भारत अब स्वाधीन होगया था गांधी जी की दृष्टि में उस राजनैतिक स्वाधीनता का बहुत अधिक महत्त्व नहीं था ,अगर वह जनसाधारण के युग के आगमन की घोसणा ना करे ! उन्होंने बार बार कहा था कि गोरे शाशकों की जगह काले शासकों के आजाने से उन्हें संतोष नहीं होगा उनकी दृष्टि में राजनैतिक स्वाधीनता का संग्राम अपने आप में कोई ध्येय नहीं था वह तो जनसाधारण की मुक्ति की दिशा में केवल पहला कदम था ! जब देश के हाथ में शासन की बाग़ डोर नहीं थी तब भी बे उसी ध्येय के लिए काम कर रहे थे ! गांधी जी की पुणे की आखिरी नजर बंदी के दिनों में उनसे एक बार यह पूंछा गया था---- यह कब कहा जाएगा की भारत को पूर्ण स्वाधीनता मिल गयी है ! गांधी जी ने उत्तर दिया कि जब आम जनता यह महसूस करे कि वह अपने ही प्रयत्न से अपनी स्थित सुधार सकती है और मनचाहे ढंग से अपने भाग्य का निर्माण कर सकती है ! उनसे फिर पूंछा गया क्या सत्ता के वैधानिक हस्तांतरण से आम जनता को बास्तव में पूरी सत्ता मिल सकती है ?क्या धीरे धीरे चलने की नीति से जन जागृति की गति रुक नहीं जाएगी और पुरानी शासन प्रणाली जारी रखने से क्रांतिकारी परिवर्तन की आशा पर पानीनहीं फिर जाएगा ?उन्होंने उत्तर दिया -----अगर सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण हो और आम जनता अंत तक अहिंसा पर डटी रहे ,तो ऐसा नहीं होगा 1 किन्तु स्वाधीनता के पहले और बाद के साम्प्रदायिक हत्याकांड ने सारी बाजी विगाड़ दी ! अपने चारों और होने वाली घटनाओं की खासकर स्वाधीनता मिलने के बाद जिस प्रकार से भारतीय राजनीति की दिशा बदली और जनता की उपेक्छा का सिल सिला प्रारम्भ हुआ और जन भागी दारी का अभाव बढ़ता गया और गांधी जी की निर्मम हत्या कर दी गयी उस से देश गांधी जी की जन सहभागिता के स्वप्न से वंचित हो गया ! अगर गांधी जी को जीवित रहने दिया गया होता तो देश इस दुर्दशा को प्राप्त नहीं होता और ना ही उसका यह स्वरुप होता ! सत्ता की प्राप्ति की भाग दौड़ में संलग्न आमजन से विशिष्ट जन बने लोग जनहित का कार्य करते स्वहित के निम्न स्वार्थों की निकृष्ट प्राप्ति के लिए छल कपट ,दम्भ ,पाखण्ड अदि दुर्गणों का सेवन करते हुए समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का ढिंढोरा नहीं पीटते बल्कि वास्तव में राष्ट्र निर्माण करते और उसका अनुभव आम जन को भी होता !
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