी नेटाल पहुंचे !इस प्रकार से नेटाल में दो बर्ग के हिन्दुस्तानी हो गए ---- १-- स्वतंत्र व्योपारी और उनका स्वतंत्र नौकर बर्ग २--गिरमिटिया हिन्दुस्तानी ! गिरमिटिया मजदूर ५ साल के एग्रीमेंट पर नेटाल जाते थे ! पांच साल बीत जाने के बादवहां मजदूरी करने को बे बंधे नहीं थे ! एग्रीमेंट पूरा होने के बाद स्वतंत्र मजदूरी या व्यापार करना हो तो बेसा करने का और नेटाल में स्थायी रूप सेबसना हो तो वहां बसने का अधिकार उनको था 1 कुछ लोगों ने इस अधिकार का उपयोग किया और कुछ लोग हिन्दुस्तान लौट गए ! जो हिन्दुस्तानी नेटाल में रह गए बे फ्री इंडियन के नाम से पुकारे जाने लगे, किन्तु इन गिरमिट से मुक्त हिन्दुस्तानियों और स्वतंत्र हिन्दुस्तानियों में बहुत बढ़ा फर्क था ! गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानियों को एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए परवाना लेना पड़ता था, इन गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानियो पर और भी बहुत से कड़े कानून लागू थे ! नेटाल में उस समय पूर्ण स्वतंत्र हिन्दुस्तानियों की संख्या ४० से ५० हजार के बीच और गिरमिट मुक्त हिन्दुस्तानियों तथा उनकी संतानो की संख्या लगभग एक लाख थी !
१ जो दुष्कर्म परायण और अशुद्ध अंतःकरण वाले हैं, बे अज्ञानी पुरुष अन्याय पूर्वक मनोवांछित विषय भोगों में विचरने वाली इंद्रियों द्वारा आत्मा ,परमात्मा का दर्शन नहीं कर सकते !
२---परन्तु जब मनुष्य अपने मन के द्वारा इंद्रिय रूपी घोड़ों की बागडोर को सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबू में कर लेता है ,तब उसे ज्ञान के प्रकाश में आत्मा का दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपक के प्रकाश में किसी भी वस्तु की आकृति स्पष्ट दिखाई देती है !
३-----जैसे अन्धकार दूर हो जाने पर सभी प्राणियों के सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चित रूप से समझ लो कि अज्ञान का नाश होने पर ही ज्ञान स्वरुप आत्मा का साक्छात्कार होता है !
४----जैसे जलचर पकछी जल में विचरता हुआ भी जल से लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसार में रहकर भी संसार के गुण दोषों से लिप्त नहीं होता है !
२---परन्तु जब मनुष्य अपने मन के द्वारा इंद्रिय रूपी घोड़ों की बागडोर को सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबू में कर लेता है ,तब उसे ज्ञान के प्रकाश में आत्मा का दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपक के प्रकाश में किसी भी वस्तु की आकृति स्पष्ट दिखाई देती है !
३-----जैसे अन्धकार दूर हो जाने पर सभी प्राणियों के सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चित रूप से समझ लो कि अज्ञान का नाश होने पर ही ज्ञान स्वरुप आत्मा का साक्छात्कार होता है !
४----जैसे जलचर पकछी जल में विचरता हुआ भी जल से लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसार में रहकर भी संसार के गुण दोषों से लिप्त नहीं होता है !
Friday, 10 June 2016
गांधी कथा ---- को जाने कल की? -------जिस मुकदद्मे को लड़ने के लिए गांधीजी साउथ अफ्रीका गए थे वह ख़त्म हो गया था इसिलए अब उन्होंने स्वदेश लौटने की तैयारी शुरू की ! उनके मुबबकिल अब्दुल्ला सेठ ने गांधीजी के सम्मान में सिडन्हम में सामुदायिक भोज का आयोजन किया ! गांधी जी ने पूरा दिन वहीं बिताया !जब गांधीजी अखबार पढ़ रहे थे तो उनकी नजर एक समाचार पर पड़ी जिसका शीर्षक था इंडियन फ्रेंचाइज यानी हिन्दुस्तानी मताधिकार ---- इस समाचार का आशय यह था कि हिन्दुस्तानियों को नेटाल की धारा सभा के लिए सदस्य चुनने का अधिकार समाप्त कर दिया जाय ! भोज में सम्मिलित किसी को भी हिन्दुस्तानियों के मताधिकार को समाप्त करने वाले इस बिल के बारे में कुछ भी पता नहीं था ! गांधीजी ने जब इस बिल के बारे में लोगों से पूंछा तो उन्होंने कहा हम व्योपारी लोग हैं हमलोग तो सिर्फ अखबार में व्यापार सम्बन्धी समाचार ही पढ़ते हैं ! हम लोग अंग्रेजी पढ़ना भी नहीं जानते हैं ! गांधीजी ने कहा की जो लोग यहीं पैदा हुए हैं और अंग्रेजी पढ़े हुए हैं बे हिन्दुस्तानी युवक यहाँ क्या करते हैं ?अब्दुल्ला सेठ ने कहा बे हमारे पास नहीं फटकते हैं बे ईसाई हैं इसीलिए पादरियों के प्रभाव में हैं और पादरी सभी गोरे हैं जो सरकार के अधीन हैं ! गांधीजी की ऑंखें खुल गयी ! भारतीय समाज को अपना कर इनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए ! ये ईसाई हैं इससे क्या बे हिन्दुस्तानी नहीं रहे ? और परदेसी बन गए हैं ?भोज में मौजूद सभी लोग इस बात चीत को सुन रहे थे ! उन लोगों ने गांधीजी से कहा की अगर आप एकाध महीना और रुक जाएँ तो आप जिस तरह कहेंगे हम लड़ेंगे आपकी जो फीस होगी वह हम लोग आपको देंगे ! गांधीजी को यह सुनकर दुःख हुआ उन्होंने कहा सार्वजानिक सेवा की कोई फीस नहीं होती है ! में सिर्फ एक सेवक के रूप में ठहर सकता हूँ आपको मुझे फीस के रूप में कुछ भी नहीं देना होगा ! आपको सिर्फ जो खर्चा इस काम में आएगा उसकी व्यबस्था करनी होगी 1 सभी लोगों ने कहा हमलोग खर्चे की व्यबस्था करेंगे आप सिर्फ रहना स्वीकार कर लें ! गांधीजी ने अपनी लड़ाई की रूप रेखा तैयार कर ली ! इस प्रकार ईश्वर ने साउथ अफ्रीका में गांधीजी के स्थायी निवास की नींव डाली और हिन्दुस्तानियो के स्वाभिमान के संघर्ष का बीजा रोपण किया
१--- जो ज्ञानी ,योग युक्त ,तथा मन और इंद्रियों को वश में रखने वाले हैं ! ,उन पर आसक्ति का प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता है जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता है !
२----- विवेकिजन आसक्ति को आत्मा का अच्छेद बंधन मानते हैं ! जब तक आसक्ति व्यक्तियों की स्तुति और गुणगान में रहती है तब तक ऐसे मनुष्य राग द्वेष के भंवर जाल में फंस कर अपनी मानसिक शांति और समाज में अपनी सामर्थ्य भर विद्वेष फैलते रहते हैं !किन्तु जब यही आसक्ति संतों के प्रति हो जाती है तो मोकछ का खुल द्वार बन जाती है ! संतों के समाज में सदा पवित्र हरि चर्चा और श्री हरि के गुणों का गान होता रहता है जिससे विषय भोग और मनुष्यो की निंदा और स्तुति बार्ता पास नहीं आने पाती है !मनुष्य की बुद्धि भोग परायण ना रहकर योग परायण हो जाती है और उसकी आँखों से स्वार्थ बृत्ति का चश्माउतर जाता है और परमार्थ दृष्टि विकसित होने लगाती है !
३----- विषय भोगों के प्राप्त ना होने पर जो त्याग करता है वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है वस्त्तुतः वही त्यागी है !,वही वैराग्य को प्राप्त होता है ! उसके मन में किसी के प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर तथा वन्धन मुक्त होता है! !
२----- विवेकिजन आसक्ति को आत्मा का अच्छेद बंधन मानते हैं ! जब तक आसक्ति व्यक्तियों की स्तुति और गुणगान में रहती है तब तक ऐसे मनुष्य राग द्वेष के भंवर जाल में फंस कर अपनी मानसिक शांति और समाज में अपनी सामर्थ्य भर विद्वेष फैलते रहते हैं !किन्तु जब यही आसक्ति संतों के प्रति हो जाती है तो मोकछ का खुल द्वार बन जाती है ! संतों के समाज में सदा पवित्र हरि चर्चा और श्री हरि के गुणों का गान होता रहता है जिससे विषय भोग और मनुष्यो की निंदा और स्तुति बार्ता पास नहीं आने पाती है !मनुष्य की बुद्धि भोग परायण ना रहकर योग परायण हो जाती है और उसकी आँखों से स्वार्थ बृत्ति का चश्माउतर जाता है और परमार्थ दृष्टि विकसित होने लगाती है !
३----- विषय भोगों के प्राप्त ना होने पर जो त्याग करता है वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है वस्त्तुतः वही त्यागी है !,वही वैराग्य को प्राप्त होता है ! उसके मन में किसी के प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर तथा वन्धन मुक्त होता है! !
Thursday, 9 June 2016
गांधी कथा ------ कुलीपन का अनुभव-----दक्छिन अफ्रीका के ऑरेंज फ्री स्टेट में कानून बनाकर भारतीयों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे ! वहां हिन्दुस्तानियों को सिर्फ होटलों में बेयरों या इसी प्रकार की कोई दूसरी मजदूरी करने का ही अधिकार था 1 जो भारतीय व्योपारी थे उन्हें नाम मात्र का मुआबजा देकर निकाल दिया गया था !ट्रांसवाल में भी १८८५ में एक कड़ा कानून बना था !१८८६ में उसमें कुछ सुधार हुआ उसके फलस्वरूप यह तै हुआ की प्रत्येक भारतीय को प्रवेश फीस के रूप में तीन पोंड जमा कराने के बाद ही उनके लिए छोड़ी गयी जमीन के बे मालिक हो सकते थे ! पर यह अधिकार सिर्फ कानून के रूप में ही रहा मौके पर भारतीयों को कभी भी जमीन का अधिकार नहीं प्राप्त हुआ !भारतीयों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था ! इसके अलावा जो कानून काळा रंग के लोगों के लिए लागू होते थे बे भी भारतीयों पर लागू होते थे ! इन कानूनों के अनुसार भारतीय लोग फुट पाथ पर नहीं चल सकते थे ! रात के ९ बजे के बाद परवाने के बिना बाहर नहीं निकल सकते थे ! गांधीजी प्रेसीडेन्ट स्ट्रीट के रास्ते एक खुले मैदान में रोज घूमने जाते थे इसी स्ट्रीट में साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति क्रूगर का घर था वह घर सब तरह के आडम्बरों से रहित था ! आस पास के दूसरे घरोंऔर राष्ट्रपति के घर में कोई फर्क नहीं मालूम पड़ता था ! घर के बाहर पहरा देने वाले संतरी को देख कर ही यह पता चलता था की यह किसी अधिकारी का घर है 1 गांधी जी हमेशा ही संतरी के पास से निकलते थे किन्तु संतरी कभी उनसे कुछ नहीं कहता था !संतरी समय समय पर बदल जाते थे ! एक बार जब गांधीजी फुट पाथ से जा रहे थे तो सिपाही ने बिना उनको फुट पाथ से उतर जाने को कहे उनको धक्का मारा,लात मारी और नीचे पटक दिया ! उसी समय मिस्टर कोट्स जो अटॉर्नी थे वहां से घोड़े पर सबार होकर निकल रहे थे उन्होंने गांधी जी को पुकारा और कहा मेने सब देखा है आप इस पर मुकदद्मा चलाएं में गबाही दूंगा मुझे इस बात का बहुत दुःख है की आप पर इस तरह का हमला किया गया ! गांधीजी ने कहा सिपाही के लिए तो सभी काले एक समान है उसका इसमें कोई दोष नहीं है ! गांधीजी ने कहा मेने तो यह नियम ही बना लिया है की मुझ पर जो बीतेगी उसके लिए में अदालत में नहीं जाऊँगा ! सिपाही डच था कोट्स ने उसको डाटा उसने गांधीजी से माफ़ी मांगी किन्तु गांधीजी तो उसे पहले ही माफ़ कर चुके थे ! किन्तु इस घटना ने गांधी जी को प्रवासी भारतीयों के प्रति होनेवाली अपमान जनक घटनाओं के प्रति और अधिक सम्बेदन शील और तीब्र बना दिया ! गांधीजी ने अनुभव किया की स्वाभिमान की रक्छा चाहने वाले भारतीयों के लिए साउथ अफ्रीका उपयुक्त देश नहीं है यह स्थिति किस प्रकार समाप्त की जा सकती है ! इसके विषय में गांधीजी का दिल दिमाग अधिक गहराई से सोचने लगा
मनु स्मृति भारत में सामजिक व्यबस्था को नियंत्रित करने वाली प्रथम कानून
की पुष्तक है !कानून समय और परिश्थिति के अनुसार हमेशा बदलता रहता है
!इसिलए मनु स्मृति के बाद भी अनेकों स्मृतियों को लिखा गया ! जिनमे
याजबल्क्य स्मृति प्रमुख है !और इसमें मनु के समय के बहुत से कानून बदल दिए
गए हैं !अब तो सारे विश्व में शाशन ब्यबस्था बदल गयी है !इसीलिए कानून का
निर्माण देशों की सरकारें करती हैं !कोई धार्मिक किताब नहीं करती है !सिर्फ
इस्लामिक राष्ट्रों में जरूर इस्लामिक कानून लागू है !बुरी आदतों
का निर्माण कैंसे होता है ?क्यों होता है ?और उनके निराकरण के लिए क्या
उपाय किये जाने चाहिए ? !इसका मूल कारण गीता में बताया गया है !अर्जुन
भगवान श्री कृष्णा से पूँछता है मनुष्य ना चाहता हुआ भी जबरदस्ती लगाए हुए
की तरह किस से प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?३(३६) भगवान श्री कृष्णा
उत्तर देते हुए कहते हैं !कामनाएं ही पाप का कारण है ! और कामनाओ की
पूर्ति में जब बाधा उत्पन्न होती है ! तब क्रोध का जन्म होता है ! किसी
भी मनुष्य की सभी कामनाएं कभी भी पूरी ना हुई हैं ! और ना हो सकती हैं ! और
ना होंगी ! कामनाएं ही जब अवांछित और अनियंत्रित हो जाती हैं तब
मनुष्यों को पाप अर्थात गलत कार्य करने को प्रेरित करती हैं !अवांछित और
अनियंत्रत अतृप्त कामनाएं ही मनुष्यों की शत्रु हैं ! जैसा में चाहूँ उसकी
प्राप्ति हो जाय इसी को कामना कहते हैं ! इन्ही कामनाओ में अनंत पाप भरे
हुए हैं ! जब तक मनुष्य के अंदर अवांछनीय कामनाओ की तृप्ति के लिए गलत पाप
पूर्ण कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश नहीं हो जाता है ! तब तक मनुष्य
सर्वथा निर्दोष नहीं हो सकता है ! कामनाओ के सिवाय पाप और क्रोध का कोई
अन्य कारण नहीं है ! मनुष्य से ना तो ईश्वर पाप कराता है ! न परिस्थिति पाप
कराती है और ना धर्म ही पाप कराता है ! प्रत्युत मनुष्य स्वयं ही कामनाओ
के बसी भूत हो कर पाप और क्रोध करता है
१---- जो आत्मकल्याण में संलग्न रहता है !वही धीर कहलाता है !जो दुःख में खिन्न नहीं हो उठता है ! और सुख में मतवाला नहीं हो उठता है और सबके साथ समान व्योहार करता है उसी को धीर कहा गया है !
२----आसक्ति से ही भय होता है ! हर्ष ,शोक ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति से ही होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में अनुराग और प्रेम होता है इन सबसे मनुष्य को महान अनर्थ की प्राप्ति होती है!
३---जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है ! उसी प्रकार विषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ तथा मानसिक शांति का नाश कर देती है !
२----आसक्ति से ही भय होता है ! हर्ष ,शोक ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति से ही होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में अनुराग और प्रेम होता है इन सबसे मनुष्य को महान अनर्थ की प्राप्ति होती है!
३---जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है ! उसी प्रकार विषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ तथा मानसिक शांति का नाश कर देती है !
Wednesday, 8 June 2016
आसन प्राणायाम योग के बहिरंग साधन हैं !योग नहीं हैं ------- जैसे रेल विछाने की पटरी का नक्शा रेल की पटरी नहीं होता या मकान बनाने का नक्शा मकान नहीं होता है !इसी प्रकार योग के साधन योग नहीं हो सकते हैं !योग को प्राप्त करने के लिए योग के साधक को सब और से इंद्रियों , मन और बुद्धि की ब्रत्तियों को रोक कर सर्व व्यापी आत्मा के साथ उनकी एकता स्थापित करना ही योगशश्त्रियों के मत में योग है
२--विद्वानों ने काम ,क्रोध ,लोभ ,भय और स्वप्न ( अत्यधिक निद्रा) ये योग के पांच दोष बताये हैं !इनका पूर्ण रूप से उच्छेद करे !क्रोध को i शम (मनो निग्रह ) से जीते !काम को संकल्प क त्याग द्वारा पराजित करे !तथा सतोगुण के द्वारा निद्रा पर विजय प्राप्त करे !धैर्य का सहारा लेकर विषय भोग और भोजन की चिंता से मुक्त हो जाय !नेत्रों की सहायता से हाथ और पैरों की ! मन के द्वारा नेत्र और कानों की ! तथा कर्म के द्वारा मन और वाणी की रक्छा करे ! अर्थात इन सबको शुद्ध बनाये ! सावधानी के द्वारा भय का और विद्वान पुरुषों के सत्संग से दम्भ ,पाखण्ड और झूठ का परित्याग करे !इस प्रकार सदैव सावधानी पूर्वक आलस्य छोड़ कर इन योग सम्बन्धी दोषों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए !योग के साधक को चाहिए की किसी को पीड़ा देने वाली हिंसयुक्त ,कठोर वाणी का प्रयोग ना करे ! जो कुछ दिखाई दे रहा है उसका बीज (सबका कारण ) तेजोमय ब्रह्म है है !सम्पूर्ण श्रष्टि उसी ब्रह्म का कार्य है ! सम्पूर्ण चरा चर जगत उस ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ! इस साधना से संपूर्ण श्रष्टि के साथ मित्रता स्थापित करे ! और अपनी बुद्धि ,मन मस्तिष्क को हिंसा ,लोभ ,और भोग से मुक्त करे !
२--विद्वानों ने काम ,क्रोध ,लोभ ,भय और स्वप्न ( अत्यधिक निद्रा) ये योग के पांच दोष बताये हैं !इनका पूर्ण रूप से उच्छेद करे !क्रोध को i शम (मनो निग्रह ) से जीते !काम को संकल्प क त्याग द्वारा पराजित करे !तथा सतोगुण के द्वारा निद्रा पर विजय प्राप्त करे !धैर्य का सहारा लेकर विषय भोग और भोजन की चिंता से मुक्त हो जाय !नेत्रों की सहायता से हाथ और पैरों की ! मन के द्वारा नेत्र और कानों की ! तथा कर्म के द्वारा मन और वाणी की रक्छा करे ! अर्थात इन सबको शुद्ध बनाये ! सावधानी के द्वारा भय का और विद्वान पुरुषों के सत्संग से दम्भ ,पाखण्ड और झूठ का परित्याग करे !इस प्रकार सदैव सावधानी पूर्वक आलस्य छोड़ कर इन योग सम्बन्धी दोषों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए !योग के साधक को चाहिए की किसी को पीड़ा देने वाली हिंसयुक्त ,कठोर वाणी का प्रयोग ना करे ! जो कुछ दिखाई दे रहा है उसका बीज (सबका कारण ) तेजोमय ब्रह्म है है !सम्पूर्ण श्रष्टि उसी ब्रह्म का कार्य है ! सम्पूर्ण चरा चर जगत उस ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ! इस साधना से संपूर्ण श्रष्टि के साथ मित्रता स्थापित करे ! और अपनी बुद्धि ,मन मस्तिष्क को हिंसा ,लोभ ,और भोग से मुक्त करे !
कथा -----प्रेटोरिया में प्रथम दिन ------१८९३ का प्रेटोरिया स्टेसन १९१४ के स्टेसन से बिलकुल भिन्न था ! मुझे स्टेसन पर कोई भी सेठ अब्दुल्ला का आदमी रविवार होने के कारण लेने नहीं आया था ! में सोचने लगा कि कहाँ जाऊं होटल में जगह मिलाने की आशा नहीं थी मेने टिकट कलेकटर से किसी छोटे होटल का पता पूंछा किन्तु उसने मेरी कोई मदद नहीं की ! उसके बगल में एक अमेरिकन हब्शी सज्जन खड़े हुए थे 1 उन्होंने मुझ से कहा आप मेरे साथ चलें में आपको एक छोटे से होटल में ले चलता हूँ उसका मालिक अमेरिकन है और में उसे अच्छी तरह जानता हूँ ! वह आपको होटल में जगह दे देगा ! बे मुझे जॉन्स्टन के फैमिली होटल में लेगए ! जॉन्स्टन ने कहा में आपको एक रात के लिए होटल में जगह दे देता हूँ किन्तु आपको भोजन अपने कमरे में ही करना होगा ! यद्द्पि मेरे मन में काले गोरे का कोई भेद नहीं है किन्तु मेरे अधिकतर ग्राहक गोरे हैं यदि में आपको भोजनग्रह में भोजन दूंगा तो बे बुरा मान जाएंगे और हो सकता है कि बे चले भी जाएँ ! मेने कहा में आपकी कठिनाई समझ सकता हूँ मुझे आप खुसी से मेरे कमरे में भोजन दी जिए 1 जब मैं कमरे में भोजन का इंतजार कर रहा था तो मेने वेटर के बजाय जॉन्स्टन को आते देखा उन्होंने कहा आप भोजनग्रह में भोजन कर सकते हैं मेरे गोरे ग्राहकों को कोई आपत्ति नहीं है 1 आप यहाँ जब तक रहना चाहें यहाँ रहें गोरों की तरफ से कोई रूकाबट नहीं होगी ! मेने मन ही मन भगवान् को धन्यबाद दिया और जॉन्स्टन का उपकार मानकर भोजन गृह मैं निश्चिन्त होकर भोजन किया ! दूसरे दिन में अब्दुल्ला सेठ के अंग्रेज वकील बेकर से मिलने गया बे मुझ से प्रेम पूर्वक मिले !उन्होंने मुझ से मेरे बारे मैं कुछ बातें पुंछी 1उन्होंे कहा मुकदद्मा लम्बा है और पेचिदीयों से भरा हुआ है 1मिकददमे के लिए बहुत बड़े बड़े और योग्य बेरिस्टर खड़े किये गए हैं !इसीलिए बेरिस्टर के रूप मैं आपकी बहुत अधिक आवष्यकता नहीं पड़ेगी किन्तु मुझे यह फायदा मिलेगा कि मैं अपने मुबिक्कल की बात आसानी से समझ सकूंगा !
शीतलता ,रस,गीला करना ,पिघलना ,चिकनाहट ,सौम्य भाव जिभ्या ,टपकना ,ओले या बर्फ के रूप में जम जाना पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले चावल ,दाल ,सब्जी अदि को गला देना ---ये सब जल के गुण हैं!
२--भयानक रूप ग्रहण करना ,जलना ,ताप देना ,पकाना ,प्रकाश करना ,शोक ,राग ,हल्कापन ,तीकछनता,और आग की लपटों का सदा ऊपर की और उठना तथा प्रकाशित होना -----ये सब अग्नि के गुण हैं !
३---अनियत स्पर्श ,वाणी की स्थिति ,चलने फिरने अदि की स्वतंत्रता ,बल ,शीघ्र गामिता .मलमूत्र अदि शरीर से बाहर निकालना ,उत्पेछन् आदि कर्म क्रिया शक्ति ,प्राण और जन्म ,मृत्यु ----ये सब वायु के गुण हैं
४---शव्द ,व्यापकता ,किसी स्थूल पदार्थ के आश्रित ना होना ,स्वयं प्रभूत औरकिसी दूसरे आधार पर ना रहना ,अव्यक्तता ,निर्विकारिता ,प्रतिघात शून्यता और श्रवण इंद्रिय का कारण होना और विकृति से मुक्त होना ---ये सब आकाश के गुण हैं
५----स्थिरता ,भारीपन ,,कड़ापन ,बीज को अंकुरित करने की शक्ति ,गंध ,विशालता ,शक्ति ,संघात ,स्थापना और धारण करने की शक्ति ----ये दस पृथ्वी के गुण हैं ! ,
1
२--भयानक रूप ग्रहण करना ,जलना ,ताप देना ,पकाना ,प्रकाश करना ,शोक ,राग ,हल्कापन ,तीकछनता,और आग की लपटों का सदा ऊपर की और उठना तथा प्रकाशित होना -----ये सब अग्नि के गुण हैं !
३---अनियत स्पर्श ,वाणी की स्थिति ,चलने फिरने अदि की स्वतंत्रता ,बल ,शीघ्र गामिता .मलमूत्र अदि शरीर से बाहर निकालना ,उत्पेछन् आदि कर्म क्रिया शक्ति ,प्राण और जन्म ,मृत्यु ----ये सब वायु के गुण हैं
४---शव्द ,व्यापकता ,किसी स्थूल पदार्थ के आश्रित ना होना ,स्वयं प्रभूत औरकिसी दूसरे आधार पर ना रहना ,अव्यक्तता ,निर्विकारिता ,प्रतिघात शून्यता और श्रवण इंद्रिय का कारण होना और विकृति से मुक्त होना ---ये सब आकाश के गुण हैं
५----स्थिरता ,भारीपन ,,कड़ापन ,बीज को अंकुरित करने की शक्ति ,गंध ,विशालता ,शक्ति ,संघात ,स्थापना और धारण करने की शक्ति ----ये दस पृथ्वी के गुण हैं ! ,
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Tuesday, 7 June 2016
गांधी कथा --अधिक परेशानी -----ट्रैन सुबह चार्लेस टाउन पहुंची ! उन दिनों चार्लस टाउन से जोहानिस बर्ग पहुंचने के लिए ट्रैन नहीं चलती थी घोड़ों द्वारा चलने वाली सिकरम से जाना पड़ता था ! भारतीय होने के कारण गांधीजी को सिकरम के अंदर गोरे यात्रियों के बगल में ना बैठाकर सिकरम के बाहर बैठाया गया ! सिक्रम के गोरे मुखिया को सिगरेट पीनी थी और हबा खानी थी इसलिए उसने गांधी जी से कहा की अब उस जगह पर वह बैठेगा और गांधीजी को अपने पैरों के पास बैठने को कहा ! गांधीजी ने जगह से उठने और उसके पेरो के पास नीचे बैठने से मना कर दिया गोरे ने गांधीजी को तमाचे जड़ने शुरू कर दिए गांधी जी की इस निर्मम पिटाई को सभी यात्री देख रहे थे ! गोरा पीटने के साथ गालियां भी दे रहा था ! कुछ यात्रियों को दया आयी और उन्होंने कहा इस बेचारे को क्यों पीट रहे हो ? गोरे ने मारपीट बंद कर दी किन्तु धमकी दी कि सिकरम स्टेंडरटन पहुँचाने दे फिर तुझे देखूंगा !रात में सिकरम स्टेंडरटन पहुंची वहां गांधीजी कोकई हिन्दुस्तानी चेहरे दिखाई दिए जिस से उनको कुछ तसली हुई ! स्टेंडरटन छोटा सा गाओं है जोहानिसबर्ग विशाल शहर है ! जोहानिस बर्ग में गांधीजी ने होटल में ठहरने का प्रयत्न किया बे चार पांच होटलों में गए किन्तु सभी होटलों ने जगह नहीं है यह कहकर गांधीजीको होटल में रुकने के लिए जगह नहीं दी १ इसीलिए गांधीए जी ने गाडी वाले से मुहम्मद कासिम कमरुद्दीन की दूकान पर ले जाने कोकहा वहां अब्दुल गनी सेठ उनका इन्तजार कर रहे थे ! उन्होंने गांधीजी का स्वागत किया ! गांधीजी ने उन्हें होटल में जगह ना मिलने की बात बतायी 1बे यह सुनकर खिलखिलाकर हंस पड़े और बोले बे हम लोगों कोहोतल में नहीं ठहरने देते हैं ! गांधीजी ने पूंछा क्यों नहीं ?उन्होंने कहा यह बात आप कुछ दिन रहने के बाद समझ जाएंगे ! इस देश में हमारे जैसे अपमान सहने वालेलोग ही रह सकते हैं क्योंकि हमें व्यापार करना है और पैसे कमाने हैं ! ये कहकर उन्होंने हिन्दुस्तानियों पर होने वाले अत्याचारों को विस्तार से बताया ! ये देश आपके समान लोगों को रहने के लिए नहीं है ! कल आपको प्रेटोरिया जाना है यहाँ आपको तीसरे दर्जे में ही ट्रैन में जगह मिलेगी यहां पर हिन्दुस्तानियों कोपहले और दूसरे दर्जे का टिकट नहीं दिया जाता है !मेने रेलवे के नियम आगे उनमे i इस बात की गुंजाइश थी ! गांधीजी ने स्टेसन मास्टर को पत्र भेजा उसमें उन्होंने अपने बैरिस्टर होने कीबात लिखी और यह भी लिखा कि बे हमेशा प्रथम श्रेणी में ही यात्रा करते हैं ! गांधीजी स्टेसन पर पहुंचे ! स्टेसन मास्टर ने कहा मै आपको एक शर्त पर प्रथम श्रेणी का टिकट दे सकता हूँ कि अगर ट्रैन में गार्ड आपको उतार दे और दूसरे या तीसरे डिब्बे में बैठने के लिए मजबूर करे तो मुझे आप कोसना नहीं ! अब्दुल गनी सेठ गांधीजी को विदा करने आये थे उन्होंने गांधीजी से कहा कि आप सुरक्छित प्रेटोरिया पहुँच जाएँ ! मुझे डर है कि गार्ड आपको प्रथम दर्जे के डिब्बे में नहीं बैठने देगा अगर गार्ड आपको बैठने भी देगा तो गोरे यात्री आपको डिब्बे से उतार देंगे ! ट्रैन आयी गांधी जीपहले दर्जे के डिब्बे में बैठ गए डिब्बे में गांधीजी के अलावा सिर्फ एक अंग्रेज यात्री और था ! गार्ड आया वहां गांधीजी को देखते ही गुस्सा हो गया उसने अंगुली से इशारा किया तीसरे दर्जे के डिब्बे में जाओ गांधीजी ने प्रथम श्रेणी का टिकट दिखाया उसने कहा टिकट अपने पास रखो और फ़ौरन इस डिब्बे से उतरो और तीसरे दर्जे के डिब्बे में जाओ ! अंग्रेज यात्री ने गार्ड को आड़े हांथों लिया और कहा तुम इन भले आदमी कोक्यों परेशान करते हो इनके पास पहले दर्जे का टिकट है मुझे इनके यहाँ बैठने से कोई कष्ट नहीं है ! गार्ड बडबडाया और उस अंग्रेज यात्री से बोला की अगर तुम कुली के साथ बैठे रहना चाहते हो तो मेरा क्या बिगड़ता है? और यह कहता हुआ चलागया !उस अंग्रेज यात्री की बजह से गांधी जी अपमान से बच गए औरउन्हें डिब्बे से नहीं उतारा गया !
Monday, 6 June 2016
गांधी कथा ----- अनुभवों की बानगी ----गांधीजी को डरबन पहुंचे ६,७ दिन हो चुके थे कि इतने में फर्म के वकील की तरफ से पत्र मिला कि मुकदद्मे की पैरवी के लिए या तो खुद सेठ अब्दुल्ला को प्रेटोरिया पहुँचाना चाहिए या किसी और को भेजना चाहिए !गांधीजी 7बें या ८ बें दिन डरबन से रबाना हुए उनके लिए ट्रैन में प्रथम श्रेणी का टिकट कटाया गया ! ट्रैन लगभग ९ बजे रात्रि को नेटाल की राजधानी मेरीतस्बर्ग पहुंची वहां पर एक आदमी गांधीजी के डिब्बे में आया उसने गांधीजी की तरफ देखा और उनके गेहुआं रंग को देख कर परेशान हुआ और बाहर निकल गया और अपने साथ दो अफसरों को लेकर आया ! एक अफसर ने गांधीजी से कहा तुम इस डिब्बे को छोड़ दो और आखिरी डब्बे में जाओ गांधीजी ने कहा मेरे पास प्रथम श्रेणी का टिकट है और मुझे डरबन से इसी डिब्बे में बैठाया गया है ! अफसर ने कहा इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना होगा अगर तुम डिब्बा मेरे कहने से खाली नहीं करोगे तो मुझे पुलिस बुलानी पड़ेगी जो तुमको इस डिब्बे से जबरन निकाल देगी ! गांधी जी ने कहा भले ही सिपाही मुझे डिब्बे से उतारे में स्वयं नहीं उतरूंगा क्योंकि इस डिब्बे में यात्रा करना मेरा कानूनी अधिकार है ! सिपाही आया उसने गांधीजी का हाथ पकड़ा और धक्का देकर नीचे उतार दिया और उनका सामान भी उतार दिया गांधीजी ने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया ! ट्रैन चलदी गांधीजी वेटिंग रूम में जाकर बैठ गए ! दक्छिन अफ्रीका में बहुत तेज सर्दी पड़ती है ! गांधीजी को ठण्ड का प्रकोप सहना पड़ा बे रात भर ठण्ड से कांपते रहे ! इस स्थिति में गांधी जी ने अपने कर्तव्य पर विचार किया ! या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या बापिस भारत लौट जाना चाहिए या फिर अपमान सहकर भी प्रिटोरिया पहुंचना चाहिए ? गांधी जी को यह बात इस घटना से स्पष्ट हो गयी कि यह रंग भेद महारोग है यदि मुझ में इस रोग को मिटाने की शक्ति हो तो मुझे उसका उपयोग इस महारोग रंग भेद और नसल भेद को मिटने के लिए करना चाहिए ! यह निश्चय करके गांधीजी ने दूसरी ट्रैन से आगे जाने का फैसला किया ! सवेरे गांधीजी ने जनरल मैनेजरको शिकायत का लम्बा तार भेजा !जनरल मेनेजर ने अपने अधिकारियों के व्योहार का बचाव किया किन्तु गांधीजी को बिना किसी रूकाबट के गंतव्य तक पहुँचाने के लिए स्टेशन मास्टर को आदेश दिया ! बहुत से भारतीय व्यपारी गांधीजी से मिलने स्टेशन पर आये उन्होंने अपने ऊपर पड़ने वाले कष्टों की कहानी गांधी जी को बतायी और उनसे कहा की जो उन पर बीती है उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है !जब हिन्दुस्तानी लोग पहले या दूसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा करते हैं तो अधिकारियों की और से रूकाबट खड़ी की जाती है 1 गोरे यात्री भी हिन्दुस्तानियों के साथ यात्रा करना पसंद नहीं करते है और हिन्दुस्तानियो के साथ दुर्व्योहार करते हैं !
Sunday, 5 June 2016
गांधी कथा ------दक्छिन अफ्रीका गए -------१० जून १८९१ में गांधीजी ने इनर टेम्पल ऑफ़ लॉ लंदन से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की !और अप्रैल १८९३ में बे पोरबंदर गुजरात की फर्म जिसका व्यापार दक्छिन अफ्रीका में था उसके वकील के रूप में दक्छिन अफ्रीका के लिए मुंबई से समुद्री जहाज से प्रस्थान किया ! उस समय गांधी जी की आयु २४ साल की थी !अफ्रीका संसार के बड़े से बड़े महाद्वीपों में से एक है ! भारत भी महाद्वीप जैसा देश माना जाता है परन्तु अफ्रीका के भू भाग में से केवल छेत्रफल की दृष्टि से ४ या ५ भारत बन सकते हैं !गांधीजी मई के अंत में नेटाल पहुंचे ! नेटाल के बंदरगाह को डरबन भी कहा जाता था ! गांधीजी को लेने के लिए उनके मुब्बकिल अब्दुल्ला सेठ बंदरगाह पर आये थे ! गांधी जी उस समय फ्राक कोट ,पैंटलून और सर पर बंगाली ढंग की पगड़ी पहने हुए थे ! दक्छिन अफ्रीका में रहने वाले सभी भारतीयों को कुली कहा जाता था ! इसीलिए गांधीजी को भी कुली बैरिस्टर कहा जाता था ! व्योपारी कुली व्योपारी कहलाते थे ! सभी भारतीय इस अपमान को बर्दास्त करते थे ! अब्दुल्ला सेठ गांधीजी को डरबन की एक अदालत दिखाने लेगएऔर कुछ जान पहचान कराई ! वहां पर गांधीजी अब्दुल्ला सेठ के अंग्रेज वकील के पास बैठ गए ! मजिस्ट्रेट गांधीजी को बार बार देख रहा था ! उसने गांधीजी से पगड़ी उतारने को कहा गांधीजी ने पगड़ी उतरने से मना कर दिया और अदालत से बाहर चले गए 1 गांधी जी की दक्छिन अफ्रीका में लड़ाई की शुरुआत इसी प्रकरण से हो गयी थी ! यह पगड़ी की घटना समाचार पत्रों में विस्तार से प्रकाशित हुई ! अखबारों में इस घटना को अन्वेलकम विजिटर ----- अबांछित अतिथि के शीर्षकोिं के रूप में प्रकाशित किया गया 1तीन ,चार दिनों के अंदर ही गांधीजी दक्छिन अफ्रीका में प्रसिद्ध हो गए ! अखबारों में कुछ लोगों ने गांधी जी का पक्छ लिया और कुछ ने गांधीजी की धृष्टता की कड़ी निंदा भी की !
Saturday, 4 June 2016
पर्याबरण के विनाश के लिए जिम्मेदार लोगों पर नियंत्रण करना होगा ---------पानी का कम से कम प्रयोग करो ,एक एक बूँद को बचाओ ,उपयोग के लिए आम जन लकड़ी का प्रयोग ना करें जमीन से मिटटी और नदियों से बालू तथा पहाड़ों से गिट्टी आदि ना ली जाय ----- ये सारी हिदायतें सरकार की ओर से और समाजसेवी संगठनों ,और चिंतकों ,विचारकों अदि की ओर से जुलूस निकालकर ,शपथ ग्रहण समारोह कर ,विचारगोष्ठी अदि आयोजित कर जनसामान्य को दी जाती हैं !इनका प्रकाशन समाचार पत्रों में भी होता है !यह भी एक महत्त्व पूर्ण कार्य है !किन्तु इससे भी अधिक महत्त्व पूर्ण कार्य है उन लोगों पर नियंत्रण करना जो पर्यावरण का विनाश कर सामान्य लोगो का जीवन कष्टमय और नष्ट करते हैं !
(१)सरकार के द्वारा सड़कनिर्माण ,औदौगिक प्रतिष्ठान ओर विकास के लिए अंधाधुंध जंगलों का विनाश ओर ब्रक्छों की कटाई तथा कटे हुए ब्रक्छों के स्थान पर ब्रक्छा रोपण ना करना ! और सरकारी बिभागों और जंगलविभग द्वारा ब्रक्छा रोपण के फर्जी आंकड़े प्रस्तुत करना
(२) उद्द्योग पतियों द्वारा कारखानों के गंदे ओर प्रदूषित जल को नदियों में डालना !ओर सरकारी अधिकारियों के सहयोग से ओर नेताओं के संरक्छण में इस अत्यन्त पर्यावरण विनाशक कार्य का जारी रहना !
(३) प्राकृतिक संसाधनों बालू ,गिट्टी ,मिटटी अदि का अवैध निर्ममता पूर्वक दोहन और इन पर नियंत्रण ना हो पाना आदि!
जो लोग उपर्युक्त विधि से पर्यावरण विनाश में लगे हुए है .बे सब अत्यन्त प्रभावशाली ,ओर शक्तिशाली लोग हैं !आमजनता उनको रोक नहीं सकती है !पर्यावरण का विनाश ये लोग करते हैं !ओर परिणाम जनता भोगती हैं !ओर यही लोग जनता को पर्यावरण संरक्छण का उपदेश भी देते हैं !इन पर्यावरण विनाशक लोगों को पर्यावरण विनाश से आर्थिक लाभ भी बहुत होता है !ब्रक्छों के कटाने से गर्मी बढ़ती है !तो बिजली के पंखे ,कूलर आदि का उत्पादन बढ़ जाता है !बिजली के अधिक उपयोग के कारण विजली की खपत बढ़ जाती है !जिसकी पूर्ति के लिए जनरेटर ,इन्वर्टर आदि का उत्पादन बढ़ता है !वायु ओर जल प्रदुषण की मुक्ति के लिए ऑक्सीजन मास्क ओर मिनरल वाटर और आर ओ आदि की बिक्री बढ़ जाती है !भासन देने के रोग से ग्रस्त भासण देने वालों और समय काटने के लिए समाज सेवा करने वाले लोगों को भेी समाज सेवा का अवसर प्राप्त हो जाता है !और आमजनता जिसका पर्यावरण विनाश से कोई सम्बन्ध नहीं होता है वह कष्ट भी भोगती है और इनके भासण भी सुनती है !परमात्मा ने पर्याप्त जल की व्यबस्था की है ,रहने के लिए जल जंगल और जमीन भी दी है !किन्तु इन थोड़ से लोगों की लालच के कारण और कुछ धर्मों की गलत मान्यताओं के कारण अवाडी के विस्फोट के कारण जनसामान्य कष्ट भोग रहा है !अगर ये पर्यावरण विनाशक लोग लालच का त्याग कर पर्यावरण का विनाश ना करें और प्रकृति के स्वाभाविक विकास में अवरोध उत्पन्न ना करें तो पर्यावरण अपने आप सुरक्छित हो जाएगा !
(१)सरकार के द्वारा सड़कनिर्माण ,औदौगिक प्रतिष्ठान ओर विकास के लिए अंधाधुंध जंगलों का विनाश ओर ब्रक्छों की कटाई तथा कटे हुए ब्रक्छों के स्थान पर ब्रक्छा रोपण ना करना ! और सरकारी बिभागों और जंगलविभग द्वारा ब्रक्छा रोपण के फर्जी आंकड़े प्रस्तुत करना
(२) उद्द्योग पतियों द्वारा कारखानों के गंदे ओर प्रदूषित जल को नदियों में डालना !ओर सरकारी अधिकारियों के सहयोग से ओर नेताओं के संरक्छण में इस अत्यन्त पर्यावरण विनाशक कार्य का जारी रहना !
(३) प्राकृतिक संसाधनों बालू ,गिट्टी ,मिटटी अदि का अवैध निर्ममता पूर्वक दोहन और इन पर नियंत्रण ना हो पाना आदि!
जो लोग उपर्युक्त विधि से पर्यावरण विनाश में लगे हुए है .बे सब अत्यन्त प्रभावशाली ,ओर शक्तिशाली लोग हैं !आमजनता उनको रोक नहीं सकती है !पर्यावरण का विनाश ये लोग करते हैं !ओर परिणाम जनता भोगती हैं !ओर यही लोग जनता को पर्यावरण संरक्छण का उपदेश भी देते हैं !इन पर्यावरण विनाशक लोगों को पर्यावरण विनाश से आर्थिक लाभ भी बहुत होता है !ब्रक्छों के कटाने से गर्मी बढ़ती है !तो बिजली के पंखे ,कूलर आदि का उत्पादन बढ़ जाता है !बिजली के अधिक उपयोग के कारण विजली की खपत बढ़ जाती है !जिसकी पूर्ति के लिए जनरेटर ,इन्वर्टर आदि का उत्पादन बढ़ता है !वायु ओर जल प्रदुषण की मुक्ति के लिए ऑक्सीजन मास्क ओर मिनरल वाटर और आर ओ आदि की बिक्री बढ़ जाती है !भासन देने के रोग से ग्रस्त भासण देने वालों और समय काटने के लिए समाज सेवा करने वाले लोगों को भेी समाज सेवा का अवसर प्राप्त हो जाता है !और आमजनता जिसका पर्यावरण विनाश से कोई सम्बन्ध नहीं होता है वह कष्ट भी भोगती है और इनके भासण भी सुनती है !परमात्मा ने पर्याप्त जल की व्यबस्था की है ,रहने के लिए जल जंगल और जमीन भी दी है !किन्तु इन थोड़ से लोगों की लालच के कारण और कुछ धर्मों की गलत मान्यताओं के कारण अवाडी के विस्फोट के कारण जनसामान्य कष्ट भोग रहा है !अगर ये पर्यावरण विनाशक लोग लालच का त्याग कर पर्यावरण का विनाश ना करें और प्रकृति के स्वाभाविक विकास में अवरोध उत्पन्न ना करें तो पर्यावरण अपने आप सुरक्छित हो जाएगा !
Friday, 3 June 2016
गांधी जी पर मिथ्या आरोप और उनकी निंदा --------- संघ के स्वयंसेवक और भाजपा के राष्ट्रिय महामंत्री ने गांधीजी पर अनेक आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कोई हिस्सा नहीं लिया था !और लोगों को देदी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल !सावरमती के संत तूने कर दिया कमाल नहीं गाना चाहिए आदि ! गांधी जी पूर्ण रूप से अहंकार और राग द्वेष आदि दुर्गुणों से मुक्त हो गए थे !बे सत्य ,अहिंसा के ब्रतधारी थे सत्याग्रह आश्रम अहमदाबाद की दीवाल पर गांधी जी के यह शव्द आज भी खुदे हुए हैं कि -----मेरे पास कुछ भी संसार को नया बताने या शिक्छन् देने के लिए नहीं है !सत्य और अहिंसा जिनका अनुसरण मेने जीवन भर किया है और जिनको आचरण में उतारने के लिए में सतत प्रयत्न शील रहा हूँ बे भारत में सनातन काल से विद्यमान हैं !इसीलिए गांधीजी पर लगाए गए आरोपों का जबाब नम्रता और बिना कटुता के ही दिया जा सकता है !गांधी जी ने अपने अनुयायिओं से कहा था कि बे उन पर लगाए जाने वाले आरोपों से उनका बचाव ना करें !अहिंसक प्रिक्रिया में हिंसा और क्रोध का कोई स्थान नहीं है !इसीलिए गांधी जी ने अपने विरोधियों का सदैव प्रेम से उनका ह्रदय परिवर्तन किया था !इस तरह के हजारों उदाहरण गांधी जी के जीवन में देखे जा सकते हैं !जहाँ गांधी जी के प्रेम से लोगों के ह्रदय परिवर्तित हुए !लोकमान्य तिलक गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे !जब बे मंडाले कारागार से मुक्त होकर आये तब उन्होंने गांधीजी से बेलगांव में मुलाक़ात की थी !गांधीजी से लम्बी बातचीत के बाद उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था कि गांधीजी हमारे काम के नहीं हैं किन्तु उनका चरित्र और देश भक्ति इतनी उज्जवल है कि उनका विरोध हमलोगों को किसी भी स्तर पर नहीं करना चाहिए !लोकमान्य तिलक की मृत्यु पर गांधीजी पूरी रात नहीं सोये थे !उन्होंने कहा था आज हमारे बीच से स्वराज्य का अखण्ड जाप करने वाला चला गया है !अब हमारे कन्धों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आगयी है !उन्होंने तिलक की स्मिृति के लिए तिलक स्वराज्य फंड में देश भर में भ्रमण कर एक करोड़ का चन्दा भी इकठ्ठा कर दिया था !महर्षि अरविंदो भी अहिंसा को राजनीति में पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करते थे !उनकी और गांधी जी की कभी मुलाकात नहीं हुई!उन्होंने अपने एक शिष्य के हाथों गांधीजी के पास अपनी एक पुस्तक लाइफ डिवाइन भेजी थी !जिस पर उन्होंने लिखा था की ईश्वर ने आपको देश सेवा के लिए चुन लिया है !अरविंदो के प्रणाम !जब गांधी जी दक्छिन अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे तब वहां का प्रशाशक फील्ड मार्शल स्मिथ गांधीजी का प्रवल विरोधी था 1किन्तु गांधीजी ने प्रेम से उसका भी ह्रदय परिवर्तित कर दिया था !जब गांधीजी ने १९४२ में अंग्रेजो भारत छोडो का नारा दिया था !तब विश्व के अधिकाँश राष्ट्र उनके विरोध में थे !उस समय स्मिथ और बर्नार्ड शॉ गांधीजी के समर्थन में पूरी तरह खड़े रहे !इंग्लैंड का तत्कालीन प्रधान मंत्री चर्चिल गांधी जी को ब्रिटिश राज्य का प्रवल विरोधी मानता था !और उनको समाप्त कर देना चाहता था !वह गांधीजी को खूसट बूढ़ा और नंगा फ़कीर कहता था !गांधीजी ने उसको १७ जुलाई १९४४ को पत्र लिखकर कहा था कि खबर है कि आप इस सीधे सादे नंगे फ़कीर को कुचल डालने की इक्छा रखते हैं ! में बहुत अरसे से फ़कीर और बो भी नंगा जो और भी कठिन काम है ,बनने की कोशिश कर रहा हूँ ! इसीलिए में आपके इस कथन को अपनी प्रशंसा ही समझता हूँ ! तो में आपसे उसी हैसियत से अनुरोध करता हूँ कि मुझ पर विश्वास कीजिये और मेरा उपयोग मेरी और अपनी कौम की सेवा के लिए तथा उसके द्वारा संसार की सेवा के लिए कीजिये ! आप गांधी को समाप्त कर सकते हैं किन्तु गांधी द्वारा आचरित सत्य ,अहिंसा को नष्ट नहीं कर सकते हैं -----आपका सच्चा मित्र एम के गांधी! कुछ दृष्टांत ऐसे भी हैं कि गांधीजी जहाँ अहिंसा और सत्य के प्रयोग से उनका ह्रदय परिवर्तन नहीं कर पाये !यह भी शायद संभव हो जाता अगर ये लोग गांधीजी की हत्या नहीं करते !ये वही लोग है जिनके ह्रदय आज भी हिंसा से भरे हुए हैं !वैदिक संस्कृति और हिन्दू धर्म का गुणगान करने वाले ये हिन्दू धर्म की कोई सीख स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं !अन्यथा यह कम से कम जो व्यक्ति निंदा का उत्तर देना के लिए मौजूद नहीं है !मृत्यु के बाद उस पर आरोप नहीं लगाते शायद गांधी जी पर आरोप लगाने से इन्हे राजनैतिक लाभ प्राप्त करने की आशा हो !और इसीलिए ये गांधीजी पर मिथ्या आरोपण करते रहते हैं !प्रधान मंत्री जी अमेरिका के राष्ट्र पति और चीन के राष्ट्रपति को गांधीजी का गीता भाष्य भेंट करते हैं ! गांधीजी के सत्याग्रह आश्रम का दर्शन कराते हैं !और भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और बहुत से भाजपा के समर्थक गांधीजी को गद्दार कहते हैं !!
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